वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६८- भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववर्गसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश
| अध्याय ६६ ] | दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ | ३१७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽनुचक्रुः संहृष्टा विवाहविधिमुत्तमम्।<br>ऋत्विजोऽभूद् गालवस्तु हुत्वा हव्यं विधानतः ॥ १६१<br>गायन्ते तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।<br>आदौ जाबालिनः पाणिर्गृहीतो दैत्यकन्यया ॥ १६२<br>इन्द्रद्युम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः।<br>ततः शकुनिना पाणिर्गृहीतो यक्षकन्यया ॥ १६३<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत्।<br>एवं क्रमाद् विवाहस्तु निर्वृत्तस्तनुमध्यमे ॥ १६४ | उसके बाद उन लोगोंने प्रसन्नतापूर्वक भलीभाँति विवाहकी विधिको पूरा किया। विधिसे हव्यका हवन करनेवाले गालव ऋत्विक् बने। उस समय वहाँ गन्धर्वोंने गाना गाया और अप्सराओंने नृत्य किया। सबसे पहले दैत्य-कन्याने जाबालिका पाणिग्रहण किया। कल्याणि! उसके बाद विधिपूर्वक इन्द्रद्युम्नने वेदवतीका, शकुनिने यक्ष-कन्याका तथा सुरथने चित्राङ्गदाका पाणिग्रहण किया। (कृशोदरि!) इस प्रकार विवाहकार्य क्रमशः सम्पन्न हुआ॥ १६०-१६४॥ |
| वृत्ते मुनिर्विवाहे तु शक्रादीन् प्राह दैवतान्।<br>अस्मिंस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ॥ १६५<br>स्थेयं विशेषतो मासमिमं माधवमुत्तमम्।<br>बाढमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा दिवं क्रमात् ॥ १६६<br>मुनयो मुनिमादाय सपुत्रं जग्मुरादरात्।<br>भार्याश्चादाय राजानः स्वं स्वं नगरमागताः ॥ १६७<br>प्रहृष्टाः सुखिनस्तस्थुः भुञ्जते विषयान् प्रियान्।<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि एवं वृत्तं पुरा किल।<br>तन्मां कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ॥ १६८<br>इत्येवमुक्त्वा नरदेवसूनु-<br>स्तां भूमिदेवस्य सुतां वरोरुम्।<br>स्तुवन्मृगाक्षीं मृदुना क्रमेण<br>सा चापि वाक्यं नृपतिं बभाषे ॥ १६९ | विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर मुनि (ऋतध्वज)-ने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—इस सप्तगोदावर तीर्थमें आपलोग सदा निवास करें। विशेषरूपसे इस उत्तम वैशाखके महीनेमें आपलोग यहाँ अवश्य रहें। देवतालोग 'ऐसा ही हो'—(ऐसा) कहकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग चले गये। मुनिलोग पुत्रसहित मुनि (ऋतध्वज)-को सादर साथ लेकर चले गये। राजालोग भी अपनी-अपनी पत्नीके साथ अपने-अपने नगरमें आ गये। सभी लोग प्रिय विषयोंका उपभोग करते हुए आनन्दपूर्वक रहने लगे। कल्याणि! चित्राङ्गदाका पूर्व वृत्तान्त इस प्रकारका है। इसलिये सरोजनयने! ललनोत्तमे! तुम मुझे अङ्गीकार करो। ऐसा कहकर राजपुत्र (दण्ड) ब्राह्मणकी उस सुन्दरी मृगनयनी पुत्रीकी कोमल वाणीसे स्तुति करने लगे। उसने भी राजासे (आगेवाला वचन) कहा — ॥ १६५-१६९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अरजा उवाच<br>नात्मानं तव दास्यामि बहुनोक्तेन किं तव।<br>रक्षन्ती भवतः शापादात्मानं च महीपते ॥ १ | अरजाने कहा— पृथिवीपते! आपके अधिक कहनेसे क्या लाभ? (थोड़ेमें समझ लीजिये कि पिताके) शापसे आपकी और अपनी रक्षा करती हुई (ही) मैं अपनेको आपके लिये समर्पित नहीं करूँगी ॥ १॥ |
| ३१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ |
| :--- | :--- |
| प्रह्लाद उवाच | |
|---|---|
| इत्थं विवदमानां तां भार्गवेन्द्रसुतां बलात्।<br>कामोपहतचित्तात्मा व्यध्वंसयत मन्दधीः॥ २<br>तां कृत्वा च्युतचारित्रां मदान्धः पृथिवीपतिः।<br>निष्क्रामाश्रमात् तस्माद् गतश्च नगरं निजम्॥ ३<br>साऽपि शुक्रसुता तन्वी अरजा रजसाप्लुता।<br>आश्रमादथ निर्गत्य बहिस्तस्थावधोमुखी॥ ४<br>चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः।<br>महाग्रहोपसृप्तेव रोहिणी शशिनः प्रिया॥ ५ | प्रह्लादने कहा—कामसे अंधे हुए उस मूर्खने इस प्रकार विवाद (निषेध) करती हुई श्रेष्ठ भार्गव कुलमें प्रसूत उस कन्याको हठात् अपावन (ध्वस्तशील) कर दिया। मदसे अंधा बना हुआ वह चरित्रसे च्युत हो करके उस आश्रमसे बाहर निकलकर अपने नगर चला गया। उसके बाद रजसे लपटायी वह कृशाङ्गी शुक्रपुत्री अरजा भी आश्रमसे बाहर निकलकर नीचे मुख लटकाये बैठ गयी। राहुसे पीड़ित चन्द्र-प्रिया रोहिणीके समान वह अपने पिताका चिन्तन करती हुई बारम्बार (बिलख-बिलखकर) रोने लगी॥ २—५॥ |
| ततो बहुतिथे काले समाप्ते यज्ञकर्मणि।<br>पातालादागमच्छुक्रः स्वमाश्रमपदं मुनिः॥ ६<br>आश्रमान्ते च ददृशे सुतां दैत्य रजस्वलाम्।<br>मेघलेखामिवाकाशे संध्यारागेण रञ्जिताम्॥ ७<br>तां दृष्ट्वा परिपप्रच्छ पुत्रि केनासि धर्षिता।<br>कः क्रीडति सरोषेण सममाशीविषेण हि॥ ८<br>कोऽद्यैव याम्यां नगरीं गमिष्यति सुदुर्मतिः।<br>कस्त्वां शुद्धसमाचारां विध्वंसयति पापकृत्॥ ९<br>ततः स्वपितरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुनः पुनः।<br>रुदन्ती व्रीडयोपेता मन्दं मन्दमुवाच ह॥ १० | उसके बाद जब बहुत तिथियोंवाला समय बीत गया और यज्ञ समाप्त हो गया तब शुक्रममुनि पातालसे अपने आश्रममें आये। दैत्य! उन्होंने आश्रमसे बाहर आकाशमें सन्ध्याके समय लालिमासे रञ्जित मेघमालाकी तरह धूलसे लिपटी हुई अपनी पुत्रीको देखा। उसे देखकर उन्होंने पूछा—पुत्रि! किसने तुम्हारा धर्षण (अपमान) किया है? क्रोधभरे साँपसे कौन खेल कर रहा है? पवित्र आचरणवाली तुम्हें शीलसे च्युत कर कौन दुर्बुद्धि पापी आज ही यमपुरी जानेवाला है? उसके बाद अपने पिताको देखकर बारम्बार काँपती, रोती एवं लजाती हुई अरजाने धीरे-धीरे कहा—॥ ६—१०॥ |
| तव शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासकृत्।<br>बलादनाथा रुदती नीताऽहं वचनीयताम्॥ ११<br>एतत् पुत्र्या वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।<br>उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ १२<br>यस्मात् तेनावनीतेन मत्तो ह्यभयमुत्तमम्।<br>गौरवं च तिरस्कृत्य च्युतधर्माऽरजा कृता॥ १३<br>तस्मात् सराष्ट्रः सबलः सभृत्यो वाहनैः सह।<br>सप्तरात्रान्तराद् भस्म ग्राववृष्ट्या भविष्यति॥ १४ | बार-बार बरजनेपर भी आपके शिष्य दण्डने रोती हुई मुझ अनाथाको बलपूर्वक निन्दनीया बना दिया है—हमारा शीलभ्रंश कर दिया है। कन्याकी इस बातको सुनकर शुक्राचार्यकी आँखें क्रोधसे अत्यन्त लाल हो गयीं। उन्होंने आचमन करके शुद्ध होकर यह (शाप) वचन कहा—यतः उस उद्दण्डने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरवको तिरस्कृतकर अरजाको धर्मसे च्युत किया है, अतः वह सात रात्रियों (दिनों)-में उपलवृष्टिके कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनोंसहित विनष्ट हो जायगा—हो जाय॥ ११—१४॥ |
| इत्येवमुक्त्वा मुनिपुङ्गवोऽसौ<br>शप्त्वा स दण्डं स्वसुतामुवाच।<br>त्वं पापमोक्षार्थमिहैव पुत्रि<br>तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती॥ १५ | उन मुनिश्रेष्ठने ऐसा कहकर दण्डको शाप देनेके बाद अपनी पुत्रीसे कहा—पुत्रि! कल्याणि! पापसे छुटकारा पानेके लिये तुम तपस्या करती हुई यहीं रहो। |
अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ ३१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शप्त्त्वेथं भगवाञ् छुक्रो दण्डमिक्ष्वाकुनन्दनम्।<br>जगाम शिष्यसहितः पातालं दानवालयम्॥ १६<br><br>दण्डोऽपि भस्मसाद् भूतः सराष्ट्रबलवाहनः।<br>महता ग्राववर्षेण सप्तरात्रान्तरे तदा॥ १७<br><br>एवं दण्डकारण्यं परित्यजन्ति देवताः।<br>आलयं राक्षसानां तु कृतं देवेन शम्भुना॥ १८ | भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्डको इस प्रकार शाप देकर शिष्यके साथ दानवोंके निवास-स्थान पाताललोकमें चले गये। उसके बाद दण्ड भी बहुत बड़ी उपलवृष्टिके कारण सात रात्रियोंके भीतर ही अपने राष्ट्र, सेना और वाहनोंके साथ नष्ट हो गया। यही कारण है कि देवताओंने दण्डकारण्यको छोड़ दिया और शम्भुने उसे राक्षसोंका स्थान बना दिया॥ १५-१८॥ |
| एवं परकलत्राणि नयन्ति सुकृतीनपि।<br>भस्मभूतान् प्राकृतांस्तु महान्तं च पराभवम्॥ १९<br><br>तस्मादन्धक दुर्बुद्धिर्न कार्या भवता त्वियम्।<br>प्राकृताऽपि दहेन्नारी किमुताहोद्रिनन्दिनी॥ २०<br><br>शङ्करोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतुं सुरासुरैः।<br>द्रष्टुमप्यमितौजस्कः किमु योधयितुं रणे॥ २१ | इस प्रकार (जैसा कि ऊपर वर्णित है) परनारियाँ (अपनेको अपवित्र करनेवाले) पुण्यात्माओंको भी जलाकर राख (नष्ट) कर देती हैं, फिर साधारण मनुष्य तो बहुत बड़ा तिरस्कार प्राप्त करते हैं। अतः अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिये। साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वतीका क्या कहना। दैत्येश! सुर या असुर कोई भी महादेवको नहीं जीत सकता। जब रणमें अत्यधिक ओजसे सम्पन्न शंकरको देखा भी नहीं जा सकता तब उनसे युद्ध करना कैसे सम्भव है॥ १९-२१॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने क्रुद्धस्ताम्रेक्षणः श्वसन्।<br>वाक्यमाह महातेजाः प्रह्लादं चान्धकासुरः॥ २२<br><br>किं ममासौ रणे योद्धुं शक्तस्त्रिणयनोऽसुर।<br>एकाकी धर्मरहितो भस्मारुणितविग्रहः॥ २३<br><br>नान्धको बिभियादिन्द्रान्नामरेभ्यः कथंचन।<br>स कथं वृषपत्राक्षाद् बिभेति स्त्रीमुखेक्षकात्॥ २४<br><br>तच्छ्रुत्वाऽस्य वचो घोरं प्रह्लादः प्राह नारद।<br>न सम्यगुक्तं भवता विरुद्धं धर्मतोऽर्थतः॥ २५ | पुलस्त्यजी बोले— ऐसा वचन कहनेपर क्रुद्ध एवं लाल-लाल आँखें किये हुए महातेजस्वी अन्धकासुरने लंबी साँस लेते हुए प्रह्लादसे कहा—असुर! क्या शरीरपर राख लपेटे, (किंतु, लोक) धर्मसे रहित अकेला वह त्रिनयन लड़ाईके मैदानमें मुझसे युद्ध कर सकता है? जो अन्धक इन्द्र या (अन्य) देवताओंसे कभी नहीं डरता वह बैलकी सवारी करनेवाले तथा स्त्रीका मुख निहारनेवाले त्रिनेत्र (शंकर)-से कैसे डर सकता है? नारद! उसके उस कठोर वचनको सुनकर प्रह्लादने कहा—आप यह उचित नहीं कह रहे हैं। आपका कहना धर्म एवं अर्थके विपरीत है॥ २२-२५॥ |
| हुताशनपतङ्गाभ्यां सिंहक्रोष्टुकयोरिव।<br>गजेन्द्रमशकाभ्यां च रुक्मपाषाणयोरिव॥ २६<br><br>एतेषाभिरुदितं यावदन्तरमन्धक।<br>तावदेवान्तरं चास्ति भवतो वा हरस्य च॥ २७<br><br>वारितोऽसि मया वीर भूयो भूयश्च वार्यसे।<br>शृणुष्व वाक्यं देवर्षेरसितस्य महात्मनः॥ २८ | अन्धक! अग्नि और जुगनू, सिंह और सियार, गजेन्द्र और मशक तथा सोने और पत्थरमें जितना अन्तर कहा जाता है, उतना ही अन्तर आप और शङ्करकी तुलनामें है। वीर! आपको मैंने रोका है और (अब भी) बार-बार रोक रहा हूँ। आप देवर्षि असितका वचन सुनें— |
| ३२० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ |
|---|
| यो धर्मशीलो जितमानरोषो<br>विद्याविनीतो न परोपतापी।<br>स्वदारतुष्टः परदारवर्जी<br>न तस्य लोके भयमस्ति किंचित्॥ २९ | जो व्यक्ति धर्मनिष्ठ, अभिमान और क्रोधको जीतनेवाला, विद्यासे विनम्र, किसीको दुःख न देनेवाला, अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट तथा परस्त्रीका त्याग करनेवाला होता है, उसे संसारमें कोई भय नहीं होता॥ २६-२९॥ |
| यो धर्महीनः कलहप्रियः सदा<br>परोपतापी श्रुतिशास्त्रवर्जितः।<br>परार्थदारेप्सुरवर्णसंगमी<br>सुखं न विन्देत परत्र चेह॥ ३०<br><br>धर्मान्वितोऽभूद् भगवान् प्रभाकरः<br>संत्यक्तरोषश्च मुनिः स वारुणिः।<br>विद्यान्वितोऽभून्मनुरर्कपुत्रः<br>स्वदारसंतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥ ३१<br><br>एतानि पुण्यानि कृतान्यमीभि-<br>र्मया निबद्धानि कुलक्रमोक्त्या।<br>तेजोऽन्विताः शापवरक्षमाश्च<br>जाताश्च सर्वे सुरसिद्धपूज्याः॥ ३२<br><br>अधर्मयुक्तोऽङ्गसुतो बभूव<br>विभुश्च नित्यं कलहप्रियोऽभूत्।<br>परोपतापी नमुचिर्दुरात्मा<br>पराबलेप्सुर्नहुषश्च राजा॥ ३३ | जो व्यक्ति धर्मसे हीन, कलहसे प्रेम रखनेवाला, सदा दूसरोंको दुःख देनेवाला, वेद-शास्त्र (-के अध्ययन)-से रहित, दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीकी इच्छा रखनेवाला तथा भिन्न वर्णके साथ सम्बन्ध करनेवाला होता है, वह इस लोक और परलोकमें सुख नहीं पा सकता। भगवान् सूर्य धर्मसे युक्त थे, महर्षि वारुणि (वसिष्ठ)-ने क्रोध छोड़ दिया था, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान् थे और अगस्त्य ऋषि अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट थे। मैंने कुलके क्रमानुसार इन पुण्य करनेवालोंका उल्लेख किया है। शाप और वर देनेमें समर्थ ये सभी तेजस्वीलोग देवताओं और सिद्धोंके पूज्य हुए। अङ्गपुत्र (वेन) अधार्मिक और शक्तिशाली तथा नित्य कलहप्रिय था। दुरात्मा नमुचि परसंतापी एवं राजा नहुष परस्त्रीपर अधिकार प्राप्त करना चाहता था॥ ३०-३३॥ |
| परार्थलिप्सुर्दितिजो हिरण्यदृक्<br>मूर्खस्तु तस्याप्यनुजः सुदुर्मतिः।<br>अवर्णसंगी यदुरुत्तमौजा<br>एते विनष्टास्त्वनयात् पुरा हि॥ ३४<br><br>तस्माद् धर्मो न संत्याज्यो धर्मो हि परमा गतिः।<br>धर्महीना नरा यान्ति रौरवं नरकं महत्॥ ३५<br><br>धर्मस्तु गदितः पुम्भिस्तारणे दिवि चेह च।<br>पतनाय तथाऽधर्म इह लोके परत्र च॥ ३६<br><br>त्याज्यं धर्मान्वितैर्नित्यं परदारोपसेवनम्।<br>नयन्ति परदारा हि नरकानेकविंशतिम्।<br>सर्वेषामपि वर्णानामेष धर्मो ध्रुवोऽन्धक॥ ३७ | दितिका पुत्र हिरण्याक्ष परधनका लालची था। उसका छोटा भाई दुर्बुद्धि एवं मूर्ख था तथा पराक्रमी यदु भिन्न जातिके साथ सम्बन्ध करनेवाला था। ये सभी पूर्वकालमें दुर्नीतिके कारण नष्ट हो गये। इसलिये धर्मको नहीं छोड़ना चाहिये; क्योंकि धर्म ही उत्तम गति है। धर्मसे हीन मनुष्य महान् रौरव नरकमें जाते हैं। पूर्वजोंने धर्मको ही परलोकको पार करनेवाला बताया है तथा अधर्मको इस लोक और परलोकमें पतनका हेतु बताया है। धर्मनिष्ठ व्यक्तियोंको परस्त्रीका सेवन करना सदैव वर्जनीय बताया है यतः परस्त्रियाँ इक्कीस नरकोंमें ले जाती हैं। अन्धक! सभी वर्णोंके लिये यह निश्चित धर्म है॥ ३४-३७॥ |
| परार्थपरदारेषु यदा वाञ्छां करिष्यति।<br>स याति नरकं घोरं रौरवं बहुलाः समाः॥ ३८ | जो मनुष्य दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीमें कामना करता है, वह बहुत वर्षोंके लिये भयंकर रौरव नरकमें |
अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ [ ३२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं पुराऽसुरपते देवर्षिरसितोऽव्ययः।<br>प्राह धर्मव्यवस्थां खगेन्द्रायारुणाय हि॥ ३९<br><br>तस्मात् सुदूरतो वर्जेत् परदारान् विचक्षणः।<br>नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम्॥ ४० | चला जाता है। राक्षसराज! प्राचीन समयमें महात्मा देवर्षि असितने गरुड़ तथा अरुणसे धर्मकी यह व्यवस्था कही थी। इसलिये विद्वान् व्यक्ति दूसरी स्त्रियोंको दूरसे ही परित्याग कर दे; क्योंकि परस्त्रियाँ नीच बुद्धिवाले मनुष्योंको तिरस्कृत करा देती हैं॥ ३८–४०॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने प्रह्लादं प्राह चान्धकः।<br>भवान् धर्मपरस्त्वेको नाहं धर्मं समाचरे॥ ४१<br><br>इत्येवमुक्त्वा प्रह्लादमन्धकः प्राह शम्बरम्।<br>गच्छ शम्बर शैलेन्द्रं मन्दरं वद शङ्करम्॥ ४२<br><br>भिक्षो किमर्थं शैलेन्द्रं स्वर्गंतुल्यं सकन्दरम्।<br>परिभुङ्क्षसि केनाद्य तव दत्तो वदस्व माम्॥ ४३<br><br>तिष्ठन्ति शासने मह्यं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>तत् किमर्थं निवमसे मामनादृत्य मन्दरे॥ ४४ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारका वचन कहनेपर अन्धकने प्रह्लादसे कहा कि आप अकेले धर्मनिष्ठ हैं। मैं धर्मका व्यवहार नहीं करता। प्रह्लादसे इस प्रकार कहकर अन्धकने शम्बरसे कहा—शम्बर! तुम मन्दर-पर्वतपर जाओ और शंकरसे कहो—भिक्षुक! तुम गुफामें रहनेवाले होकर और सबके समान मन्दर-पर्वतका उपभोग क्यों कर रहे हो? मुझे बतलाओ कि तुमको इसे किसने दे दिया है? इन्द्र आदि देवता मेरा शासन मानते हैं। तुम मेरा अपमान करके इस मन्दर-पर्वतपर कैसे रह रहे हो?॥ ४१–४४॥ |
| यदीष्टस्तव शैलेन्द्रः क्रियतां वचनं मम।<br>येयं हि भवतः पत्नी सा मे शीघ्रं प्रदीयताम्॥ ४५<br><br>इत्युक्तः स तदा तेन शम्बरो मन्दरं द्रुतम्।<br>जगाम तत्र यत्रास्ते सह देव्या पिनाकधृक्॥ ४६<br><br>गत्वावाचान्धकवचो याथातथ्यं दनोः सुतः।<br>तमुत्तरं हरः प्राह शृण्वत्या गिरिकन्यया॥ ४७<br><br>ममायं मन्दरो दत्तः सहस्राक्षेण धीमता।<br>तन्न शक्नोम्यहं त्यक्तुं विनाज्ञां वृत्रवैरिणः॥ ४८ | यदि यह पर्वतराज तुम्हें अभीष्ट है तो मेरे कहनेके अनुसार कार्य करो। तुम्हारी जो यह स्त्री है, उसे मुझे शीघ्र दे दो। उसके ऐसा कहनेपर शम्बर शीघ्रतासे उस मन्दरपर्वतपर गया, जहाँ पिनाक-पाणि शंकर देवीके साथ निवास कर रहे थे। दनु-पुत्रने वहाँ जाकर अन्धकके वचनको ज्यों-का-त्यों कहा। शङ्करने पर्वतनन्दिनीके सुनते हुए उसे उत्तर दिया। बुद्धिमान् इन्द्रने मुझे यह मन्दरपर्वत दिया है। इसलिये वृत्रासुरके वैरी इन्द्रकी आज्ञाके बिना मैं इसे नहीं छोड़ सकता॥ ४५–४८॥ |
| यच्चाब्रवीद् दीयतां मे गिरिपुत्रीति दानवः।<br>तदेषा यातु स्वं कामं नाहं वारयितुं क्षमः॥ ४९<br><br>ततोऽब्रवीद् गिरिसुता शम्बरं मुनिसत्तम।<br>ब्रूहि गत्वान्धकं वीर मम वाक्यं विपश्चितम्॥ ५०<br><br>अहं पताका संग्रामे भवानीशश्च देविनौ।<br>प्राणद्यूतं परिस्तीर्य यो जेष्यति स लप्स्यते॥ ५१<br><br>इत्येवमुक्तो मतिमान् शम्बरोऽन्धकमागमत्।<br>समागम्याब्रवीद् वाक्यं शर्वगौर्योश्च भाषितम्॥ ५२ | दानवने जो यह कहा कि गिरिनन्दिनीको मुझे दे दो, तो ये अपनी इच्छासे जा सकती हैं। मैं इन्हें नहीं रोक सकता। मुनिसत्तम! उसके बाद गिरिपुत्री पार्वतींने शम्बरसे कहा—वीर! तुम जाकर विद्वान् अन्धकसे मेरी बात कहो—संग्राममें मैं तो पताका हूँ। आप और शंकर खेलनेवाले हैं। प्राणोंका द्यूत फैलाकर (हार-जीतका दाँव लगाकर) जो जीतेगा वह मुझे प्राप्त करेगा! ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् शम्बर अन्धकके पास गया एवं उसने शंकर तथा गौरीकी कही हुई बातें (ज्यों-की-त्यों) उससे कह दीं॥ ४९–५२॥ |
| ३२२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ |
|---|
| तच्छ्रुत्वा दानवपतिः क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन।<br>समाहूयाब्रवीद् वाक्यं दुर्योधनमिदं वचः॥ ५३<br>गच्छ शीघ्रं महाबाहो भेरीं सान्नाहिकीं दृढाम्।<br>ताडयस्व सुविश्रब्धं दुःशीलामिव योषितम्॥ ५४<br>समादिष्टोऽन्धकेनाथ भेरीं दुर्योधनो बलात्।<br>ताडयामास वेगेन यथा प्राणेन भूयसा॥ ५५<br>सा ताडिता बलवता भेरी दुर्योधनेन हि।<br>सत्वरं भैरवं रावं रुराव सुरभी यथा॥ ५६ | उसे सुनकर दानवपतिकी आँखें क्रोधसे जलने लगीं। लंबी साँस लेते हुए दुर्योधनको बुलाकर उसने कहा—महाबाहो! शीघ्र जाओ एवं मारू या संग्रामके समयमें बजनेवाले जुझाऊ नगाड़ेको (मस्तीसे) जोर-जोरसे ऐसे पीटो जैसे दुराचारिणीको कोई (उसके अपराधके कारण उसका अभिभावक आदि निर्भयतासे) ताड़ित करता है। उसके बाद अन्धकसे आदेश प्राप्त कर दुर्योधन अत्यन्त बलपूर्वक जी-जानसे वेगपूर्वक भेरीको बजाने लगा। बलवान् दुर्योधनद्वारा बलपूर्वक बजायी जाती हुई वह भेरी सहसा भयंकर ध्वनिमें घरघराने लगी, जिस प्रकार सुरभी घरघराती है॥ ५३–५६॥ |
| याथातथ्यं च तान् सर्वान्हा सेनापतिर्बली।<br>ते चापि बलिनां श्रेष्ठाः संनद्धा युद्धकाङ्क्षिणः॥ ५८<br>सहान्धका निर्ययुस्ते गजैरुष्ट्रैर्हयै रथैः।<br>अन्धको रथमास्थाय पञ्चनल्वप्रमाणतः॥ ५९<br>त्र्यम्बकं स पराजेतुं कृतबुद्धिर्विनिर्ययौ।<br>जम्भः कुजम्भो हुण्डश्च तुहुण्डः शम्बरो बलिः॥ ६०<br>बाणः कार्तस्वरो हस्ती सूर्यशत्रुर्महोदरः।<br>अयःशंकुः शिबिः शाल्वो वृषपर्वा विरोचनः॥ ६१<br>हयग्रीवः कालनेमिः संह्लादः कालनाशनः।<br>शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्॥ ६२<br>दुर्योधनश्च पाकश्च विपाकः कालशम्बरौ।<br>एते चान्ये च बहवो महावीर्या महाबलाः।<br>प्रजग्मुरुत्सुका योद्धुं नानायुधधरा रणे॥ ६३<br>इत्थं दुरात्मा दनुसैन्यपाल-<br>स्तदान्धको योद्धुमना हरेण।<br>महाचलं मन्दरमभ्युपेयिवान्<br>स कालपाशावसितो हि मन्दधीः॥ ६४ | उसकी उस ध्वनिको सुनकर सभी बड़े असुर ‘यह क्या है?’—ऐसा कहते हुए शीघ्रतासे सभामें आ गये। पराक्रमी सेनापतिने उन सभीसे उचित और सत्य वचन कहा। युद्धकी इच्छा करनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ वे सभी वीर तैयार हो गये। हाथी, ऊँट, घोड़ों और रथोंसहित वे सभी अन्धकके साथ बाहर निकले। पाँच नल्व—अर्थात् दो हजार हाथके प्रमाणवाले रथपर चढ़कर अन्धक त्रिलोचन शंकरको जीतनेका निश्चय कर बाहर निकला। जम्भ, कुजम्भ, हुण्ड, तुहुण्ड, शम्बर, बलि, बाण, कार्तस्वर, हस्ती, सूर्यशत्रु, महोदर, अयःशंकु, शिबि, शाल्व, वृषपर्वा, विरोचन, हयग्रीव, कालनेमि, संह्लाद, कालनाशन, शरभ, शलभ, पराक्रमी विप्रचित्ति, दुर्योधन, पाक, विपाक, काल एवं शम्बर—ये सभी तथा अन्य अनेक महापराक्रमशाली एवं महाबलवान् राक्षस भाँति-भाँतिके आयुधोंको लेकर प्रबल इच्छासे संग्राममें लड़नेके लिये चल पड़े। इस प्रकार काल-पाशसे बँधा हुआ वह अल्पमति दनुसैन्यपति दुष्टात्मा अन्धक शंकरसे युद्ध करनेके विचारसे महान् पर्वत मन्दरपर गया॥ ५७–६४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छाछठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६६॥