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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

७५- त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति, निधियोंका वर्णन, जयश्रीका बलिमें मिलना और बलिकी समृद्धिका वर्णन

३६० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७२
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ते चास्यै वरदा ब्रह्मन् जाताः सप्त महर्षयः।<br>व्रजध्वं तनयाः सप्त भविष्यन्ति न संशयः ॥ ४९<br>युवयोर्गुणसंयुक्ता महर्षीणां प्रसादतः।<br>इत्येवमुक्त्वा जग्मुस्ते सर्व एव महर्षयः ॥ ५० | ब्रह्मन्! सातों महर्षियोंने उसे वर दिया—तुम जाओ; महर्षियोंकी कृपासे तुम दोनोंको निःसन्देह सात गुणवान् पुत्र होंगे। इस प्रकार कहकर वे सभी महर्षि चले गये॥ ४९–५०॥
स चापि राजर्षिरगात् सभार्यो नगरं निजम्।<br>ततो बहुतिथे काले सा राज्ञो महिषी प्रिया ॥ ५१<br>अवाप गर्भं तन्वङ्गी तस्मान्नृपतिसत्तमात्।<br>गुर्विण्यामथ भार्यायां ममरासौ नराधिपः ॥ ५२<br>सा चाप्यारोढुमिच्छन्ती भर्तारं वै पतिव्रता।<br>निवारिता तदामात्यैर्न तथापि व्यतिष्ठत ॥ ५३<br>समारोप्याथ भर्तारं चितायामारुहच्च सा।<br>ततोऽग्निमध्यात् सलिले मांसपेश्यपतन्मुने ॥ ५४<br>साऽम्भसा सुखशीतेन संसिक्ता सप्तधाऽभवत्।<br>तेऽजायन्ताथ मरुत उत्तमस्यान्तरे मनोः ॥ ५५ | वे राजर्षि भी अपनी पत्नीके सहित नगरमें गये। उसके बाद बहुत समय बीत जानेपर राजाकी उस प्रिय रानीने उन नृपतिश्रेष्ठसे गर्भ धारण किया। भार्याके गर्भिणी होनेपर वे राजा संसारसे चल बसे। उस पतिव्रताने अपने पतिके साथ चितापर आरूढ़ होनेकी इच्छा की। मन्त्रियोंने उसे रोका, परंतु वह रुकी नहीं। पतिको चितापर रखकर वह भी उसपर चढ़ गयी। मुने! उसके बाद अग्निके बीचसे जलमें एक मांसपेशी गिरी। अत्यन्त शीतल जलसे संसिक्त होनेपर वह (मांसपेशी) सात टुकड़ोंमें अलग-अलग हो गयी। वे ही टुकड़े उत्तम मनुके कालमें मरुत् हुए॥ ५१–५५॥
तामसस्यान्तरे ये च मरुतोऽप्यभवन् पुरा।<br>तानहं कीर्तयिष्यामि गीतनृत्यकलिप्रिय ॥ ५६<br>तामसस्य मनोः पुत्रो ऋतध्वज इति श्रुतः।<br>स पुत्रार्थी जुहावाग्नौ स्वमांसं रुधिरं तथा ॥ ५७<br>अस्थीनि रोमकेशांश्च स्नायुमज्जायकृद्घनम्।<br>शुक्रं च चित्रगौ राजा सुतार्थी इति नः श्रुतम् ॥ ५८ | हे गीतनृत्यकलिप्रिय (नारदजी)! पहले तामस मन्वन्तरमें जो मरुत् हुए (अब मैं) उनका वर्णन करूँगा। तामस मनुके पुत्र ऋतध्वज नामसे विख्यात थे। उन्होंने पुत्रकी अभिलाषासे अग्निमें अपने शरीरके मांस और रक्तका हवन किया। हमलोगों ने सुना है कि पुत्रके अभिलाषी (उन) राजाने अस्थि, रोम, केश, स्नायु, मज्जा, यकृत् और घने शुक्रकी अग्निमें आहुति दी॥ ५६–५८॥
सप्तस्वेवार्चिषु ततः शुक्रपातादनन्तरम्।<br>मा मा क्षिपस्वेत्यभवच्छब्दः सोऽपि मृतो नृपः ॥ ५९<br>ततस्तस्माद्धुतवहात् सप्त तत्तेजसोपमाः।<br>शिशवः समजायन्त ते रुदन्तोऽभवन् मुने ॥ ६०<br>तेषां तु ध्वनिमाकर्ण्य भगवान् पद्मसम्भवः।<br>समागम्य निवार्याथ स चक्रे मरुतः सुतान् ॥ ६१<br>ते त्वासन् मरुतो ब्रह्मंस्तामसे देवतागणाः।<br>येऽभवन् रैवते तांश्च शृणुष्व त्वं तपोधन ॥ ६२ | उसके बाद सातों अग्नियोंमें शुक्रपात होनेपर 'मत फेंको, मत फेंको' इस प्रकारका शब्द होने लगा। वे राजा भी मर गये। मुने! उसके बाद उस अग्निसे सात तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुए और वे रोने लगे। उनके रोनेकी ध्वनि सुनकर भगवान् कमलयोनि (ब्रह्मा)-ने आकर मना किया और उन पुत्रोंको मरुत् नामका देवता बना दिया। ब्रह्मन्! वे ही तामस मन्वन्तरमें (मरुद्गण) नामक देवता हुए। हे तपोधन! रैवत मन्वन्तरमें जो (मरुद्गण) हुए उनका विवरण आगे सुनिये—॥ ५९–६२॥
रैवतस्यान्ववाये तु राजासीद् रिपुजिद् वशी।<br>रिपुजिन्नामतः ख्यातो न तस्यासीत् सुतः किल ॥ ६३ | रैवतके वंशमें शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेवाले संयमी रिपुजित् नामसे विख्यात एक राजा थे। उनको

अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३६१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स समाराध्य तपसा भास्करं तेजसां निधिम्।<br>अवाप कन्यां सुरतिं तां प्रगृह्य गृहं ययौ॥ ६४<br><br>तस्यां पितृगृहे ब्रह्मन् वसन्त्यां स पिता मृतः।<br>साऽपि दुःखपरीताङ्गी स्वां तनुं त्यक्तुमुद्यता॥ ६५<br><br>ततस्तां वारयामासुर्ऋषयः सप्त मानसाः।<br>तस्यामासक्तचित्तास्तु सर्व एव तपोधनाः॥ ६६पुत्र नहीं था। उन्होंने तपद्वारा तेजवनिधि सूर्यकी आराधना कर सुरति नामकी कन्या प्राप्त की और उसे लेकर वे घर चले गये। ब्रह्मन्! उस कन्याके पितृ-गृहमें रहते हुए पिताका देहावसान हो गया। वह भी शोकसे आकुल होकर अपने शरीरका परित्याग करनेके लिये तैयार हुई। उसके बाद सात मानस ऋषियोंने उसे मना किया। किंतु वे सभी तपोधन उसमें आसक्तचित्त हो गये थे॥ ६३-६६॥
अपारयन्ती तद्दुःखं प्रज्वाल्याग्निं विवेश ह।<br>ते चापश्यन्त ऋषयस्तच्चित्ता भावितास्तथा॥ ६७<br><br>तां मृतामृषयो दृष्ट्वा कष्टं कष्टेति वादिनः।<br>प्रजग्मुर्ज्वलनाच्चापि सप्ताजायन्त दारकाः॥ ६८<br><br>ते च मात्रा विना भूता रुरुदुस्तान् पितामहः।<br>निवारयित्वा कृतवांल्लोकनाथो मरुद्गणान्॥ ६९<br><br>रैवतस्यान्तरे जाता मरुतोऽमी तपोधन।<br>शृणुष्व कीर्तयिष्यामि चाक्षुषस्यान्तरे मनोः॥ ७०किंतु वह कन्या उस दुःखको सहन न कर सकनेके कारण आग जलाकर उसमें प्रवेश कर गयी। उसमें आसक्त तथा प्रभावित ऋषियोंने उसे देखा। उसे मरा हुआ देखकर वे ऋषि ‘दुःखकी बात है’, ‘दुःखकी बात है’ कहते हुए चले गये। उसके बाद उस अग्निसे सात पुत्र हुए। माताके अभावमें वे रोने लगे। लोकनाथ पितामह ब्रह्माने उन्हें (रोनेसे) रोककर मरुद्गणका पद दे दिया। तपोधन! वे ही रैवत मन्वन्तरमें मरुद्गण हुए। अब मैं चाक्षुष मनुके कालके मरुद्गणोंका वर्णन करूँगा, उसे सुनिये-॥ ६७-७०॥
आसीन्मङ्किरिति ख्यातस्तपस्वी सत्यवाक् शुचिः।<br>सप्तसारस्वते तीर्थे सोऽतप्यत महत्त्पः॥ ७१<br><br>विघ्नार्थं तस्य तुषिता देवाः संप्रेषयन् वपुम्।<br>सा चाभ्येत्य नदीतीरे क्षोभयामास भामिनी॥ ७२<br><br>ततोऽस्य प्राच्यवच्छुक्रं सप्तसारस्वते जले।<br>तां चैवाप्यशपन्मूढां मुनिर्मङ्कणको वपुम्॥ ७३<br><br>गच्छ लब्धाऽसि मूढे त्वं पापस्यास्य महत् फलम्।<br>विध्वंसयिष्यति हयो भवतीं यज्ञसंसदि॥ ७४<br><br>एवं शप्त्वा ऋषिः श्रीमाञ्जगामाथ स्वमाश्रमम्।<br>सरस्वतीभ्यः सप्तभ्यः सप्त वै मरुतोऽभवन्॥ ७५<br><br>एतत् तवोक्ता मरुतः पुरा यथा<br>जाता वियद्व्याप्तिकरा महर्षे।<br>येषां श्रुते जन्मनि पापहानि-<br>र्भवेच्च धर्माभ्युदयो महान् वै॥ ७६मङ्कि नामसे विख्यात सत्यवादी और पवित्र एक तपस्वी थे। उन्होंने सप्तसारस्वततीर्थमें महान् तप किया था। देवताओंने उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये ‘वपु’ नामकी अप्सराको भेजा। उस भामिनीने नदीके किनारे आकर मुनिको क्षोभित कर दिया। उसके बाद उनका शुक्र च्युत होकर सप्तसारस्वतके जलमें गिर गया। मुनि मङ्कणकने उस मूढ़ा वपुको भी शाप दे दिया। हे मूढ़े! चली जाओ। तुम इस पापका दारुण फल प्राप्त करोगी। यज्ञसंसद्में तुमको अश्व विध्वस्त करेगा। श्रीमान् ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपने आश्रममें चले गये। उसके बाद सप्तसरस्वतियोंसे सात मरुत् उत्पन्न हुए। महर्षे! पूर्वकालमें आकाशव्यापी मरुद्गण जिस प्रकार उत्पन्न हुए थे, उसे मैंने आपसे कहा। इनका वर्णन सुननेसे पापका नाश तथा धर्मका महान् अभ्युदय होता है॥ ७१-७६॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७२ ॥

३६२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७३

तिहत्तरवाँ अध्याय

बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध, कालनेमिके साथ विष्णुभगवान्का युद्ध और कालनेमिका वध

पुलस्त्य उवाच
पुलस्त्य उवाच<br>एतदर्थं बलिर्दैत्यः कृतो राजा कलिप्रिय।<br>मन्त्रप्रदाता प्रह्लादः शुक्रश्चासीत् पुरोहितः ॥ १<br><br>ज्ञात्वाऽभिषिक्तं दैतेयं विरोचनसुतं बलिम्।<br>दिदृक्षवः समायाताः समयाः सर्व एव हि ॥ २<br><br>तानागतानिरीक्ष्यैव पूजयित्वा यथाक्रमम्।<br>पप्रच्छ कुलजान् सर्वान् किंनु श्रेयस्करं मम ॥ ३<br><br>तमूचुः सर्व एवैनं शृणुष्व सुरमर्दन।<br>यत् ते श्रेयस्करं कर्म यदस्माकं हितं तथा॥ ४पुलस्त्यजी बोले—कलिप्रिय (नारदजी)! बलि दैत्यको इसीलिये राजा बनाया गया था। प्रह्लाद उसके परामर्श देनेवाले मन्त्री तथा शुक्राचार्य पुरोहित थे। विरोचनके पुत्र बलि दैत्यको राज्यपर अभिषिक्त हुआ जानकर मयके साथ सभी दैत्य उसे देखनेकी इच्छासे आये। उन (वहाँ) आये हुए अपने कुलपुरुषोंको देखकर (बलिने) यथाक्रम उनकी पूजा की एवं उनसे पूछा कि मेरे लिये क्या कल्याणकारी है? उन सभीने उससे कहा—देवमर्दन! तुम्हारे लिये जो कल्याणकारी और हमारे लिये हितकर कर्म है, उसे सुनो—॥ १-४॥
पितामहस्तव बली आसीद् दानवपालकः।<br>हिरण्यकशिपुर्वीरः स शक्रोऽभूज्जगत्रये ॥ ५<br><br>तमागम्य सुरश्रेष्ठो विष्णुः सिंहवपुर्धरः।<br>प्रत्यक्षं दानवेन्द्राणां नखैस्तं हि व्यदारयत् ॥ ६<br><br>अपकृष्टं तथा राज्यमन्धकस्य महात्मनः।<br>तेषामर्थे महाबाहो शङ्करेण त्रिशूलिना ॥ ७<br><br>तथा तव पितृव्योऽपि जम्भः शक्रेण घातितः।<br>कुजम्भो विष्णुना चापि प्रत्यक्षं पशुवत् तव ॥ ८तुम्हारे पितामह, हिरण्यकशिपु बलवान्, वीर और दानवकुलके पालन करनेवाले थे। तीनों लोकोंके वे इन्द्र हो गये थे। किंतु सिंहशरीर धारणकर देवोंमें श्रेष्ठ श्रीविष्णुने उनके पास आकर श्रेष्ठ दानवोंके सामने ही उन्हें अपने नखोंसे विदीर्ण कर डाला। महाबाहो! त्रिशूल धारण करनेवाले शंकरने भी उन (देवों)-के लिये महान् बलशाली अन्धकका राज्य छीन लिया था। और इन्द्रने तुम्हारे चाचा (पिताके भाई) जम्भको मार दिया एवं विष्णुने तुम्हारे सामने कुजम्भको पशुकी तरह मार डाला॥ ५-८॥
शम्भुः पाको महेन्द्रेण भ्राता तव सुदर्शनः।<br>विरोचनस्तव पिता निहतः कथयामि ते ॥ ९मैं तुमसे बतला दे रहा हूँ कि महेन्द्रेने शम्भु, पाक और तुम्हारे भाई सुदर्शन एवं तुम्हारे पिता विरोचनको मार डाला है।
श्रुत्वा गोत्रक्षयं ब्रह्मन् कृतं शक्रेण दानवः।<br>उद्योगं कारयामास सह सर्वैर्महासुरैः ॥ १०<br><br>रथैरन्ये गजैरन्ये वाजिभिश्चापरेऽसुराः।<br>पदातयस्तथैवान्ये जग्मुर्युद्धाय दैवतैः ॥ ११<br><br>मयोऽग्रे याति बलवान् सेनानाथो भयङ्करः।<br>सैन्यस्य मध्ये च बलिः कालनेमिश्च पृष्ठतः ॥ १२[पुलस्त्यजी कहते हैं कि] ब्रह्मन्! इन्द्रद्वारा किये गये अपने कुलका विनाश सुनकर दानव बलिने समस्त महान् असुरोंको युद्ध करनेके लिये तैयारी करनेकी प्रेरणा दी। फिर तो कुछ असुर रथोंपर, कुछ हाथियोंपर, कुछ घोड़ोंपर और कुछ पैदल ही देवताओंसे युद्ध करनेके लिये चल पड़े। सेनाके आगे-आगे भयङ्कर महाबलशाली सेनापति मय चल रहा था। सेनाके बीचमें

| अध्याय ७३ ] | बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध और कालनेमिका वध | ३६३ |
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| वामपार्श्वमवष्टभ्य शाल्वः प्रथितविक्रमः।<br>प्रयाति दक्षिणं घोरं तारकाख्यो भयङ्करः॥ १३ | बलि, पीछे कालनेमि, बायीं ओर प्रसिद्ध पराक्रमवाला शाल्व तथा दाहिनी बगलमें भयङ्कर तारक नामका असुर कुशलतासे चल रहा था॥ ९—१३॥ |
| दानवानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च।<br>सम्प्रायातानि युद्धाय देवैः सह कलिप्रिय॥ १४<br><br>श्रुत्वाऽसुराणामुद्योगं शक्रः सुरपतिः सुरान्।<br>उवाच याम दैत्यांस्तान् योद्धुं सबलसंयुतान्॥ १५<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं सुरराट् स्यन्दनं बली।<br>समारुरोह भगवान् यतमातलिवाजिनम्॥ १६<br><br>समारूढे सहस्राक्षे स्यन्दनं देवतागणाः।<br>स्वं स्वं वाहनमारुह्य निश्चेरुर्युद्धकाङ्क्षिणः॥ १७ | कलिप्रिय (नारदजी) ! हजारों, दस-दस लाखों, (ही नहीं,) दस-दस करोड़ोंकी संख्यामें—असंख्य दैत्य देवताओंसे युद्ध करनेके लिये निकल पड़े। असुरोंकी (इस प्रकारकी) युद्ध करनेकी तैयारीको सुनकर देवताओंके स्वामी इन्द्रने देवताओंसे कहा—देवताओ! हम सब देवगण भी लड़ाई करनेके लिये दल-बलके साथ आये हुए दैत्योंसे लड़नेके लिये चलें। इस प्रकारकी घोषणा कर बलवान् भगवान् देवपति इन्द्र अपने सारथि मातलिद्वारा नियन्त्रित घोड़ोंवाले रथपर चढ़ गये। इन्द्रके रथपर चढ़ जानेपर देवतालोग भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर युद्धकी इच्छासे बाहर निकल चले॥ १४—१७॥ |
| आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वेऽश्विनौ तथा।<br>विद्याधरा गुह्यकाश्च यक्षराक्षसपन्नगाः॥ १८<br><br>राजर्षयस्तथा सिद्धा नानाभूताश्च संहताः।<br>गजानन्ये रथानन्ये हयानन्ये समारुहन्॥ १९<br><br>विमानानि च शुभ्राणि पक्षिवाहानि नारद।<br>समारुह्याद्रवन् सर्वे यतो दैत्यबलं स्थितम्॥ २०<br><br>एतस्मिन्नन्तरे धीमान् वैनतेयः समागतः।<br>तस्मिन् विष्णुः सुरश्रेष्ठ अधिरुह्य समभ्यगात्॥ २१ | आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, विद्याधर, गुह्यक, यक्ष, राक्षस, पन्नग, राजर्षि, सिद्ध तथा अनेक प्रकारके भूत एकत्र हो गये। कुछ हाथियोंपर, कुछ रथोंपर और कुछ घोड़ोंपर आरूढ़ हुए। नारदजी! कुछ देवगण पक्षियोंद्वारा वाहित होनेवाले उज्ज्वल विमानोंपर चढ़कर वहाँ पहुँच गये, जहाँ दैत्योंकी सेना (पहलेसे) डटी हुई थी। इसी समय बुद्धिमान् गरुड़जी आ गये। देवोंमें श्रेष्ठ विष्णु उनपर आरूढ़ होकर आ गये॥ १८—२१॥ |
| तमागतं सहस्राक्षस्त्रैलोक्यपतिमव्ययम्।<br>ववन्द मूर्ध्नावनतः सह सर्वैः सुरोत्तमैः॥ २२<br><br>ततोऽग्रे देवसैन्यस्य कार्तिकेयो गदाधरः।<br>पालयञ्जघनं विष्णुर्याति मध्ये सहस्रदृक्॥ २३<br><br>वामं पार्श्वमवष्टभ्य जयन्तो व्रजते मुने।<br>दक्षिणं वरुणः पार्श्वमवष्टभ्याव्रजद् बली॥ २४<br><br>ततोऽमराणां पृतना यशस्विनी<br>स्कन्देन्द्रविष्ण्वम्बुपसूर्यपालिता ।<br>नानास्त्रशस्त्रोद्यतदोःसमूहा<br>समाससादारिबलं महीध्रे॥ २५ | फिर तो हजार आँखोंवाले इन्द्रने सभी देवताओंके साथ सिर झुकाकर उन आये हुए तीनों लोकोंके स्वामी नित्य (विष्णुभगवान्)-की वन्दना की। उसके बाद कार्तिकेय देवसेनाके अग्रभागकी, गदाधारी श्रीविष्णु सेनाके पीछे भागकी और सहस्रलोचन इन्द्र बीचभागकी रक्षा करते हुए चलने लगे। नारद मुने! जयन्त बायीं ओरकी सेनाको समेटकर चले एवं बलवान् वरुण दाहिनी बगलकी सेनाको समेटकर चले। उसके बाद नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवालोंसे गठित और स्कन्द, विष्णु, वरुण एवं सूर्यसे संरक्षित देवोंकी यशस्विनी सेना शत्रुसैन्यके निकट पर्वतपर पहुँच गयी॥ २२—२५॥ |
| उदयाद्रितटे रम्ये शुभे समशिलातले।<br>निर्वृक्षे पक्षिरहिते जातो देवासुरो रणः॥ २६ | उदयाचलके वृक्ष एवं पक्षियोंसे रहित रमणीय शुभ एवं समतल पथरीले मैदानमें देवों और दैत्योंका |