वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर
अध्याय ३९]
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन
१७३
विज्ञाय तस्य तद्भावं रुषङ्गोस्ते तपोधनाः ।
तं वै तीर्थे उपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ १८
स तैः पुत्रैः समानीतः सरस्वत्यां समाप्लुतः ।
स्मृत्वा तीर्थगुणान् सर्वान् प्राहेदृषिसत्तमः ॥ १९
सरस्वत्युत्तरे तीर्थे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ।
पृथूदके जप्यपरो नूनं चामरतां व्रजेत् ॥ २०
तत्रैव ब्रह्मयोन्यस्ति ब्रह्मणा यत्र निर्मिता।
पृथूदकं समाश्रित्य सरस्वत्यास्तटे स्थितः ॥ २१
चातुर्वर्ण्यस्य सृष्ट्यर्थमात्मज्ञानपरोऽभवत्।
तस्याभिधायतः सृष्टिं ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः ॥ २२
मुखतो ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्रियास्तथा ।
ऊरुभ्यां वैश्यजातीयाः पद्भ्यां शूद्रास्ततोऽभवन् ॥ २३
चातुर्वर्ण्यं ततो दृष्ट्वा आश्रमस्थं ततस्ततः।
एवं प्रतिष्ठितं तीर्थं ब्रह्मयोनीति संज्ञितम् ॥ २४
तत्र स्नात्वा मुक्तिकामः पुनर्योनिं न पश्यति।
तत्रैव तीर्थं विख्यातमवकीर्णेति नामतः ॥ २५
यस्मिंस्तीर्थे वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रममर्षणम् ।
जुहाव वाहनैः सार्धं तत्राबुध्यत् ततो नृपः ॥ २६
ऋषय ऊचुः
कथं प्रतिष्ठितं तीर्थमवकीर्णेति नामतः।
धृतराष्ट्रेण राज्ञा च स किमर्थं प्रसादितः ॥ २७
लोमहर्षण उवाच
ऋषयो नैमिषेया ये दक्षिणार्थं ययुः पुरा।
तत्रैव च वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रमयाचत ॥ २८
तेनापि तत्र निन्दार्थमुक्तं पश्चानृतं तु यत्।
ततः क्रोधेन महता मांसमुत्कृत्य तत्र ह ॥ २९
पृथूदके महातीर्थे अवकीर्णेति नामतः ।
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेस्ततः ॥ ३०
हूयमाने तदा राष्ट्रे प्रवृत्ते यज्ञकर्मणि ।
अक्षीयत ततो राष्ट्रं नृपतेर्दुष्कृतेन वै ॥ ३१
(तीर्थ)-में ले चलो। रुषङ्गुके उस भावको जानकर वे
तपोधन (पुत्र) उन तपके धनीको सरस्वतीके तीर्थमें
ले गये ॥ १४ - १८॥
उन पुत्रोंद्वारा लाये गये उन ऋषिश्रेष्ठने सरस्वतीमें
स्नान करनेके पश्चात् उस तीर्थके सब गुणोंका स्मरण
कर यह कहा था-'सरस्वतीके उत्तरकी ओर स्थित
पृथूदक नामके तीर्थमें अपने शरीरका त्याग करनेवाला
जपपरायण मनुष्य निश्चय ही देवत्वको प्राप्त होता है।'
वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित 'ब्रह्मयोनितीर्थ' है, जहाँ सरस्वतीके
किनारे अवस्थित पृथूदकमें स्थित होकर ब्रह्मा चारों
वर्णोंकी सृष्टिके लिये आत्मज्ञानमें लीन हुए थे। सृष्टिके
विषयमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके चिन्तन करनेपर उनके
मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य
और दोनों पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए ॥ १९-२३॥
उसके बाद उन्होंने चारों वर्णोंको विभिन्न
आश्रमोंमें स्थित हुआ देखा। इस प्रकार ब्रह्मयोनि
नामक तीर्थकी प्रतिष्ठा हुई थी। मुक्तिकी कामना
करनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नान करनेसे पुनर्जन्म नहीं
देखता। वहीं अवकीर्ण नामक एक विख्यात तीर्थ भी
है, जहाँपर दाल्भ्य (दल्भ या दल्भि गोत्रमें उत्पन्न)
वक नामक ऋषिने क्रोधी धृतराष्ट्रको उसके वाहनोंके
साथ हवन कर दिया था, तब कहीं राजाको (अपने
किये कर्मका) ज्ञान हुआ था ॥ २४ - २६ ॥
ऋषियोंने पूछा- अवकीर्ण नामक तीर्थ कैसे
प्रतिष्ठित हुआ एवं राजा धृतराष्ट्रने उन (वक दाल्भ्य
मुनि)-को क्यों प्रसन्न किया था ? ॥ २७ ॥
लोमहर्षणने कहा- प्राचीन कालमें नैमिषारण्य-
निवासी जो ऋषि दक्षिणा पानेके लिये (राजा धृतराष्ट्रके
यहाँ) गये थे, उनमेंसे दल्भिवंशीय वक ऋषिने धृतराष्ट्रसे
(धनकी) याचना की। उन्होंने (धृतराष्ट्रने) भी निन्दापूर्ण
ग्राम्य और असत्य बात कही। उसके बाद वे (वक
दाल्भ्य) अत्यन्त क्रुद्ध होकर पृथूदकमें स्थित अवकीर्ण
नामक तीर्थमें जा करके मांस काट-काटकर धृतराष्ट्रके
राष्ट्रके नाम हवन करने लगे। तब यज्ञमें राष्ट्रका
हवन प्रारम्भ होनेपर राजाके दुष्कर्मके कारण राष्ट्रका
क्षय होने लगा ॥ २८-३१ ॥
| १७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४० |
|---|
| ततः स चिन्तयामास ब्राह्मणस्य विचेष्टितम्।<br>पुरोहितेन संयुक्तो रत्नान्यादाय सर्वशः॥ ३२<br><br>प्रसादनार्थं विप्रस्य ह्यवकीर्णं ययौ तदा।<br>प्रसादितः स राज्ञा च तुष्टः प्रोवाच तं नृपम्॥ ३३<br><br>ब्राह्मणा नावमन्तव्याः पुरुषेण विजानता।<br>अवज्ञातो ब्राह्मणस्तु हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम्॥ ३४<br><br>एवमुक्त्वा स नृपतिं राज्येन यशसा पुनः।<br>उत्थापयामास ततस्तस्य राज्ञे हिते स्थितः॥ ३५ | (राष्ट्रको क्षीण होते देख) उसने विचार किया और वह इसे ब्राह्मणका विकर्म जानकर (उस ब्राह्मणको) प्रसन्न करनेके लिये समस्त रत्नोंको लेकर पुरोहितके साथ अवकीर्णतीर्थमें गया (और उस) राजाने उन्हें प्रसन्न कर लिया। प्रसन्न होकर उन्होंने राजासे कहा — (राजन्!) विद्वान् मनुष्यको ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। अपमानित हुआ ब्राह्मण मनुष्यके कुलके तीन पुरुषों (पीढ़ियों)-का विनाश कर देता है। ऐसा कहकर उन्होंने पुनः राजाको राज्य एवं यशके साथ सम्पन्न कर दिया और वे उस राजाके हितकारी हो गये॥ ३२—३५॥ |
| तस्मिंस्तीर्थे तु यः स्नाति श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>स प्राप्नोति नरो नित्यं मनसा चिन्तितं फलम्॥ ३६<br><br>तत्र तीर्थं सुविख्यातं यायातं नाम नामतः।<br>यस्येह यजमानस्य मधु सुस्राव वै नदी॥ ३७<br><br>तस्मिन् स्नातो नरो भक्त्या मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>फलं प्राप्नोति यज्ञस्य अश्वमेधस्य मानवः॥ ३८<br><br>मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं पुण्यतमं द्विजाः।<br>तस्मिन् स्नात्वा नरो भक्त्या मधुना तर्पयेत् पितॄन्॥ ३९<br><br>तत्रापि सुमहत्तीर्थं वसिष्ठोद्वाहसंज्ञितम्।<br>तत्र स्नातो भक्तियुक्तो वासिष्ठं लोकमाप्नुयात्॥ ४० | उस (अवकीर्ण) तीर्थमें जो जितेन्द्रिय मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह नित्य मनोऽभिलषित फल प्राप्त करता है। वहाँ 'यायात' (ययातिका तीर्थ) नामसे सुविख्यात तीर्थ है, जहाँ यज्ञ करनेवालेके लिये नदीने मधु बहाया था। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है एवं उसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। द्विजो! वहीं 'मधुस्रव' नामक पवित्र तीर्थ है। उसमें मनुष्यको भक्तिपूर्वक स्नान कर मधुसे पितरोंका तर्पण करना चाहिये। वहींपर 'वसिष्ठोद्वाह' नामक सुन्दर महान् तीर्थ है, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला व्यक्ति महर्षि वसिष्ठके लोकको प्राप्त करता है॥ ३६—४०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥
चालीसवाँ अध्याय
वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग
| ऋषय ऊचुः<br>वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ कथं वै सम्बभूव ह।<br>किमर्थं सा सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत्॥ १ | ऋषियोंने कहा (पूछा)— महाराज! वह वसिष्ठापवाह कैसे उत्पन्न हुआ? उस श्रेष्ठ सरिताने उन ऋषिको अपने प्रवाहमें क्यों बहा दिया था?॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br>विश्वामित्रस्य राजर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः।<br>भृशं वैरं बभूवेह तपःस्पर्द्धाकृते महत्॥ २ | लोमहर्षण बोले— (ऋषियो!) राजर्षि विश्वामित्र एवं महात्मा वसिष्ठमें तपस्याके विषयमें परस्पर चुनौती होनेके कारण बड़ी भारी शत्रुता हो गयी। |
| अध्याय ४० ] | वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग | १७५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थे बभूव ह।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे विश्वामित्रस्य धीमतः॥ ३<br>यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम्।<br>स्थापयामास देवेशो लिङ्गाकारां सरस्वतीम्॥ ४<br>वसिष्ठस्तत्र तपसा घोररूपेण संस्थितः।<br>तस्येह तपसा हीनो विश्वामित्रो बभूव ह॥ ५ | वसिष्ठका आश्रम स्थाणुतीर्थमें था और उसके पश्चिम दिशामें बुद्धिमान् विश्वामित्र महर्षिका आश्रम था; जहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवने यज्ञ करनेके बाद सरस्वतीकी पूजा कर मूर्तिके रूपमें सरस्वतीकी स्थापना की थी। वसिष्ठजी वहीं घोर तपस्यामें संलग्न थे। उनकी तपस्यासे विश्वामित्र (प्रभावतः) हीन-से होने लगे॥ २-५॥ |
| सरस्वतीं समाहूय इदं वचनमब्रवीत्।<br>वसिष्ठं मुनिशार्दूलं स्वेन वेगेन आनय॥ ६<br>इहाहं तं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यथिता सा महानदी॥ ७<br>तथा तां व्यथितां दृष्ट्वा वेपमानां महानदीम्।<br>विश्वामित्रोऽब्रवीत् क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय॥ ८<br>ततो गत्वा सरिच्छ्रेष्ठा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्।<br>कथयामास रुदतो विश्वामित्रस्य तद् वचः॥ ९ | (एक बार) विश्वामित्रने सरस्वतीको बुलाकर यह वचन कहा—सरस्वति! तुम मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको अपने वेगसे बहा लाओ। मैं उन द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठको यहाँ मारूँगा—इसमें संदेहकी बात नहीं है। इस (अवाञ्छनीय बात)-को सुनकर वह महानदी दुःखित हो गयी। (पर) विश्वामित्रने उस प्रकार दुःखित एवं काँपती हुई उस महानदीको देखकर क्रोधमें भरकर कहा कि वसिष्ठको शीघ्र लाओ। उसके बाद उस श्रेष्ठ नदीने मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उनसे रोते हुए विश्वामित्रकी उस बातको कहा॥ ६-९॥ |
| तपःक्रियाविशीर्णां च भृशं शोकसमन्विताम्।<br>उवाच स सरिच्छ्रेष्ठां विश्वामित्राय मां वह॥ १०<br>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित्।<br>चालयामास तं स्थानात् प्रवाहेणाम्भसस्तदा॥ ११<br>स च कूलापहारेण मित्रावरुणयोः सुतः।<br>उह्यमानश्च तुष्टाव तदा देवीं सरस्वतीम्॥ १२<br>पितामहस्य सरसः प्रवृत्ताऽसि सरस्वति।<br>व्याप्तं त्वया जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः॥ १३ | उन वसिष्ठजीने तपश्चर्यासे दुर्बल एवं अतिशय शोक-समन्वित उस श्रेष्ठ सरिता (सरस्वती)-से कहा—(तुम) विश्वामित्रके पास मुझे बहा ले चलो। उन दयालुके उस वचनको सुनकर उस सरस्वती सरिताने जलके (तेज) प्रवाहद्वारा उन्हें उस स्थानसे बहाना प्रारम्भ किया। किनारेसे ले जाये जानेके कारण बहते हुए मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठ-ऋषि प्रसन्न होकर देवी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे—सरस्वति! आप ब्रह्माके सरोवरसे निकली हैं। आपने अपने उत्तम जलसे समस्त जगत्को व्याप्त कर दिया है॥ १०-१३॥ |
| त्वमेवाकाशगा देवी मेघेषु सृजसे पयः।<br>सर्वास्त्वापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहे॥ १४<br>पुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिः कान्तिः क्षमा तथा।<br>स्वधा स्वाहा तथा वाणी तवायत्तमिदं जगत्॥ १५<br>त्वमेव सर्वभूतेषु वाणीरूपेण संस्थिता।<br>एवं सरस्वती तेन स्तुता भगवती सदा॥ १६<br>सुखेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति।<br>न्यवेदयत्तदा खिन्ना विश्वामित्राय तं मुनिम्॥ १७ | 'आप ही आकाशगामिनी देवी हैं और मेघोंमें जलको उत्पन्न करती हैं। आप ही सभी जलोंके रूपमें वर्तमान हैं। आपकी ही शक्तिसे हमलोग अध्ययन करते हैं। आप ही पुष्टि, धृति, कीर्ति, सिद्धि, कान्ति, क्षमा, स्वधा, स्वाहा तथा सरस्वती हैं। यह पूरा विश्व आपके ही अधीन है। आप ही समस्त प्राणियोंमें वाणीरूपसे स्थित हैं।' वसिष्ठजीने भगवती सरस्वतीकी इस प्रकार स्तुति की और सरस्वती नदीने उन विप्रदेवको विश्वामित्रके आश्रममें सुखपूर्वक पहुँचा दिया और खिन्न होकर उन मुनिको विश्वामित्रके लिये निवेदित कर दिया॥ १४-१७॥ |
| १७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४० |
|---|
| तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः।<br>अथान्विषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ॥ १८<br><br>तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्महत्याभयान्नदी।<br>अपोवाह वसिष्ठं तं मध्ये चैवाम्भसस्तदा।<br>उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ॥ १९<br><br>ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम्।<br>अब्रवीत् क्रोधरक्ताक्षो विश्वामित्रो महातपाः ॥ २०<br><br>यस्मान्मां सरितां श्रेष्ठे वञ्चयित्वा विनिर्गता।<br>शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसंयुता ॥ २१ | उसके बाद सरस्वतीद्वारा बहाकर लाये गये वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र क्रोधसे भर गये और वसिष्ठका अन्त करनेवाला शस्त्र ढूँढ़ने लगे। उन्हें क्रोधसे भरा हुआ देखकर ब्रह्महत्याके भयसे डरती हुई वह सरस्वती नदी गाधिपुत्र विश्वामित्रको वञ्चित कर दोनोंकी बातोंका पालन करती हुई उन वसिष्ठको जलमें (पुनः) बहा ले गयी। उसके बाद ऋषिप्रवर वसिष्ठको अपवाहित होते देखकर महातपस्वी विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। फिर विश्वामित्रने कहा—ओ श्रेष्ठ नदी! यतः तुम मुझे वञ्चितकर चली गयी हो, कल्याणि! अतः श्रेष्ठ राक्षसोंसे संयुक्त होकर तुम शोणितका वहन करो—तुम्हारा जल रक्तसे युक्त हो जाय ॥ १८–२१ ॥ |
| ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता।<br>अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ॥ २२<br><br>अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा।<br>सरस्वतीं तदा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥ २३<br><br>तस्मिंस्तीर्थवरे पुण्ये शोणितं समुपावहत्।<br>ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसाश्च समागताः ॥ २४<br><br>ततस्ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते।<br>तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः।<br>नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥ २५ | उसके बाद बुद्धिमान् विश्वामित्रसे इस प्रकार शाप प्राप्तकर सरस्वतीने एक वर्षतक रक्तसे मिले हुए जलको बहाया। उसके पश्चात् सरस्वती नदीको रक्तसे मिश्रित जलवाली देखकर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ अत्यन्त दुःखित हो गयीं। (यतः) उस पवित्र श्रेष्ठ तीर्थमें रुधिर ही बहने लगा। अतः वहाँ भूत, पिशाच, राक्षस एकत्र होने लगे। वे सभी रक्तका पान करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे। वे उससे अत्यन्त तृप्त, सुखी एवं निश्चिन्त होकर इस प्रकार नाचने एवं हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्गको जीत लिया हो ॥ २२–२५ ॥ |
| कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋषयः सतपोधनाः।<br>तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां तपोधनाः ॥ २६<br><br>तां दृष्ट्वा राक्षसैर्घोरैः पीयमानां महानदीम्।<br>परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥ २७<br><br>ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः।<br>आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रुवन् ॥ २८<br><br>किं कारणं सरिच्छ्रेष्ठे शोणितेन ह्रदो ह्यहम्।<br>एवमाकुलतां यातः श्रुत्वा वेत्स्यामहे वयम् ॥ २९ | कुछ समय बीतनेपर तपस्याके धनी ऋषिलोग तीर्थयात्रा करते-करते सरस्वतीके तटपर पहुँचे। (वहाँ) भयानक राक्षसोंके द्वारा पीती जाती हुई महानदी सरस्वतीको देखकर वे उसकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करने लगे। और महान् व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाले उन महाभागोंने श्रेष्ठ नदीको (पास) बुलाकर उससे यह वचन फिर कहा—श्रेष्ठ सरिते! हम सब आपसे यह जानना चाहते हैं कि यह जलाशय रक्तसे भरकर ऐसा क्षुब्ध कैसे हुआ है? ॥ २६–२९ ॥ |
| ततः सा सर्वमाचष्ट विश्वामित्रविचेष्टितम्।<br><br>ततस्ते मुनयः प्रीताः सरस्वत्यां समानयन्।<br><br>अरुणां पुण्यतोयौघां सर्वदुष्कृतनाशिनीम् ॥ ३० | तब उसने विश्वामित्रके समस्त विकर्मोंका (उनके सामने ही) वर्णन किया। उसके पश्चात् प्रसन्न हुए मुनिजन सरस्वती तथा समस्त पापोंका विनाश करनेवाली अरुणा नदीको ले आये। (जिससे सरस्वती-ह्रदका |
| अध्याय ४० ] | वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग | १७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या राक्षसा दुःखिता भृशम्।<br>ऊचुस्तान् वै मुनीन् सर्वान् दैन्ययुक्ताः पुनः पुनः॥ ३१<br><br>वयं हि क्षुधिताः सर्वे धर्महीनाश्च शाश्वताः।<br>न च नः कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिणः॥ ३२<br><br>युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा।<br>पक्षोऽयं वर्धतेऽस्माकं यतः स्मो ब्रह्मराक्षसाः॥ ३३ | शोणित पवित्र जल हो गया) (पर) सरस्वतीके जलको (इस प्रकार शुद्ध हुआ) देखकर राक्षस बहुत दुःखित हो गये। वे दीनतापूर्वक उन सभी मुनियोंसे बार-बार कहने लगे कि हम सभी सदा भूखे एवं धर्मसे रहित रहते हैं। हम अपनी इच्छासे पापकर्म करनेवाले पापी नहीं बने हुए हैं, अपितु आपलोगोंकी अकृपा एवं अशोभन कर्मोंसे ही हमारा पक्ष बढ़ता रहता है; क्योंकि हम सभी ब्रह्मराक्षस हैं॥ ३०—३३॥ |
| एवं वैश्याश्च शूद्राश्च क्षत्रियाश्च विकर्मभिः।<br>ये ब्राह्मणान् प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः॥ ३४<br><br>योषितां चैव पापानां योनिदोषेण वर्द्धते।<br>इयं संततिरस्माकं गतिरेषा सनातनी॥ ३५<br><br>शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे।<br>तेषां ते मुनयः श्रुत्वा कृपाशीलाः पुनश्च ते॥ ३६<br><br>ऊचुः परस्परं सर्वे तप्यमानाश्च ते द्विजाः।<br>क्षुत्कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाशितं भवेत्॥ ३७<br><br>केशावपन्नमाधूतं मारुतश्वासदूषितम्।<br>एभिः संसृष्टमन्नं च भागं वै रक्षसां भवेत्॥ ३८ | इसी प्रकार जो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करते हैं, वे (ऐसे ही) विकर्म करनेके कारण राक्षस हो जाते हैं। पापिनी स्त्रियोंके योनिदोषसे हमारी यह संतति बढ़ती रहती है। यह हमारी प्राचीन गति है। आपलोग सभी लोकोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। (लोमहर्षणजी कहते हैं—) द्विजो! वे कृपालु मुनि उन सदाकी रीति ब्रह्मराक्षसोंके इन वचनोंको सुनकर बहुत दुःखी हुए और परस्पर परामर्शकर उनसे बोले—(ब्रह्मराक्षसो!) छींक तथा कीटके संसर्गसे दूषित, उच्छिष्ट भोजन, केशयुक्त, तिरस्कृत एवं श्वासवायुसे दूषित अन्न तुम राक्षसोंका भाग होगा॥ ३४—३८॥ |
| तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वान् अन्यान्येतानि वर्जयेत्।<br>राक्षसानामसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्तेऽन्नमीदृशम्॥ ३९<br><br>शोधयित्वा तु तत्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः।<br>मोक्षार्थं रक्षसां तेषां संगमं तत्र कल्पयन्॥ ४०<br><br>अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोकविश्रुते।<br>त्रिरात्रोपोषितः स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ ४१<br><br>प्राप्ते कलियुगे घोरे अधर्मे प्रत्युपस्थिते।<br>अरुणासंगमे स्नात्वा मुक्तिमाप्नोति मानवः॥ ४२<br><br>ततस्ते राक्षसाः सर्वे स्नाताः पापविवर्जिताः।<br>दिव्यमाल्याम्बरधराः स्वर्गस्थितिसमन्विताः॥ ४३ | (पुनः लोमहर्षणजी बोले—) ऋषियो! इसको जानकर विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इस प्रकारके अन्नोंको त्याग दे। इस प्रकार अन्न खानेवाला व्यक्ति राक्षसोंका भाग खाता है। उन तपोधन ऋषियोंने उस तीर्थको शुद्धकर उन राक्षसोंकी मुक्तिके लिये वहाँ एक सङ्गमकी रचना की। [उसका फल इस प्रकार है] लोक-प्रसिद्ध अरुणा और सरस्वतीके सङ्गममें तीन दिनोंतक व्रतपूर्वक स्नान करनेवाला (व्यक्ति) सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। (आगे भी) घोर कलियुग आनेपर तथा अधर्मका अधिक प्रसार हो जानेपर मनुष्य अरुणाके सङ्गममें स्नान करके मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। इसको सुननेके बाद उन सभी राक्षसोंने उसमें स्नान किया और वे निष्पाप हो गये तथा दिव्य माला और वस्त्र धारणकर स्वर्गमें विराजने लगे॥ ३९—४३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥
| १७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४१ |
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इकतालीसवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके तीर्थों—शतसाहस्रिक, शतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| लोमहर्षण उवाच<br>समुद्रास्तत्र चत्वारो दर्विणा आहृताः पुरा।<br>प्रत्येकं तु नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ १<br>यत्किञ्चित् क्रियते तस्मिंस्तपस्तीर्थे द्विजोत्तमाः।<br>परिपूर्णं हि तत्सर्वमपि दुष्कृतकर्मणः॥ २<br>शतसाहस्रिकं तीर्थं तथैव शतिकं द्विजाः।<br>उभयोर्हि नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br>सोमतीर्थं च तत्रापि सरस्वत्यास्तटे स्थितम्।<br>यस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो राजसूयफलं लभेत्॥ ४ | लोमहर्षणने कहा— प्राचीन कालकी बात है महर्षि दर्वि वहाँ चार समुद्रोंको ले आये थे। उनमेंसे प्रत्येक समुद्रमें स्नान करनेसे मनुष्योंको हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है। द्विजोत्तमो ! उस तीर्थमें जो तपस्या की जाती है, वह पापीद्वारा की गयी होनेपर भी सिद्ध हो जाती है। द्विजो ! वहाँ शतसाहस्रिक एवं शतिक नामके दो तीर्थ हैं। उन दोनों ही तीर्थोंमें स्नान करनेवाला मनुष्य हजार गौ-दान करनेका फल प्राप्त करता है। वहीं सरस्वतीके तटपर सोमतीर्थ भी स्थित है, जिसमें स्नान करनेसे पुरुष राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ १—४॥ |
| रेणुकाश्रममासाद्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>मातृभक्त्या च यत्पुण्यं तत्फलं प्राप्नुयान्नरः॥ ५<br>ऋणमोचनमासाद्य तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम्।<br>ऋणैर्मुक्तो भवेन्नित्यं देवर्षिपितृसम्भवैः।<br>कुमारस्याभिषेकं च ओजसं नाम विश्रुतम्॥ ६<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो यशसा च समन्वितः।<br>कुमारपुरमाप्नोति कृत्वा श्राद्धं तु मानवः॥ ७<br>चैत्रषष्ठ्यां सिते पक्षे यस्तु श्राद्धं करिष्यति।<br>गयाश्राद्धे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं प्राप्नुयान्नरः॥ ८ | माताकी सेवा करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्य-फलको इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेवाला श्रद्धालु मनुष्य रेणुकातीर्थमें जाकर प्राप्त कर लेता है और ब्रह्माद्वारा सेवित ऋणमोचन नामके तीर्थमें जाकर देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋणसे छूट जाता है। कुमार (कार्तिकेय)-का अभिषेकस्थल ओजसनामसे विख्यात है; उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य कीर्ति प्राप्त करता है और वहाँ श्राद्ध करनेसे उसे कार्तिकेयके लोककी प्राप्ति होती है। चैत्रमासकी शुक्ला षष्ठी तिथिमें जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करेगा, वह गयामें श्राद्ध करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्यको प्राप्त करता है॥ ५—८॥ |
| संनिहत्यां यथा श्राद्धं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तथा श्राद्धं तत्र कृतं नात्र कार्या विचारणा॥ ९<br>ओजसे ह्यक्षयं श्राद्धं वायुना कथितं पुरा।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत्॥ १०<br>यस्तु स्नानं श्रद्दधानश्चैत्रषष्ठ्यां करिष्यति।<br>अक्षय्यमुदकं तस्य पितॄणामुपजायते॥ ११<br>तत्र पञ्चवटं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>महादेवः स्थितो यत्र योगमूर्तिधरः स्वयम्॥ १२ | राहुद्वारा सूर्यके ग्रस्त हो जानेपर (सूर्यग्रहण लगनेपर) सन्निहतीतीर्थमें किये गये श्राद्धके समान वहाँका श्राद्ध पुण्यप्रद होता है; इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वसमयमें वायुने कहा था कि ओजसतीर्थमें किये गये श्राद्धका क्षय नहीं होता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिके दिन जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा, उसके पितरोंको अक्षय (कभी भी क्षय न होनेवाले) जलकी प्राप्ति होगी। तीनों लोकोंमें विख्यात एक ‘पञ्चवट’ नामका तीर्थ है, जहाँ स्वयं भगवान् महादेव योगसाधना करनेकी मुद्रामें विराजमान हैं॥ ९—१२॥ |
अध्याय ४१ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका वर्णन १७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च देवदेवं महेश्वरम्।<br>गाणपत्यमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते॥ १३<br>कुरुतीर्थं च विख्यातं कुरुणा यत्र वै तपः।<br>तप्तं सुघोरं क्षेत्रस्य कर्षणार्थं द्विजोत्तमाः॥ १४<br>तस्य घोरेण तपसा तुष्ट इन्द्रोऽब्रवीद् वचः।<br>राजर्षे परितुष्टोऽस्मि तपसाऽनेन सुव्रत॥ १५<br>यज्ञं ये च कुरुक्षेत्रे करिष्यन्ति शतक्रतोः।<br>ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान्॥ १६<br>अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं प्रभुः।<br>आगम्यागम्य चैवेनं भूयो भूयो वहस्य च॥ १७<br>शतक्रतुरनिर्विण्णः पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह।<br>यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष देहमात्मनः।<br>ततः शक्रोऽब्रवीत् प्रीत्या ब्रूहि यत्ते चिकीर्षितम्॥ १८ | उस (पञ्चवट) स्थानपर स्नान करके देवाधिदेव महादेवकी पूजा करनेवाला मनुष्य गणपतिपद और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता हुआ प्रसन्न रहता है। श्रेष्ठ द्विजो! 'कुरुतीर्थ' विख्यात तीर्थ है, जिसमें कुरुने कीर्तिकी प्राप्तिके लिये धर्मकी खेती करनेके लिये तपस्या की थी। उनकी घोर तपस्यासे प्रसन्न होकर इन्द्रने कहा—सुन्दर व्रतोंके करनेवाले राजर्षि! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं संतुष्ट हूँ। (सुनो) इस कुरुक्षेत्रमें जो लोग इन्द्रका यज्ञ करेंगे, वे लोग पापरहित हो जायँगे और पवित्र लोकोंको प्राप्त होंगे। इतना कहकर इन्द्रदेव मुस्कराकर स्वर्ग चले गये। बिना खिन्न हुए इन्द्र बारंबार आये और उपहासपूर्वक उनसे (उनकी योजनाके सम्बन्धमें कुछ) पूछ-पूछकर चले गये। कुरुने जब उग्र तपस्याद्वारा अपनी देहका कर्षण किया तो इन्द्रने प्रेमपूर्वक उनसे कहा—'कुरु! तुम्हें जो कुछ करनेकी इच्छा हो उसे कहो'॥ १३-१८॥ |
| कुरुरुवाच<br>ये श्रद्दधानास्तीर्थेऽस्मिन् मानवा निवसन्ति ह।<br>ते प्राप्नुवन्तु सदनं ब्राह्मणाः परमात्मनः॥ १९<br>अन्यत्र कृतपापा ये पञ्चपातकदूषिताः।<br>अस्मिंस्तीर्थे नराः स्नात्वा मुक्ता यान्तु परां गतिम्॥ २०<br>कुरुक्षेत्रे पुण्यतमं कुरुतीर्थं द्विजोत्तमाः।<br>तं दृष्ट्वा पापमुक्तस्तु परं पदमवाप्नुयात्॥ २१<br>कुरुतीर्थे नरः स्नातो मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>कुरुणा समनुज्ञातः प्राप्नोति परमं पदम्॥ २२ | कुरुने कहा— इन्द्रदेव! जो श्रद्धालु मानव इस तीर्थमें निवास करते हैं, वे परमात्मरूप परब्रह्मके लोकको प्राप्त करते हैं। इस स्थानसे अन्यत्र पाप करनेवालों एवं पञ्चपातकोंसे दूषित मनुष्य भी इस तीर्थमें स्नान करनेसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त करता है। (लोमहर्षणने कहा—) श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रमें कुरुतीर्थ सर्वाधिक पवित्र है। उसका दर्शन कर पापात्मा मनुष्य (भी) मोक्ष प्राप्त कर लेता है तथा कुरुतीर्थमें स्नानकर पापोंसे छूट जाता है एवं कुरुकी आज्ञासे परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है॥ १९-२२॥ |
| स्वर्गद्वारं ततो गच्छेच्छिवद्वारे व्यवस्थितम्।<br>तत्र स्नात्वा शिवद्वारे प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३<br>ततो गच्छेदनरकं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>यत्र पूर्वे स्थितो ब्रह्मा दक्षिणे तु महेश्वरः॥ २४<br>रुद्रपत्नी पश्चिमतः पद्मनाभोत्तरे स्थितः।<br>मध्ये अनरकं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्॥ २५ | फिर (कुरुतीर्थमें स्नान करनेके बाद) शिवद्वारमें स्थित स्वर्गद्वारको जाय (और स्नान करे); क्योंकि वहाँ (शिवद्वारमें) स्नान करनेसे मनुष्य परमपदको प्राप्त करता है। शिवद्वार जानेके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात अनरक नामके तीर्थमें जाय। उस अनरकके पूर्वमें ब्रह्मा, दक्षिणमें महेश्वर, पश्चिममें रुद्रपत्नी एवं उत्तरमें पद्मनाभ और इन सबके मध्यमें अनरक नामका तीर्थ स्थित है; वह तीनों लोकोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २३-२५॥ |