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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

१७- देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग

८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अपत्यसंततिं दृष्ट्वा प्राज्ञो देहस्य चानतिम्।<br>वानप्रस्थाश्रमं गच्छेद्रात्मनः शुद्धिकारणम्॥ ११३<br><br>तत्रारण्योपभोगैश्च तपोभिश्चात्मकर्षणम्।<br>भूमौ शय्या ब्रह्मचर्यं पितृदेवातिथिक्रिया॥ ११४<br><br>होमस्त्रिषवणं स्नानं जटावल्कलधारणम्।<br>वन्यस्नेहनिषेवित्वं वानप्रस्थविधिस्त्वयम्॥ ११५ध्यानपूर्वक सुनो। बुद्धिमान् व्यक्ति पुत्रकी संतान (पौत्र) और अपने शरीरकी गिरती अवस्था देखकर अपने आत्माकी शुद्धिके लिये वानप्रस्थ-आश्रमको ग्रहण करे। वहाँ अरण्यमें उत्पन्न मूल-फल आदिसे अपना जीवन-यापन करते हुए तपद्वारा शरीर-शोषण करे। इस आश्रममें भूमिपर शयन, ब्रह्मचर्यका पालन एवं पितर, देवता तथा अतिथियोंकी पूजा करे। हवन, तीनों काल—प्रातः, मध्याह्न, सन्ध्याकाल—स्नान, जटा और वल्कलका धारण तथा वन्य फलोंसे निकाले रसका सेवन करे। यही वानप्रस्थ-आश्रमकी विधि है॥ ११२—११५॥
सर्वसङ्गपरित्यागो ब्रह्मचर्यममानिता।<br>जितेन्द्रियत्वमावासे नैकस्मिन् वसतिश्चिरम्॥ ११६<br><br>अनारम्भस्तथाहारो भैक्षान्नं नातिकोपिता।<br>आत्मज्ञानावबोधेच्छा तथा चात्मावबोधनम्॥ ११७<br><br>चतुर्थे त्वाश्रमे धर्मा अस्माभिस्ते प्रकीर्तिताः।<br>वर्णधर्माणि चान्यानि निशामय निशाचर॥ ११८<br><br>गार्हस्थ्यं ब्रह्मचर्यं च वानप्रस्थं त्रयाश्रमाः।<br>क्षत्रियस्यापि कथिता ये चाचारा द्विजस्य हि॥ ११९[चतुर्थ आश्रम (संन्यास)-के धर्म ये हैं—]<br>सभी प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग, ब्रह्मचर्य, अहंकारका अभाव, जितेन्द्रियता, एक स्थानपर अधिक समयतक न रहना, उद्योगका अभाव, भिक्षान्न-भोजन, क्रोधका त्याग, आत्मज्ञानकी इच्छा तथा आत्मज्ञान। निशाचर! हमने तुमसे चतुर्थ-आश्रम (संन्यास)-के इन धर्मोंका वर्णन किया। अब अन्य वर्ण-धर्मोंको सुनो। क्षत्रियोंके लिये भी गार्हस्थ्य, ब्रह्मचर्य एवं वानप्रस्थ—इन तीन आश्रमों एवं ब्राह्मणोंके लिये विहित आचारोंका विधान है॥ ११६—११९॥
वैखानसत्वं गार्हस्थ्यमाश्रमद्वितयं विशः।<br>गार्हस्थ्यमुत्तमं त्वेकं शूद्रस्य क्षणदाचर॥ १२०<br><br>स्वानि वर्णाश्रमोक्तानि धर्माणीह न हापयेत्।<br>यो हापयति तस्यासौ परिकुप्यति भास्करः॥ १२१<br><br>कुपितः कुलनाशाय ईश्वरो रोगवृद्धये।<br>भानुर्वै यतते तस्य नरस्य क्षणदाचर॥ १२२<br><br>तस्मात् स्वधर्मं न हि संत्यजेत<br>न हापयेच्चापि हि नात्मवंशम्।<br>यः संत्यजेच्चापि निजं हि धर्मं<br>तस्मै प्रकुप्येत दिवाकरस्तु॥ १२३राक्षस! वैश्यजातिके लिये गार्हस्थ्य एवं वानप्रस्थ—इन दो आश्रमोंका विधान है तथा शूद्रके लिये एकमात्र उत्तम गृहस्थ-आश्रमका ही नियम है। अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित धर्मोंका इस लोकमें त्याग नहीं करना चाहिये। जो इनका त्याग करता है, उसपर सूर्य भगवान् क्रुद्ध होते हैं। निशाचर! भगवान् भास्कर क्रुद्ध होकर उस मनुष्यकी रोगवृद्धि एवं उसके कुलका नाश करनेके लिये प्रयत्न करते हैं। अतः मनुष्य स्वधर्मका न तो त्याग करे और न अपने वंशकी हानि होने दे। जो मनुष्य अपने धर्मका त्याग करता है, उसपर भगवान् सूर्य क्रोध करते हैं॥ १२०—१२३॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्तो मुनिभिः सुकेशी<br>प्रणम्य तान् ब्रह्मनिधीन् महर्षीन्।<br>जगाम चोत्पत्य पुरं स्वकीयं<br>मुहुर्मुहुर्धर्ममवेक्षमाणः॥ १२४पुलस्त्यजी बोले— मुनियोंके ऐसा कहनेके बाद सुकेशी उन ब्रह्मज्ञानी महर्षियोंको बारम्बार प्रणामकर धर्मका चिन्तन करते हुए उड़कर अपने पुरको चला गया॥ १२४॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥

अध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन एवं लोलार्क-प्रसंग ८१


पन्द्रहवाँ अध्याय

दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, वरुणा-असीकी महिमा, लोलार्क-प्रसंग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिर्देवर्षे गत्वा स्वपुरमुत्तमम्।<br>समाहूयाब्रवीत् सर्वान् राक्षसान् धार्मिकं वचः॥ १<br><br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियसंयमः।<br>दानं दया च क्षान्तिश्च ब्रह्मचर्यममानिता॥ २<br><br>शुभा सत्या च मधुरा वाङ् नित्यं सत्क्रियारतिः।<br>सदाचारनिषेवित्वं परलोकप्रदायकाः॥ ३<br><br>इत्यूचुर्मुनयो मह्यं धर्ममाद्यं पुरातनम्।<br>सोहमाज्ञापये सर्वान् क्रियतामविकल्पतः॥ ४पुलस्त्यजी बोले— देवर्षे! उसके बाद अपने उत्तम नगरमें जाकर सुकेशीने सभी राक्षसोंको बुलाकर उनसे धर्मकी बात बतलायी। (सुकेशीने कहा—) अहिंसा, सत्य, चोरीका सर्वथा त्याग, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, दान, दया, क्षमा, ब्रह्मचर्य, अहंकारका न करना, प्रिय, सत्य और मधुर वाणी बोलना, सदा सत्कार्योंमें अनुराग रखना एवं सदाचारका पालन करना—ये सब धर्म परलोकमें सुख देनेवाले हैं। मुनियोंने इस प्रकारके आदिकालके पुरातन धर्मको मुझे बतलाया है। मैं तुमलोगोंको आज्ञा देता हूँ कि तुमलोग बिना किसी हिचकके इन सभी धर्मोंका आचरण करो॥ १–४॥
पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिवचनात् सर्व एव निशाचराः।<br>त्रयोदशाङ्गं ते धर्मं चक्रुर्मुदितमानसाः॥ ५<br><br>ततः प्रवृद्धिं सुतरामगच्छन्त निशाचराः।<br>पुत्रपौत्रार्थसंयुक्ताः सदाचारसमन्विताः॥ ६<br><br>तज्ज्योतिस्तेजसस्तेषां राक्षसानां महात्मनाम्।<br>गन्तुं नाशनुवन् सूर्यो नक्षत्राणि न चन्द्रमाः॥ ७<br><br>ततस्त्रिभुवने ब्रह्मन् निशाचरपुरोऽभवत्।<br>दिवा चन्द्रस्य सदृशः क्षणदायां च सूर्यवत्॥ ८पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद सुकेशीके वचनसे सभी राक्षस प्रसन्न-चित्त होकर (अहिंसा आदि) तेरह अङ्गवाले धर्मका आचरण करने लगे। इससे राक्षसोंकी सभी प्रकारकी अच्छी उन्नति हुई। वे पुत्र-पौत्र तथा अर्थ-धर्म-सदाचार आदिसे सम्पन्न हो गये। उन महान् राक्षसोंके तेजके सामने सूर्य, नक्षत्र और चन्द्रमाकी गति और कान्ति क्षीण-सी दीखने लगी। ब्रह्मन्! उसके बाद निशाचरोंकी नगरी तीनों लोकोंमें दिनमें चन्द्रमाके समान और रातमें सूर्यके समान चमकने लगी॥ ५–८॥
न ज्ञायते गतिर्व्योम्नि भास्करस्य ततोऽम्बरे।<br>शशाङ्कमिति तेजस्वादमन्यन्त पुरोत्तमम्॥ ९<br><br>स्वं विकासं विमुञ्चन्ति निशामिति व्यचिन्तयन्।<br>कमलाकरेषु कमला मित्रमित्यवगम्य हि।<br>रात्रौ विकसिता ब्रह्मन् विभूतिं दातुमीप्सवः॥ १०<br><br>कौशिका रात्रिसमयं बुद्ध्वा निरगमन् किल।<br>तान् वायसास्तदा ज्ञात्वा दिवा निघ्नन्ति कौशिकान्॥ ११<br><br>स्नातकास्त्वापगास्वेव स्नानजप्यपरायणाः।<br>आकण्ठमग्नास्तिष्ठन्ति रात्रौ ज्ञात्वाऽथ वासरम्॥ १२(फलतः) अब आकाशमें सूर्यकी गति (चलने)-का पता नहीं लगता था। लोग उस श्रेष्ठ नगरको नगरके तेजके कारण आकाशमें चन्द्रमा समझने लग गये। ब्रह्मन्! सरोवरके कमल दिनको रात्रि समझकर विकसित नहीं होते थे। पर वे रात्रिमें सुकेशीके पुरको सूर्य समझकर विभूति प्रदान करनेकी इच्छासे विकसित होने लगे। इसी प्रकार उल्लू भी दिनको रात समझकर बाहर निकल आये और कौए दिनमें आये जानकर उन उल्लुओंको मारने लगे। स्नान करनेवाले लोग भी रात्रिको दिन समझकर गलेतक खुले बदन होकर स्नान करने लगे एवं जप करते हुए जलमें खड़े रहे॥ ९–१२॥

८२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १५
न व्ययुज्यन्त चक्राश्च तदा वै पुरदर्शने।
उस समय सुकेशीके नगरके (सूर्यवत्) दर्शन
मन्यमानास्तु दिवसमिदमुच्चैर्बुवन्ति च ॥ १३
होनेसे चकवा-चकई रात्रिको ही दिन मानकर परस्पर
नूनं कान्ताविहीनेन केनचिच्चक्रपत्तिणा ।
अलग नहीं होते थे। वे उच्चस्वरसे कहते — निश्चय ही
किसी पलीसे विहीन चक्रवाक पक्षीने एकान्तमें नदीतटपर
उत्सृष्टं जीवितं शून्ये फूत्कृत्य सरितस्तटे ॥ १४
फूत्कार करके जीवन त्याग दिया है। इसीसे दयार्द्र सूर्य
ततोऽनुकम्पयाविष्टो विवस्वांस्तीव्ररश्मिभिः ।
अपनी तेज किरणोंसे जगत्‌को तपाते हुए किसी प्रकार
संतापयञ्जगत् सर्वं नास्तमेति कथंचन ॥ १५
अस्त नहीं हो रहे हैं। दूसरे कहते हैं — 'निश्चय ही कोई
अन्ये वदन्ति चक्राह्वो नूनं कश्चिन् मृतो भवेत्।
चक्रवाक मर गया है और पतिके शोकमें उसकी दुः‌खिनी
तत्कान्तया तपस्तप्तं भर्तृशोकार्त्तया बत ॥ १६
कान्ताने भारी तप किया है। इसीलिये निश्चय ही उसकी
आराधितस्तु भगवांस्तपसा वै दिवाकरः।
तपस्यासे प्रसन्न हुए एवं चन्द्रमाको जीत लेनेवाले
तेनासौ शशिनिर्जैता नास्तमेति रविर्ध्रुवम् ॥ १७
भगवान् सूर्य अस्त नहीं हो रहे हैं' ॥ १३–१७ ॥
यज्विनो होमशालासु सह ऋत्विग्भिरध्वरे।
महामुने ! उन दिनों यज्ञशालाओंमें ऋत्विजोंके
प्रावर्त्तयन्त कर्माणि रात्रावपि महामुने ॥ १८
साथ यजमानलोग रात्रिमें भी यज्ञकर्म करनेमें लगे रहते
थे। विष्णुके भक्तलोग भक्तिपूर्वक सदा विष्णुकी पूजा
महाभागवताः पूजां विष्णोः कुर्वन्ति भक्तितः ।
करते रहते एवं दूसरे लोग सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा और
रवौ शशिनि चैवान्ये ब्रह्मणोऽन्ये हरस्य च ॥ १९
शिवकी आराधनामें लगे रहते थे। कामी लोग यह मानने
कामिनश्चाप्यमन्यन्त साधु चन्द्रमसा कृतम्।
लगे कि चन्द्रमाने रात्रिको निरन्तरके लिये अपनी
यदिदं रजनी रम्या कृता सततकौमुदी ॥ २०
ज्योत्स्नामयी बना दिया, अच्छा हुआ ॥ १८–२० ॥
अन्ये ब्रुवैल्लोकगुरुरस्माभिश्चक्रभृद् वशी।
दूसरे लोग कहने लगे कि हमलोगोंने श्रावण
निर्व्याजेन महागन्धैरर्चितः कुसुमैः शुभैः ॥ २१
आदि चार महीनोंमें शुद्धभावसे अति सुगन्धित पवित्र
पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीके साथ सुदर्शनचक्रको धारण
सह लक्ष्म्या महायोगी नभस्यादिचतुर्ष्वपि।
करनेवाले भगवान् विष्णुकी पूजा की है। इसी अवधिमें
अशून्यशयना नाम द्वितीया सर्वकामदा ॥ २२
सर्वकामदा अशून्यशयना द्वितीया तिथि होती है। उसीसे
तेनासौ भगवान् प्रीतः प्रादाच्छयनमुत्तमम्।
प्रसन्न होकर भगवान्‌ने अशून्य तथा महाभोगोंसे परिपूर्ण
अशून्यं च महाभोगैरनस्तमितशेखरम् ॥ २३
उत्तम शयन प्रदान किया है। दूसरे कहते कि देवी
रोहिणीने चन्द्रमाका क्षय देखकर निश्चय ही रुद्रकी
अन्येऽब्रुवन् ध्रुवं देव्या रोहिण्या शशिनः क्षयम्।
आराधना करनेकी अभिलाषासे परम पवित्र अक्षय
दृष्ट्वा तप्तं तपो घोरं रुद्राराधनकाम्यया ॥ २४
अष्टमी तिथिमें वेदोक्त विधिसे कठिन तपस्या की है,
पुण्यायामक्षयाष्टम्यां वेदोक्तविधिना स्वयम्।
जिससे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने उसे अपनी
तुष्टेन शंभुना दत्तं वरं चास्यै यदृच्छया ॥ २५
इच्छासे वर दिया है ॥ २१–२५ ॥
अन्येऽब्रुवन् चन्द्रमसा ध्रुवमाराधितो हरिः।
दूसरे लोग कहते — चन्द्रमाने निश्चय ही अखण्ड-
व्रतेनेह त्वखण्डेन तेनाखण्डः शशी दिवि ॥ २६
व्रतका आचरण करके भगवान् हरिको आराधित किया
है। उससे आकाशमें चन्द्रमा अखण्डरूपसे प्रकाशित हो
रहा है। दूसरोंने कहा — चन्द्रमाने अत्यधिक तेजवाले
अन्ये ब्रुवञ्छशाङ्केन ध्रुवं रक्षा कृतात्मनः।
पदद्वयं समभ्यर्च्य विष्णोरमिततेजसः ॥ २७
श्रीविष्णुके चरणयुगलकी विधिवत् पूजा करके अपनी

अध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, लोलार्क-प्रसंग ८३
तेनासौ दीप्तिमांश्चन्द्रः परिभूय दिवाकरम्।
अस्माकमानन्दकरो दिवा तपति सूर्यवत् ॥ २८
लक्ष्यते कारणैरन्यैर्बहुभिः सत्यमेव हि।
शशाङ्कनिर्जितः सूर्यो न विभाति यथा पुरा ॥ २९
यथामी कमलाः श्लक्ष्णा रणद्भृङ्गगणावृताः।
विकचाः प्रतिभासन्ते जातः सूर्योदयो ध्रुवम् ॥ ३०
यथा चामी विभासन्ति विकचाः कुमुदाकराः।
अतो विज्ञायते चन्द्र उदितश्च प्रतापवान् ॥ ३१
एवं संभाषतां तत्र सूर्यो वाक्यानि नारद।
अमन्यत किमेतद्धि लोको वक्ति शुभाशुभम् ॥ ३२
एवं संचिन्त्य भगवान् दध्यौ ध्यानं दिवाकरः ।
आसमन्ताज्जगद् ग्रस्तं त्रैलोक्यं रजनीचरैः ॥ ३३
ततस्तु भगवाञ्ज्ञात्वा तेजसोऽप्यसहिष्णुताम् ।
निशाचरस्य वृद्धिं तामचिन्तयत योगवित् ॥ ३४
ततोऽज्ञासीच्च तान् सर्वान् सदाचाररताञ्शुचीन्।
देवब्राह्मणपूजासु संसक्तान् धर्मसंयुतान् ॥ ३५
ततस्तु रक्षः क्षयकृत् तिमिरद्विपकेसरी।
महांशुनखरः सूर्यस्तद्विघातमचिन्तयत् ॥ ३६
ज्ञातवांश्च ततश्छिद्रं राक्षसानां दिवस्पतिः।
स्वधर्मविच्युतिर्नाम सर्वधर्मविघातकृत् ॥ ३७
ततः क्रोधाभिभूतेन भानुना रिपुभेदिभिः।
भानुभी राक्षसपुरं तद् दृष्टं च यथेच्छया ॥ ३८
स भानुना तदा दृष्टः क्रोधाध्मातेन चक्षुषा।
निपपाताम्बराद् भ्रष्टः क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ ३९
पतमानं समालोक्य पुरं शालकटङ्कटः।
नमो भवाय शर्वाय इदमुच्चैरुदीरयत् ॥ ४०
तमाक्रन्दितमाकर्ण्य चारणा गगनेचराः।
हा हेति चुक्रुशुः सर्वे हरभक्तः पतत्यसौ ॥ ४१
तच्चारणवचः शर्वः श्रुतवान् सर्वगोऽव्ययः ।
श्रुत्वा संचिन्तयामास केनासौ पात्यते भुवि ॥ ४२
रक्षा की है। उससे तेजस्वी चन्द्रमा सूर्यपर विजय प्राप्त
करके हमें आनन्द देते हुए दिनमें सूर्यकी भाँति दीप्तिमान्
हो रहे हैं। अन्य अनेक प्रकारके कारणोंसे सचमुच यह
लक्षित हो रहा है कि चन्द्रमाके द्वारा पराजित हुए सूर्य
पूर्ववत् दीप्तिवाले नहीं दीख रहे हैं ॥ २६- २९ ॥
इधर ये सुन्दर कमल खिले हैं और उनपर भौंरे
गुंजार कर रहे हैं। भ्रमर-समूहसे आवृत्त ये सुन्दर कमल
विकसित दिखलायी पड़ रहे हैं; अतः निश्चय ही सूर्योदय
हुआ है। और इधर ये कुमुद्वृन्द खिले हुए हैं; अतः
लगता है कि प्रतापवान् चन्द्रमा उदित हुआ है। नारदजी!
इस प्रकार वार्ता करनेवालोंके वाक्योंको सुनकर सूर्य
सोचने लगे कि ये लोग इस प्रकार शुभाशुभ वचन क्यों
बोल रहे हैं ? भगवान् दिवाकर ऐसा विचारकर ध्यानमग्न
हो गये और उन्होंने देखा कि समस्त त्रैलोक्य चारों
ओरसे राक्षसोंद्वारा ग्रस्त हो गया है ॥ ३०-३३॥
तब योगी भगवान् भास्कर राक्षसोंकी वृद्धि तथा
तेजकी असहनीयताको जानकर स्वयं चिन्तन करने
लगे। उन्हें यह ज्ञात हुआ कि सभी राक्षस सदाचार-
परायण, पवित्र, देवता और ब्राह्मणोंकी पूजामें अनुरक्त
तथा धार्मिक हैं। उसके बाद राक्षसोंको नष्ट करनेवाले
तथा अन्धकाररूपी हाथीके लिये तेज किरणरूपी
नखवाले सिंहके समान सूर्य उनके विनाशके विषयमें
चिन्तन करने लगे। अन्तमें सूर्यको राक्षसोंके अपने
धर्मसे गिरनेका मूल कारण मालूम हुआ, जो समस्त
धर्मोंका विनाशक है ॥ ३४-३७॥
तब क्रोधसे अभिभूत सूर्यने शत्रुओंके भेदन करनेवाली
अपनी किरणोंद्वारा भलीभाँति उस राक्षसको देखा। उस
समय सूर्यद्वारा क्रोधभरी दृष्टिसे देखे जानेके कारण वह
नगर नष्ट हुए पुण्यवाले ग्रहके समान आकाशसे नीचे गिर
पड़ा। अपने नगरको गिरते देखकर शालकटंकट (सुकेशी)-
ने ऊँचे स्वरसे चीखनेके स्वरमें 'नमो भवाय शर्वाय'
यह कहा। उसकी उस चीखको सुनकर गगनमें विचरण
करनेवाले सभी चारण चिल्लाने लगे - हाय हाय! हाय
हाय ! यह शिव-भक्त तो नीचे गिर रहा है ॥ ३८-४१ ॥
सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी नित्य शंकरने
चारणोंके उस वचनको सुना और फिर सोचने लगे-
यह नगर किसके द्वारा पृथ्वीपर गिराया जा रहा है।

८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञातवान् देवपतिना सहस्रकिरणेन तत्।<br>पातितं राक्षसपुरं ततः क्रुद्धस्त्रिलोचनः॥ ४३<br>क्रुद्धस्तु भगवन्तं तं भानुमन्तमपश्यत्।<br>दृष्टमात्रस्त्रिनेत्रेण निपपात ततोऽम्बरात्॥ ४४<br>गगनात् स परिभ्रष्टः पथि वायुनिषेविते।<br>यदृच्छया निपतितो यन्त्रमुक्तो यथोपलः॥ ४५उन्होंने यह जान लिया कि देवोंके पति सहस्रकिरणमाली सूर्यद्वारा राक्षसोंका यह पुर गिराया गया है। इससे त्रिलोचन शंकर क्रुद्ध हो गये और उन्होंने भगवान् सूर्यको देखा। त्रिनेत्रधारी शंकरके देखते ही वे सूर्य आकाशसे नीचे आ गिरे। आकाशसे नीचे वायुमण्डलमार्गमें वे इस प्रकार गिरे जैसे यन्त्रके द्वारा कोई पत्थर फेंका गया हो॥ ४२-४५।
ततो वायुपथान्मुक्तः किंशुकोज्ज्वलविग्रहः।<br>निपपातान्तरिक्षात् स वृतः किन्नरचारणैः॥ ४६<br><br>चारणैर्वेष्टितो भानुः प्रभात्याम्बरात् पतन्।<br>अर्द्धपक्वं यथा तालात् फलं कपिभिरावृतम्॥ ४७<br><br>ततस्तु ऋषयोऽभ्येत्य प्रत्यूचुर्भानुमालिनम्।<br>निपतस्व हरिक्षेत्रे यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि॥ ४८<br><br>ततोऽब्रवीत् पतन्नेव विवस्वांस्तांस्तपोधनान्।<br>किं तत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं वद्वध्वं शीघ्रमेव मे॥ ४९फिर पलाश-पुष्पके समान आभावाले सूर्य वायुमण्डलसे अलग होकर किंनरों एवं चारणोंसे भरे अन्तरिक्षसे नीचे गिर गये। उस समय आकाशसे नीचे गिरते हुए सूर्य चारणोंसे घिरे हुए ऐसे लग रहे थे, जैसे तालवृक्षसे गिरनेवाला अधपका तालफल कपियोंसे घिरा हो। तब मुनियोंने किरणमाली भगवान् सूर्यदेवके समीप आकर उनसे कहा कि यदि तुम कल्याण चाहते हो तो विष्णुके क्षेत्रमें गिरो। गिरते हुए ही सूर्यने (ऐसा सुनकर) उन तपस्वियोंसे पूछा-विष्णुभगवान्‌का वह पवित्र क्षेत्र कौन-सा है? आपलोग उसे मुझे शीघ्र बतलायें ॥ ४६-४९॥
तमूचुर्मुनयः सूर्य शृणु क्षेत्रं महाफलम्।<br>साम्प्रतं वासुदेवस्य भावि तच्छंकरस्य च॥ ५०<br><br>योगशायिनमारभ्य यावत् केशवदर्शनम्।<br>एतत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं नाम्ना वाराणसी पुरी॥ ५१<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् भानुर्भवनेत्राग्नितापितः।<br>वरणायास्तथैवास्यास्त्वन्तरे निपपात ह॥ ५२<br><br>ततः प्रदह्यति तनौ निमज्यास्यां लुलद् रविः।<br>वरणायां समभ्येत्य न्यमज्जत यथेच्छया॥ ५३इसपर मुनियोंने सूर्यसे बतलाया - सूर्यदेव! आप महाफल देनेवाले उस क्षेत्रका विवरण सुनिये- इस समय वह क्षेत्र वासुदेवका क्षेत्र है, किंतु भविष्यमें वह शंकरका क्षेत्र होगा। योगशायीसे प्रारम्भ कर केशवदर्शनतकका क्षेत्र हरिका पवित्र क्षेत्र है, इसका नाम वाराणसीपुरी है। उसे सुनकर शिवजीकी नेत्राग्निसे संतप्त होते हुए भगवान् सूर्य वरुणा और असी* इन दोनों नदियोंके बीचमें गिरे। उसके बाद शरीरके जलते रहनेसे व्याकुल हुए सूर्य असी नदीमें स्नान करनेके बाद वरुणा नदीमें इच्छानुकूल स्नान किये॥ ५०-५३॥
भूयोऽसिं वरणां भूयो भूयोऽपि वरणादसिम्।<br>लुलंस्त्रिनेत्रवह्न्यात्तौ भ्रमतेऽलातचक्रवत्॥ ५४<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् ऋषयो यक्षराक्षसाः।<br>नागा विद्याधराश्चापि पक्षिणोऽप्सरसस्तथा॥ ५५<br>यावन्तो भास्कररथे भूतप्रेतादयः स्थिताः।<br>तावन्तो ब्रह्मसदनं गता वेदयितुं मुने॥ ५६इस प्रकार शंकरके तीसरे नेत्रकी अग्निसे दग्ध होकर वे बारंबार असि और वरुणा नदियोंकी ओर अलातचक्र (लुकाठीके मण्डल)-के समान चक्कर काटने लगे। मुने! इस बीच ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, विद्याधर, पक्षी, अप्सराएँ और भास्करके रथमें जितने भूत-प्रेत आदि थे, वे सभी इसे ज्ञापित करनेके लिये ब्रह्मलोकमें गये।

* अब भी वरुणा और अस्सी नदियाँ वाराणसीको अपने अन्तरालमें किये हुए हैं। अस्सी बरसातमें जलभरित होती है, पर वरुणा सदा जलपूर्णा रहती है।

अध्याय १६ ] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८५
ततो ब्रह्मा सुरपतिः सुरैः सार्धं समभ्यगात्।
रम्यं महेश्वरावासं मन्दरं रविकारणात् ॥ ५७
गत्वा दृष्ट्वा च देवेशं शंकरं शूलपाणिनम्।
प्रसाद्य भास्कारार्थाय वाराणस्यामुपानयत् ॥ ५८
ततो दिवाकरं भूयः पाणिनादाय शंकरः।
कृत्वा नामास्य लोलेति रथमारोपयत् पुनः ॥ ५९
आरोपिते दिनकरे ब्रह्माऽभ्येत्य सुकेशिनम्।
सबान्धवं सनगरं पुनरारोपयद् दिवि ॥ ६०
समारोप्य सुकेशिं च परिष्वज्य च शंकरम्।
प्रणम्य केशवं देवं वैराजं स्वगृहं गतः ॥ ६१
एवं पुरा नारद भास्करेण
पुरं सुकेशर्भुवि सन्निपातितम्।
दिवाकरो भूमितले भवेन
क्षिप्तस्तु दृष्ट्या न च संप्रदग्धः ॥ ६२
आरोपितो भूमितलाद् भवेन
भूयोऽपि भानुः प्रतिभासनाय।
स्वयंभुवा चापि निशाचरेन्द्र-
स्त्वारोपितः खे सपुरः सबन्धुः ॥ ६३
तब सुरपति इन्द्र, ब्रह्मा देवताओंके साथ सूर्यकी
शान्तिके लिये महेश्वरके आवास-स्थान मन्दर पर्वतपर
गये। वहाँ जाकर तथा देवेश शूलपाणि भगवान् शिवका
दर्शन करनेके बाद भगवान् ब्रह्माजी भास्करके लिये
उन्हें (शिवजीको) प्रसन्न कर उन्हें (सूर्यको) वाराणसीमें
लाये ॥ ५४—५८ ॥
फिर भगवान् शंकरने सूर्यभगवान्को हाथमें लेकर
उनका नाम 'लोल' रख दिया और उन्हें पुनः उनके
रथपर स्थापित कर दिया। दिनकरके अपने रथमें आरूढ़
हो जानेपर ब्रह्मा सुकेशीके पास गये एवं उसे भी पुनः
बान्धवों और नगरसहित आकाशमें पूर्ववत् स्थापित कर
दिया। सुकेशीको पुनः आकाशमें स्थापित करनेके बाद
ब्रह्माजी शंकरका आलिङ्गन एवं केशवदेवको प्रणाम
कर अपने वैराज नामक लोकमें चले गये। नारदजी !
प्राचीन समयमें इस प्रकार सूर्यने सुकेशीके नगरको
पृथ्वीपर गिराया एवं महादेवने भगवान् सूर्यको अपने
तृतीय नेत्रकी अग्निसे दग्ध न कर केवल भूमितलपर
गिरा ही दिया था। फिर शंकरने सूर्यको प्रतिभासित
होनेके लिये भूमितलसे आकाशमें स्थित किया और
ब्रह्माने निशाचरराजको उसके पुर और बन्धुओंके साथ
आकाशमें फिर संस्थापित कर दिया ॥ ५९—६३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
देवताओंका शयन — तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों
एवं शिव-पूजनका वर्णन
नारद उवाच
यानेतान् भगवान् प्राह कामिभिः शशिनं प्रति।
आराधनाय देवाभ्यां हरीशाभ्यां वदस्व तान् ॥ १
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्व कामिभिः प्रोक्तान् व्रतान् पुण्यान् कलिप्रिय।
आराधनाय शर्वस्य केशवस्य च धीमतः ॥ २
नारदजीने कहा — पुलस्त्यजी ! आपने चन्द्रमाके
प्रति कामियोंद्वारा वर्णित श्रीहरि और शंकरकी आराधनाके
लिये जिन व्रतोंका उल्लेख किया है उनका वर्णन करें ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी बोले - लोक-कल्याणके लिये कलहको
भी इष्ट माननेवाले कलि (कलह) - प्रिय नारदजी ! आप
महादेव और बुद्धिमान् श्रीहरिकी आराधनाके लिये
कामियोंद्वारा कहे गये पवित्र व्रतोंका वर्णन सुनें।