वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२३- वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य-लक्ष्मीका वर्णन
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श्रीवामनपुराण
[ अध्याय २१
सम्भूय विन्ध्यं गत्वा च भूयो भूतगणैर्वृता ।
शुम्भं चैव निशुम्भं च वधिष्यति वरायुधैः ॥ ४
नारद उवाच
ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता मृता दक्षात्मजा सती ।
सा जाता हिमवत्पुत्रीत्येवं मे वक्तुमर्हसि ॥ ५
यथा च पार्वतीकोशात् समुद्भूता हि कौशिकी ।
यथा हतवती शुम्भं निशुम्भं च महासुरम् ॥ ६
कस्य चेमौ सुतौ वीरौ ख्यातौ शुम्भनिशुम्भकौ।
एतद् विस्तरतः सर्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ७
पुलस्त्य उवाच
एतत्ते कथयिष्यामि पार्वत्याः सम्भवं मुने ।
शृणुष्वावहितो भूत्वा स्कन्दोत्पत्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८
रुद्रः सत्यां प्रणष्टायां ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
निराश्रयत्वमापन्नस्तपस्तप्तुं व्यवस्थितः ॥ ९
स चासीद् देवसेनानीर्दैत्यदर्पविनाशनः ।
शिवरूपत्वमास्थाय सैनापत्यं समुत्सृजत् ॥ १०
ततो निराकृता देवाः सेनानाथेन शम्भुना।
दानवेन्द्रेण विक्रम्य महिषेण पराजिताः ॥ ११
ततो जग्मुः सुरेशानं द्रष्टुं चक्रगदाधरम् ।
श्वेतद्वीपे महाहंसं प्रपन्नाः शरणं हरिम् ॥ १२
तानागतान् सुरान् दृष्ट्वा ततः शक्रपुरोगमान् ।
विहस्य मेघगम्भीरं प्रोवाच पुरुषोत्तमः ॥ १३
किं जितास्त्वसुरेन्द्रेण महिषेण दुरात्मना।
येन सर्वे समेत्यैवं मम पार्श्वमुपागताः ॥ १४
तद् युष्माकं हितार्थाय यद् वदामि सुरोत्तमाः ।
तत्कुरुध्वं जयो येन समाश्रित्य भवेद्धि वः ॥ १५
उत्पन्न होनेपर भूतगणोंसे आवृत हो वे विन्ध्यपर्वतपर
गयीं और उन्होंने (अपने) श्रेष्ठ आयुधोंसे शुम्भ तथा
निशुम्भ नामके दानवोंका वध किया ॥ २-४ ॥
नारदजीने कहा- ब्रह्मन् ! आपने पहले यह
बात कही थी कि दक्षकी पुत्री सती ही मरकर फिर
हिमवान्की पुत्री हुई थीं। (अब) इसे आप विस्तारसे
सुनाइये। पार्वतीके शरीर-कोशसे जिस प्रकार वे कौशिकी
प्रकट हुईं और फिर उन्होंने शुम्भ तथा निशुम्भ नामके
बड़े असुरोंका जैसे वध किया था - इन सभी बातोंको
विस्तारसे कहिये। ये शुम्भ और निशुम्भ नामसे विख्यात
वीर किसके पुत्र थे, इसका ठीक-ठीक विस्तारसे वर्णन
कीजिये ॥ ५-७ ॥
पुलस्त्यजी बोले- मुने ! (अच्छा,) अब मैं फिर
आपसे पार्वतीकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ,
आप ध्यान देकर (सम्बद्ध) स्कन्दके जन्मकी शाश्वत
(नित्य, सदा विराजनेवाली) कथा सुनें! सतीके देह
त्याग कर देनेपर रुद्र भगवान् निराश्रय विधुर हो गये
एवं ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए तपस्या करने लगे।
वे शङ्करजी (पहले) दैत्योंके दर्पको चूर्ण करनेवाले
देवताओंके सेनानी थे। परंतु अब उन्होंने (रुद्र-रूपका
त्याग कर) शिव-स्वरूप धारण कर लिया तथा तपमें
लगकर सेनापति (स्थायी)-पदका भी परित्याग कर
दिया। फिर तो देवताओंके ऊपर उनके सेनापति शिवसे
विरहित हो जानेके कारण दानवश्रेष्ठ महिषने बलपूर्वक
आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया ॥ ८-११ ॥
(जब देवसमुदाय पराजित हो गया) तब पराजित
हुए देवतालोग शरण-प्राप्तिकी खोजमें देवेश्वर भगवान्
श्रीविष्णुके दर्शनार्थ श्वेतद्वीप गये। उस समय भगवान्
विष्णु इन्द्र आदि देवताओंको आये हुए देखकर हँसे
और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले- मालूम होता
है कि आपलोग असुरोंके स्वामी दुरात्मा महिषसे हार
गये हैं, जिसके कारण इस प्रकार एक साथ मिलकर
मेरे पास आये हैं? श्रेष्ठ देवताओ! अब आपलोगोंकी
भलाईके लिये मैं जो बात कहता हूँ, उसे आप सब
सुनिये और उसे (यथावत्) आचरण कीजिये। उसके
सहारे आपकी निश्चय विजय होगी ॥ १२-१५ ॥
अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| य एते पितरो दिव्यास्त्वग्निष्वात्तेति विश्रुताः ।<br>अमीषां मानसी कन्या मेना नाम्नाऽस्ति देवताः ॥ १६<br><br>तामाराध्य महातिथ्यां श्रद्धया परयाऽमराः ।<br>प्रार्थयध्वं सतीं मेनां प्रालेयाद्रेरिहार्थतः ॥ १७<br><br>तस्यां सा रूपसंयुक्ता भविष्यति तपस्विनी ।<br>दक्षकोपाद् यया मुक्तं मलवज्जीवितं प्रियम् ॥ १८<br><br>सा शङ्करात् स्वतेजोऽंशं जनयिष्यति यं सुतम् ।<br>स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं सपदानुगम् ॥ १९<br><br>तस्माद् गच्छत पुण्यं तत् कुरुक्षेत्रं महाफलम् ।<br>तत्र पृथूदके तीर्थे पूज्यन्तां पितरोऽव्ययाः ॥ २०<br><br>महातिथ्यां महापुण्ये यदि शत्रुपराभवम् ।<br>जिहासतात्मनः सर्वे इत्थं वै क्रियतामिति ॥ २१ | देवगण ! जो ये 'अग्निष्वात्त' नामसे प्रसिद्ध दिव्य पितर हैं, उनकी मेना नामकी एक मानसी कन्या है। देववृन्द ! आपलोग अत्यन्त श्रद्धासे अमावास्याको सती मेनाकी (यथाविधि) आराधना करें तथा उनसे हिमालयकी पत्नी बननेके लिये प्रार्थना करें। उन्हीं मेनासे (एक) तपस्विनी रूपवती कन्या उत्पन्न होगी, जिसने दक्षके ऊपर कोपकर अपने प्रिय जीवनका मलके समान परित्याग कर दिया था। वे शिवजीके तेजके अंशरूप जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगी वह दैत्योंमें श्रेष्ठ महिषको उसकी सेनासहित मार डालेगा ॥ १६–१९ ॥<br><br>अतः आपलोग महान् फल देनेवाले, पवित्र कुरुक्षेत्रमें जायें एवं वहाँ 'पृथूदक' नामके तीर्थमें नित्य ही अग्निष्वात्त नामके पितरोंकी पूजा करें। यदि आपलोग अपने शत्रुंकी पराजय चाहते हैं तो सब कुछ छोड़कर अमावास्याको उस परम पवित्र तीर्थमें इसी (निर्दिष्ट) कार्यको सम्पन्न करें ॥ २०–२१ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः ।<br>कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पप्रच्छुः परमेश्वरम् ॥ २२ | पुलस्त्यजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने हाथ जोड़कर उन परमात्मासे पूछा — ॥ २२ ॥ |
| देवा ऊचुः<br>कोऽयं कुरुक्षेत्र इति यत्र पुण्यं पृथूदकम् ।<br>उद्भवं तस्य तीर्थस्य भगवान् प्रब्रवीतु नः ॥ २३<br><br>केयं प्रोक्ता महापुण्या तिथीनामुत्तमा तिथिः ।<br>यस्यां हि पितरो दिव्याः पूज्याऽस्माभिः प्रयत्नतः ॥ २४<br><br>ततः सुराणां वचनान्मुरारिः कैटभार्दनः ।<br>कुरुक्षेत्रोद्भवं पुण्यं प्रोक्तवांस्तां तिथीमपि ॥ २५ | देवताओंने पूछा— भगवन्! यह कुरुक्षेत्र तीर्थ कौन है, जहाँ पृथूदक तीर्थ है ? आप हमलोगोंको उस तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें बतायें। और, वह पवित्र उत्तम तिथि कौन-सी है जिसमें हम सब दिव्य पितरोंकी पूजा प्रयत्नपूर्वक कर सकें। तब भगवान् विष्णुने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर उनसे कुरुक्षेत्रकी पवित्र उत्पत्ति तथा उस उत्तम तिथिका भी वर्णन किया (जिसमें पूजा करनेकी बात कही थी) ॥ २३–२५ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>सोमवंशोद्भवो राजा ऋक्षो नाम महाबलः ।<br>कृतस्यादौ समभवदृक्षात् संवरणोऽभवत् ॥ २६<br><br>स च पित्रा निजे राज्ये बाल एवाभिषेचितः ।<br>बाल्येऽपि धर्मनिरतो मद्भक्तश्च सदाऽभवत् ॥ २७<br><br>पुरोहितस्तु तस्यासीद् वसिष्ठो वरुणात्मजः ।<br>स चास्याध्यापयामास साङ्गान् वेदानुदारधीः ॥ २८<br><br>ततो जगाम चारण्यं त्वनध्याये नृपात्मजः ।<br>सर्वकर्मसु निक्षिप्य वसिष्ठं तपसां निधिम् ॥ २९ | श्रीभगवान्ने कहा— सत्ययुगके प्रारम्भमें सोमवंशमें ऋक्षनामके एक महाबलवान् राजा उत्पन्न हुए। उन ऋक्षसे संवरणकी उत्पत्ति हुई। पिताने उसे बचपनमें ही राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह बाल्यकालमें भी सदा धर्मनिष्ठ एवं मेरा भक्त था। वरुणके पुत्र वसिष्ठ उसके पुरोहित थे। उन्होंने उसे अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंको पढ़ाया। एक दिनकी बात है कि अनध्याय (छुट्टी) रहनेपर वह राजपुत्र (संवरण) तपोनिधि वसिष्ठको सभी कार्य सौंपकर वनमें चला गया ॥ २६–२९ ॥ |