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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

२२- कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य

अध्याय २० ] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०५
बीसवाँ अध्याय
भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर-वध एवं देवीका
शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना
नारद उवाच
कथं कात्यायनी देवी सानुगं महिषासुरम्।
सवाहनं हतवती तथा विस्तरतो वद ॥ १
एतच्च संशयं ब्रह्मन् हृदि मे परिवर्तते।
विद्यमानेषु शस्त्रेषु यत्पद्भ्यां तममर्दयत् ॥ २
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्।
वृत्तां देवयुगस्यादौ पुण्यां पापभयापहाम् ॥ ३
एवं स नमरः क्रुद्धः समापतत वेगवान्।
सगजाश्वरथो ब्रह्मन् दृष्टो देव्या यथेच्छया ॥ ४
ततो बाणगणैर्दैत्यः समानम्यथ कार्मुकम्।
ववर्ष शैलं धारौघैर्द्यौरिवाम्बुदवृष्टिभिः ॥ ५
शरवर्षेण तेनाथ विलोक्याद्रिं समावृतम्।
क्रुद्धा भगवती वेगादाचकर्ष धनुर्वरम् ॥ ६
तद्धनुर्दानवे सैन्ये दुर्गया नामितं बलात्।
सुवर्णपृष्ठं विबभौ विद्युदम्बुधरेष्विव ॥ ७
बाणैः सुररिपूनन्यान् खड्गेनान्यान् शुभव्रत।
गदया मुसलेनान्यांश्चर्मणाऽन्यानपातयत् ॥ ८
एकोऽप्यसौ बहून् देव्याः केसरी कालसंनिभः ।
विधुन्वन् केसरसटां निष्पूदयति दानवान् ॥ ९
कुलिशाभिहता दैत्याः शक्त्या निर्भिन्नवक्षसः ।
लाङ्गलैर्दारितग्रीवा विनिकृत्ताः परश्वथैः ॥ १०
दण्डनिर्भिन्नशिरसश्चक्रविच्छिन्नबन्धनाः ।
चेलुः पेतुश्च मम्लुश्च तत्यजुश्चापरे रणम् ॥ ११
नारदजीने पूछा - (पुलस्त्यजी !) दुर्गादेवीने सेना
एवं वाहनोंके सहित महिषासुरको किस प्रकार मार
डाला, इसे आप विस्तारसे कहें। मेरे मनमें यह शंका
घर कर गयी है कि शस्त्रोंके विद्यमान होते हुए भी
देवीने पैरोंसे उसे क्यों मारा ? ॥ १-२॥
[फिर नारदजीके प्रश्नको सुनकर] पुलस्त्यजीने
कहा- नारदजी ! देवयुगके आदिमें घटित तथा पाप एवं
भयको दूर करनेवाली इस प्राचीन एवं पवित्र कथाको
आप सावधान होकर सुनिये। एक बार इसी प्रकार
(अर्थात्) पूर्ववर्णित रीतिसे क्रुद्ध होकर नमरने भी हाथी,
घोड़े और रथोंके साथ वेगपूर्वक देवीके ऊपर आक्रमण
कर दिया था। फिर देवीने भी उसे भलीभाँति देखा। इसके
बाद दैत्यने अपने धनुषको झुकाकर (चढ़ाकर) विन्ध्य
पर्वतके ऊपर इस प्रकारसे बाण-वर्षा की जैसे आकाशसे
बादल (उसपर) धारा-प्रवाह (मूसलाधार) जलवृष्टि करता
हो। उसके बाद उस दैत्यकी बाण-वर्षासे पर्वतको सर्वथा
ढका देखकर देवीको बड़ा क्रोध हुआ और तब उन्होंने
वेगपूर्वक झट विशाल धनुषको चढ़ा लिया ॥ ३-६ ॥
श्रीदुर्गाजीद्वारा चढ़ाया गया सोनेकी पीठवाला वह
धनुष दानवी-सेनामें इस प्रकार चमक उठा, जैसे
बादलोंमें बिजली चमकती है। शुभ व्रतवाले श्रीनारदजी !
श्रीदुर्गाजीने कुछ दैत्योंको बाणोंसे, कुछको तलवारसे,
कुछको गदासे, कुछको मुसलसे और कुछ दैत्योंको
ढाल चलाकर ही मार डाला। कालके समान देवीके
सिंहने (भी) अपनी गर्दनके बालोंको झाड़ते हुए
अकेला ही अनेकों दैत्योंका संहार कर डाला। देवीने
कुछ दैत्योंको वज्रसे आहत कर दिया, कुछ दैत्योंके
वक्षःस्थलको शक्तिसे फाड़ डाला, कुछके गर्दनको
हलसे विदीर्ण कर कुछको फरसेसे काट डाला, कुछके
सिरको दण्डसे फोड़ दिया तथा कुछ दैत्योंके शरीरके
संधि-स्थानोंको चक्रसे छिन्न-भिन्न कर दिया। कुछ
पहले ही चले गये, कुछ गिर गये, कुछ मूर्च्छित हो गये
और कुछ युद्धभूमि छोड़कर भाग गये ॥ ७-११॥

१०६श्रीवामनपुराण[ अध्याय २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ते वध्यमाना रौद्र्या दुर्गया दैत्यदानवाः।<br>कालरात्रिं मन्यमाना दुद्रुवुर्भयपीडिताः॥ १२<br>सैन्याग्रं भग्नमालोक्य दुर्गामग्रे तथा स्थिताम्।<br>दृष्ट्वा जगाम नमरो मत्तकुञ्जरसंस्थितः॥ १३<br>समागम्य च वेगेन देव्याः शक्तिं मुमोच ह।<br>त्रिशूलमपि सिंहाय प्राहिणोद् दानवो रणे॥ १४<br>तावापतन्तौ देव्या तु हुंकारेणाथ भस्मसात्।<br>कृतावथ गजेन्द्रेण गृहीतो मध्यतो हरिः॥ १५भयंकर रूपवाली दुर्गाद्वारा मारे जा रहे दैत्य एवं दानव भयसे व्याकुल हो गये तथा वे उन्हें कालरात्रिके समान मानते हुए डरसे भाग चले। सेनाके अग्र (प्रधान) भागको नष्ट तथा अपने सम्मुख दुर्गाको स्थित देखकर नमर मतवाले हाथीपर चढ़कर आगे आया। उस दानवने युद्धमें देवीके ऊपर शक्तिसे कसकर प्रहार किया एवं सिंहके ऊपर त्रिशूल चलाया। (किंतु) देवीने उन दोनों अस्त्रोंको आते देख हुंकारसे ही उन्हें भस्म कर डाला। इधर नमरके हाथीने (सूँड़से) सिंहकी कमर पकड़ ली॥ १२-१५॥
अथोत्पत्य च वेगेन तलेनाहत्य दानवम्।<br>गतासुः कुञ्जरस्कन्धात् क्षिप्य देव्यै निवेदितः॥ १६<br>गृहीत्वा दानवं मध्ये ब्रह्मन् कात्यायनी रुषा।<br>सव्येन पाणिना भ्राम्य वादयत् पटहं यथा॥ १७<br>ततोऽट्टहासं मुमुचे तादृशे वाद्यतां गते।<br>हास्यात् समुद्भवंस्तस्या भूता नानाविधाऽद्भुताः॥ १८<br>केचिद् व्याघ्रमुखा रौद्रा वृकाकारास्तथा परे।<br>हयास्या महिषास्याश्च वराहवदनाः परे॥ १९इसपर सिंहने तेजीसे उछलकर नमर दानवको पंजेसे मारकर उसके प्राण ले लिये और हाथीके कंधेसे उसे नीचे गिराकर देवीके आगे रख दिया। नारदजी! देवी कात्यायनी क्रोधसे उस दैत्यको मध्यमें पकड़कर तथा बायें हाथसे घुमाकर ढोलके समान बजाने लगीं और उसे अपना बाजा बनाकर उन्होंने जोरसे अट्टहास किया। उनके हँसनेसे अनेक प्रकारके अद्भुत भूत उत्पन्न हो गये! कोई-कोई (भूत) व्याघ्रके समान भयंकर मुखवाले थे, किसीकी आकृति भेड़ियेके समान थी, किसीका मुख घोड़ेके तुल्य और किसीका मुख भैंसे-जैसा एवं किसीका सूकरके समान मुँह था॥ १६-१९॥
आखुकुक्कुटवक्त्राश्च गोऽजाविकमुखास्तथा।<br>नानावक्त्राक्षिचरणा नानायुधधरास्तथा॥ २०<br>गायन्त्यन्ये हसन्त्यन्ये रमन्त्यन्ये तु संघशः।<br>वादयन्त्यपरे तत्र स्तुवन्त्यन्ये तथाम्बिकाम्॥ २१<br>सा तैर्भूतगणैर्देवी सार्द्धं तद्दानवं बलम्।<br>शातयामास चाक्रम्य यथा सस्यं महाशनिः॥ २२<br>सेनाग्रे निहते तस्मिन् तथा सेनाग्रगामिनि।<br>चिक्षुरः सैन्यपालस्तु योधयामास देवताः॥ २३उनके मुँह चूहे, मुर्गे (कुक्कुट), गाय, बकरा और भेड़के मुखोंके समान थे। कई नाना प्रकारके मुख, आँख एवं चरणोंवाले थे तथा वे नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे। उनमें कुछ तो समूह बनाकर गाने लगे, कुछ हँसने लगे और कुछ रमण करने लगे तथा कुछ बाजा बजाने लगे एवं कुछ देवीकी स्तुति करने लगे। देवीने उन भूतगणोंके साथ उस दानव-सेनापर आक्रमण कर उसे इस प्रकार तहस-नहस कर दिया, जैसे भारी वज्रके समान ओलोंके गिरनेसे खेतीका संहार हो जाता है। इस प्रकार सेनाके अग्रभाग तथा सेनापतिके मारे जानेपर अब सेनापति चिक्षुर देवताओंसे भिड़ गया—युद्ध करने लगा॥ २०-२३॥
कार्मुकं दृढमाकर्णमाकृष्य रथिनां वरः।<br>ववर्ष शरजालानि यथा मेघो वसुंधराम्॥ २४रथियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यने अपने मजबूत धनुषको अपने कानोंतक चढ़ाकर उससे बाणोंकी इस प्रकार वर्षा की जैसे मेघ पृथ्वीपर (घनघोर) जल बरसाते हैं। परंतु

अध्याय २०] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तान् दुर्गा स्वशरैश्छित्त्वा शरसंघान् सुपर्वभिः।<br>सौवर्णपुङ्खानपराञ्शराञ्जग्राह षोडश॥ २५<br><br>ततश्चतुर्भिस्तु तुरङ्गमानपि भामिनी।<br>हत्वा सारथिमेकेन ध्वजमेकेन चिच्छिदे॥ २६<br><br>ततस्तु सशरं चापं चिच्छेद्यैकेषुणाऽम्बिका।<br>छिन्ने धनुषि खड्गं च चर्म चादत्तवान् बली॥ २७दुर्गाने भी सुन्दर पर्वों (गाँठों)-वाले अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और फिर सुवर्णसे निर्मित पंखवाले सोलह बाणोंको अपने हाथोंमें ले लिया। उन्होंने क्रुद्ध होकर चार बाणोंसे उसके चार घोड़ोंको और एकसे सारथीको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजाके दो टुकड़े कर दिये। फिर अम्बिकाने एक बाणसे उसके बाणसहित धनुषको काट डाला। धनुष कट जानेपर बलवान् चिक्षुरने ढाल और तलवार उठा ली॥ २४—२७॥
तं खड्गं चर्मणा सार्धं दैत्यस्याधुन्वतो बलात्।<br>शरैश्चतुर्भिश्चिच्छेद ततः शूलं समाददे॥ २८<br><br>समुद्भ्राम्य महच्छूलं संप्राद्रवदथाम्बिकाम्।<br>क्रोष्टुको मुदितोऽरण्ये मृगराजवधूं यथा॥ २९<br><br>तस्याभिपततः पादौ करौ शीर्षं च पञ्चभिः।<br>शरैश्चिच्छेद संक्रुद्धा न्यपतन्निहतोऽसुरः॥ ३०<br><br>तस्मिन् सेनापतौ क्षुणे तदोग्रास्यो महासुरः।<br>समाद्रवत वेगेन करालास्यश्च दानवः॥ ३१वह ढाल और तलवारको जोर लगाकर घुमा ही रहा था कि देवीने चार बाणोंसे उन्हें काट डाला। इसपर उस दैत्यने शूल ले लिया। महान् शूलको घुमाकर वह अम्बिकाकी ओर इस प्रकार दौड़ा, जैसे वनमें सियार आनन्दमग्न होकर सिंहिनीकी ओर दौड़े! पर देवीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पाँच बाणोंसे उस असुरके दोनों हाथों, दोनों पैरों एवं मस्तकको काट डाला, जिससे वह असुर मरकर गिर पड़ा। उस सेनापतिके मरनेपर उग्रास्य नामका महान् असुर तथा करालास्य नामका दानव—ये दोनों तेजीसे उनकी ओर दौड़े॥ २८—३१॥
बाष्कलश्चोद्धतश्चैव उदग्राख्योऽग्रकार्मुकः।<br>दुर्द्धरो दुर्मुखश्चैव बिडालनयनोऽपरः॥ ३२<br><br>एतेऽन्ये च महात्मानो दानवा बलिनां वराः।<br>कात्यायनीमाद्रवन्त नानाशस्त्रास्त्रपाणयः॥ ३३<br><br>तान् दृष्ट्वा लीलया दुर्गा वीणां जग्राह पाणिना।<br>वादयामास हसती तथा डमरुकं वरम्॥ ३४<br><br>यथा यथा वादयते देवी वाद्यानि तानि तु।<br>तथा तथा भूतगणा नृत्यन्ति च हसन्ति च॥ ३५बाष्कल, उद्धत, उदग्र, उग्रकार्मुक, दुर्द्धर, दुर्मुख तथा बिडालाक्ष—ये तथा अन्य अनेक अत्यन्त बली एवं श्रेष्ठ दैत्य शस्त्र और अस्त्र लेकर दुर्गाकी ओर दौड़ पड़े। देवी दुर्गाने उन्हें देखा और वे लीलापूर्वक हाथोंमें वीणा एवं श्रेष्ठ डमरू लेकर हँसती हुई उन्हें बजाने लगीं। देवी उन वाद्योंको ज्यों-ज्यों बजाती जाती थीं, त्यों-त्यों सभी भूत भी नाचते और हँसते थे॥ ३२—३५॥
ततोऽसुराः शस्त्रधराः समभ्येत्य सरस्वतीम्।<br>अभ्यघ्नंस्तांश्च जग्राह केशेषु परमेश्वरी॥ ३६<br><br>प्रगृह्य केशेषु महासुरांस्तान्<br>उत्पत्य सिंहात्तु नगस्य सानुम्।<br>ननर्त वीणां परिवादयन्ती<br>पपौ च पानं जगतो जनित्री॥ ३७<br><br>ततस्तु देव्या बलिनो महासुरा<br>दोर्दण्डनिर्धूतविशीर्णदर्पाः।<br>विस्रस्तवस्त्रा व्यसवश्च जाताः<br>ततस्तु तान् वीक्ष्य महासुरेन्द्रान्॥ ३८<br><br>देव्या महौजा महिषासुरस्तु<br>व्यद्रावयद् भूतगणान् खुराग्रैः।<br>तुण्डेन पुच्छेन तथोरसाऽन्यान्<br>निःश्वासवातेन च भूतसंघान्॥ ३९अब असुर शस्त्र लेकर महासरस्वतीरूपा दुर्गाके पास जाकर उनपर प्रहार करने लगे। पर परमेश्वरीने (तुरंत) उनके बालोंको जोरके साथ पकड़ लिया। उन महासुरोंका केश पकड़कर और फिर सिंहसे उछलकर पर्वत-शृङ्गपर जाकर जगज्जननी दुर्गा वीणा-वादन करती हुई मधुपान करने लगीं। तभी देवीने अपने बाहुदण्डोंसे सभी असुरोंको मारकर उनके घमण्डको चूर कर दिया। उनके वस्त्र शरीरसे खिसक पड़े और वे प्राणरहित हो गये। यह देखकर महाबली महिषासुर अपने खुरके अग्रभागसे, तुण्डसे, पुच्छसे, वक्षःस्थलसे तथा निःश्वास-वायुसे देवीके भूतगणोंको भगाने लगा॥ ३६—३९॥

१०८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २०
नादेन चैवाशनिसंनिभेन
विषाणकोट्या त्वपरान् प्रमथ्य।
दुद्राव सिंहं युधि हन्तुकामः
ततोऽम्बिका क्रोधवशं जगाम ॥ ४०
ततः स कोपादथ तीक्ष्णशृङ्गः
क्षिप्रं गिरीन् भूमिमशीर्णयच्च।
संक्षोभयंस्तोयनिधीन् घनांश्च
विध्वंसयन् प्राद्रवताथ दुर्गाम् ॥ ४१
सा चाथ पाशेन बबन्ध दुष्टं
स चाप्यभूत् क्लिन्नकटः करीन्द्रः।
करं प्रचिच्छेद च हस्तिनोऽग्रं
स चापि भूयो महिषोऽभिजातः ॥ ४२
ततोऽस्य शूलं व्यसृजन्मृडानी
स शीर्णमूलो न्यपतत् पृथिव्याम्।
शक्तिं प्रचिक्षेप हुताशदत्तां
सा कुण्ठिताग्रा न्यपतन्महर्षे ॥ ४३
चक्रं हरेर्दानवचक्रहन्तुः
क्षिप्तं त्वचक्रत्वमुपागतं हि।
गदां समाविध्य धनेश्वरस्य
क्षिप्ता तु भग्ना न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ४४
जलेशपाशोऽपि महासुरेण
विषाणतुण्डाग्रखुरप्रणुन्नः ।
निरस्य तत्कोपितया च मुक्तो
दण्डस्तु याम्यो बहुखण्डतां गतः ॥ ४५
वज्रं सुरेन्द्रस्य च विग्रहेऽस्य
मुक्तं सुसूक्ष्मत्वमुपाजगाम।
संत्यज्य सिंहं महिषासुरस्य
दुर्गाऽधिरूढा सहसैव पृष्ठम् ॥ ४६
पृष्ठस्थितायां महिषासुरोऽपि
पोप्लूयते वीर्यमदान्मृदान्याम्।
सा चापि पद्भ्यां मृदुकोमलाभ्यां
ममर्द तं क्लिन्नमिवाजिनं हि ॥ ४७
स मृद्यमानो धरणीधराभो
देव्या बली हीनबलो बभूव।
और अपने बिजलीकी कड़कके समान नाद एवं
सींगोंकी नोकसे शेष भूतोंको व्याकुल कर रणक्षेत्रमें
सिंहको मारने दौड़ा। इससे अम्बिकाको बड़ा क्रोध
हुआ। फिर वह क्रुद्ध महिष अपने नुकीले सींगोंसे
जल्दी-जल्दी पर्वतों एवं पृथ्वीको विदीर्ण करने लगा।
वह समुद्रको क्षुब्ध करते तथा मेघोंको तितर-बितर
करते हुए दुर्गाकी ओर दौड़ा। इसपर उन देवीने उस
दुष्टको पाशसे बाँध दिया, पर वह झटसे मदसे भींगे
कपोलोंवाला गजराज बन गया। (तब) देवीने उस
गजके शुण्डका अगला भाग काट डाला। अब उसने पुनः
भैंसेका रूप धारण कर लिया। महर्षि नारदजी! उसके
बाद देवीने उसके ऊपर शूल फेंका जो टूटकर पृथ्वीपर
गिर पड़ा। तत्पश्चात् उन्होंने अग्निसे प्राप्त हुई शक्ति
फेंकी, किंतु वह भी टूटकर गिर पड़ी ॥ ४०-४३ ॥
दानवसमूहको मारनेवाला विष्णुप्रदत्त चक्र भी
फेंके जानेपर व्यर्थ हो गया। देवीने कुबेरद्वारा दी गयी
गदा भी घुमाकर फेंकी, पर वह भी भग्न होकर
पृथ्वीपर गिर पड़ी। महिषने वरुणके पाशको भी अपने
सींग, थूथना एवं खुरके प्रहारसे विफल कर दिया।
फिर कुपित होकर देवीने यमदण्डको छोड़ा, पर उसे
भी उसने तोड़कर कई खण्ड-खण्ड कर डाला।
उसके शरीरपर देवीद्वारा छोड़ा गया इन्द्रका वज्र भी
छोटे-छोटे टुकड़ोंमें बिखर गया। अब दुर्गाजी सिंहको
छोड़कर सहसा महिषासुरकी पीठपर ही चढ़ गयीं।
देवीके पीठपर चढ़ जानेपर भी महिषासुर अपने
बलके मदसे उछलता रहा। देवी भी अपने मृदुल तथा
कोमल चरणोंसे भींगे मृगचर्मके समान उसकी पीठको
मर्दन करती गयीं ॥ ४४-४७ ॥
अन्तमें देवीद्वारा कुचला जाता हुआ पर्वताकार
बलवान् महिष बलशून्य हो गया। तब देवीने अपने

अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १०९
ततोऽस्य शूलेन बिभेद कण्ठं
तस्मात् पुमान् खड्गधरो विनिर्गतः ॥ ४८
निष्क्रान्तमात्रं हृदये पदा तं
आहत्य संगृह्य कचेषु कोपात्।
शिरः प्रचिच्छेद वरासिनाऽस्य
हाहाकृतं दैत्यबलं तदाऽभूत् ॥ ४९
सचण्डमुण्डाः समयाः सताराः
सहासिलोम्ना भयकातराक्षाः।
संताड्यमानाः प्रमथैर्भवन्त्याः
पातालमेवाविविशुर्भयार्ताः ॥ ५०
देव्या जयं देवगणा विलोक्य
स्तुवन्ति देवीं स्तुतिभिर्महर्षे।
नारायणीं सर्वजगत्प्रतिष्ठां
कात्यायनीं घोरमुखीं सुरूषाम् ॥ ५१
संस्तूयमाना सुरसिद्धसंघै-
र्निषण्णभूता हरपादमूले।
भूयो भविष्याम्यमरार्थमेव-
मुक्त्वा सुरांस्तान् प्रविवेश दुर्गा ॥ ५२
शूलसे उसकी गर्दन काट दीं। उसके कटे कण्ठसे तुरंत
तलवार लिये एक पुरुष निकल पड़ा। उसके निकलते
ही देवीने उसके हृदयपर चरणसे आघात किया और
क्रोधसे उसके बालोंको समेटकर पकड़ लिया तथा
अपनी श्रेष्ठ तलवारसे उसका भी सिर काट डाला। उस
समय दैत्योंकी सेनामें हाहाकार मच गया। चण्ड, मुण्ड,
मय, तार और असिलोमा आदि दैत्य भवानीके
प्रमथगणोंद्वारा प्रताडित एवं भयसे उद्विग्न होकर पातालमें
प्रविष्ट हो गये। महर्षि नारदजी ! इधर देवीकी विजयको
देखकर देवतागण स्तुतियोंके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की
आधारभूता, क्रोधमुखी, सुरूपा, नारायणी, कात्यायनीदेवीकी
स्तुति करने लगे। देवताओं और सिद्धोंद्वारा स्तुति की
जाती हुई दुर्गाने 'मैं आप देवताओंके श्रेयके लिये पुनः
आविर्भूत होऊँगी' - ऐसा कहकर शिवजीके पादमूलमें
लीन हो गयीं ॥ ४८-५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २० ॥
इक्कीसवाँ अध्याय
देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग;
संवरण-तपतीका विवाह
नारद उवाच
पुलस्त्य कथ्यतां तावद् देव्या भूयः समुद्भवः।
महत्कौतूहलं मेऽद्य विस्तराद् ब्रह्मवित्तम ॥ १
पुलस्त्य उवाच
श्रूयतां कथयिष्यामि भूयोऽस्याः सम्भवं मुने।
शुम्भासुरवधार्थाय लोकानां हितकाम्यया ॥ २
या सा हिमवतः पुत्री भवेनोढा तपोधना।
उमा नाम्ना च तस्याः सा कोशाज्जाता तु कौशिकी ॥ ३
नारदजीने कहा - ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुलस्त्यजी !
अब आप देवीकी उत्पत्तिके विषयमें मुझसे पुनः
विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उसे सुननेकी मेरी बड़ी
अभिलाषा है ॥ १॥
पुलस्त्यजी बोले - मुनिजी ! सुनिये; मैं पुनः
लोककल्याणकी इच्छासे शुम्भ नामक असुरके वधके
लिये देवीकी जो पुनः उत्पत्ति हुई, उसका वर्णन करता
हूँ। भगवान् शङ्करने हिमवान्की जिस तपस्विनी कन्या
उमासे विवाह किया था, उन्हींके शरीर-कोश (गर्भ)-से
उत्पन्न होनेके कारण वे देवी कौशिकी कहलायीं।