वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६२- शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, हरि-हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य
| २७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६० |
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| नारद उवाच<br>कोऽसौ मुरारिर्देवर्षे देवो यक्षो नु किन्नरः।<br>दैत्यो राक्षसो वापि पार्थिवो वा तदुच्यताम् ॥ २६ | नारदने पूछा— देवर्षे! आप यह बतलायें कि ये मुरारि कौन हैं? ये देवता हैं या यक्ष, किन्नर हैं या दैत्य, राक्षस हैं या मनुष्य?॥ २६॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>योऽसौ रजः सत्त्वमयो गुणवांश्च तमोमयः।<br>निर्गुणः सर्वगो व्यापी मुरारिर्मधुसूदनः ॥ २७ | पुलस्त्यजीने कहा— देवताओ! जो ये मुरारि हैं वे मधु नामके राक्षसके विनाशकारी हैं; वे सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे युक्त हैं; निर्गुण और सगुण हैं; सर्वगामी और सर्वव्यापी हैं॥ २७॥ |
| नारद उवाच<br>योऽसौ मुर इति ख्यातः कस्य पुत्रः स गीयते।<br>कथं च निहतः संख्ये विष्णुना तद् वदस्व मे ॥ २८ | नारदने (पुलस्त्यजीसे) पूछा— आप मुझे यह बतलायें कि यह मुर-नामधारी दानव किसका पुत्र है और लड़ाईके मैदानमें भगवान् विष्णुने उसे किस प्रकार मारा?॥ २८॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि मुरासुरनिबर्हणम्।<br>विचित्रमिदमाख्यानं पुण्यं पापप्रणाशनम् ॥ २९<br>कश्यपस्यौरसः पुत्रो मुरो नाम दनूद्भवः।<br>स ददर्श रणे शस्तान् दितिपुत्रान् सुरोत्तमैः ॥ ३०<br>ततः स मरणाद् भीतस्तप्त्वा वर्षगणान्बहून्।<br>आराधयामास विभुं ब्रह्माणमपराजितम् ॥ ३१<br>ततोऽस्य तुष्टो वरदः प्राह वत्स वरं वृणु।<br>स च वव्रे वरं दैत्यो वरमेनं पितामहात् ॥ ३२ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! मुर असुरके विनाशकी कथा अद्भुत है; वह पापका विनाश करनेवाली और पवित्रकारिणी है; मैं उसे कहूँगा; तुम सुनो। दनुकी कोखसे कश्यपका औरस पुत्र मुर उत्पन्न हुआ। उसने श्रेष्ठ देवोंद्वारा संग्राममें दैत्योंको पराजित देखा। उसके बाद मृत्युसे भयभीत होकर उसने बहुत वर्षोंतक तपस्या करते हुए व्यापक अजेय ब्रह्माकी आराधना की। उसके बाद उसके ऊपर संतुष्ट होकर ब्रह्माने कहा—वत्स! वर माँगो। उस दैत्यने पितामहसे यह श्रेष्ठ वर माँगा—॥ २९—३२॥ |
| यं यं करतलेनाहं स्पृशेयं समरे विभो।<br>स स मद्धस्तसंस्पृष्टस्त्वमरोऽपि मरत्वतः ॥ ३३<br>बाढमित्याह भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ततोऽभ्यागान्महातेजा मुरः सुरगिरिं बली ॥ ३४<br>समेत्याह्वयते देवं यक्षं किन्नरमेव वा।<br>न कश्चिद् युयुधे तेन समं दैत्येन नारद ॥ ३५<br>ततोऽमरावतीं क्रुद्धः स गत्वा शक्रमाह्वयत्।<br>न चास्य सह योद्धुं वै मतिं चक्रे पुरंदरः ॥ ३६ | विभो! युद्धमें मैं जिसे हाथसे छू दूँ वह मेरे हाथसे छूते ही अमर (देवता) होनेपर भी मृत्युको प्राप्त हो जाय। लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने कहा—बहुत ठीक; ऐसा ही होगा। उसके बाद महातेजस्वी बलशाली मुर देवगिरिपर जा पहुँचा। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] नारदजी! वहाँ पहुँचकर उसने देवता, यक्ष, किन्नर आदिको युद्धके लिये ललकारा, किंतु किसीने भी उसके साथ युद्ध नहीं किया। उसके बाद क्रुद्ध होकर वह अमरावतीकी ओर चला गया और इन्द्रको संग्राम करनेके लिये ललकारने लगा। किंतु इन्द्रने भी उसके साथ युद्ध करनेका विचार नहीं किया॥ ३३—३६॥ |
| ततः स करमुद्यम्य प्रविवेशामरावतीम्।<br>प्रविशन्तं न तं कश्चिन्निवारयितुमुत्सहेत् ॥ ३७<br>स गत्वा शक्रसदनं प्रोवाचेन्द्रं मुरस्तदा।<br>देहि युद्धं सहस्राक्ष नो चेत् स्वर्गं परित्यज ॥ ३८<br>इत्येवमुक्तो मुरुणा ब्रह्मन् हरिरयस्तदा।<br>स्वर्गराज्यं परित्यज्य भूचरः समजायत ॥ ३९ | उसके बाद हाथ उठाये हुए उसने अमरावतीमें प्रवेश किया। परंतु किसीने भी प्रवेश करते हुए उसको रोकनेका साहस नहीं किया। उसके बाद इन्द्रके भवनमें जाकर मुरने इन्द्रसे कहा—सहस्राक्ष! मुझसे संग्राम करो, अन्यथा स्वर्गको छोड़ दो। ब्रह्मन्! मुरके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र (युद्ध न कर) स्वर्गका राज्य छोड़कर |
| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २७१ |
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| ततो गजेन्द्रकुलिशौ हृतौ शक्रस्य शत्रुणा ।<br>सकलत्रो महातेजाः सह देवैः सुतेन च ॥ ४०<br><br>कालिन्द्या दक्षिणे कूले निवेश्य स्वपुरं स्थितः ।<br>मुरुश्चापि महाभोगान् बुभुजे स्वर्गसंस्थितः ॥ ४१ | पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उसके बाद (उस) शत्रुने इन्द्रके गजराज (ऐरावत) और वज्रको छीन लिया। महातेजस्वी इन्द्र अपनी पत्नी, पुत्र और देवताओंके साथ कालिन्दीके दक्षिण तटपर अपना नगर बसाकर रहने लगे और मुर स्वर्गमें रहते हुए महान् भोगोंका उपभोग करने लगा ॥ ३७-४१ ॥ |
| दानवाश्चापरे रौद्रा मयतारपुरोगमाः ।<br>मुरमासाद्य मोदन्ते स्वर्गे सुकृतिनो यथा ॥ ४२<br><br>स कदाचिन्महीपृष्ठं समायातो महासुरः ।<br>एकाकी कुञ्जरारूढः सरयूं निम्नगां प्रति ॥ ४३<br><br>स सरय्वास्तटे वीरं राजानं सूर्यवंशजम् ।<br>ददृशे रघुनामानं दीक्षितं यज्ञकर्मणि ॥ ४४<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् दैत्यो युद्धं मे दीयतामिति ।<br>नो चेन्निवर्ततां यज्ञो नेष्टव्या देवतास्त्वया ॥ ४५ | मय और तारक आदि दूसरे भयंकर दानव भी मुरके निकट पहुँचकर स्वर्गमें पुण्यात्माओंके समान आमोद-प्रमोद करने लगे। वह महान् असुर किसी समय पृथ्वीपर आया और अकेला ही हाथीपर चढ़कर सरयू नदीके तटपर उपस्थित हुआ। उसने सरयूके किनारे सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए एवं यज्ञकर्ममें दीक्षित रघु नामके राजाको देखा। उनके पास जाकर उस दैत्यने कहा— मुझसे संग्राम करो, नहीं तो यज्ञ करना बंद कर दो। तुम देवताओंकी पूजा नहीं कर सकते ॥ ४२-४५ ॥ |
| तमुपेत्य महातेजा मित्रावरुणसंभवः ।<br>प्रोवाच बुद्धिमान् ब्रह्मन् वसिष्ठस्तपसां वरः ॥ ४६<br><br>किं ते जितैर्नरैर्दैत्य अजिताननुशासय ।<br>प्रहर्तुमिच्छसि यदि तं निवारय चान्तकम् ॥ ४७<br><br>स बली शासनं तुभ्यं न करोति महासुर ।<br>तस्मिञ्जिते हि विजितं सर्वं मन्यस्व भूत लम् ॥ ४८<br><br>स तद् वसिष्ठवचनं निशम्य दनुपुङ्गवः ।<br>जगाम धर्मराजानं विजेतुं दण्डपाणिनम् ॥ ४९ | ब्रह्मन् ! मित्रावरुणके पुत्र महातेजस्वी, बुद्धिमान् और तपस्वियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठने उस दैत्यके पास जाकर कहा—दैत्य ! मनुष्योंको जीत लेनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा ? जो नहीं जीते गये हैं उनको पराजित करो। यदि तुम (चढ़ाई कर) प्रहार करना चाहते हो तो उन यमराजका अवरोध करो। महासुर ! वे बलशाली हैं। तुम्हारा शासन नहीं मानते। उनको जीत लेनेपर समस्त भूतलको पराजित हुआ समझो। वसिष्ठका वह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ दण्ड धारण करनेवाले धर्मराजको जीतनेके लिये चल पड़ा ॥ ४६-४९ ॥ |
| तमायान्तं यमः श्रुत्वा मत्वाऽवध्यं च संयुगे ।<br>स समारुह्य महिषं केशवान्तिकमागमत् ॥ ५०<br><br>समेत्य चाभिवाद्यैनं प्रोवाच मुरचेष्टितम् ।<br>स चाह गच्छ मामद्य प्रेषयस्व महासुरम् ॥ ५१<br><br>स वासुदेववचनं श्रुत्वाऽभ्यागात् त्वरान्वितः ।<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यः सम्प्राप्तो नगरीं मुरः ॥ ५२<br><br>तमागतं यमः प्राह किं मुरो कर्तुमिच्छसि ।<br>वदस्व वचनं कर्त्ता त्वदीयं दानवेश्वर ॥ ५३ | उसे आता हुआ सुनकर तथा संग्राममें वह अवध्य है—ऐसा विचारकर वे यमराज महिषपर सवार होकर भगवान् केशवके पास चले गये। उनके पास जाकर प्रणाम करनेके पश्चात् (यमराजने) मुरके कृत्योंको बताया। उन्होंने कहा—तुम जाकर अभी उस महासुरको मेरे पास भेज दो। वासुदेवके वचनको सुनकर वे शीघ्र चले आये। इतनेमें मुर दैत्य उनकी नगरीमें आया। उसके आनेपर यमने कहा—हे मुर ! बतलाओ तुम क्या करना चाहते हो ? दानवेश्वर ! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ५०-५३ ॥ |
| मुरुवाच<br>यम प्रजासंयमनान्निवृत्तिं कर्त्तुमर्हसि ।<br>नो चेत् तवाद्य छित्त्वाऽहं मूर्धानं पातये भुवि ॥ ५४ | मुरु या मुरने कहा— यम ! तुम प्रजाओंके ऊपर नियन्त्रण करना बंद कर दो, नहीं तो मैं तुम्हारा सिर |
| २८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६० |
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| तमाह धर्मराड् ब्रह्मन् यदि मां संयमाद् भवान्।<br>गोपायति मुरो सत्यं करिष्ये वचनं तव ॥ ५५<br><br>मुरस्तमाह भवतः कः संयन्ता वदस्व माम्।<br>अहमेनं पराजित्य वारयामि न संशयः॥ ५६<br><br>यमस्तं प्राह मां विष्णुर्देवश्चक्रगदाधरः।<br>श्वेतद्वीपनिवासी यः स मां संयमतेऽव्ययः ॥ ५७ | काटकर पृथ्वीपर फेंक दूँगा। ब्रह्मन्! धर्मराजने उससे कहा—यदि तुम मेरे ऊपर संयम करनेवालेसे मेरी रक्षा कर सको तो मैं सत्य कहता हूँ कि तुम्हारे वचनका पालन करूँगा। मुरने उनसे कहा—मुझे बतलाओ कि तुम्हारा संयन्ता (शासक) कौन है? मैं निस्सन्देह उसे पराजित कर रोक दूँगा। यमने उससे कहा—जो श्वेतद्वीपके निवासी, चक्र-गदा धारण करनेवाले, अविनाशी भगवान् विष्णु हैं, वे ही मुझे शासित करते हैं॥ ५४–५७॥ |
| तमाह दैत्यशार्दूलः क्वासौ वसति दुर्जयः।<br>स्वयं तत्र गमिष्यामि तस्य संयमनोद्यतः॥ ५८<br><br>तमुवाच यमो गच्छ क्षीरोदं नाम सागरम्।<br>तत्रास्ते भगवान् विष्णुर्लोकनाथो जगन्मयः॥ ५९<br><br>मुरस्तद्वाक्यमाकर्ण्य प्राह गच्छामि केशवम्।<br>किं तु त्वया न तावद्धि संयम्या धर्म मानवाः॥ ६०<br><br>स प्राह गच्छ त्वं तावत् प्रवर्तिष्ये जयं प्रति।<br>संयन्तुर्वा यथा स्याद्वि ततो युद्धं समाचर॥ ६१<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दुग्धाब्धिमगमन्मुरः।<br>यत्रास्ते शेषपर्यङ्के चतुर्मूर्तिर्जनार्दनः॥ ६२ | दैत्योंमें श्रेष्ठ मुरने यमराजसे कहा—यम! वह कहाँ रहता है, जिसे कठिनतासे जीता जा सकता है? उसका संयमन करनेके लिये मैं तैयार होकर वहाँ स्वयं जाऊँगा। यमराजने उससे कहा—तुम क्षीरसागरमें जाओ। वहाँ लोकस्वामी जगन्मूर्ति भगवान् विष्णु रहते हैं। मुरने उनकी बात सुनकर कहा—धर्मराज! मैं केशवके पास जा रहा हूँ, परंतु तुम तबतक मनुष्योंका नियमन मत करना। उस (मुर)-ने कहा—तुम जाओ। तबतक मैं तुम्हारे नियामकको जैसे भी हो जीतनेका प्रयत्न करूँगा। उसके बाद तुम युद्ध करना। इतना कहकर मुर या मुर दैत्य क्षीरसागरमें जा पहुँचा। वहाँ (जाकर उसने देखा कि) चतुर्भुजाधारी जनार्दन अनन्त नागकी शय्यापर (पड़े हुए) हैं॥ ५८–६२॥ |
| नारद उवाच<br><br>चतुर्मूर्तिः कथं विष्णुरेक एव निगद्यते।<br>सर्वगत्वात् कथमपि अव्यक्तत्वाच्च तद्वद॥ ६३ | नारदजीने पूछा— आप (कृपया) यह बतलायें कि विष्णु एक होनेपर भी चतुर्मूर्ति क्यों कहे जाते हैं। क्या सर्वगत एवं अव्यक्त होनेके कारण तो नहीं कहा जाता? (आप) उसे कहें॥ ६३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br><br>अव्यक्तः सर्वगोऽपीह एक एव महामुने।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथो यथा ब्रह्मांस्तथा शृणु॥ ६४<br><br>अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं शुक्लं शान्तं परं पदम्।<br>वासुदेवाख्यमव्यक्तं स्मृतं द्वादशपत्रकम्॥ ६५ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! अव्यक्त एवं सर्वव्यापी होनेपर भी वे एक ही हैं। जिस कारणसे जगन्नाथ चतुर्मूर्ति कहे जाते हैं, उसे बताता हूँ, सुनो। वासुदेव नामक श्रेष्ठ पद (तर्क या अनुमानद्वारा अज्ञेय) एवं निर्देश किये जानेमें अशक्य, शुक्ल (शुद्ध), शान्तियुक्त, अव्यक्त (अप्रकट) एवं द्वादशपत्रक ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—) द्वादशाक्षर मन्त्रवाला कहा गया है॥ ६४-६५॥ |
| नारद उवाच<br><br>कथं शुक्लं कथं शान्तमप्रतर्क्यमनिन्दितम्।<br>कान्यस्य द्वादशैवोक्ता पत्रका तानि मे वद॥ ६६ | नारदजीने [पुनः] पूछा— किस प्रकार वे शुक्ल, शान्त, अप्रतर्क्य एवं अनिन्दित हैं? मुझे बतलाइये कि उनके कथित द्वादशपत्रक कौन हैं॥ ६६॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br><br>शृणुष्व गुह्यं परमं परमेष्ठिप्रभाषितम्।<br>श्रुतं सनत्कुमारेण तेनाख्यातं च तन्मम॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— पितामह ब्रह्माने जिस परम गुह्य वचनको कहा है, उसे सुनिये। सनत्कुमारने उसे सुना था और उन्होंने मुझसे कहा था॥ ६७॥ |
| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २८१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नारद उवाच<br>कोऽयं सनत्कुमारोति यस्योक्तं ब्रह्मणा स्वयं।<br>तवापि तेन गदितं वद मामनुपूर्वशः॥ ६८ | नारदजीने [फिर] कहा— इस विषयमें स्वयं ब्रह्माजीने जिनसे कहा है, वे सनत्कुमार कौन हैं? और उन्होंने भी आपसे जो कहा है उसे क्रमशः मुझसे कहें॥ ६८॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>धर्मस्य भार्याहिंसाख्या तस्यां पुत्रचतुष्टयम्।<br>संजातं मुनिशार्दूल योगशास्त्रविचारकम्॥ ६९<br>ज्येष्ठः सनत्कुमारोऽभूद् द्वितीयश्च सनातनः।<br>तृतीयः सनको नाम चतुर्थश्च सनन्दनः॥ ७०<br>सांख्यवेत्तारमपरं कपिलं वोढुमासुरिम्।<br>दृष्ट्वा पञ्चशिखं श्रेष्ठं योगयुक्तं तपोनिधिम्॥ ७१<br>ज्ञानयोगं न ते दद्युर्ज्यायांसोऽपि कनीयसाम्।<br>मानमुक्तं महायोगं कपिलादीनुपासतः॥ ७२<br>सनत्कुमारश्चाभ्येत्य ब्रह्माणं कमलोद्भवम्।<br>अपृच्छद् योगविज्ञानं तमुवाच प्रजापतिः॥ ७३ | पुलस्त्यजी बोले— धर्मकी पत्नी अहिंसा है। उससे चार पुत्र हुए। मुनिश्रेष्ठ! वे सभी योगशास्त्रके विचार करनेमें कुशल थे। उनमें सनत्कुमार ज्येष्ठ, सनातन द्वितीय, सनक तृतीय एवं चतुर्थ सनन्दन हुए। वे सभी सांख्यवेत्ता कपिल, वोढु, आसुरी एवं योगसे युक्त तपोनिधि श्रेष्ठ पञ्चशिख नामक (ऋषि)-को देखकर उनके पास गये। बड़े होनेपर भी उन लोगोंने अपनेसे छोटोंको ज्ञानयोगका उपदेश नहीं दिया। कपिल आदिकी उपासना करनेवालोंको महायोगका परिणाममात्र बतला दिया। सनत्कुमारने कमलोद्भव ब्रह्माके पास जाकर योग-विज्ञान पूछा। प्रजापतिने उनसे कहा॥ ६९—७३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>कथयिष्यामि ते साध्य यदि पुत्रत्वमिच्छसि।<br>यस्य कस्य न वक्तव्यं तत्सत्यं नान्यथेति हि॥ ७४ | ब्रह्माने कहा— साध्य! यदि तुम पुत्र होना चाहो तो मैं तुमसे कहूँगा। उसे जिस-किसीसे नहीं कहना चाहिये; क्योंकि यह सत्य है, अन्यथा नहीं है॥ ७४॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>पुत्र एवास्मि देवेश यतः शिष्योऽस्म्यहं विभो।<br>न विशेषोऽस्ति पुत्रस्य शिष्यस्य च पितामह॥ ७५ | सनत्कुमारने कहा— देवेश! मैं पुत्र ही हूँ; क्योंकि विभो! मैं शिष्य हूँ। पितामह! पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं होता॥ ७५॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>विशेषः शिष्यपुत्राभ्यां विद्यते धर्मनन्दन।<br>धर्मकर्मसमायोगे तथापि गदतः शृणु॥ ७६<br><br>पुन्नाम्नो नरकात् त्राति पुत्रस्तेनेह गीयते।<br>शेषपापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः॥ ७७ | ब्रह्माने कहा— धर्मनन्दन! शिष्य और पुत्रमें धर्म-कर्मके संयोगमें (जो) कुछ भेद होता है उसे बताता हूँ, मुझसे सुनो। यह वैदिकी श्रुति है—जो 'पुम्' नामक नरकसे उद्धार कर देता है उसे 'पुत्र' कहा जाता है और शेष पापोंका हरण करनेवाला होनेसे 'शिष्य' कहा जाता है (—यही दोनोंमें भेद है)॥ ७६-७७॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>कोऽयं पुन्नामको देव नरकात् त्राति पुत्रकः।<br>कस्माच्छेषं ततः पापं हरेच्छिष्यश्च तद्वद॥ ७८ | सनत्कुमारने कहा (पूछा)— देव! वह 'पुम्' नामक नरक कौन है? जिस नरकसे पुत्र रक्षा करता है और शिष्य किससे अवशिष्ट पापका हरण करता है; आप कृपया इन्हें बतलाइये॥ ७८॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>एतत् पुराणं परमं महर्षे<br>योगाङ्गयुक्तं च सदैव यच्च।<br>तथैव चोग्रं भयहारि मानवं<br>वदामि ते साध्य निशामयैनम्॥ ७९ | ब्रह्माने कहा— महर्षे! मैं तुमको अत्यन्त प्राचीन,<br><br>योगाङ्गसे युक्त, उग्र भय दूर करनेवाली परम पवित्र<br><br>कथा सुनाता हूँ। हे साध्य! तुम इसे सुनो॥ ७९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें साठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६०॥
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| २८२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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इकसठवाँ अध्याय
पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार-ब्रह्माका प्रसंग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु-वध
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— |
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| परदाराभिगमनं पापीयांसोपसेवनम्।<br>पारुष्यं सर्वभूतानां प्रथमं नरकं स्मृतम्॥ १<br><br>फलस्तेयं महापापं फलहीनं तथाऽटनम्।<br>छेदनं वृक्षजातीनां द्वितीयं नरकं स्मृतम्॥ २<br><br>वर्ज्यादानं तथा दुष्टमवध्यवधबन्धनम्।<br>विवादमर्थहेतूत्थं तृतीयं नरकं स्मृतम्॥ ३<br><br>भयदं सर्वसत्त्वानां भवभूतिविनाशनम्।<br>भ्रंशनं निजधर्माणां चतुर्थं नरकं स्मृतम्॥ ४ | परस्त्रीसे संगत होना, पापियोंके साथ रहना और सब प्राणियोंके प्रति (किसी भी प्राणीके साथ) कठोरताका व्यवहार करना पहला नरक कहा गया है। फलोंकी चोरी, (अच्छे) उद्देश्यसे रहित घूमना (आवारापन) एवं वृक्ष आदि वनस्पतियोंका काटना घोर पाप तथा दूसरा नरक कहा गया है। दोषयुक्त एवं वर्जित—ग्रहण न करने योग्य—वस्तुओंका लेना, जो वधके योग्य नहीं है उसे मारना अथवा बन्धनमें डालना (बन्दी बनाना) और अर्थ (धन—रुपये-पैसे)-के लिये किया जानेवाला विवाद (मुकदमा उठाना) तीसरा नरक होता है। सभी प्राणियोंको भय देना, संसारकी सार्वजनिक सम्पत्तिको नष्ट करना तथा अपने नियत धर्म-नियमोंसे विचलित होना चौथे प्रकारका नरक कहलाता है॥ १—४॥ |
| मारणं मित्रकौटिल्यं मिथ्याऽभिशपनं च यत्।<br>मिष्टैकाशनमित्युक्तं पञ्चमं तु नृपाचनम्॥ ५<br><br>पत्रफलादिहरणं यमनं योगनाशनम्।<br>यानयुग्यस्य हरणं षष्ठमुक्तं नृपाचनम्॥ ६<br><br>राजभागहरं मूढं राजजायानिषेवणम्।<br>राज्ये त्वहितकारित्वं सप्तमं निरयं स्मृतम्॥ ७<br><br>लुब्धत्वं लोलुपत्वं च लब्धधर्मार्थनाशनम्।<br>लालासंकीर्णमेवोक्तमष्टमं नरकं स्मृतम्॥ ८ | पुरश्चरण आदि तान्त्रिक अभिचारोंसे किसीको मारना, मृत्यु-जैसा अपार कष्ट देना तथा मित्रके साथ छल-छद्म, झूठी शपथ और अकेले मधुर पदार्थ खाना पाँचवाँ नरक कहा जाता है। पत्र (पुष्प आदि) एवं फल चोराना, किसीको बाँध (बन्धुवा बनाये) रखना, किसीके प्राप्तव्यकी प्राप्तिमें विघ्न-बाधा डालकर उसे नष्ट कर देना, घोड़ा-गाड़ी आदि सवारीके जूए (आदि सामानों)-की चोरी कर लेना छठा पाप कहा गया है। भुलावेमें पड़कर राजाके अंशका चुरा लेना एवं मूर्खतावश साहस कर राजपत्नीका संसर्ग एवं राज्यका अमङ्गल (नुकसान) करना सातवाँ नरक कहा जाता है। किसी वस्तु या व्यक्तिपर लुभा जाना, लालच करना, पुरुषार्थसे प्राप्त धर्मयुक्त अर्थका विनाश करना और लारमिली वाणीको आठवाँ नरक कहते हैं॥ ५—८॥ |
| विप्रोष्यां ब्रह्महरणं ब्राह्मणानां विनिन्दनम्।<br>विरोधं बन्धुभिश्चोक्तं नवमं नरपाचनम्॥ ९ | ब्राह्मणको देशसे निकाल देना, ब्राह्मणका धन चुराना, ब्राह्मणोंकी निन्दा करना तथा बन्धुओंसे विरोध |