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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

४५- सांनिहितसर—स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन

अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८३

तिरालीसवाँ अध्याय

स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर

ऋषय ऊचुः(स्थाणुतीर्थमें जाने तथा स्थाणुवटके दर्शनसे मुक्ति-प्राप्ति होनेकी बात सुननेके बाद) ऋषियोंने पूछा— महामुने! आप स्थाणुतीर्थ एवं स्थाणुवटके माहात्म्य तथा सांनिहित्य सरोवरकी उत्पत्ति और इन्द्रद्वारा उसके धूलसे भरे जानेके कारणका वर्णन करें। (इसी प्रकार) लिङ्गोंके दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा स्पर्शसे होनेवाले फल और सरोवरके माहात्म्यका भी पूर्णतः वर्णन करें॥ १-२॥
स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं वटस्य च महामुने।<br>सांनिहत्यसरोत्पत्तिं पूरणं पांशुना ततः॥ १<br>लिङ्गानां दर्शनात् पुण्यं स्पर्शनेन च किं फलम्।<br>तथैव सरमाहात्म्यं ब्रूहि सर्वमशेषतः॥ २
लोमहर्षण उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयः सर्वे पुराणं वामनं महत्।<br>यच्छ्रुत्वा मुक्तिमाप्नोति प्रसादाद् वामनस्य तु॥ ३<br>सनत्कुमारमासीनं स्थाणोर्वटसमीपतः।<br>ऋषिभिर्बालखिल्यैराद्यैर्ब्रह्मपुत्रैर्महात्मभिः ॥ ४<br>मार्कण्डेयो मुनिस्तत्र विनयेनाभिगम्य च।<br>पप्रच्छ सरमाहात्म्यं प्रमाणं च स्थितिं तथा॥ ५लोमहर्षणजी बोले— मुनियो! आपलोग महान् वामनपुराणको श्रवण करें, जिसका श्रवण कर मनुष्य वामनभगवान्‌की कृपासे मुक्ति पा लेता है। (एक समय) ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमार महात्मा बालखिल्य आदि ऋषियोंके साथ स्थाणुवटके पास बैठे हुए थे। महर्षि मार्कण्डेयने उनके निकट जाकर नम्रतापूर्वक सरोवरके माहात्म्य, उसके विस्तार और स्थितिके विषयमें पूछा—॥ ३-५॥
मार्कण्डेय उवाच<br>ब्रह्मपुत्र महाभाग सर्वशास्त्रविशारद।<br>ब्रूहि मे सरमाहात्म्यं सर्वपापक्षयावहम्॥ ६<br>कानि तीर्थानि दृश्यानि गुह्यानि द्विजसत्तम।<br>लिङ्गानि ह्यतिपुण्यानि स्थाणोर्यानि समीपतः॥ ७<br>येषां दर्शनमात्रेण मुक्तिं प्राप्नोति मानवः।<br>वटस्य दर्शनं पुण्यमुत्पत्तिं कथयस्व मे॥ ८<br>प्रदक्षिणायां यत्पुण्यं तीर्थस्नानेन यत्फलम्।<br>गुह्येषु चैव दृष्टेषु यत्पुण्यमभिजायते॥ ९<br>देवदेवो यथा स्थाणुः सरोमध्ये व्यवस्थितः।<br>किमर्थं पांशुना शक्रस्तीर्थं पूरितवान् पुनः॥ १०<br>स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं चक्रतीर्थस्य यत्फलम्।<br>सूर्यतीर्थस्य माहात्म्यं सोमतीर्थस्य ब्रूहि मे॥ ११मार्कण्डेयजीने कहा (पूछा)— सर्वशास्त्रविशारद महाभाग ब्रह्मपुत्र (सनत्कुमार)! आप मुझसे सभी पापोंके नष्ट करनेवाले सरोवरके माहात्म्यको कहिये। द्विजश्रेष्ठ! स्थाणुतीर्थके पास कौन-कौन-से तीर्थ दृश्य हैं और कौन-कौन-से अदृश्य और कौन-से लिङ्ग अत्यन्त पवित्र हैं, जिनका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। मुने! आप स्थाणुवटके दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा उसकी उत्पत्तिके विषयमें भी कहिये—बताइये। इनकी प्रदक्षिणा करनेसे होनेवाले पुण्य, तीर्थमें स्नान करनेसे मिलनेवाले फल एवं गुप्त तीर्थों तथा प्रकट तीर्थोंके दर्शनसे मिलनेवाले पुण्यका भी वर्णन करें। प्रभो! सरोवरके मध्यमें देवाधिदेव स्थाणु (शिव) किस प्रकार स्थित हुए और किस कारणसे इन्द्रने इस तीर्थको पुनः धूलिसे भर दिया? आप स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, चक्रतीर्थका फल एवं सूर्यतीर्थ तथा सोमतीर्थका माहात्म्य—इन
१८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४३
शंकरस्य च गुह्यानि विष्णोः स्थानानि यानि च।<br>कथयस्व महाभाग सरस्वत्याः सविस्तरम्॥ १२सबको मुझसे कहिये। महाभाग! सरस्वतीके निकट शंकर तथा विष्णुके जो-जो गुप्त स्थान हैं उनका भी आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
ब्रूहि देवाधिदेवस्य माहात्म्यं देव तत्त्वतः।<br>विरिञ्चस्य प्रसादेन विदितं सर्वमेव च॥ १३देव! देवाधिदेवके माहात्म्यको आप भलीभाँति बतावें; क्योंकि ब्रह्माकी कृपासे आपको सब कुछ विदित है॥ ६—१३॥
लोमहर्षण उवाचलोमहर्षणने कहा (उत्तर दिया)—
मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा ब्रह्मात्मा स महामुनिः।<br>अतिभक्त्या तु तीर्थस्य प्रवणीकृतमानसः॥ १४मार्कण्डेयके वचनको सुनकर ब्रह्मस्वरूप महामुनिका मन उस तीर्थके प्रति अत्यन्त भक्ति-प्रवण होनेसे गद्गद हो गया।
पर्यङ्कं शिथिलीकृत्वा नमस्कृत्वा महेश्वरम्।<br>कथयामास तत्सर्वं यच्छ्रुतं ब्रह्मणः पुरा॥ १५उन्होंने आसनसे उठकर भगवान् शंकरको प्रणाम किया तथा प्राचीन कालमें ब्रह्मासे इसके विषयमें जो कुछ सुना था उन सबका वर्णन किया॥ १४-१५॥
सनत्कुमार उवाचसनत्कुमारने कहा—
नमस्कृत्य महादेवमीशानं वरदं शिवम्।<br>उत्पत्तिं च प्रवक्ष्यामि तीर्थानां ब्रह्मभाषिताम्॥ १६मैं कल्याणकर्ता, वरदानी महादेव ईशानको नमस्कार कर ब्रह्मासे कहे हुए तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन करूँगा।
पूर्वमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>बृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजसम्भवम्॥ १७प्राचीन कालमें जब महाप्रलय हो गया और सर्वत्र केवल जल-ही-जल हो गया एवं उसमें समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया, तब प्रजाओंके बीजस्वरूप एक 'अण्ड' उत्पन्न हुआ।
तस्मिन्नण्डे स्थितो ब्रह्मा शयनायोपचक्रमे।<br>सहस्रयुगपर्यन्तं सुप्त्वा स प्रत्यबुध्यत॥ १८ब्रह्मा उस अण्डमें स्थित थे। उन्होंने उसमें अपने सोनेका उपक्रम किया। फिर तो वे हजारों युगोंतक सोते रहे। उसके बाद जगे।
सुप्तोत्थितस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमपश्यत।<br>सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च॥ १९ब्रह्मा जब सोकर उठे, तब उन्होंने संसारको शून्य देखा। (जब उन्होंने संसारमें कुछ भी नहीं देखा) तब रजोगुणसे आविष्ट हो गये और सृष्टिके विषयमें विचार करने लगे॥ १६—१९॥
रजः सृष्टिगुणं प्रोक्तं सत्त्वं स्थितिगुणं विदुः।<br>उपसंहारकाले च तमोगुणः प्रवर्तते॥ २०रजोगुणको सृष्टिकारक तथा सत्त्वगुणको स्थितिकारक माना गया है। उपसंहार करनेके समयमें तमोगुणकी प्रवृत्ति होती है।
गुणातीतः स भगवान् व्यापकः पुरुषः स्मृतः।<br>तेनेदं सकलं व्याप्तं यत्किंचिज्जीवसंज्ञितम्॥ २१परंतु भगवान् वास्तवमें व्यापक एवं गुणातीत हैं। वे पुरुष नामसे कहे जाते हैं। जीव नामसे निर्दिष्ट सारे पदार्थ उन्हींसे ओतप्रोत हैं।
स ब्रह्मा स च गोविन्द ईश्वरः स सनातनः।<br>यस्तं वेद महात्मानं स सर्वं वेद मोक्षवित्॥ २२वे ही ब्रह्मा हैं, वे ही विष्णु हैं और वे ही सनातन महेश्वर हैं। मोक्षके ज्ञानी जिस प्राणीने उन महान् आत्माको समझ लिया, उसने सब कुछ जान लिया।
किं तेषां सकलैस्तीर्थैराश्रमैर्वा प्रयोजनम्।<br>येषामनन्तकं चित्तमात्मन्येव व्यवस्थितम्॥ २३जिस मनुष्यका अनन्त (बहुमुखी) चित्त उन परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित है, उनके लिये सारे तीर्थ एवं आश्रमोंसे क्या प्रयोजन?॥ २०—२३॥
आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था<br>सत्योदका शीलसमाधियुक्ता।यह आत्मारूपी नदी शील और समाधिसे युक्त है। इसमें संयमरूपी पवित्र तीर्थ है, जो सत्यरूपी जलसे

अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८५
तस्यां स्नातः पुण्यकर्मा पुनाति
न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा ॥ २४
एतत्प्रधानं पुरुषस्य कर्म
यदात्मसम्बोधसुखे प्रविष्टम्।
ज्ञेयं तदेव प्रवदन्ति सन्त-
स्तत्प्राप्य देही विजहाति कामान् ॥ २५
नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं
यथैकता समता सत्यता च।
शीले स्थितिर्दण्डविधानवर्जन-
मक्रोधनश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥ २६
एतद् ब्रह्म समासेन मयोक्तं ते द्विजोत्तम।
यज्ज्ञात्वा ब्रह्म परमं प्राप्स्यसि त्वं न संशयः ॥ २७
इदानीं शृणु चोत्पत्तिं ब्रह्मणः परमात्मनः।
इमं चोदाहरन्त्येव श्लोकं नारायणं प्रति ॥ २८
आपो नारा वै तनव इत्येवं नाम शुश्रुमः।
तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः ॥ २९
विबुद्धः सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतं जगत्।
अण्डं बिभेद भगवांस्तस्मादोमित्यजायत ॥ ३०
ततो भूरभवत् तस्माद् भुव इत्यपरः स्मृतः।
स्वः शब्दश्च तृतीयोऽभूद् भूर्भुवः स्वेति संज्ञितः ॥ ३१
तस्मात्तेजः समभवत् तत्सवितुर्वरेण्यं यत्।
उदकं शोषयामास यत्तेजोऽण्डविनिःसृतम् ॥ ३२
तेजसा शोषितं शेषं कललत्वमुपागतम्।
कललाद् बुद्बुदं ज्ञेयं ततः काठिन्यतां गतम् ॥ ३३
काठिन्याद् धरणी ज्ञेया भूतानां धारिणी हि सा।
यस्मिन् स्थाने स्थितं ह्याण्डं तस्मिन् संनिहितं सरः ॥ ३४
यदाद्यं निःसृतं तेजस्तस्मादादित्य उच्यते।
अण्डमध्ये समुत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३५
उल्बं तस्याभवन्मेरुर्जरायुः पर्वताः स्मृताः।
गर्भोदकं समुद्राश्च तथा नद्यः सहस्रशः ॥ ३६
परिपूर्ण है। जो पुण्यात्मा इस (नदी)-में स्नान करता है,
वह पवित्र हो जाता है, (पिये जानेवाले सामान्य) जलसे
अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती। इसलिये पुरुषका मुख्य
कर्तव्य है कि वह आत्मज्ञानरूपी सुखमें प्रविष्ट रहे।
महात्मा लोग उसीको 'ज्ञेय' कहते हैं। शरीर धारण
करनेवाला देही जब उसे पा लेता है, तब सभी
इच्छाओंको छोड़ देता है। ब्राह्मणके लिये एकता,
समता, सत्यता, मर्यादामें स्थिति, दण्ड-विधानका त्याग,
क्रोध न करना एवं (सांसारिक) क्रियाओंसे विराग ही
धन है, इनके समान उनके लिये कोई अन्य धन नहीं
है। द्विजोत्तम! मैंने थोड़ी मात्रामें तुमसे यह जो ज्ञानके
विषयमें कहा है, इसे जानकर तुम निःसंदेह परम
ब्रह्मको प्राप्त करोगे। अब तुम परमात्मा ब्रह्मकी
उत्पत्तिके विषयमें सुनो। उस नारायणके विषयमें लोग
इस श्लोकका उदाहरण दिया करते हैं- ॥ २४-२८ ॥
'आप्' (जल) ही को 'नार', (एवं परमात्मा)-
को 'तनु' - ऐसा हमने सुन रखा है। वे (परमात्मा)
उसमें शयन करते हैं, जिससे वे (शब्दव्युत्पत्तिसे)
'नारायण' शब्दसे स्मरण किये गये हैं। जलमें सोनेके
बाद जाग जानेपर उन्होंने जगत्को अपनेमें प्रविष्ट
जानकर अण्डको तोड़ दिया, उससे 'ॐ' शब्दकी
उत्पत्ति हुई। इसके बाद उससे (पहली बार) भूः,
दूसरी बार भुवः एवं तीसरी बार स्वःकी उत्पत्ति
(ध्वनि) हुई। इन तीनोंका नाम क्रमशः मिलकर
'भूर्भुवःस्वः' हुआ। उस सविता देवताका जो वरेण्य
तेज है, वह उसीसे उत्पन्न हुआ। अण्डसे जो तेज
निकला, उसने जलको सुखा दिया ॥ २९-३२ ॥
तेजसे जलके सोखे जानेपर शेष जल कललकी
आकृतिमें बदल गया। कललसे बुद्बुद हुआ और उसके
बाद वह कठोर हो गया। कठोर हो जानेके कारण वह
बुद्बुद भूतोंको धारण करनेवाली धरणी बन गया। जिस
स्थानपर अण्ड स्थित था, वहीं संनिहित नामका सरोवर
है। तेजके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण उसे 'आदित्य'
नामसे कहा जाता है। फिर सारे संसारके पितामह ब्रह्मा
अण्डके मध्यमें उत्पन्न हुए। उस अण्डका उल्ब
(गर्भका आवरण) मेरु पर्वत है एवं अन्य पर्वत उसके
जरायु (झिल्ली) माने जाते हैं। समुद्र एवं सहस्रों नदियाँ