वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४०- वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग
| १६४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां तीर्थे स्नात्वा ह्यलेपके।<br>पूजयित्वा शिवं तत्र पापलेपो न विद्यते॥ ४४<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः फलकीवनमुत्तमम्।<br>यत्र देवाः सगन्धर्वाः साध्याश्च ऋषयः स्थिताः।<br>तपश्चरन्ति विपुलं दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥ ४५<br><br>दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः।<br>अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः॥ ४६ | सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त करता है। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी (चौदस) तिथिको 'अलेपक' नामक तीर्थमें स्नान कर वहाँ शिवकी पूजा करनेसे पापसे लिप्त नहीं होता—पाप दूर भाग जाता है। विप्रवरो! वहाँसे उत्तम फलकीवनमें जाना चाहिये। वहाँ देवता, गन्धर्व, साध्य और ऋषिलोग रहते हैं एवं दिव्य सहस्र वर्षोंतक बहुत तप करते हैं। दृषद्वती (कग्गर) नदीमें स्नानकर देवताओंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र नामक यज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४३—४६॥ |
| सोमक्षये च सम्प्राप्ते सोमस्य च दिने तथा।<br>यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ४७<br><br>गयायां च यथा श्राद्धं पितॄन् प्रीणाति नित्यशः।<br>तथा श्राद्धं च कर्तव्यं फलकीवनमाश्रितैः॥ ४८<br><br>मनसा स्मरते यस्तु फलकीवनमुत्तमम्।<br>तस्यापि पितरस्तृप्तिं प्रयास्यन्ति न संशयः॥ ४९<br><br>तत्रापि तीर्थं सुमहत् सर्वदेवैरलंकृतम्।<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५०<br><br>पाणिखाते नरः स्नात्वा पितॄन् संतर्प्य मानवः।<br>अवाप्नुयाद् राजसूयं सांख्यं योगं च विन्दति॥ ५१ | सोमवारके दिन चन्द्रमाके क्षीण हो जानेपर अर्थात् सोमवती अमावास्याको जो मनुष्य श्राद्ध करता है, उसका पुण्यफल सुनो। जैसे गया-क्षेत्रमें किया गया श्राद्ध पितरोंको नित्य तृप्त करता है, वैसे ही फलकीवनमें रहनेवालोंको श्राद्ध करनेसे पितरोंको तृप्ति होती है। जो मनुष्य मनसे फलकीवनका स्मरण करता है, उसके भी पितर निःसंदेह तृप्ति प्राप्त करते हैं। वहीं सभी देवोंसे सुशोभित एक 'सुमहत्' तीर्थ है; उसमें स्नान करनेवाला पुरुष हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। मानव पाणिखात तीर्थमें स्नान करके एवं पितरोंका तर्पण कर राजसूय-यज्ञ तथा सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म)-के अनुष्ठान करनेसे होनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४७—५१॥ |
| ततो गच्छेत सुमहत्तीर्थं मिश्रकमुत्तमम्।<br>तत्र तीर्थानि मुनिना मिश्रितानि महात्मना॥ ५२<br><br>व्यासेन मुनिशार्दूला दधीच्यर्थं महात्मना।<br>सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः॥ ५३<br><br>ततो व्यासवनं गच्छेद्व्रियतो नियताशनः।<br>मनोजवे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवमणिं शिवम्॥ ५४<br><br>मनसा चिन्तितं सर्वं सिध्यते नात्र संशयः।<br>गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थं नरः शुचिः॥ ५५<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्चयेद् देवान् पितॄंश्च प्रयतो नरः।<br>स देव्या समनुज्ञातो यथा सिद्धिं लभेन्नरः॥ ५६ | पाणिखातके बाद 'मिश्रक' नामक महान् एवं श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। मुनिश्रेष्ठो! वहाँ महात्मा व्यासदेवने दधीचिऋषिके हेतु तीर्थोंको एकमें मिश्रित किया था। इस मिश्रकतीर्थमें स्नान कर लेनेवाला मनुष्य (मानो) सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। फिर संयमशील तथा नियमित आहार करनेवाला होकर व्यासवनमें जाना चाहिये। 'मनोजव' तीर्थमें स्नानकर 'देवमणि' शङ्करका दर्शन करनेसे मनुष्यको अभीष्ट-सिद्धिकी प्राप्ति होती है—इसमें संदेह नहीं। मनुष्यको देवीके मधुवटी नामक तीर्थमें जाकर स्नान करके संयत होकर देवों एवं पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला व्यक्ति देवीकी आज्ञासे (जैसी चाहता है, वैसी) सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ ५२—५६॥ |
| कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्यां नरोत्तमः।<br>स्नायीत नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५७ | जो मनुष्य 'कौशिकी' और 'दृषद्वती' (कग्गर) नदियोंके संगममें स्नान करता और नियत भोजन करता है, वह श्रेष्ठ पुरुष सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
| अध्याय ३६ ] | कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन | १६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता।<br>पुत्रशोकाभिभूतेन देहत्यागाय निश्चयः ॥ ५८<br><br>कृतो देवैश्च विप्रेन्द्राः पुनरुत्थापितस्तदा।<br>अभिगम्य स्थलीं तस्य पुत्रशोकं न विन्दति ॥ ५९<br><br>किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च।<br>गच्छेत परमां सिद्धिं ऋणैर्मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ ६०<br><br>अहं च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे भुवि दुर्लभे।<br>तयोः स्नात्वा विशुद्धात्मा सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ ६१ | श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! 'व्यासस्थली' नामका एक स्थान है, जहाँ पुत्रशोकसे दुःखी होकर वेदव्यासने अपने शरीरत्यागका निश्चय कर लिया था, पर देवोंने उन्हें पुनः सँभाल लिया। उसके बाद उस भूमिमें जानेवाले मनुष्यको पुत्रशोक नहीं होता। 'किंदत्त कूप'में जाकर एक पसर (तौलका एक परिमाण) तिलका दान करनेसे मनुष्य परमसिद्धि और ऋणसे मुक्ति प्राप्त करता है। 'अह' एवं 'सुदिन' नामक ये दो तीर्थ पृथ्वीमें दुर्लभ हैं। इन दोनोंमें स्नान करनेसे मनुष्य विशुद्धात्मा होकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है॥ ५७—६१॥ |
| कृतजप्यं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां प्रयतः स्थितः ॥ ६२<br><br>अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत्।<br>कोटितीर्थं च तत्रैव दृष्ट्वा कोटीश्वरं प्रभुम् ॥ ६३<br><br>तत्र स्नात्वा श्रद्धधानः कोटियज्ञफलं लभेत्।<br>ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ६४<br><br>यत्र वामनरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>बलेरपहृतं राज्यमिन्द्राय प्रतिपादितम् ॥ ६५ | उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'कृतजप्य' नामके तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ नियमपूर्वक संयत रहते हुए गङ्गामें स्नान करना चाहिये। वहाँपर महादेवका पूजन करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। वहींपर कोटितीर्थ स्थित है। वहाँ श्रद्धापूर्वक स्नानकर 'कोटीश्वर' नाथका दर्शन करनेसे मनुष्य कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है। उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'वामनक' तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ प्रभावशाली विष्णुने वामनरूप धारणकर बलिको राज्य छीन कर इन्द्रको दे दिया था॥ ६२—६५॥ |
| तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ६६<br><br>ज्येष्ठाश्रमं च तत्रैव सर्वपातकनाशनम्।<br>तं तु दृष्ट्वा नरो मुक्तिं संप्रयाति न संशयः ॥ ६७<br><br>ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः।<br>द्वादश्यां च नरः स्नात्वा ज्येष्ठत्वं लभते नृषु ॥ ६८<br><br>तत्र प्रतिष्ठिता विप्रा विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>दीक्षाप्रतिष्ठासंयुक्ता विष्णुप्रीणनतत्पराः ॥ ६९ | वहाँ 'विष्णुपद' तीर्थमें स्नान कर वामनदेवकी पूजा कर समस्त पापोंसे शुद्ध होकर (छूटकर) मनुष्य विष्णुके लोकको प्राप्त कर लेता है। वहींपर सभी पापोंको नष्ट करनेवाला ज्येष्ठाश्रम नामका तीर्थ है, उसका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है—इसमें संदेह नहीं। ज्येष्ठ महीनेके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको उपवास कर द्वादशी तिथिके दिन स्नानकर मानव मनुष्योंमें श्रेष्ठता (बड़प्पन) प्राप्त करता है। वहाँ (सर्वाधिक) प्रभावशाली विष्णुभगवान्ने यज्ञादिमें दीक्षित (लगे हुए), प्रतिष्ठित एवं सम्मान्य तथा विष्णु-भगवान्की आराधनामें परायण ब्राह्मणोंको सम्मानित किया था॥ ६६—६९॥ |
| तेभ्यो दत्तानि श्राद्धानि दानानि विविधानि च।<br>अक्षयाणि भविष्यन्ति यावन्मन्वन्तरस्थितिः ॥ ७०<br><br>तत्रैव कोटितीर्थं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा कोटियज्ञफलं लभेत् ॥ ७१ | उन्हें दिये गये (पात्रक) श्राद्ध और अनेक प्रकारके दान अक्षय एवं मन्वन्तरतक स्थिर रहते हैं। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात 'कोटितीर्थ' है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य करोड़ों यज्ञोंके फल प्राप्त करता है। |
१६६
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ३७
कोटिश्वरं नरो दृष्ट्वा तस्मिंस्तीर्थे महेश्वरम् ।
महादेवप्रसादेन गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ ७२
तत्रैव सुमहत् तीर्थं सूर्यस्य च महात्मनः ।
तस्मिन् स्नात्वा भक्तियुक्तः सूर्यलोके महीयते ॥ ७३
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं कल्मषनाशनम् ।
कुलोत्तारणनामानं विष्णुना कल्पितं पुरा ॥ ७४
वर्णानामाश्रमाणां च तारणाय सुनिर्मलम् ।
ब्रह्मचर्यात्परं मोक्षं य इच्छन्ति सुनिर्मलम् ।
तेऽपि तत्तीर्थमासाद्य पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७५
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
कुलानि तारयेत् स्नातः सप्त सप्त च सप्त च ॥ ७६
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये तत्परायणाः ।
स्नाता भक्तियुताः सर्वे पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७७
दूरस्थोऽपि स्मरेद् यस्तु कुरुक्षेत्रं सवामनम् ।
सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनर्निवसन्नरः ॥ ७८
उस तीर्थमें 'कोटिश्वर' महादेवका दर्शन कर मनुष्य उन
महादेवकी कृपासे गाणपत्य पद (गणनायक्त्वकी उपाधि)
प्राप्त करता है। और वहीं महात्मा सूर्यदेवका महान्
तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें
महान् माना जाता है॥ ७०-७३॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कोटि तीर्थके बाद पापका नाश
करनेवाले 'कुलोत्तारण तीर्थ' में जाना चाहिये, जिसे
प्राचीनकालमें विष्णुने वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले
मनुष्योंको तारनेके लिये बनाया था। जो मनुष्य
ब्रह्मचर्यव्रतसे विशुद्ध मुक्तिकी इच्छा करते हैं ऐसे लोग
भी उस तीर्थमें जाकर परम पदका दर्शन कर लेते हैं।
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी वहाँ स्नानकर
अपने कुलके (७+७+७=२१) इक्कीस पूर्व पुरुषोंका
उद्धार कर देते हैं। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र
उस तीर्थमें तीर्थपरायण होकर एवं भक्तिसे स्नान करते
हैं, वे सभी परम पदका दर्शन करते हैं। और जो दूर
रहता हुआ भी वामनसहित कुरुक्षेत्रका स्मरण करता है,
वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है; फिर वहाँ निवास
करनेवालेका तो कहना ही क्या? ॥ ७४-७८॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन
लोमहर्षण उवाच
पवनस्य हृदे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ।
विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शैवं पदमवाप्नुयात् ॥ १
पुत्रशोकेन पवनो यस्मिंल्लीनो बभूव ह ।
ततः सब्रह्मकैर्देवैः प्रसाद्य प्रकटीकृतः ॥ २
अतो गच्छेत अमृतं स्थानं तच्छूलपाणिनः ।
यत्र देवैः सगन्धर्वैः हनुमान् प्रकटीकृतः ॥ ३
लोमहर्षण बोले- पवनके हृदमें, पुत्र (हनुमान्जी)-
के शोकके कारण जिस सरोवरमें पवन लीन हो गये थे,
उसमें स्नान करके महेश्वरदेवका दर्शन कर मनुष्य समस्त
पापोंसे विमुक्त हो शिवपदको प्राप्त करता है। उसके
बाद ब्रह्माके साथ सभी देवोंने मिलकर उन्हें प्रसन्न एवं
प्रत्यक्ष प्रकट किया। यहाँसे शूलपाणि (भगवान् शंकर)-
के अमृत नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ गन्धर्वोंके
साथ देवताओंने हनुमान्जीको प्रकट किया था।
अध्याय ३७ ]
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन
१६७
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा अमृतत्वमवाप्नुयात्।
कुलोत्तारणमासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ४
कुलानि तारयेत् सर्वान् मातामहपितामहान्।
शालिहोत्रस्य राजर्षेस्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ५
तत्र स्नात्वा विमुक्तस्तु कलुषैर्देहसंभवैः ।
श्रीकुञ्जं तु सरस्वत्यां तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ६
तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या अग्निष्टोमफलं लभेत् ।
ततो नैमिषकुञ्जं तु समासाद्य नरः शुचिः ॥ ७
नैमिषस्य च स्नानेन यत् पुण्यं तत् समाप्नुयात् ।
तत्र तीर्थं महाख्यातं वेदवत्या निषेवितम् ॥ ८
रावणेन गृहीतायाः केशेषु द्विजसत्तमाः।
तद्ध्याय च सा प्राणान् मुमुचे शोककर्शिता ॥ ९
ततो जाता गृहे राज्ञो जनकस्य महात्मनः।
सीता नामेति विख्याता रामपत्नी पतिव्रता ॥ १०
सा हृता रावणेनेह विनाशाय आत्मनः स्वयम्।
रामेण रावणं हत्वा अभिषिच्य विभीषणम् ॥ ११
समानीता गृहं सीता कीर्तिरात्मवता यथा।
तस्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा कन्यायज्ञफलं लभेत् ॥ १२
विमुक्तः कलुषैः सर्वैः प्राप्नोति परं पदम्।
ततो गच्छेत सुमहद् ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ॥ १३
यत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः।
ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात् ॥ १४
ततो गच्छेत सोमस्य तीर्थं त्रैलोक्यदुर्लभम् ।
यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा द्विजराज्यमवाप्नुयात् ॥ १५
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च स्वपितॄन् दैवतानि च ।
निर्मलः स्वर्गमायाति कार्तिकां चन्द्रमा यथा ॥ १६
उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य अमृतपदको पा लेता है।
नियमानुसार तीर्थका सेवन करनेवाला श्रेष्ठ ब्राह्मण
'कुलोत्तारण' तीर्थमें जाकर अपने मातामह और पितामहके
समस्त वंशोंका उद्धार कर देता है। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध
राजर्षि शालिहोत्रके तीर्थमें स्नान कर मुक्त हो मनुष्य
शारीरिक पापोंसे सर्वथा छूट जाता है। सरस्वती-क्षेत्रमें
तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध श्रीकुञ्ज नामक तीर्थ है। उसमें
भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम-यज्ञका फल
प्राप्त कर लेता है। मनुष्य वहाँसे नैमिषकुञ्जतीर्थमें
जाकर पवित्र हो जाता है और नैमिषारण्यतीर्थमें स्नान
करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्त कर लेता है। वहाँपर
'वेदवती' से निषेवित बहुत प्रसिद्ध तीर्थ है ॥ १-८ ॥
द्विजश्रेष्ठो ! रावणके द्वारा अपने केशके पकड़े
जानेपर शोकसे संतप्त होकर (वेदवतीने) उसके
(रावणके) वधके लिये अपने प्राणोंको छोड़ दिया था
और उसके बाद महात्मा राजा जनकके घरमें वे उत्पन्न
हुईं और उनका नाम 'सीता' विख्यात हुआ तथा वे
रामकी पतिव्रता पत्नी हुईं। उस सीताको रावणने स्वयं
अपने विनाशके लिये अपहृत कर लिया। सीताके
अपहरण हो जानेपर राम-रावण-युद्ध हुआ, जिसमें
रावणको मारनेके बाद विभीषणको (लङ्काके राज्यपर)
अभिषिक्त कर राम सीताको वैसे ही घर लौटा लाये,
जैसे आत्मवान् (जितेन्द्रिय) पुरुष कीर्तिको प्राप्त करता
है। उनके तीर्थमें स्नान कर मनुष्य कन्यायज्ञ (कन्यादान)-
का फल एवं समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम पदको
प्राप्त करता है। उस वेदवतीतीर्थके बाद ब्रह्माके उत्तम
और महान् स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ स्नान करनेसे
अवर-वर्णका व्यक्ति (जन्मान्तरमें) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर
लेता है और ब्राह्मण विशुद्ध अन्तःकरणवाला होकर
परम पदकी प्राप्ति करता है ॥ ९-१४ ॥
उस ब्रह्माके तीर्थस्थलपर जानेके बाद तीनों
लोकोंमें दुर्लभ 'सोमतीर्थ' में जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमाने
तपस्या करके द्विजराजत्व-पदको प्राप्त किया था। वहाँ
स्नानकर अपने पितरों और देवताओंकी पूजा करनेसे
मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान निर्मल