वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३३- सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करने तथा तीर्थमें स्नान करनेका महत्त्व
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४१
| आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं चीरमथाङ्गिराः॥<br>आसनं चैव पुलहः पुलस्त्यः पीतवाससी॥ ३७<br><br>उपस्तस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूषणाः।<br>शास्त्राण्यशेषाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः॥ ३८<br><br>स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः।<br>सर्वदेवमयो देवो बलेरध्वरमभ्यगात्॥ ३९ | यज्ञोपवीत दिया। ब्रह्मपुत्र मरीचिने उन्हें पलाशदण्ड, वसिष्ठने कमण्डलु और अङ्गिराने रेशमी वस्त्र दिया। पुलहने आसन तथा पुलस्त्यने दो पीले वस्त्र दिये। ओंकारके स्वरसे अलंकृत वेद, सभी शास्त्र तथा सांख्ययोग आदि दर्शनोंकी उक्तियाँ उनका उपस्थान करने लगीं। समस्त देवताओंके मूर्तिरूप वामनभगवान् जटा, दण्ड, छत्र एवं कमण्डलु धारण करके बलिकी यज्ञभूमिमें पधारे॥ ३६—३९॥ |
| यत्र यत्र पदं विप्रा भूभागे वामनो ददौ।<br>ददाति भूमिविवरं तत्र तत्राभिपीडिता॥ ४०<br><br>स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम्।<br>साब्धिद्वीपवतीं सर्वां चालयामास मेदिनीम्॥ ४१<br><br>बृहस्पतिस्तु शनकैर्मार्गं दर्शयते शुभम्।<br>तथा क्रीडाविनोदार्थमतिजाड्यगतोऽभवत्॥ ४२<br><br>ततः शेषो महानागो निःसृत्यासौ रसातलात्।<br>साहाय्यं कल्पयामास देवदेवस्य चक्रिणः॥ ४३<br><br>तदद्यापि च विख्यातमहेर्बिलमनुत्तमम्।<br>तस्य संदर्शनादेव नागेभ्यो न भयं भवेत्॥ ४४ | ब्राह्मणो! पृथ्वीपर वामनभगवान् जिस-जिस स्थानपर डग रखते थे, वहाँकी दबी हुई भूमिमें दरार पड़ जाता था—गड्डा हो जाता था। मधुरभावसे धीरे-धीरे चलते हुए वामनभगवान्ने समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसे युक्त सारी पृथ्वीको कँपा दिया। बृहस्पति भी शनैः-शनैः उन्हें सारे कल्याणकारी मार्गको दिखाने लगे एवं स्वयं भी क्रीडापूर्ण मनोरञ्जनके लिये अत्यन्त धीरे-धीरे चलने लगे। उसके बाद महानाग शेष रसातलसे ऊपर आकर देवदेव चक्रधारी भगवान्की सहायता करने लगे। आज भी वह श्रेष्ठ सर्पोंका बिल विख्यात है और उसके दर्शनमात्रसे नागोंसे भय नहीं होता॥ ४०—४४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणे तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥
इकतीसवाँ अध्याय
वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना और बलिका पातालमें जाना
| लोमहर्षण उवाच<br>सपर्वतवनामुर्वी दृष्ट्वा संक्षुभितां बलिः।<br>पप्रच्छोशनसं शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ १<br><br>आचार्य क्षोभमायाति साब्धिभूमिधरा मही।<br>कस्माच्च नासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः॥ २<br><br>इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः।<br>उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः॥ ३ | लोमहर्षण बोले— बलिने वनों और पर्वतोंके साथ सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षोभसे भरी देखकर हाथ जोड़ करके शुक्राचार्यको प्रणाम कर पूछा—आचार्यदेव! समुद्र तथा पर्वतोंके साथ पृथ्वीके क्षुब्ध होनेका क्या कारण है और अग्निदेव असुरोंके भागोंको क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं? बलिके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् शुक्राचार्यने चिरकालतक ध्यान लगाकर (और |
१४२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३१
अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः। तथ्य समझकर) दैत्येन्द्रसे कहा-कश्यपके घरमें
वामनेनेह रूपेण परमात्मा सनातनः ॥ ४ जगद्योनि - संसारको उत्पन्न करनेवाले सनातन परमात्मा
वामनके रूपमें अवतीर्ण हो गये हैं ॥ १-४ ॥
स नूनं यज्ञमायाति तव दानवपुंगव । दानवश्रेष्ठ ! वे ही प्रभु तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं।
तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही ॥ ५ उन्हींके पैर रखनेसे पृथ्वीमें विक्षोभ हो रहा है जिससे
यह पृथ्वी काँप रही है, ये पर्वत भी काँप रहे हैं और
कम्पन्ते गिरयश्चेमे क्षुभिता मकरालयाः। सिन्धुमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं। इस भूमिमें उन
नेयं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम् ॥ ६ भूतपति भगवान्को वहन करनेकी शक्ति नहीं है। ये ही
सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। (परमात्मा) देव, असुर, गन्धर्व-देवों, मनुष्यों एवं
अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः । महासुरोंको धारण करते हैं। जगत्को धारण करनेवाले
धारयत्यखिलान् देवान् मनुष्यांश्च महासुरान् ॥ ७ भगवान् कृष्णकी ही यह गम्भीर (अचिन्त्य) माया है,
इयमस्य जगद्धातुर्माया कृष्णस्य गह्नरी। जिस मायाके द्वारा यह संसार धार्यधारकभावसे क्षुब्ध हो
धार्यधारकभावेन यया संपीडितं जगत् ॥ ८ रहा है ॥ ५-८ ॥
तत्संनिधानादसुरा न भागार्हाः सुरद्विषः। उनके सन्निधान होनेके कारण देवताओंके शत्रु
भुञ्जते नासुरान् भागानपि तेन त्रयोऽग्नयः ॥ ९ दैत्यलोग यज्ञ-भाग पानेके योग्य नहीं रह गये हैं,
अतएव तीनों अग्निदेव भी असुरोंके भागको नहीं ले
रहे हैं। शुक्राचार्यकी बात सुननेके बाद बलिके रोंगटे
शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा हृष्टरोमाऽब्रवीद् बलिः । खड़े हो गये। उसके बाद बलिने (शुक्राचार्यसे)
धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्। कहा-ब्रह्मन् ! मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गया, जो
यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान् ॥ १० स्वयं यज्ञके अधिपति भगवान् लगातार मेरे यज्ञमें
पधार रहे हैं। कौन दूसरा पुरुष मुझसे श्रेष्ठ है ? सदैव
सावधान रहनेवाले योगीलोग जिन नित्य परमात्माको
यं योगिनः सदोद्युक्ताः परमात्मानमव्ययम् । देखना चाहते हैं, वे ही देव मेरे यज्ञमें (कृपाकर)
द्रष्टुमिच्छन्ति देवोऽसौ ममाध्वरमुपेष्यति। पधार रहे हैं। आचार्य! मुझे जो करना चाहिये, उसे
यन्मयाचार्य कर्त्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि ॥ ११ आप आदिष्ट कीजिये ॥ ९-११ ॥
शुक्र उवाच शुक्राचार्य बोले - असुर ! वेदोंका विधान है
यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर । कि यज्ञभागके भोक्ता देवता हैं। परंतु दैत्य ! तुमने यज्ञभागका
भोक्ता दानवोंको बना दिया है। (यह वेद-विधानके
त्वया तु दानवा दैत्य यज्ञभागभुजः कृताः ॥ १२ विपरीत किया है-विधानका उल्लङ्घन किया है।) ये
ही देव सत्त्वगुणका आश्रय लेकर विश्वकी स्थिति और
अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् । पालन करते हैं और ये ही सृष्टि भी करते हैं, फिर ये
विसृष्टं च तथाऽयं च स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥ १३ ही प्रभु स्वयं प्रजाका (जीवोंका) अन्त भी करते हैं।
विष्णु स्थितिके कार्यमें (कल्याणमय मर्यादाके स्थापनमें)
भवांस्तु वन्दी भविता नूनं विष्णुः स्थितौ स्थितः । तत्पर हो गये हैं। अतः आपको निश्चय ही बन्दी होना
विदित्त्वैवं महाभाग कुरु यत् ते मनोगतम् ॥ १४ है। महाभाग! इसपर विचारकर तुम्हारे मनमें जैसी