सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

५२- शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्‌के यहाँ भेजना, महर्षियोंका हिमवान्‌से शिवके लिये उमाकी याचना, हिमालयकी स्वीकृति और सप्तर्षियोंद्वारा शिवको स्वीकृति-सूचना

| अध्याय ४९ ] | चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति | २१५ |
| :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुनश्चिन्तयतः सृष्टिं जज्ञे कन्या मनोरमा।<br>नीलोत्पलदलश्यामा तनुमध्या सुलोचना॥ ४<br><br>तां दृष्ट्वाभिमतां ब्रह्मा मैथुनायाजुहाव ताम्।<br>तेन पापेन महता शिरोऽशीर्यत वेधसः॥ ५<br><br>तेन शीर्णेन स ययौ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>सान्निहत्यं सरः पुण्यं सर्वपापक्षयावहम्॥ ६<br><br>तत्र पुण्ये स्थाणुतीर्थे ऋषिसिद्धनिषेविते।<br>सरस्वत्युत्तरे तीरे प्रतिष्ठाप्य चतुर्मुखम्॥ ७<br><br>आराधयामास तदा धूपैर्गन्धैर्मनोरमैः।<br>उपहारैस्तथा हृद्यै रौद्रसूक्तैर्दिने दिने॥ ८<br><br>तस्यैवं भक्तियुक्तस्य शिवपूजापरस्य च।<br>स्वयमेवाजगामाथ भगवान् नीललोहितः॥ ९<br><br>तमागतं शिवं दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>प्रणम्य शिरसा भूमौ स्तुतिं तस्य चकार ह॥ १०पुनः उनके सृष्टिकी चिन्ता करनेपर एक नीले कमल-दलके समान श्याम, पतले मध्य भागवाली, सुलोचना, मनो-मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई। उस मनोहर कन्याको देखकर ब्रह्माने उसे संतानोत्पत्ति हेतु बुलाया। (बस,) उस महान् पापसे ब्रह्माका मस्तक गिर गया॥ २–५॥<br><br>वे (ब्रह्माजी) उस गिरे मस्तकको लेकर सभी पापोंका विनाश करनेवाले तीनों लोकोंमें विख्यात सान्निहत्यसर नामके तीर्थमें गये। ऋषि और सिद्धोंसे सेवित उस पवित्र स्थाणुतीर्थमें सरस्वतीके उत्तरी तटपर चतुर्मुख (चार मुखवाले शिवलिङ्ग)-को स्थापित कर प्रतिदिन मनोरम धूप, गन्ध, सुन्दर उपहारों एवं रुद्र-सूक्तोंसे उसकी उपासना करने लगे। उनके इस प्रकार भक्तिपूर्वक शिवपूजामें तन्मय हो जानेपर भगवान् नीललोहित (शंकरजी) स्वयं ही वहाँ आ गये। लोकपितामह ब्रह्माने उन आये हुए शिवको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया और पुनः वे (ब्रह्माजी) उन (शिव)-की स्तुति करने लगे॥ ६–१०॥
ब्रह्मोवाच<br>नमस्तेऽस्तु महादेव भूतभव्य भवाश्रय।<br>नमस्ते स्तुतिनित्याय नमस्त्रैलोक्यपालिने॥ ११<br><br>नमः पवित्रदेहाय सर्वकल्मषनाशिने।<br>चराचरगुरो गुह्यगुह्यानां च प्रकाशकृत्॥ १२<br><br>रोगा न यान्ति भिषजैः सर्वरोगविनाशन।<br>रौरवाजिनसंवीत वीतशोक नमोऽस्तु ते॥ १३<br><br>वारिकल्लोलसंक्षुब्धमहाबुद्धिविघट्टिने ।<br>त्वन्नामजापिनो देव न भवन्ति भवाश्रयाः॥ १४ब्रह्माने कहा— भूत, भव्य तथा भवके आश्रयस्वरूप महादेवजी! आपको नमस्कार है। नित्य-स्तुति किये जानेवाले और तीनों लोकोंके रक्षक! आपको नमस्कार है। सभी पापोंको नष्ट करनेवाले एवं पवित्र देहवाले! आपको नमस्कार है। चर और अचरके गुरु! आप रहस्योंके भी रहस्यको (गुप्त-से-गुप्त तत्त्वको) प्रकाशित करनेवाले हैं। वैद्योंकी दवाओंसे दूर न होनेवाले सभी रोगोंका विनाश करनेवाले! रुरुमृगचर्मधारी! शोकसे रहित शिव! आपको नमस्कार है। जलकी उत्ताल तरङ्गोंसे महाबुद्धिके विघटन करनेमें (स्वयं भी) संक्षुब्ध देव! आपके नामका जप करनेवाले प्राणी संसारमें नहीं पड़ते॥ ११–१४॥
नमस्ते नित्यनित्याय नमस्त्रैलोक्यपालन।<br>शंकरायाप्रमेयाय व्याधीनां शमनाय च॥ १५<br><br>परायापरिमेयाय सर्वभूतप्रियाय च।<br>योगेश्वराय देवाय सर्वपापक्षयाय च॥ १६<br><br>नमः स्थाणवे सिद्धाय सिद्धवन्दिसुताय च।<br>भूतसंसारदुर्गाय विश्वरूपाय ते नमः॥ १७नित्यके भी नित्य आपको नमस्कार है। तीनों लोकोंके पालक! कल्याणकारी (निश्चयात्मिका बुद्धिसे भी अगम्य) अप्रमेय शारीरिक-मानसिक रोगोंके नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। सबसे परे, अपरिमेय (मापमें न आने योग्य), सभी प्राणियोंके प्रिय देव एवं सभी पापोंके क्षय करनेवाले योगेश्वर! आपको नमस्कार है। (आप) स्थाणुस्वरूप सिद्ध एवं सिद्धों तथा वन्दियोंके द्वारा स्तुत आपको नमस्कार है। संसारके प्राणियोंके लिये दुर्ग बने हुए आप विश्वरूपके लिये नमस्कार है।

| २१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४१ |
| :--- | :--- |

| फणीन्द्रोक्तमहिम्ने ते फणीन्द्राङ्गदधारिणे।<br>फणीन्द्रवरहाराय भास्कराय नमो नमः॥ १८ | सर्पराजके द्वारा बखानी गयी महिमावाले, सर्पराजके बाजूबंद एवं माला धारण करनेवाले भास्करस्वरूप! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १५–१८॥ |
| एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्माणं प्राह शङ्करः।<br>न च मन्युस्त्वया कार्यों भाविन्यर्थे कदाचन ॥ १९<br><br>पुरा वराहकल्पे ते यन्मयाऽपहृतं शिरः।<br>चतुर्मुखं च तद्भून्न कदाचिन्नशिष्यति ॥ २०<br><br>अस्मिन् सान्निहिते तीर्थे लिङ्गानि मम भक्तितः।<br>प्रतिष्ठाय विमुक्तस्त्वं सर्वपापैर्भविष्यसि ॥ २१<br><br>सृष्टिकामेन च पुरा त्वयाऽहं प्रेरितः किल।<br>तेनाहं त्वां तथेत्युक्त्वा भूतानां देशवर्त्तिवत् ॥ २२<br><br>दीर्घकालं तपस्तप्त्वा मग्नः संनिहिते स्थितः।<br>सुमहान्तं ततः कालं त्वं प्रतीक्षां ममाकरोः॥ २३ | इस प्रकार स्तुति किये जानेपर शंकरने ब्रह्मासे कहा—ब्रह्मन्! जो कार्य अवश्यम्भावी है उसके विषयमें आपको कभी भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। पहले वराह-कल्पमें मैंने आपका जो मस्तक अपहृत किया था वही चार मुख हो गया। अब वह कभी विनष्ट नहीं होगा। इस सान्निहिततीर्थमें भक्तिपूर्वक मेरे लिङ्गोंकी प्रतिष्ठा करके आप सभी पापोंसे छूट जायँगे। प्राचीन कालमें सृष्टि रचनेकी इच्छासे आपने मुझे अनुप्रेरित किया था, अतः मैं 'ऐसा ही होगा' यह कहकर भूतोंके देशमें रहनेवालेकी भाँति दीर्घकालतक तप करके संनिहितमें विलीन होकर स्थित रहा। उसके बाद आपने बहुत दिनोंतक मेरी प्रतीक्षा की॥ १९–२३॥ |
| स्रष्टारं सर्वभूतानां मनसा कल्पितं त्वया।<br>सोऽब्रवीत् त्वां तदा दृष्ट्वा मां मग्नं तत्र चाम्भसि॥ २४<br><br>यदि मे नाग्रजस्त्वन्यस्ततः स्त्रक्ष्याम्यहं प्रजाः।<br>त्वयैवोक्तश्च नैवास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः॥ २५<br><br>स्थाणुरेष जले मग्नो विवशः कुरु मद्द्वितम्।<br>स सर्वभूतनसृजद् दक्षादींश्च प्रजापतीन्॥ २६ | फिर आपने अपने मनमें सभी प्राणियोंकी सृष्टि करनेवालेका ध्यान किया। तब उन्होंने मुझे वहाँ जलमें विलीन देखकर आपसे कहा कि यदि मुझसे अन्य कोई बड़ा पहले हुआ न माना जाय तो मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा। आपने कहा—आपके सिवा कोई दूसरा अग्रज पुरुष नहीं है। ये स्थाणु जलमें विलीन तथा विवश पड़े हैं। आप मेरा कल्याण करें। फिर उन्होंने दक्ष आदि प्रजापतियों तथा समस्त भूतोंकी सृष्टि की ॥ २४–२६॥ |
| यैरिमं प्रकरोत् सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम्।<br>ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् ॥ २७<br><br>बिभक्षयिषवो ब्रह्मन् सहसा प्राद्रवंस्तथा।<br>स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् ॥ २८ | (इस तरह) जिन्होंने इस चार प्रकारके प्राणि-समुदायको उत्पन्न किया, सृष्टि होते ही वे सभी प्रजाएँ क्षुधित हो गयीं और प्रजापतिको खानेकी इच्छासे उन्हींपर लपक पड़ीं। जब उन्होंने उन्हींका भक्षण करनेकी चेष्टा की, तब त्राण पानेकी इच्छासे वे पितामहके पास दौड़कर गये और उनसे बोले— |
| अथासां च महावृत्तिः प्रजानां संविधीयताम्।<br>दत्तं ताभ्यस्त्वया ह्यन्नं स्थावराणां महौषधीः॥ २९<br><br>जङ्गमानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम्।<br>विहितान्नाः प्रजाः सर्वाः पुनर्जग्मुर्यथागतम् ॥ ३० | प्रजाओंकी जीविकाका विधान कीजिये। फिर आपने उन्हें अन्न (जीवन-साधन) प्रदान किया। अचल प्राणियोंकी महौषधियाँ और निर्बल चल प्राणी शक्तिशाली प्राणियोंके अन्न (प्राण-शक्ति) बने। इस प्रकार जीवन-निर्वाहके लिये प्राण-शक्तिका विधान हुआ। फिर सभी प्रजाएँ अपने स्थानको लौट गयीं ॥ २७–३०॥ |

अध्याय ४९ ]चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति२१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो ववृधिरे सर्वाः प्रीतियुक्ताः परस्परम्।<br>भूतग्रामे विवृद्धे तु तुष्टे लोकगुरौ त्वयि॥ ३१<br>समुत्तिष्ठञ्जलात् तस्मात् प्रजाः संदृष्टवानहम्।<br>ततोऽहं ताः प्रजा दृष्ट्वा विहिताः स्वेन तेजसा ॥ ३२<br>क्रोधेन महता युक्तो लिङ्गमुत्पाट्य चाक्षिपम्।<br>तत् क्षिप्तं सरसो मध्ये ऊर्ध्वमेव यदा स्थितम् ॥ ३३<br>तदा प्रभृति लोकेषु स्थाणुरित्येष विश्रुतः।<br>सकृद् दर्शनमात्रेण विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ॥ ३४<br>प्रयाति मोक्षं परमं यस्मान्नावर्तते पुनः।<br>यश्चेह तीर्थे निवसेत् कृष्णाष्टम्यां समाहितः ॥ ३५<br>स मुक्तः पातकैः सर्वैरगम्यागमनोद्भवैः।<br>इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३६फिर तो वे सब परस्पर प्रेमपूर्वक रहकर बढ़ने लगे। प्राणि-समुदायके बढ़ने एवं लोकके गुरु आपके हर्षित होनेपर मैंने उस जलसे निकलकर प्रजाको देखा। उसके बाद अपने तेजसे उत्पन्न हुई उन प्रजाओंको देखकर भारी क्रोधसे भरकर मैंने लिङ्गको उखाड़कर फेंक दिया। तालाबके बीचमें फेंका गया वह (लिङ्ग) ऊपर स्थित हो गया। तभीसे वह (लिङ्ग) संसारमें 'स्थाणु' नामसे प्रसिद्ध हो गया। इस (लिङ्ग)-का एक बार भी दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे छूटकर मोक्षपद प्राप्त कर लेता है; जहाँसे वह फिर नहीं लौटता। कृष्णाष्टमीके दिन मनको शान्त—समाहित कर इस तीर्थमें निवास करनेवाला व्यक्ति अगम्यागमनसे होनेवाले सभी पापोंसे छूट जाता है—ऐसा कहकर भगवान् महादेव वहीं अन्तर्हित हो गये॥ ३१—३६॥
ब्रह्मा विशुद्धपापस्तु पूज्य देवं चतुर्मुखम्।<br>लिङ्गानि देवदेवस्य ससृजे सरमध्यतः ॥ ३७<br>आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं हरिपाश्र्वे प्रतिष्ठितम्।<br>द्वितीयं ब्रह्मसदनं स्वकीये ह्याश्रमे कृतम् ॥ ३८<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे तृतीयं च प्रतिष्ठितम्।<br>चतुर्थं ब्रह्मणा लिङ्गं सरस्वत्यास्तटे कृतम् ॥ ३९<br>एतानि ब्रह्मतीर्थानि पुण्यानि पावनानि च।<br>ये पश्यन्ति निराहारास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥ ४०पापके शोधन हो जानेके कारण ब्रह्माने भी चतुर्मुख महादेवका पूजन कर तालाबके बीचमें देवाधिदेव (शिव)-के लिङ्गोंकी सृष्टि की। पहले तो उन्होंने हरिकी बगलमें ब्रह्मसरको स्थापित किया और दूसरा अपने आश्रम ब्रह्मसदनका निर्माण किया। उसीकी पूर्व दिशामें ब्रह्माने तृतीय लिङ्गको एवं सरस्वती नदीके तटपर चतुर्थ लिङ्गको प्रतिष्ठित किया। जो प्राणी उपवास-व्रतपूर्वक इन पवित्र और पापनाशक ब्रह्मतीर्थोंका दर्शन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त करते हैं॥ ३७—४०॥
कृते युगे हरेः पार्श्वे त्रेतायां ब्रह्मण आश्रमे।<br>द्वापरे तस्य पूर्वेण सरस्वत्यास्तटे कलौ ॥ ४१<br>एतानि पूजयित्वा च दृष्ट्वा भक्तिसमन्विताः।<br>विमुक्ताः कलुषैः सर्वैः प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ४२<br>सृष्टिकाले भगवता पूजितस्तु महेश्वरः।<br>सरस्वत्युत्तरे तीरे नाम्ना ख्यातश्चतुर्मुखः ॥ ४३<br>तं प्रणम्य श्रद्दधानो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>लोलासंकरसंभूतैस्तथा वैभाण्डसंकरैः ॥ ४४सत्ययुगमें हरिकी बगलमें, त्रेतामें ब्रह्माके आश्रममें, द्वापरमें उसके पूर्व तथा कलिमें सरस्वतीके तटपर स्थित लिङ्गोंका भक्तिपूर्वक पूजन एवं दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे छूटकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। सृष्टि करनेके समय सरस्वतीके उत्तरी तटपर भगवान् ब्रह्मासे अर्चित भगवान् महेश्वर चतुर्मुख नामसे विख्यात हुए। मनुष्य उनको श्रद्धाके साथ प्रणाम कर लोलासाङ्कर्य (चंचलासे उत्पन्न वर्णसंकर) तथा वैभाण्डसाङ्कर्यसे उत्पन्न सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४१-४४॥
तथैव द्वापरे प्राप्ते स्वाश्रमे पूज्य शङ्करम्।<br>विमुक्तो राजसैर्भावैर्वर्णसंकरसम्भवैः ॥ ४५<br><br>ततः कृष्णचतुर्दश्यां पूजयित्वा तु मानवः।<br>विमुक्तः पातकैः सर्वैर्भोज्यस्यान्नसम्भवैः ॥ ४६उसी प्रकार द्वापरयुगके आनेपर अपने आश्रममें शङ्करका पूजन कर ब्रह्मा वर्णसाङ्कर्यसे उत्पन्न होनेवाले रजोगुणके भावोंसे मुक्त हुए। मनुष्य कृष्णचतुर्दशी तिथिमें वहाँ शङ्करजीका पूजन कर अभक्ष्य अन्नके भक्षण करनेसे होनेवाले समस्त पापोंसे विमुक्त हो जाता है।
२१८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५०

| कलिकोले तु संप्राप्ते वसिष्ठाश्रममास्थितः ।<br>चतुर्मुखं स्थापयित्वा ययौ सिद्धिमनुत्तमाम् ॥ ४७<br>तत्रापि ये निराहाराः श्रद्दधाना जितेन्द्रियाः ।<br>पूजयन्ति महादेवं ते यान्ति परमं पदम् ॥ ४८<br>इत्येतत् स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं कीर्त्तितं तव ।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥ ४९ | कलिकाल आनेपर वसिष्ठाश्रममें स्थित होकर ब्रह्माने चतुर्मुख (शङ्कर)-की स्थापना की तथा उत्तम सिद्धि प्राप्त की। जो लोग वहाँ निराहार, श्रद्धायुक्त और जितेन्द्रिय होकर महादेवकी पूजा करेंगे, वे परमपदको प्राप्त करेंगे। इस प्रकार मैंने आपसे स्थाणुतीर्थका माहात्म्य बताया, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४५—४९॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४९॥


पचासवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके पृथूदकतीर्थके सन्दर्भमें अक्षय-तृतीयाके महत्त्वकी कथा

देवदेव उवाचदेवदेव (महादेव)-ने कहा—
एवं पृथूदको देवाः पुण्यः पापभयापहः।<br>तं गच्छध्वं महातीर्थं यावत् संनिधिबोधितम्॥ १<br><br>यदा मृगशिरोऋक्षे शशिसूर्यौ बृहस्पतिः।<br>तिष्ठन्ति सा तिथिः पुण्या त्वक्षया परिगीयते॥ २<br><br>तं गच्छध्वं सुरश्रेष्ठा यत्र प्राची सरस्वती।<br>पितॄनाराधयध्वं हि तत्र श्राद्धेन भक्तितः॥ ३<br><br>ततो मुरारिवचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः।<br>समाजग्मुः कुरुक्षेत्रे पुण्यतीर्थं पृथूदकम्॥ ४देवताओ! इस प्रकार पृथूदकतीर्थ पाप-भयको नष्ट करनेवाला और पवित्र है। तुमलोग 'सन्निहित' तालाबतक (उस) ज्ञात (व्याप्त) होनेवाले महातीर्थमें जाओ। जिस तिथिमें चन्द्रमा, सूर्य एवं बृहस्पति—ये तीनों ग्रह मृगशिरा नक्षत्रमें स्थित होते हैं, उस पवित्र तिथिको 'अक्षया' तिथि कहते हैं। श्रेष्ठ देवताओ! जहाँ सरस्वती नदी पूर्व दिशामें बह रही है, वहाँ जाकर भक्ति-श्रद्धासे श्राद्ध करके पितरोंकी आराधना करो। भगवान्‌का निर्देश सुनकर इन्द्रके सहित सभी देवता कुरुक्षेत्रमें विद्यमान पृथूदक नामवाले पवित्र तीर्थमें गये॥ १—४॥
तत्र स्नात्वा सुराः सर्वे बृहस्पतिमचोदयन्।<br>विशस्व भगवन् ऋक्षमिमं मृगशिरं कुरु।<br>पुण्यां तिथिं पापहरां तव कालोऽयमागतः॥ ५<br><br>प्रवर्तते रविस्तत्र चन्द्रमाऽपि विशत्यसौ।<br>त्वदायत्तं गुरो कार्यं सुराणां तत् कुरुष्व च॥ ६<br><br>इत्येवमुक्तो देवैस्तु देवाचार्योऽब्रवीदिदम्।<br>यदि वर्षाधिपोऽहं स्यां ततो यास्यामि देवताः।<br>बाढमूचुः सुराः सर्वे ततोऽसौ प्राक्रमन्मृगम्॥ ७वहाँ स्नान करके सभी देवताओंने बृहस्पतिसे कहा—भगवन्! इस मृगशिरा नक्षत्रमें आप प्रविष्ट होकर पापविनाशिनी पवित्र तिथिका निर्माण (विधान) करें। आपका यह (निर्दिष्ट) समय आ गया है। सूर्य उस स्थानपर स्थित हैं तथा चन्द्रमा भी उसमें प्रविष्ट हो रहे हैं। हे बृहस्पति! देवताओंका कार्य आपके अधीन है, आप उसे पूरा करें। देवताओंके इस प्रकार कहनेपर देवोंके गुरु बृहस्पतिने यह कहा—देवताओ! यदि मैं वर्ष-स्वामी बनूँ तो (मृगशिरा नक्षत्रपर) जाऊँगा। सभी देवोंने कहा—ठीक है। तब उन्होंने (बृहस्पतिने) मृगशिरा नक्षत्रमें प्रवेश किया॥ ५—७॥

अध्याय ५१ ] मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन २१९


| आषाढे मासि मार्गर्क्षे चन्द्रक्षयतिथिर्हि या।<br>तस्यां पुरन्दरः प्रीतः पिण्डं पितृषु भक्तितः॥८<br>प्रादात् तिलमधूमिश्रं हविष्यान्नं कुरुष्वथ।<br>ततः प्रीतास्तु पितरस्तां प्राहुस्तनयां निजाम्॥९<br>मेनां देवाश्च शैलाय हिमयुक्ताय वै ददुः।<br>तां मेनां हिमवाँल्लब्ध्वा प्रसादाद् दैवतेष्वथ।<br>प्रीतिमानभवच्चासौ रराम च यथेच्छया॥१०<br>ततो हिमाद्रिः पितृकन्यया समं<br>समर्पयन् वै विषयान् यथेष्टम्।<br>अजीजनत् सा तनयाश्च तिस्रो<br>रूपातियुक्ताः सुरयोषितोपमाः॥११ | आषाढ़ महीनेके मृगशिरा नक्षत्रमें चन्द्रक्षय (अमावस्या) तिथिके आ जानेपर इन्द्रने प्रसन्न होकर कुरुक्षेत्रमें भक्तिके साथ पितरोंको तिल और मधुसे मिला हुआ हविष्यान्नका पिण्ड प्रदान किया। तब पितरोंने देवोंको अपनी मेना नामकी कन्या दी। देवताओंने उसे हिमालयको सौंप दिया। देवोंके अनुग्रहसे उस मेनाको पाकर वे हिमवान् प्रसन्न हो गये और इच्छानुकूल विनोद-विहारमें लग गये। हिमालय पितरोंद्वारा दी गयी उस कन्याके साथ दाम्पत्यसुखमें आसक्त हो गये। फिर उस मेनाने भी सुरनारियोंके समान अत्यन्त रूपवती तीन कन्याओंको उत्पन्न किया॥८—११॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥५०॥


इक्यावनवाँ अध्याय

मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, कुटिला और रागिणीको शाप, उमाकी तपस्या, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन

| पुलस्त्य उवाच<br>मेनायाः कन्यकास्तिस्रो जाता रूपगुणान्विताः।<br>सुनाभ इति च ख्यातश्चतुर्थस्तनयोऽभवत्॥१<br>रक्ताङ्गी रक्तनेत्रा च रक्ताम्बरविभूषिता।<br>रागिणी नाम संजाता ज्येष्ठा मेनासुता मुने॥२<br>शुभाङ्गी पद्मपत्राक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा।<br>श्वेतमाल्याम्बरधरा कुटिला नाम चापरा॥३<br>नीलाञ्जनचयप्रख्या नीलेन्दीवरलोचना।<br>रूपेणानुपमा काली जघन्या मेनकासुता॥४<br>जातास्ताः कन्यकास्तिस्रः षडब्दात् परतो मुने।<br>कर्तुं तपः प्रयातास्ता देवास्ता ददृशुः शुभाः॥५<br>ततो दिवाकरैः सर्वैर्वसुभिश्च तपस्विनी।<br>कुटिला ब्रह्मलोकं तु नीता शशिकरप्रभा॥६<br>अथोचुर्देवताः सर्वाः किं त्वियं जनयिष्यति।<br>पुत्रं महिषहन्तारं ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥७ | पुलस्त्यजी बोले—मेनाको रूप और गुणोंसे सम्पन्न तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं और चौथा सुनाभ नामसे विख्यात पुत्र उत्पन्न हुआ। मुने! मेनाकी जेठी कन्या 'रागिणी' नामकी थी, जो लाल अङ्गों तथा लाल आँखोंवाली थी। वह लाल वस्त्रोंसे सुशोभित रहती थी। दूसरी 'कुटिला' नामकी कन्या थी, जो सुन्दर शरीरवाली, कमलदलनयना, नीले एवं घुँघराले बालोंवाली थी तथा उज्ज्वल माला और उज्ज्वल वस्त्र धारण किये रहती थी। मेनाकी तीसरी कन्याका नाम था 'काली'। उसका रंग नीले अञ्जनके ढेरके समान और आँखें नीले कमलके जैसी थीं। वह अत्यन्त सुन्दर थी॥१—४॥<br>मुने! वे तीनों कन्याएँ जन्मसे छः वर्षके बाद तपस्या करने चली गयीं। देवताओंने उन सुन्दरी कन्याओंको देखा, फिर आदित्य तथा वसुगण चन्द्रमाकी किरणोंके समान कान्तिवाली तपस्विनी (मध्यमा कन्या) कुटिलाको ब्रह्मलोकमें ले गये। उसके बाद सभी देवताओंने ब्रह्मासे कहा कि ब्रह्मन्! आप बतलायें कि क्या यह कन्या महिषासुरको मारनेवाले पुत्रको जनेगी? |