वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२- सुकेशीका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन
५२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९
ततस्तु रौद्रे सुरदैत्यसादने वह युद्ध डरपोकोंके लिये भयावना, देवों एवं
महाहवे भीरुभयंकरेऽथ। दैत्योंका संहार करनेवाला तथा वस्तुतः अत्यन्त भयंकर
रक्षांसि यक्षाश्च सुसंप्रहृष्टाः था। उसमें यक्ष और राक्षस लोग अत्यन्त आनन्दित
पिशाचयूथास्त्वभिरेमिरे च॥४१ हो रहे थे। पिशाचोंका समूह भी प्रसन्न था। वे
पिबन्त्यसृग्गाढतरं भटाना- वीरोंके गाढ़े रुधिरका पान करते थे तथा (उनके
मालिङ्ग्य मांसानि च भक्षयन्ति। शवोंका) आलिंगन कर मांसका भक्षण करते थे।
वसां विल्लुम्पन्ति च विस्फुरन्ति पक्षी चर्बीको नोचते और उछलते थे एवं एक-
गर्जन्त्यथान्योन्यमथो वयांसि ॥ ४२ दूसरेके प्रति गर्जन करते थे। सियारिनें 'फेत्कार'
मुञ्चन्ति फेत्काररवाञ्शिवाश्च शब्द कर रही थीं, भूमिपर पड़े हुए वेदनासे दुःखी
क्रन्दन्ति योधा भुवि वेदनात्र्ताः। योद्धा कराह रहे थे। कुछ लोग शस्त्रसे आहत
शस्त्रप्रतप्ता निपतन्ति चान्ये होकर गिर रहे थे। युद्धभूमि मरघटके समान हो
युद्धं श्मशानप्रतिमं बभूव ॥ ४३ गयी थी। सियारिनोंके भयंकर शब्दसे युक्त देवासुर-
तस्मिञ्शिवाघोररवे प्रवृत्ते संग्राम ऐसा लगता था, मानो युद्धमें निपुण योद्धा
सुरासुराणां सुभयंकरे ह। लोग शस्त्ररूपी पाशा लेकर अपने प्राणोंकी बाजी
युद्धं बभौ प्राणपणोपविद्धं
द्वन्द्वेऽतिशस्त्राक्षगतो दुरोदरः ॥ ४४ लगाते हुए जुआ खेल रहे हैं॥ ४१-४४॥
हिरण्यचक्षुस्तनयो रणेऽन्धको हिरण्याक्षका पुत्र अन्धक हजारों घोड़ोंसे
रथे स्थितो वाजसहस्रयोजिते। युक्त रथपर आरूढ़ होकर मतवाले हाथीकी पीठपर
मत्तेभपृष्ठस्थितमुग्रतेजसं स्थित महातेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ जा भिड़ा।
समेयिवान् देवपतिं शतक्रतुम् ॥ ४५
समापतन्तं महिषाधिरूढं इधर आठ घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ अस्त्र
यमं प्रतीच्छद् बलवान् दितीशः। उठाये बलवान् दैत्यराज प्रह्लादने महिषपर सवार
प्रह्लादनामा तुरगाष्टयुक्तं यमराजका सामना किया। नारदजी! उधर विरोचन
रथं समास्थाय समुद्यतास्त्रः ॥ ४६ वरुणदेवसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा तथा
विरोचनश्चापि जलेश्वरं त्वगा- जम्भ बलशाली कुबेरकी ओर चला। शम्बर
ज्जम्भस्त्वथागाद् धनदं बलाढ्यम्। वायुदेवताके सामने जा खड़ा हुआ एवं मय अग्निके
वायुं समभ्येत्य च शम्बरोऽथ साथ युद्ध करने लगा। हयग्रीव आदि अन्यान्य
मयो हुताशं युयुधे मुनीन्द्र ॥ ४७
अन्ये हयग्रीवमुखा महाबला महाबलवान् दैत्य तथा दानव अग्नि, सूर्य, अष्ट
दितेस्तनूजा दनुपुङ्गवाश्च। वसुओं तथा शेषनाग आदि देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध
सुरान् हुताशार्कवसूरगेश्वरान् करने लगे ॥ ४५-४८ ॥
द्वन्द्वं समासाद्य महाबलान्विताः ॥ ४८
गर्जन्त्यथान्योन्यमुपेत्य युद्धे वे एक-दूसरेके साथ युद्ध करते हुए भीषण
चापानि कर्षन्त्यतिवेगिताश्च। गर्जन कर रहे थे। वे वेगपूर्वक धनुष चढ़ा करके
मुञ्चन्ति नाराचगणान् सहस्रश हजारों बाणोंकी झड़ी लगाकर कहने लगे-अरे!
आगच्छ हे तिष्ठसि किं ब्रुवन्तः ॥ ४९ आओ, आओ, रुक क्यों गये। तेज बाणोंकी वर्षा
शरैस्तु तीक्ष्णैरतितापयन्तः
शस्त्रैरमोघैरभिताडयन्तः । करते हुए तथा अमोघ शस्त्रोंसे प्रहार करते हुए
अध्याय १० ] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५३
| मन्दाकिनीवेगनिभां वहन्तीं<br>प्रवर्तयन्तो भयदां नदीं च ॥ ५०<br>त्रैलोक्यमाकांक्षिभिरुग्रवेगैः<br>सुरासुरैर्नारद संप्रयुद्धे।<br>पिशाचरक्षोगणपुष्टिवर्धनी-<br>मुत्तर्तुमिच्छद्भिरसृग्नदी बभौ ॥ ५१<br>वाद्यन्ति तूर्याणि सुरासुराणां<br>पश्यन्ति खस्था मुनिसिद्धसंघाः।<br>नयन्ति तानप्सरसां गणाग्र्या<br>हता रणे येऽभिमुखास्तु शूराः ॥ ५२ | उन लोगोंने गङ्गाके समान तीव्र वेगसे प्रवाहित होनेवाली, (किंतु) भयंकर नदीको प्रवर्तित कर दिया। नारदजी! उस युद्धमें तीनों लोकोंको चाहनेवाले उग्रवेगशाली देवता एवं असुरगण पिशाचों एवं राक्षसोंकी पुष्टि बढ़ानेवाली शोणित-सरिताको पार करनेकी इच्छा कर रहे थे। उस समय देवता और दानवोंके बाजे बज रहे थे। आकाशमें स्थित मुनियों और सिद्धोंके समूह उस युद्धको देख रहे थे। जो वीर उस युद्धमें सम्मुख मारे गये थे, उन्हें अप्सराएँ सीधे स्वर्गमें लिये चली जा रही थीं॥ ४९–५२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय
अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः प्रवृत्ते संग्रामे भीरूणां भयवर्धने।<br>सहस्त्राक्षो महाचापमादाय व्यसृजच्छरान् ॥ १<br>अन्धकोऽपि महावेगं धनुराकृष्य भास्वरम्।<br>पुरंदराय चिक्षेप शरान् बर्हिणवाससः ॥ २<br>तावन्योन्यं सुतीक्ष्णाग्रैः शरैः संनतपर्वभिः।<br>रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराजघ्नतुरुभावपि ॥ ३<br>ततः क्रुद्धः शतमखः कुलिशं भ्राम्य पाणिना।<br>चिक्षेप दैत्यराजाय तं ददर्श तथान्धकः ॥ ४<br>आजघान च बाणौघैरस्त्रैः शस्त्रैः स नारद।<br>तान् भस्मसात्तदा चक्रे नगानिव हुताशनः ॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— तत्पश्चात् भीरुओंके लिये भय बढ़ानेवाला समर आरम्भ हो गया। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अपने विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। अन्धक भी अपने दीप्तिमान् धनुषको लेकर बड़े वेगसे मयूरपंख लगे बाणोंको इन्द्रपर छोड़ने लगा। वे दोनों एक-दूसरेको झुके हुए पर्वोंवाले स्वर्णपंखयुक्त तथा महावेगवान् तीक्ष्ण बाणोंसे आहत कर दिये। फिर इन्द्रने क्रुद्ध होकर वज्रको अपने हाथसे घुमाकर उसे अन्धकके ऊपर फेंका। नारदजी! अंधकने उसे आते देखा। उसने बाणों, अस्त्रों और शस्त्रोंसे उसपर प्रहार किया; पर अग्नि जिस प्रकार वनों, पर्वतों (या वृक्षों)-को भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस वज्रने उन सभी अस्त्रोंको भस्म कर डाला॥ १–५॥ |
| ततोऽतिवेगिनं वज्रं दृष्ट्वा बलवतां वरः।<br>समाप्लुत्य रथात्तस्थौ भुवि बाहुसहायवान् ॥ ६<br>रथं सारथिना सार्धं साश्वध्वजसकूबरम्।<br>भस्म कृत्वाथ कुलिशमन्धकं समुपाययौ ॥ ७<br>तमापतन्तं वेगेन मुष्टिनाहत्य भूतले।<br>पातयामास बलवाञ्जगर्ज च तदाऽन्धकः ॥ ८ | तब बलवानोंमें श्रेष्ठ अन्धक अति वेगवान् वज्रको आते देखकर रथसे कूदकर बाहुबलका आश्रय लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया। वह वज्र, सारथि, अश्व, ध्वजा एवं कूबरके साथ रथको भस्मकर इन्द्रके पास पहुँच गया। उस (वज्र)-को वेगपूर्वक आते देख बलवान् अन्धकने मुष्टिसे मारकर उसे भूमिपर गिरा दिया और गर्जन करने लगा॥ ६–८॥ |
५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १०
तं गर्जमानं वीक्ष्याथ वासवः सायकैर्दृढम् ।
ववर्ष तान् वारयन् स समभ्यायाच्छतक्रतुम् ॥ ९
आजघान त लेनेभं कुम्भमध्ये पदा करे।
जानुना च समाहत्य विषाणं प्रभभञ्ज च ॥ १०
वाममुष्ट्या तथा पार्श्वं समाहत्यान्धकस्त्वरन् ।
गजेन्द्रं पातयामास प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ॥ ११
गजेन्द्रात् पतमानाच्च अवप्लुत्य शतक्रतुः ।
पाणिना वज्रमादाय प्रविवेशामरावतीम् ॥ १२
पराङ्मुखे सहस्त्राक्षे तद् दैवतबलं महत् ।
पातयामास दैत्येन्द्रः पादमुष्टितलादिभिः ॥ १३
ततो वैवस्वतो दण्डं परिभ्राम्य द्विजोत्तम ।
समभ्यधावत् प्रह्लादं हन्तुकामः सुरोत्तमः ॥ १४
तमापतन्तं बाणौघैर्ववर्ष रविनन्दनम् ।
हिरण्यकशिपोः पुत्रश्चापमानम्य वेगवान् ॥ १५
तां बाणवृष्टिमतुलां दण्डेनाहत्य भास्करिः।
शातयित्वा प्रचिक्षेप दण्डं लोकभयंकरम् ॥ १६
स वायुपथमास्थाय धर्मराजकरे स्थितः ।
जज्वाल कालाग्निनिभो यद्वद् दग्धुं जगत्त्रयम् ॥ १७
जाज्वल्यमानमायान्तं दण्डं दृष्ट्वा दितेः सुताः ।
प्राक्रोशन्ति हतः कष्टं प्रह्लादोऽयं यमेन हि ॥ १८
तमाक्रन्दितमाकर्ण्य हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः ।
प्रोवाच मा भैष्ट मयि स्थिते कोऽयं सुराधमः ॥ १९
इत्येवमुक्त्वा वचनं वेगेनाभिससार च।
जग्राह पाणिना दण्डं हसन् सव्येन नारद ॥ २०
तमादाय ततो वेगाद् भ्रामयामास चान्धकः।
जगर्ज च महानादं यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २१
प्रह्लादं रक्षितं दृष्ट्वा दण्डाद् दैत्येश्वरेण हि ।
साधुवादं ददुर्हष्टा दैत्यदानवयूथपाः ॥ २२
भ्रामयन्तं महादण्डं दृष्ट्वा भानुसुतो मुने।
दुःसहं दुर्धरं मत्वा अन्तर्धानमगाद् यमः ॥ २३
अन्तर्हिते धर्मराजे प्रह्लादोऽपि महामुने ।
दारयामास बलवान् देवसैन्यं समन्ततः ॥ २४
वरुणः शिशुमारस्थो बद्ध्वा पाशैर्महासुरान् ।
गदया दारयामास तमभ्यगाद् विरोचनः ॥ २५
उसे इस प्रकार गरजते देखकर इन्द्रने उसके ऊपर
जोरोंसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। अन्धक भी उनको
निवारित करते हुए इन्द्रके पास पहुँच गया। उसने अपने
हाथसे ऐरावत हाथीके सिरपर एवं अपने पैरसे सूँड़पर
प्रहार कर और घुटनोंसे दाँतोंपर प्रहार कर उन्हें तोड़
डाला। फिर अन्धकने बायीं मुट्ठीसे ऐरावतकी कमरपर
शीघ्रतापूर्वक चोट मारकर उसे जर्जर कर गिरा दिया।
इन्द्र भी हाथीसे नीचे गिरे जा रहे थे। वे झटसे कूदकर एवं
हाथमें वज्र लेकर अमरावतीमें प्रविष्ट हो गये ॥ ९-१२॥
इन्द्रके रणसे विमुख हो जानेपर अन्धकने उस विशाल
देव-सेनाको पैर, मुट्ठी एवं थप्पड़ों आदिसे मारकर गिरा
दिया। नारदजी ! इसके बाद देवश्रेष्ठ यमराज अपना दण्ड
घुमाते हुए प्रह्लादको मारनेकी इच्छासे दौड़ पड़े। यमराजको
अपनी ओर आते देख प्रह्लादने भी अपने धनुषको चढ़ाकर
फुर्तीसे बाण-समूहोंकी झड़ी लगा दी। यमराजने अपने
दण्डके प्रहारसे उस अतुलनीय बाण-वृष्टिको व्यर्थ कर
लोकभयकारी दण्ड चला दिया ॥ १३-१६॥
धर्मराजके हाथमें स्थित वह दण्ड हवामें ऊपर
घूम रहा था। वह ऐसा लगता था मानो तीनों लोकोंको
जलानेके लिये कालाग्नि प्रज्वलित हो रही हो। उस
प्रज्वलित दण्डको अपनी ओर आते देखकर दैत्यलोग
चिल्लाने लगे- हाय ! हाय ! यमराजने प्रह्लादको मार
दिया। उस आक्रन्दनको सुनकर हिरण्याक्षके पुत्र
अन्धकने कहा- डरो मत। मेरे रहते ये यमराज क्या
वस्तु हैं? नारदजी! ऐसा कहकर वह वेगसे दौड़ पड़ा
और हँसते हुए उस दण्डको बायें हाथसे पकड़
लिया ॥ १७-२० ॥
फिर अन्धक उसे लेकर घुमाने लगा और साथ
ही वर्षाकालिक मेघके तुल्य वह महानाद करते हुए
गर्जन करने लगा। अन्धकके द्वारा यम-दण्डसे प्रह्लादको
सुरक्षित देखकर दैत्यों एवं दानवोंके सेनानायक प्रसन्न
होकर उसे धन्यवाद देने लगे। मुने! अपने महादण्डको
अन्धकद्वारा घुमाते देख सूर्यनय यम दैत्यको दुःसह
और दुर्धर समझकर अन्तर्धान हो गये। महामुने!
धर्मराजके अन्तर्हित होनेपर अब बली प्रह्लाद भी सभी
ओरसे देवसेनाको नष्ट करने लगे ॥ २१-२४॥
वरुणदेव सूँसपर स्थित थे। वे प्रबल असुरोंको
अपने पाशोंसे बाँधकर गदाद्वारा विदीर्ण करने
लगे। इसपर विरोचनने उनका सामना किया।
अध्याय १०] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५५
तोमरैर्वज्रसंस्पर्शैः शक्तिभिर्मार्गणैरपि। उसने वज्रतुल्य तोमर, शक्ति, बाण, मुद्गर और कणपों*
जलेशं ताडयामास मुद्गरैः कणपैरपि ॥ २६ (भल्लों)-से वरुणदेवपर प्रहार किया। इसपर वरुणने
उसके निकट जाकर गदासे मारकर उन्हें पृथ्वीपर गिरा
ततस्तं गदयाभ्येत्य पातयित्वा धरातले। दिया। फिर दौड़कर उन्होंने पाशोंसे उसके मतवाले
अभिद्रुत्य बबन्धाथ पाशैर्मत्तगजं बली ॥ २७ हाथीको बाँध लिया। पर अन्धकने तुरन्त ही उन
पाशोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। नारदजी! इतना ही
तान् पाशशतधा चक्रे वेगाच्च दनुजेश्वरः। नहीं, उसने वरुणके निकट जाकर उनकी कमर भी
वरुणं च समभ्येत्य मध्ये जग्राह नारद ॥ २८ पकड़ ली ॥ २५-२८ ॥
ततो दन्ती च शृङ्गाभ्यां प्रचिक्षेप तदाऽव्ययः। उस हाथीने भी अपने प्रबल दाँतोंसे वरुणको
ममर्द च तथा पद्भ्यां सवाहं सलिलेश्वरम् ॥ २९ उठाकर फेंक दिया। साथ ही वह वाहनसहित वरुणको
तं मर्द्यमानं वीक्ष्याथ शशाङ्कः शिशिरांशुमान्। अपने पैरोंसे कुचलने लगा। यह देख शीतकिरण
अभ्येत्य ताडयामास मार्गणैः कायदारणैः ॥ ३० चन्द्रमाने हाथीके पास पहुँचकर अपने तेज नुकीले
स ताड्यमानः शिशिरांशुबाणै- बाणोंसे उसके शरीरको विदीर्ण कर दिया। चन्द्रमाके
रवाप पीडां परमां गजेन्द्रः। बाणोंसे विद्ध होनेपर अन्धकके हाथीको अत्यधिक
दुष्टश्च वेगात् पयसामधीशं पीड़ा हुई। वह अपने पैरोंसे वरुणको तेजीसे बार-बार
मुहुर्मुहुः पादतर्लैममर्द ॥ ३१ कुचलने लगा। नारदजी! वरुणदेवने भी हाथीके दोनों
स मृद्यमानो वरुणो गजेन्द्रं पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया एवं अपने हाथों तथा
पद्भ्यां सुगाढं जगृहे महर्षे। पैरोंसे भूमिको स्पर्श करते हुए मस्तक उठाकर बलपूर्वक
पादेषु भूमिं करयोः स्पृशंश्च अङ्गुलियोंसे उस हाथीकी पूँछ पकड़ ली और सर्पराज
मूर्द्धानमुल्लाल्य बलान्महात्मा ॥ ३२ वासुकिसे विरोचनको बाँधकर उसे हाथी और पिलवानके
गृह्याङ्गुलीभिंश्च गजस्य पुच्छं सहित उठाकर आकाशमें फेंक दिया ॥ २९-३३॥
कृत्वेह बन्धं भुजगेश्वरेण। वरुणद्वारा फेंका गया विरोचन आकाशसे हाथीसहित
उत्पाट्य चिक्षेप विरोचनं हि पृथ्वीपर इस प्रकार आ गिरा, जैसे सूर्यद्वारा पहले
सकुञ्जरं खे सनियन्तृवाहम् ॥ ३३ सुकेशी दैत्यका नगर अट्टालिकाओं, यन्त्रों, अर्गलाओं
क्षिप्तो जलेशेन विरोचनस्तु एवं महलोंके सहित पृथ्वीपर गिराया गया था। उसके
सकुञ्जरो भूमितले पपात। बाद वरुण गदा और पाश लेकर दैत्यको मारनेके लिये
साट्टं सन्यन्त्रार्गलहर्म्यभूमिं दौड़े। अब दैत्यलोग मेघ-गर्जन-जैसे जोर-जोरसे रोने
पुरं सुकेशेरिव भास्करेण ॥ ३४ लगे-हाय! हाय! राक्षस-सेनाके रक्षक वीर विरोचन
ततो जलेशः सगदः सपाशः वरुणद्वारा मारे जा रहे हैं। हे प्रह्लाद! हे जम्भ! हे
समभ्यधावद् दितिजं निहन्तुम्। कुजम्भ! तुम सभी अन्धकके साथ आकर (उन्हें)
ततः समाक्रन्दमनुत्तमं हि बचाओ। हाय! बलवान् वरुण दैत्यवीर विरोचनको
मुक्तं तु दैत्यैर्घनरावतुल्यम् ॥ ३५ वाहनसहित चूर्ण करते हुए उन्हें पाशमें बाँधकर गदासे
हा हा हतोऽसौ वरुणेन वीरो इस प्रकार मार रहे हैं, जैसे अश्वमेध यज्ञमें इन्द्र पशुको
विरोचनो दानवसैन्यपालः।
प्रह्लाद हे जम्भकुजम्भकाद्या
रक्षध्वमभ्येत्य सहान्धकेन ॥ ३६
अहो महात्मा बलवाञ्जलेशः
संचूर्णयन् दैत्यभटं सवाहम्।
पाशेन बद्ध्वा गदया निहन्ति
यथा पशुं वाजिमखे महेन्द्रः ॥ ३७
*कणप अस्त्रका वर्णन महाभारत तथा दशकुमारचरितमें आया है।