वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१५- दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, वरुणा-असीकी महिमा, लोलार्क-प्रसंग
| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उपावृत्तस्ततस्तस्माद् गृहस्थाश्रमकाम्यया।<br>असमानर्षिकुलजां कन्यामुद्वहेद् निशाचर ॥ ११<br><br>स्वकर्मणा धनं लब्ध्वा पितृदेवातिथीनपि।<br>सम्यक् संप्रीणयेद् भक्त्या सदाचाररतो द्विजः ॥ १२ | वहाँकी अवधि समाप्त कर ब्रह्मचारी द्विज गृहस्थाश्रमकी कामनासे अपने गोत्रसे भिन्न गोत्रके ऋषिवाले कुलमें उत्पन्न कन्यासे विवाह करे। सदाचारमें रत द्विज अपने नियत कर्मद्वारा धनोपार्जनकर पितरों, देवों एवं अतिथियोंको अपनी भक्तिसे अच्छी तरह तृप्त करे ॥ ९—१२ ॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>सदाचारो निगदितो युष्माभिर्मम सुव्रताः।<br>लक्षणं श्रोतुमिच्छामि कथयध्वं तमद्य मे ॥ १३ | (ब्रह्मचारी ब्राह्मणके नियमोंको सुननेके बाद) सुकेशिने कहा— श्रेष्ठ व्रतवाले ऋषियो! आपलोगोंने मुझसे इसके पूर्व सदाचारका वर्णन किया है। सदाचारका लक्षण क्या है? अब मैं उसे सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे अब उसका वर्णन करें ॥ १३ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>सदाचारो निगदितस्तव योऽस्माभिरादरात्।<br>लक्षणं तस्य वक्ष्यामस्तच्छृणुष्व निशाचर ॥ १४<br><br>गृहस्थेन सदा कार्यमाचारपरिपालनम्।<br>न ह्याचारविहीनस्य भद्रमत्र परत्र च ॥ १५<br><br>यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये।<br>भवन्ति यः समुल्लङ्घ्य सदाचारं प्रवर्तते ॥ १६<br><br>दुराचारो हि पुरुषो नेह नामुत्र नन्दते।<br>कार्यो यत्नः सदाचारे आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १७ | ऋषियोंने कहा— राक्षस! हमलोगोंने तुमसे श्रद्धापूर्वक जिस सदाचारका वर्णन किया है, उसका (अब) लक्षण बतलाते हैं; तुम उसे सुनो। गृहस्थको आचारका सदा पालन करना चाहिये। आचारहीन व्यक्तिका इस लोक और परलोकमें कल्याण नहीं होता है। सदाचारका उल्लङ्घन कर लोक-व्यवहार तथा शास्त्र-व्यवहार करनेवाले पुरुषके यज्ञ, दान एवं तप कल्याणकर नहीं होते। दुराचारी पुरुष इस लोक तथा परलोकमें सुख नहीं पाता। अतः आचार-पालनमें सदा तत्पर रहना चाहिये। आचार दुर्लक्षणोंको नष्ट कर देता है ॥ १४—१७ ॥ |
| तस्य स्वरूपं वक्ष्यामः सदाचारस्य राक्षस।<br>शृणुष्वैकमनास्तच्च यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि ॥ १८<br>धर्मोऽस्य मूलं धनमस्य शाखा<br>पुष्पं च कामः फलमस्य मोक्षः।<br>असौ सदाचारतरुः सुकेशिन्<br>संसेवितो येन स पुण्यभोक्ता ॥ १९<br>ब्राह्मे मुहूर्ते प्रथमं विबुध्ये-<br>दनुस्मरेद् देववरान् महर्षीन्।<br>प्राभातिकं मङ्गलमेव वाच्यं<br>यदुक्तवान् देवपतिस्त्रिनेत्रः ॥ २० | राक्षस! हम उस (पृष्ट) सदाचारका स्वरूप कहते हैं। यदि तुम कल्याण चाहते हो तो एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो। सुकेशिन्! सदाचारका मूल धर्म है, धन इसकी शाखा है, काम (मनोरथ) इसका पुष्प है एवं मोक्ष इसका फल है—ऐसे सदाचाररूपी वृक्षका जो सेवन करता है, वह पुण्यभोगी बन जाता है। मनुष्योंको ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवों एवं महर्षियोंका स्मरण करना चाहिये तथा देवाधिदेव महादेवद्वारा कथित प्रभातकालीन मङ्गलस्तोत्रका पाठ करना चाहिये ॥ १८—२० ॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>किं तदुक्तं प्रभातं शंकरेण महात्मना।<br>प्रभाते यत् पठन्मर्त्यो मुच्यते पापबन्धनात् ॥ २१ | सुकेशिने पूछा— ऋषियो! महादेव शंकरने कौन-सा 'सुप्रभात' कहा है कि जिसका प्रातःकाल पाठ करनेसे मनुष्य पाप-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ सुप्रभातं हरोदितम्।<br>श्रुत्वा स्मृत्वा पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२ | ऋषिगण बोले— राक्षसश्रेष्ठ! महादेवजीद्वारा वर्णित 'सुप्रभात' स्तोत्रको सुनो। इसको सुनने, स्मरण करने और पढ़नेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
| ७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ |
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| ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी<br>भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।<br>गुरुश्च शुक्रः सह भानुजेन<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २३<br>भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च<br>मनुः पुलस्त्यः पुलहः सगौतमः।<br>रैभ्यो मरीचिश्प्यवनो ऋभुश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २४<br>सनत्कुमारः सनकः सनन्दनः<br>सनातनोऽप्यासुरिपिङ्गलौ च।<br>सप्त स्वराः सप्त रसातलाश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २५ | (स्तुति इस प्रकार है—) 'ब्रह्मा, विष्णु, शंकर ये देवता तथा सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनैश्चर ग्रह—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। भृगु, वसिष्ठ, क्रतु, अङ्गिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रैभ्य, मरीचि, च्यवन तथा ऋभु—ये सभी (ऋषि) मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, आसुरि, पिङ्गल, सातों स्वर एवं सातों रसातल—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें'॥ २२–२५॥ |
| पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः<br>स्पर्शश्च वायुर्ज्वलनः सतेजाः।<br>नभः सशब्दं महता सहैव<br>यच्छन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २६<br>सप्तार्णवाः सप्त कुलाचलाश्च<br>सप्तर्षयो द्वीपवराश्च सप्त।<br>भूरादि कृत्वा भुवनानि सप्त<br>ददन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २७<br>इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं<br>पठेत् स्मरेद्वा शृणुयाच्च भक्त्या।<br>दुःस्वप्ननाशोऽनघ सुप्रभातं<br>भवेच्च सत्यं भगवत्प्रसादात्॥ २८<br>ततः समुत्थाय विचिन्तयेत<br>धर्मं तथार्थं च विहाय शय्याम्।<br>उत्थाय पश्चाद्धरिरित्युदीर्य<br>गच्छेत् तदोत्सर्गविधिं हि कर्तुम्॥ २९ | 'गन्धगुणवाली पृथ्वी, रसगुणवाला जल, स्पर्शगुणवाली वायु, तेजोगुणवाली अग्नि, शब्दगुणवाला आकाश एवं महत्तत्त्व—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सातों समुद्र, सातों कुलपर्वत, सप्तर्षि, सातों श्रेष्ठ द्वीप और भू आदि सातों लोक—ये सभी प्रभातकालमें मुझे मङ्गल प्रदान करें।' इस प्रकार प्रातःकालमें परम पवित्र सुप्रभात-स्तोत्रको भक्तिपूर्वक पढ़े, स्मरण करे अथवा सुने। निष्पाप! ऐसा करनेसे भगवान्की कृपासे निश्चय ही उसके दुःस्वप्नका नाश होता है तथा सुन्दर प्रभात होता है। उसके बाद उठकर धर्म तथा अर्थके विषयमें चिन्तन करे और शय्या त्याग करनेके बाद 'हरि'का नाम लेकर उत्सर्ग-विधि (शौच आदि) करनेके लिये जाय॥ २६–२९॥ |
| न देवगोब्राह्मणवह्निमार्गे<br>न राजमार्गे न चतुष्पथे च।<br>कुर्यादधोत्सर्गमपीह गोष्ठे<br>पूर्वापरां चैव समाश्रितो गाम्॥ ३०<br>ततस्तु शौचार्थमुपाहरेन्मृदं<br>गुदे त्रयं पाणितले च सप्त।<br>तथोभयोः पञ्च चतुस्तथैकां<br>लिङ्गे तथैकां मृदमाहरेत॥ ३१<br>नान्तर्जलाद्राक्षस मूषिकस्थला-<br>च्छौचावशिष्टा शरणात् तथान्या। | मल-त्याग देवता, गौ, ब्राह्मण और अग्निके मार्ग, राजपथ (सड़क) और चौराहेपर, गोशालामें तथा पूर्व या पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके न करे। मलत्यागके बाद फिर शुद्धिके लिये मिट्टी ग्रहण करे और मलद्वारमें तीन बार, बायें हाथमें सात बार तथा दोनों हाथोंमें दस बार एवं लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये। राक्षस! सदाचार जाननेवाले मनुष्यको जलके भीतरसे, चूहेकी बिलसे, दूसरोंके शौचसे बची हुई एवं गृहसे मिट्टी नहीं लेनी |
| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वल्मीकमृच्चापि हि शौचनाय<br>ग्राह्या सदाचारविदा नरेण ॥ ३२<br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वापि विद्वान्<br>प्रक्षाल्य पादौ भुवि संनिविष्टः ।<br>समाचमेदद्भिर्फेनिालाभि-<br>रादौ परिमृज्य मुखं द्विरद्भिः ॥ ३३ | चाहिये। दीमककी बाँबीसे भी शुद्धिके लिये मिट्टी नहीं लेनी चाहिये। विद्वान् पुरुष पैर धोनेके पश्चात् उत्तर या पूर्वमुख बैठकर फेनरहित जलसे पहले मुखको दो बार धोये फिर धोनेके बाद आचमन करे ॥ ३०—३३ ॥ |
| ततः स्पृशेत्खानि शिरः करेण<br>संध्यामुपासीत ततः क्रमेण ।<br>केशांस्तु संशोध्य च दन्तधावनं<br>कृत्वा तथा दर्पणदर्शनं च ॥ ३४<br>कृत्वा शिरःस्नानमथाङ्गिकं वा<br>संपूज्य तोयेन पितॄन् सदेवान् ।<br>होमं च कृत्वालभनं शुभानां<br>कृत्वा बहिर्निर्गमनं प्रशस्तम् ॥ ३५<br>दूर्वादधिसर्पिस्थोदकुम्भं<br>धेनुं सवत्सां वृषभं सुवर्णम् ।<br>मृद्गोमयं स्वस्तिकमक्षतानि<br>लाजामधु ब्राह्मणकन्यकां च ॥ ३६<br>श्वेतानि पुष्पाण्यथ शोभनानि<br>हुताशनं चन्दनमर्कबिम्बम् ।<br>अश्वत्थवृक्षं च समालभेत<br>ततस्तु कुर्यान्निजजातिधर्मम् ॥ ३७ | आचमन करनेके बाद अपनी इन्द्रियों तथा सिरको हाथसे स्पर्शकर क्रमशः केश-संशोधन, दन्तधावन एवं दर्पण-दर्शनकर संध्योपासन करे। शिरःस्नान (सिरसे पैरतक स्नान) अथवा अर्धस्नान कर पितरों एवं देवताओंका जलसे पूजन करनेके पश्चात् हवन एवं माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श कर बाहर निकलना प्रशस्त होता है। दूर्वा, दधि, घृत, जलपूर्ण कलश, बछड़ेके साथ गाय, बैल, सुवर्ण, मिट्टी, गोबर, स्वस्तिक चिह्न (卐), अक्षत, लाजा, मधुका स्पर्श करे और ब्राह्मणकी कन्या एवं सूर्यबिम्बका दर्शन करे तथा सुन्दर श्वेतपुष्प, अग्नि, चन्दनका दर्शन कर अश्वत्थ (पीपल) वृक्षका स्पर्श करनेके बाद अपने जाति-धर्म (अपने वर्णके लिये नियतकर्म)-का पालन करे ॥ ३४—३७ ॥ |
| देशानुशिष्टं कुलधर्ममग्र्यं<br>स्वगोत्रधर्मं न हि संत्यजेत ।<br>तेनार्थसिद्धिं समुपाचरेत<br>नासत्प्रलापं न च सत्यहीनम् ॥ ३८<br>न निष्ठुरं नागमशास्त्रहीनं<br>वाक्यं वदेत्साधुजनेन येन ।<br>निन्द्यो भवेन्नैव च धर्मभेदी<br>सङ्गं न चासत्सु नरेषु कुर्यात् ॥ ३९<br>संध्यासु वर्ज्यं सुरतं दिवा च<br>सर्वासु योनीषु पराबलासु ।<br>आगारशून्येषु महीतलेषु<br>रजस्वलास्वेव जलेषु वीर ॥ ४०<br>वृथाऽटनं वृथा दानं वृथा च पशुमारणम् ।<br>न कर्त्तव्यं गृहस्थेन वृथा दारपरिग्रहम् ॥ ४१ | देश-विहित धर्म, श्रेष्ठ कुलधर्म और गोत्रधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, उसीसे अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये। असत्प्रलाप, सत्यरहित, निष्ठुर और वेद-आगमशास्त्रसे असंगत वाक्य कभी न कहे, जिससे साधुजनोंद्वारा निन्दित होना पड़े। किसीके धर्मको हानि न पहुँचाये एवं बुरे लोगोंका सङ्ग भी न करे। वीर! सन्ध्या एवं दिनके समय रति नहीं करनी चाहिये। सभी योनियोंकी परस्त्रियोंमें, गृहहीन पृथ्वीपर, रजस्वला स्त्रीमें तथा जलमें सुरतव्यापार वर्जित है। गृहस्थको व्यर्थ भ्रमण, व्यर्थ दान, व्यर्थ पशुवध तथा व्यर्थ दार-परिग्रह नहीं करना चाहिये ॥ ३८—४१ ॥ |
| वृथाऽटनान्नित्यहानिर्वृथादानाद्धनक्षयः ।<br>वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति पातकं नरकप्रदम् ॥ ४२ | व्यर्थ घूमनेसे नित्यकर्मकी हानि होती है तथा वृथा दानसे धनकी हानि होती है और वृथा पशुवध करनेवाला नरक प्राप्त करानेवाले पापको प्राप्त होता है। अवैध |
| ७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ ] |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| संतत्या हानिरश्लाघ्या वर्णसंकरतो भयम्।<br>भेतव्यं च भवेल्लोके वृथादारपरिग्रहात् ॥ ४३<br>परस्वे परदारे च न कार्या बुद्धिरुत्तमैः।<br>परस्वं नरकायैव परदाराश्च मृत्यवे ॥ ४४<br>नेक्षेत् परस्त्रियं नग्नां न सम्भाषेत तस्करान्।<br>उदक्यादर्शनं स्पर्शं संभाषं च विवर्जयेत् ॥ ४५ | स्त्री-संग्रहसे सन्तानकी निन्दनीय हानि, वर्णसांकर्यका भय तथा लोकमें भी भय होता है। उत्तम व्यक्ति परधन तथा परस्त्रीमें बुद्धि न लगाये। परधन नरक देनेवाला और परस्त्री मृत्युका कारण होती है। परस्त्रीको नग्नावस्थामें न देखे, चोरोंसे बातचीत न करे एवं रजस्वला स्त्रीको न तो देखे, न उसका स्पर्श ही करे और न उससे बातचीत ही करे॥ ४२—४५॥ |
| नैकासने तथा स्थेयं सोदर्या परजायया।<br>तथैव स्यान्न मातुश्च तथा स्वदुहितुस्त्वपि ॥ ४६<br>न च स्नायीत वै नग्नो न शयीत कदाचन।<br>दिग्वाससोऽपि न तथा परिभ्रमणमिष्यते।<br>भिन्नासनभाजनादीन् दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ४७<br>नन्दासु नाभ्यङ्गमुपाचरेत<br>क्षौरं च रिक्तासु जयासु मांसम्।<br>पूर्णासु योषित्परिवर्जयेत<br>भद्रासु सर्वाणि समाचरेत ॥ ४८<br>नाभ्यङ्गमर्के न च भूमिपुत्रे<br>क्षौरं च शुक्रे रविजे च मांसम्।<br>बुधेषु योषिन्न समाचरेत<br>शेषेषु सर्वाणि सदैव कुर्यात् ॥ ४९ | अपनी बहन तथा परस्त्रीके साथ एक आसनपर न बैठे। इसी प्रकार अपनी माता तथा कन्याके साथ भी एक आसनपर न बैठे। नग्न होकर स्नान और शयन न करे। वस्त्रहीन होकर इधर-उधर न घूमे, टूटे आसन और बर्तन आदिको अलग रख दे। नन्दा (प्रतिपद्, षष्ठी और एकादशी) तिथियोंमें तेलसे मालिश न करे, रिक्ता (चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी) तिथियोंमें क्षौर कर्म न करे (न कराये) तथा जया (तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी) तिथियोंमें फलका गूदा नहीं खाना चाहिये। पूर्णा (पञ्चमी, दशमी और पूर्णिमा) तिथियोंमें स्त्रीका सम्पर्क न करे तथा भद्रा (द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी) तिथियोंमें सभी कार्य करे। रविवार एवं मङ्गलवारको तेलकी मालिश, शुक्रवारको क्षौरकर्म नहीं कराना चाहिये (न करना चाहिये)। शनिवारको फलका गूदा न खाये तथा बुधवारको स्त्री वर्ज्य है। शेष दिनोंमें सभी कार्य सदैव कर्तव्य हैं॥ ४६—४९॥ |
| चित्रासु हस्ते श्रवणे न तैलं<br>क्षौरं विशाखास्वभिजित्सु वर्ज्यम्।<br>मूले मृगे भाद्रपदास मांसं<br>योषिन्मघाकृत्तिकयोत्तरासु ॥ ५०<br>सदैव वर्ज्यं शयनमुदक्शिरा-<br>स्तथा प्रतीच्यां रजनीचरेश।<br>भुञ्जीत नैवेह च दक्षिणामुखो<br>न च प्रतीच्यामभिभोजनीयम् ॥ ५१<br>देवालयं चैत्यतरुं चतुष्पथं<br>विद्याधिकं चापि गुरुं प्रदक्षिणम्।<br>माल्यान्नपानं वसनानि यत्नतो<br>नान्यैर्धृतांश्चापि हि धारयेद् बुधः ॥ ५२<br>स्नायाच्छिरःस्नानतया च नित्यं<br>न कारणं चैव विना निशासु।<br>ग्रहोपरागे स्वजनापयाते<br>मुक्त्वा च जन्मर्क्षगते शशाङ्के ॥ ५३ | चित्रा, हस्त और श्रवण नक्षत्रोंमें तेल तथा विशाखा और अभिजित् नक्षत्रोंमें क्षौर-कार्य नहीं करना-कराना चाहिये। मूल, मृगशिरा, पूर्वाभाद्रपद और उत्तराभाद्रपदमें गूदा-भक्षण तथा मघा, कृत्तिका और तीनों उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद)-में स्त्री-सहवास न करे। राक्षसराज! उत्तर एवं पश्चिमकी ओर सिर करके शयन नहीं करना चाहिये। दक्षिण एवं पश्चिममुख भोजन नहीं करना चाहिये। देवमन्दिर, चैत्य-वृक्ष, देवताके समान पूज्य पीपल आदिके वृक्ष, चौराहे, अपनेसे अधिक विद्वान् तथा गुरुकी प्रदक्षिणा करे। बुद्धिमान् व्यक्ति यत्नपूर्वक दूसरेके द्वारा व्यवहृत माला, अन्न और वस्त्रका व्यवहार न करे। नित्य सिरके ऊपरसे स्नान करे। ग्रहोपराग (ग्रहणके समय) और स्वजनकी मृत्यु तथा जन्म-नक्षत्रमें चन्द्रमाके रहनेके अतिरिक्त समयमें रात्रिमें बिना विशेष कारण स्नान नहीं करना चाहिये॥ ५०—५३॥ |