वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१- श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनाश्रयी प्रश्न, शिवजीका लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना
[ ७ ]
| क्रमाङ्क | विषय | पृष्ठ-संख्या | क्रमाङ्क | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| देनेका धुन्धुका निश्चय, वामनका त्रिविक्रम होना और धुन्धुका वध .................. | ३८३ | ८८- | बलिको कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव, उनकी स्तुति, बलिके यज्ञमें जानेकी उत्कण्ठा और भरद्वाजसे स्वस्थानका कथन .................................. | ४३४ | |
| ७९- | पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट तथा परस्पर वृत्तान्तका कहना एवं श्रवण-द्वादशीका माहात्म्य, गयामें श्राद्ध करनेसे प्रेत-योनिसे मुक्ति और पुरूरवाको सुरूपकी प्राप्ति | ३९० | ८९- | वामनभगवान्का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना ........... | ४३९ |
| ८०- | नक्षत्र-पुरुषके वर्णन-प्रसङ्गमें नक्षत्र-पुरुषकी पूजाका विधान और नक्षत्र-पुरुषके व्रतका माहात्म्य ....... | ३९६ | ९०- | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता, बलि और शुक्रके संवाद-प्रसङ्गमें कोशकारकी कथा .................................................... | ४४३ |
| ८१- | प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भवका आख्यान............................... | ३९९ | ९१- | वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना, वामनका विराद्रूप ग्रहण करना एवं त्रिविक्रमत्व, वामनका बलिबन्धन-विषयक प्रश्न, बलिको वर, बलिका पाताल और वामनका स्वर्ग-गमन ............................................ | ४५३ |
| ८२- | चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना, हरका विरूपाक्ष हो जाना और श्रीदाम-वध ............. | ४०२ | ९२- | ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति और वामनरूपमें विष्णुका स्वर्गमें निवास ......................................... | ४५९ |
| ८३- | प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व ................................................... | ४०६ | ९३- | बलिका पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति, प्रह्लादद्वारा विष्णुभक्तिकी प्रशंसा ............................. | ४६३ |
| ८४- | प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना, गजेन्द्रद्वारा विष्णुकी स्तुति, गज-ग्राहका उद्धार एवं 'गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र' की फलश्रुति ........... | ४११ | ९४- | बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान, विष्णु-मन्दिर-निर्माण और विष्णुभक्त एवं वृद्धवाक्यकी महिमाका वर्णन ..................................... | ४७० |
| ८५- | सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त, राक्षसग्रस्त मुनिकी अग्नि-प्रार्थना, सारस्वतस्तोत्र और मुनिद्वारा राक्षसको उपदेश................... | ४१८ | ९५- | पुराण-वाचन, श्रवण-श्रवण और पठनकी फलश्रुति ................................................. | ४७६ |
| ८६- | स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र........................... | ४२७ | |||
| ८७- | अगस्त्यद्वारा कथित पापप्रशमनस्तोत्र ................ | ४३२ |
[चित्र: राजा बलि और उनकी पत्नी द्वारा वामन देव का स्वागत]
शशिकांत
॥ श्रीहरिः ॥
॥ ॐ नमो भगवते त्रिविक्रमाय ॥
अथ श्रीवामनपुराणम्
पहला अध्याय
श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनाश्रयी प्रश्न; शिवजीका
लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
भगवान् श्रीनारायण, मनुष्योंमें श्रेष्ठ नर, भगवती
सरस्वतीदेवी और (पुराणोंके कर्ता) महर्षि व्यासजीको
नमस्कार करके जय (पुराणों तथा महाभारत आदि
ग्रन्थों)-का उच्चारण (पठन) करना चाहिये*।
जिन्होंने बलिसे (भूमि, स्वर्ग और पाताल-इन)
तीनों लोकोंके राज्यको छीनकर इन्द्रको दे दिया, उन
मायामय वामनरूपधारी और लक्ष्मीको हृदयमें धारण
करनेवाले विष्णुको नमस्कार है।
(एक बारकी बात है कि-) वाग्मियोंमें श्रेष्ठ
विद्वद्वर पुलस्त्य ऋषि अपने आश्रममें बैठे हुए थे;
(वहीं) नारदजीने उनसे वामनपुराणकी कथा-(इस
प्रकार) पूछी। उन्होंने कहा-ब्रह्मन्! महाप्रभावशाली
भगवान् विष्णुने कैसे वामनका अवतार ग्रहण किया था,
इसे आप मुझ जिज्ञासुको बतलायें। एक तो मेरी यह
शङ्का है कि दैत्यवर्य प्रह्लादने विष्णुभक्त होकर भी
त्रैलोक्यराज्यमाक्षिप्य बलेरिन्द्राय यो ददौ।
श्रीधराय नमस्तस्मै छद्मवामनरूपिणे ॥ १
पुलस्त्यमृषिमासीनमाश्रमे वाग्विदां वरम्।
नारदः परिपप्रच्छ पुराणं वामनाश्रयम् ॥ २
कथं भगवता ब्रह्मन् विष्णुना प्रभविष्णुना।
वामनत्वं धृतं पूर्वं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ३
कथं च वैष्णवो भूत्वा प्रह्लादो दैत्यसत्तमः।
त्रिदशैर्युयुधे सार्धमत्र मे संशयो महान् ॥ ४
- महाभारतके उल्लेखानुसार नर-नारायण ब्रह्मर्षिरूपमें विभक्त परमात्मा ही हैं, जो बादमें अर्जुन और कृष्ण हुए। ये
ही नारायणीय या भागवतधर्मके प्रधान प्रचारक हैं, अतः भागवतीय ग्रन्थोंमें सर्वत्र इन दोनोंको नमस्कार किया गया है। पुराण-
प्रवचनमें भी इस श्लोकको माङ्गलिक रूपमें पढ़नेकी प्राचीन प्रथा है।
महाभारतका प्राचीन नाम 'जय' है; पर उपलक्षणसे पुराणोंका भी ग्रहण किया जाता है। भविष्यपुराणका वचन है-
अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा। कार्त्स्नं वेदपञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः ॥
जयेति नाम चैतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ (भविष्यपुराण १।१।५-६)
अर्थात्-अठारहों पुराण, रामायण और सम्पूर्ण (वेदार्थ) पाँचवाँ वेद, जिसे महाभारत-रूपमें जानते हैं-इन सबको
मनीषीलोग 'जय' कहते हैं।