वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६४- चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन
अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मधुंनोऽष्टौ जलस्योक्ताः सर्वे ते द्विगुणाः सुराः।<br>ततो रोचनया देवमष्टोत्तरशतेन हि॥ ११<br><br>अनुलिम्पेत् कुङ्कुमेन चन्दनेन च भक्तितः।<br>बिल्वपत्रैः सकमलैः धत्तूरसुरचन्दनैः ॥ १२<br><br>मन्दारैः पारिजातैश्च अतिमुक्तैस्तथाऽर्चयेत् ।<br>अगुरुं सह कालेयं चन्दनेनापि धूपयेत्॥ १३<br><br>जप्तव्यं शतरुद्रीयं ऋग्वेदोक्तैः पदक्रमैः।<br>एवं कृते तु देवेशं पश्यध्वं नेतरेण च॥ १४<br><br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः केशवमब्रुवन् ।<br>विधानं तप्तकृच्छ्रस्य कथ्यतां मधुसूदन।<br>यस्मिंश्चीर्णे कायशुद्धिर्भवते सार्वकालिकी ॥ १५ | देवताओ ! मधुका स्नान आठ घड़ोंसे तथा जलका स्नान इन सभीके दुगुने (२४०) घड़ोंसे कहा गया है। उसके बाद भक्तिपूर्वक देवको एक सौ आठ बार गोरोचन, कुङ्कुम और चन्दनका लेपन करनेका विधान है। फिर उन्हें भक्तिसे मलयचन्दन लगाना चाहिये। पूरे खिले हुए कमलोंके सहित बिल्वपत्र, धतूर एवं हरिचन्दनसे उनकी अर्चा होनी चाहिये। पूर्ण खिले हुए मन्दार और हरशृङ्गार चढ़ाकर पूजा करनी चाहिये। फिर अगुरु, केशर या काले चन्दन एवं चन्दनसे धूप दे। उसके बाद ऋग्वेदमें कथित 'पद' और 'क्रम' शैलियोंसे शतरुद्रीका जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे आपलोग देवेश्वरका दर्शन कर सकेंगे; अन्य किसी उपायसे नहीं। वासुदेवके ऐसा कहनेपर देवताओंने केशवसे कहा—मधुसूदन ! आप हमें तप्त-कृच्छ्र (-व्रत)-का विधान (भी) बतलाइये, जिसके करनेसे सदाके लिये कायशुद्धि हो जाती है ॥ १०—१५ ॥ |
| वासुदेव उवाच<br>त्र्यहमुष्णं पिबेदापः त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।<br>त्र्यहमुष्णं पिबेत्सर्पिर्वायुभक्षो दिनत्रयम्॥ १६<br>पला द्वादश तोयस्य पलावष्टौ पयसः सुराः।<br>षट्पलं सर्पिषः प्रोक्तं दिवसे दिवसे पिबेत् ॥ १७ | वासुदेवने कहा—देवताओ ! (तप्त-कृच्छ्र-व्रतका विधान इस प्रकार है—) तीन दिन बारह पल गरम जल पिये, तीन दिन आठ पल गरम दूध पिये, तीन दिन छः पल गरम घी पिये एवं तीन दिन केवल वायु पीकर रहे ॥ १६-१७ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने सुराः कायविशुद्धये ।<br>तप्तकृच्छ्ररहस्यं वै चक्रुः शक्रपुरोगमाः ॥ १८<br>ततो व्रते सुराश्चीर्णे विमुक्ताः पापतोऽभवन्।<br>विमुक्तपापा देवेशं वासुदेवमथाब्रुवन् ॥ १९<br>क्वासौ वद जगन्नाथ शंभुस्तिष्ठति केशव।<br>यं क्षीराद्यभिषेकेण स्नापयामो विधानतः ॥ २०<br>अथोवाच सुरान्विष्णुरेष तिष्ठति शङ्करः ।<br>मद्देहे किं न पश्यध्वं योगश्रयं प्रतिष्ठितः ॥ २१ | पुलस्त्यजी बोले—इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने शरीरकी शुद्धिके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतका एकान्त अनुष्ठान किया। उसके बाद उस व्रतका पालन हो जानेपर देवता पापसे छूट गये। पापसे छूटकर देवताओंने देवोंके स्वामी वासुदेवसे कहा—जगन्नाथ ! केशव ! आप कृपया यह बतलाइये कि शम्भु किस स्थानपर अवस्थित हैं? जिन्हें हमलोग दूध आदिके अभिषेकसे विधिपूर्वक स्नान करायें। उसके बाद विष्णुने देवताओंसे कहा—देवताओ ! मेरे शरीरमें ये शङ्कर संयुक्त होकर स्थित हैं। क्या आपलोग नहीं देख रहे हैं? ॥ १८—२१ ॥ |
| तमूचुर्नैव पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम् ।<br>सत्यं वद सुरेशान महेशानः क्व तिष्ठति ॥ २२<br>ततोऽव्ययात्मा स हरिः स्वहृत्पङ्कजशायिनम्।<br>दर्शयामास देवानां मुरारिर्लिङ्गमैश्र्वरम्॥ २३<br>ततः सुराः क्रमेणैव क्षीरादिभिरनन्तरम् ।<br>स्त्रापयाञ्चक्रिरे लिङ्गं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ २४ | उन लोगोंने विष्णुसे कहा कि हमलोग तो आपमें त्रिपुरनाशक शङ्करको नहीं देख रहे हैं। सुरेशान ! आप सच बतलाइये कि महेश किस स्थानपर स्थित हैं। उसके बाद अव्ययात्मा मुरारि विष्णुने देवताओंको अपने हृदयकमलमें विश्राम करनेवाले शङ्करके लिङ्गका दर्शन करा दिया। उसके बाद देवताओंने क्रमशः दूध आदिसे उस नित्य, स्थिर एवं अक्षय लिङ्गको स्नान कराया। |
| २९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६२ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गोरोचनया त्वालिप्य चन्दनेन सुगन्धिना।<br>बिल्वपत्राम्बुजैर्देवं पूजयामासुरञ्जसा ॥ २५ | फिर उन लोगोंने गोरोचन और सुगन्धित चन्दनका लेपन कर बिल्वपत्रों और कमलोंसे भक्तिपूर्वक (यथाविधि उन) देवकी पूजा की॥ २२—२५॥ |
| प्रधूप्यागुरुणा भक्त्या निवेद्य परमौषधीः।<br>जप्त्वाऽष्टशतनामानं प्रणामं चक्रिरे ततः ॥ २६<br>इत्येवं चिन्तयन्तश्च देवावेतौ हरीश्वरौ।<br>कथं योगत्वमापन्नौ सत्त्वान्धतमसोद्भवौ ॥ २७<br>सुराणां चिन्तितं ज्ञात्वा विश्वमूर्तिर्बभूविभुः।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वायुधधरोऽव्ययः ॥ २८<br>सार्द्धं त्रिनेत्रं कमलाइकुण्डलं<br>जटागुडाकेशखगर्भभव्ध्वजम् ।<br>समाधवं हारभुजङ्गवक्षसं<br>पीताजिनाच्छन्नकटिप्रदेशम् ॥ २९<br>चक्रासिहस्तं हलशार्ङ्गपाणिं<br>पिनाकशूलाजगवान्वितं च।<br>कपर्दखट्वाङ्गकपालघण्टा-<br>सशङ्खटङ्काररवं महर्षे ॥ ३०<br>दृष्ट्वैव देवा हरिशङ्करं तं<br>नमोऽस्तु ते सर्वगताव्ययेति।<br>प्रोक्त्वा प्रणामं कमलासनाद्या-<br>श्चकुर्मतिं चैकतरां नियुज्य ॥ ३१ | उसके बाद देवोंने प्रेमपूर्वक धूप-दानकर परमौषधियों (भङ्ग आदि)-को समर्पित किया। फिर (शङ्करके) एक सौ आठ नामोंका जप करनेके बाद उन्हें प्रणाम किया। सभी देवता यह विचारने लगे कि सत्त्वगुणकी प्रधानतासे विष्णु एवं तमोगुणकी अधिकतासे आविर्भूत शिवमें एकता किस प्रकार हुई? देवताओंके विचारको जानकर अविनाशी व्यापक भगवान् सभी (शुभ) लक्षणोंसे युक्त एवं सब प्रकारके आयुधोंको धारण करनेवाले विश्वमूर्ति हो गये। महर्षे! फिर तो देवताओंने एक ही शरीरमें कानमें सर्पके कुण्डल पहने, सिरपर आपसमें चिपके लंबे बालके जटाजूट बाँधे, गलेमें सर्पके हार लटकाये, हाथमें पिनाक, शूल, आजगव धनुष, खट्वाङ्ग धारण किये तथा घण्टासे युक्त वाघाम्बर धारण करनेवाले त्रिनेत्रधारी वृषभध्वज महादेव और साथ ही कमलके कुण्डलधारी, गरुड़ध्वज, हार और पीताम्बर पहने, हाथोंमें चक्र, असि, हल, शार्ङ्गधनुष, टंकार-सी ध्वनि करनेवाले शङ्खको लिये गुडाकेश विष्णुको देखा। उसके बाद 'सर्वव्यापी अविनाशी प्रभुको नमस्कार है'—इस प्रकार कहकर ब्रह्मा आदि देवताओंने उन हरि एवं शङ्करको एक रूप (अभिन्न) समझा॥ २६—३१॥ |
| तानेकचित्तान् विज्ञाय देवान् देवपतिर्हरिः।<br>प्रगृह्याभ्यद्रवत्तूर्णं कुरुक्षेत्रं स्वमाश्रमम् ॥ ३२<br>ततोऽपश्यन्त देवेशं स्थाणुभूतं जले शुचिम्।<br>दृष्ट्वा नमः स्थाणवेति प्रोक्त्वा सर्वे ह्युपाविशन् ॥ ३३<br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिरेहोहि दीयतां वरः।<br>क्षुब्धं जगज्जगन्नाथ उन्मज्जस्व प्रियातिथे ॥ ३४<br>ततस्तां मधुरां वाणीं शुश्राव वृषभध्वजः।<br>श्रुत्वोत्तस्थौ च वेगेन सर्वव्यापी निरञ्जनः ॥ ३५<br>नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यः प्रोवाच प्रहसन् हरः।<br>स चागतः सुरैः सेन्द्रैः प्रणतौ विनयान्वितैः ॥ ३६ | देवोंके स्वामी भगवान् विष्णु उन देवताओंको समान हृदयवाला समझ उन्हें साथ लेकर शीघ्र अपने आश्रम कुरुक्षेत्रमें चले गये। उसके बाद उन लोगोंने जलके भीतर पवित्र स्थाणुभूत उन देवेश (महादेव)-को देखा। उन्हें देखकर 'स्थाणवे नमः' (स्थाणुको नमस्कार है)—यह कहकर वे सभी (वहीं) बैठ गये। उसके बाद इन्द्रने कहा—जगन्नाथ! अतिथप्रिय! संसार अशान्त हो उठा है। आप (कृपया) बाहर निकलकर यहाँ आइये, यहाँ आइये (और आकर) हमें वर दीजिये। उसके बाद वृषकेतु महादेवने वह मधुर वाणी सुनी। फिर उसे सुनकर वे सर्वव्यापी परमविशुद्ध शङ्कर वेगसे उठ खड़े हुए। उन्होंने हँसते हुए 'सभी देवताओंको नमस्कार है' ऐसा कहा। इन्द्र आदि देवताओंने जलसे ऊपर आये हुए उन शङ्करको और अधिक विनयभावसे प्रणाम किया॥ ३२—३६॥ |
अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २९१
| तमूचुर्देवताः सर्वास्त्यज्यतां शङ्कर द्रुतम्।<br>महाव्रतं त्रयो लोकाः क्षुब्धास्त्वत्तेजसावृताः॥ ३७<br><br>अथोवाच महादेवो मया त्यक्तो महाव्रतः।<br>ततः सुरा दिवं जग्मुर्हृष्टाः प्रयतमानसाः॥ ३८<br><br>ततोऽपि कम्पते पृथ्वी साब्धिद्वीपाचला मुने।<br>ततोऽभिचिन्तयद्रुद्रः किमर्थं क्षुभिता मही॥ ३९<br><br>ततः पर्यचरच्छूली कुरुक्षेत्रं समन्ततः।<br>ददर्शौघवतीतीरे उशनसं तपोनिधिम्॥ ४०<br><br>ततोऽब्रवीत्सुरपतिः किमर्थं तप्यते तपः।<br>जगत्क्षोभकरं विप्र तच्छीघ्रं कथ्यतां मम॥ ४१ | सभी देवताओेंने उनसे कहा कि शंकर! कृपया महाव्रतको शीघ्र छोड़ दीजिये। आपके तेजसे व्याप्त होकर तीनों लोक क्षुब्ध हो गये हैं। उसके बाद महादेवने कहा कि (लीजिये), मैंने महाव्रतका त्याग कर दिया। तत्पश्चात् देवता प्रसन्न हो गये और शान्तचित्त होकर स्वर्ग चले गये। मुने! तो भी समुद्र, द्वीप और पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप रही थी। तब (स्वयं) रुद्रने सोचा कि (अब) पृथ्वी क्यों क्षुब्ध हो रही है? फिर त्रिशूल धारण करनेवाले (शङ्कर) कुरुक्षेत्रके चारों ओर विचरण करने लगे। उन्होंने ओघवतीके किनारे (तपस्या करते) तपोनिधि उशनाको देखा। उसके बाद देवाधिदेव शंकरने उनसे कहा—विप्र! आप जगत्को क्षुब्ध करनेवाला तप क्यों कर रहे हैं? उसे मुझे शीघ्र बतलाइये॥ ३७—४१॥ |
| उशना उवाच<br>तवाराधनकामार्थं तप्यते हि महत्तपः।<br>संजीवनीं शुभां विद्यां ज्ञातुमिच्छे त्रिलोचन॥ ४२ | उशनाने कहा— आपकी आराधना (प्रसन्नता-प्राप्ति)-की इच्छासे मैं महान् तप कर रहा हूँ। त्रिनयन! मैं मङ्गलमयी संजीवनी विद्याको जानना चाहता हूँ॥ ४२॥ |
| हर उवाच<br>तपसा परितुष्टोऽस्मि सुतप्तेन तपोधन।<br>तस्मात् संजीवनीं विद्यां भवाञ्ज्ञास्यति तत्त्वतः॥ ४३<br><br>वरं लब्ध्वा ततः शुक्रस्तपसः संन्यवर्त्तत।<br>तथापि चलते पृथ्वी साब्धिभूभृन्नगावृता॥ ४४<br><br>ततोऽगमन्महादेवः सप्तसारस्वतं शुचिः।<br>ददर्श नृत्यमानं च ऋषिं मङ्कणसंज्ञितम्॥ ४५<br><br>भावेन पोप्लूयति बालवत् स<br>भुजौ प्रसार्यैव ननर्त्त वेगात्।<br>तस्यैव वेगेन समाहता तु<br>चचाल भूभूमिधरैः सहैव॥ ४६ | महादेवने कहा— तपोधन! मैं भलीभाँति की गयी आपकी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। इसलिये आप संजीवनी विद्याको यथार्थरूपमें जान जायेंगे। शुक्र (शुक्राचार्य) वर पाकर तपस्यासे विरत हो गये। फिर भी सागर, पर्वत, वृक्ष आदिके साथ सारी पृथ्वी काँप रही थी। उसके बाद परमपावन महादेव सप्तसारस्वतमें गये। वहाँ उन्होंने मङ्कण नामके महर्षिको नाचते हुए देखा। वे बालकके समान भाव-विभोर होकर दोनों हाथ फैलाकर वेगसे (उछल-उछलकर) नाच रहे थे। उसके (उछलनेके) वेगसे आहत हो पृथ्वी पर्वतोंसहित बड़े जोरसे काँप रही थी—हिल रही थी॥ ४३—४६॥ |
| तं शङ्करोऽभ्येत्य करे निगृह्य<br>प्रोवाच वाक्यं प्रहसन् महर्षे।<br>किं भावितो नृत्यसि केन हेतुना<br>वदस्व मामेत्य किमत्र तुष्टिः॥ ४७<br><br>स ब्राह्मणः प्राह ममाद्य तुष्टि-<br>र्यैनेह जाता शृणु तद् द्विजेन्द्र।<br>बहून् गणान् वै मम तप्यतस्तपः<br>संवत्सरान् कायविशोषणार्थम्॥ ४८<br><br>ततोऽनुपश्यामि करात् क्षतोत्थं<br>निर्गच्छते शाकरसं ममेह। | शंकरने उनके पास जाकर एवं उनका हाथ पकड़कर हँसते हुए कहा—महर्षे! किस भावनासे प्रभावित होकर एवं किस कारणसे आप नाच रहे हैं? आप (मेरे पास) आकर मुझसे यह बतलाइये कि आपको इस विषयमें क्यों संतुष्टि है? उस ब्राह्मणने कहा—द्विजेन्द्र! आज मुझे जिस कारणसे प्रसन्नता हो रही है, उसे सुनिये। शरीरको दुर्बल करनेके लिये तपस्या करते हुए मेरे अनेक वर्ष बीत गये हैं। अब मैं देखता हूँ कि मेरे हाथके घावसे शाकरस निकल रहा है। |
| २९२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६२ |
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| तेनाद्य तुष्टोऽस्मि भृशं द्विजेन्द्र<br>येनास्मि नृत्यामि सुभावितात्मा ॥ ४९<br>तं प्राह शम्भुर्द्विज पश्य मह्यं<br>भस्म प्रवृत्तोऽङ्गुलितोऽतिशुक्लम् ।<br>संताडनादेव न च प्रहर्षो<br>ममास्ति नूनं हि भवान् प्रमत्तः ॥ ५० | द्विजेन्द्र ! इसी कारण मुझे बहुत आनन्द मिल रहा है और मैं भावविभोर होकर नृत्य कर रहा हूँ। शम्भुने उनसे कहा—द्विज ! मुझे देखो। चोट करनेसे ही मेरी अङ्गुलिसे अत्यन्त स्वच्छ सफेद भस्म निकल रहा है, परंतु इससे मुझे तो उत्कृष्ट प्रसन्नता नहीं होती। आप निश्चय ही उन्मत्त हो गये हैं ॥ ४७-५० ॥ |
| श्रुत्वाऽथ वाक्यं वृषभध्वजस्य<br>मत्वा मुनिर्मङ्कणको महर्षे ।<br>नृत्यं परित्यज्य सुविस्मितोऽथ<br>ववन्द पादौ विनयावनम्रः ॥ ५१<br>तमाह शम्भुर्द्विज गच्छ लोकं<br>तं ब्रह्मणो दुर्गममव्ययस्य ।<br>इदं च तीर्थं प्रवरं पृथिव्यां<br>पृथूदकस्यास्तु समं फलेन ॥ ५२<br>सांनिध्यमत्रैव सुरासुराणां<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणाम् ।<br>सदाऽस्तु धर्मस्य निधानमग्र्यं<br>सारस्वतं पापमलापहारि ॥ ५३<br>सुप्रभा काञ्चनाक्षी च सुवेणुर्विमलोदका ।<br>मनोहरा चौघवती विशाला च सरस्वती ॥ ५४<br>एताः सप्त सरस्वत्यो निवसिष्यन्ति नित्यशः ।<br>सोमपानफलं सर्वाः प्रयच्छन्ति सुपुण्यदाः ॥ ५५ | महर्षे ! शंकरकी बात सुनकर और उसे मानकर मङ्कणक मुनिने नृत्य करना छोड़ दिया और आश्चर्यसहित तथा विनम्र भावसे झुककर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। शम्भुने उनसे कहा—द्विज ! तुम अविनाशी ब्रह्मके दुर्गम लोकको जाओ। और, यह श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकतीर्थके सदृश पृथ्वीमें फल देनेवाला प्रसिद्ध होगा। सुर, असुर, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरलोग सदा यहाँ उपस्थित रहेंगे। यह श्रेष्ठ 'सारस्वत' तीर्थ सदा धर्मका निधान एवं पाप-मलका अपहरण करनेवाला होगा। यहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, सुवेणु, विमलोदका, मनोहरा, ओघवती, विशाला, सरस्वती नामकी सात नदियाँ नित्य निवास करेंगी। ये सभी पुण्य प्रदान करनेवाली नदियाँ यज्ञीय सोमरसके पीनेसे होनेवाले फलको देनेवाली हैं ॥ ५१-५५ ॥ |
| भवानपि कुरुक्षेत्रे मूर्तिं स्थाप्य गरीयसीम् ।<br>गमिष्यति महापुण्यं ब्रह्मलोकं सुदुर्गमम् ॥ ५६<br>इत्येवमुक्तो देवेन शङ्करेण तपोधनः ।<br>मूर्तिं स्थाप्य कुरुक्षेत्रे ब्रह्मलोकमगाद् वशी ॥ ५७<br>गते मङ्कणके पृथ्वी निश्चला समजायत ।<br>अथागान्मन्दरं शम्भुर्निजमावसथं शुचिः ॥ ५८<br>एतत् तवोक्तं द्विज शङ्करस्तु<br>गतस्तदासीत् तपसेऽथ शैले ।<br>शून्येऽभ्यगाद् दुष्टमतिर्हि देव्या<br>संयोधितो येन हि कारणेन ॥ ५९ | तुम भी कुरुक्षेत्रमें अत्यन्त उत्तम मूर्ति स्थापित करके परम पवित्र सुदुर्गम ब्रह्मलोकमें जाओगे। महादेवके इस प्रकार कहनेपर जितेन्द्रिय तपस्वी मङ्कणक ऋषि कुरुक्षेत्रमें मूर्ति स्थापित करके ब्रह्मलोक चले गये। मङ्कणक ऋषिके चले जानेपर पृथ्वी शान्त हो गयी। महादेव भी अपने पवित्र निवास-स्थान मन्दर-पर्वतपर चले गये। (पुलस्त्यजीने कहा—) द्विज ! मैंने तुमसे यह बतलाया कि उस समय शङ्करके तपस्या-हेतु जानेके कारण शून्य (उनकी उपस्थितिसे रहित) पर्वतपर जाकर दुष्टमति (अन्धक)-ने जिस कारणसे देवीसे युद्ध किया ॥ ५६-५९ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बासठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६२ ॥
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अध्याय ६३ ] अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन २९३
तिरसठवाँ अध्याय
अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>गतोऽन्धकस्तु पाताले किमचेष्टत दानवः।<br>शङ्करो मन्दरस्थोऽपि यच्चकार तदुच्यताम्॥ १ | नारदजीने पूछा— मुने! अन्धक दानवने पातालमें जाकर क्या किया? शङ्करने मन्दरपर्वतपर रहकर जो कुछ किया उसे भी बतलाइये॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>पातालस्थोऽन्धको ब्रह्मन् बाध्यते मदनाग्निना।<br>संतप्तविग्रहः सर्वान् दानवानिदमब्रवीत्॥ २<br>स मे सुहृत्स मे बन्धुः स भ्राता स पिता मम।<br>यस्तामद्रिसुतां शीघ्रं ममान्तिकमुपानयेत्॥ ३<br>एवं ब्रुवति दैत्येन्द्रं अन्धके मदनान्धके।<br>मेघगम्भीरनिर्घोषं प्रह्लादो वाक्यमब्रवीत्॥ ४<br>येयं गिरिसुता वीर सा माता धर्मतस्तव।<br>पिता त्रिनयनो देवः श्रूयतामत्र कारणम्॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! पातालमें रहता हुआ अन्धक कामाग्निसे दुःखी हो गया; उसका शरीर सन्तप्त होने लगा। उसने सभी दानवोंसे यह कहा— (दानवो!) वही मेरा मित्र, वही मेरा बन्धु, वही भाई और वही पिता है, जो उस पर्वतपुत्रीको मेरे पास शीघ्र ला दे। कामसे अधीर हुए दैत्येन्द्र अन्धकके ऐसा कहनेपर प्रह्लादने बादलके समान गम्भीर शब्दमें कहा— वीर! ये जो गिरिजा हैं, वे धर्मतः तुम्हारी माता हैं और त्रिलोचन शङ्कर तुम्हारे पिता हैं; इसका जो कारण है, उसे तुम सुनो— ॥ २–५ ॥ |
| तव पित्रा ह्यपुत्रेण धर्मनित्येन दानव।<br>आराधितो महादेवः पुत्रार्थाय पुरा किल॥ ६<br>तस्मै त्रिलोचनेनासीद् दत्तोऽन्धोऽप्येव दानव।<br>पुत्रकः पुत्रकामस्य प्रोक्त्वेत्थं वचनं विभो॥ ७<br>नेत्रत्रयं हिरण्याक्ष नर्मार्थमुमया मम।<br>पिहितं योगसंस्थस्य ततोऽन्धमभवत्तमः॥ ८<br>तस्माच्च तमसो जातो भूतो नीलघनस्वनः।<br>तदिदं गृह्यतां दैत्य तवौपयिकमात्मजम्॥ ९ | दानव! पहले समयमें धर्ममें सदा तत्पर रहनेवाले पुत्रहीन तुम्हारे पिताने पुत्रकी कामनासे महादेवकी आराधना की थी। दानव! त्रिलोचन शङ्करने पुत्रकी कामनावाले उसको अन्ध पुत्र दिया और यह कहा कि शक्तिशाली हिरण्याक्ष! एक समय मैं योगमें स्थित था और उमाने परिहासार्थ मेरे तीनों नेत्रोंको बन्द कर दिया था। उसके बाद अन्धकारस्वरूप तम उत्पन्न हुआ। उस तमसे नीले मेघके समान शब्द करनेवाला एक भूत (प्राणी) उत्पन्न हुआ। दैत्य! तुम इसे ग्रहण करो। यह तुम्हारे योग्य पुत्र है॥ ६–९॥ |
| यदा तु लोकविद्विष्टं दुष्टं कर्म करिष्यति।<br>त्रैलोक्यजननीं चापि अभिवाञ्छिष्यतेऽधमः॥ १०<br>घातयिष्यति वा विप्रं यदा प्रक्षिप्य चासुरान्।<br>तदास्य स्वयमेवाहं करिष्ये कायशोधनम्॥ ११<br>एवमुक्त्वा गतः शम्भुः स्वस्थानं मन्दराचलम्।<br>त्वत्पिताऽपि सम्भ्यागात् त्वामादाय रसातलम्॥ १२<br>एतेन कारणेनाम्बा शैलेयी भविता तव।<br>सर्वस्यापीह जगतो गुरुः शम्भुः पिता ध्रुवम्॥ १३ | (किंतु) यह अधम जब संसारके विरोधमें बुरा कर्म करेगा तथा त्रैलोक्य-जननीकी चाह करेगा अथवा असुरोंको भेजकर जब यह विप्रोंका वध करायेगा, तब मैं स्वयं इसके शरीरकी शुद्धि करूँगा। ऐसा कहकर शम्भु अपने स्थान मन्दराचलपर चले गये और तुम्हारे पिता तुमको लेकर रसातलमें चले आये। इसी कारण शैलपुत्री तुम्हारी माता एवं समस्त जगत्के गुरु शम्भु निश्चय ही तुम्हारे पिता हैं॥ १०–१३॥ |
| भवानपि तपोयुक्तः शास्त्रवेत्ता गुणाप्लुत:।<br>नेदृशे पापसंकल्पे मतिं कुर्याद् भवद्विधः॥ १४ | आप भी तपस्या करनेवाले एवं शास्त्रके ज्ञाता तथा अनेक अलौकिक गुणोंसे भूषित हो। अतः आप-जैसे पुरुषको इस प्रकारके पाप करनेमें मानसिक निश्चय भी |