वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७२- स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| ३४६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| विरथं तु कृतं पश्चादेनं धक्ष्यति शङ्करः।<br>नोपेक्ष्यः शत्रुरुद्दिष्टो देवाचार्येण देवताः॥ १३<br><br>इत्येवमुक्ताः प्रमथा वासुदेवेन सामराः।<br>चक्रुवेगं सहेन्द्रेण समं चक्रधरेण च॥ १४ | शत्रुको बिना रथका कर दें। बिना रथका करनेके बाद तो शंकर इसे भस्म कर देंगे। देवो! देवताओंके आचार्य बृहस्पतिने कहा है कि शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र एवं विष्णुसहित प्रमथों तथा देवोंने शीघ्रतासे चढ़ाई कर दी॥ ११-१४॥ |
| तुरगाणां सहस्रं तु मेघाभानां जनार्दनः।<br>निमिषान्तरमात्रेण गदया विनिपोथयत्॥ १५<br><br>हताश्वात् स्यन्दनात् स्कन्दः प्रगृह्य रथसारथिम्।<br>शक्त्या विभिन्नहृदयं गतासुं व्यसृजद् भुवि॥ १६<br><br>विनायकाद्याः प्रमथाः समं शक्रेण दैवतैः।<br>सध्वजाक्षं रथं तूर्णमभञ्जन्त तपोधनाः॥ १७<br><br>सहसा स महातेजा विरथस्त्यज्य कार्मुकम्।<br>गदामादाय बलवानभिदुद्राव दैवतान्॥ १८ | जनार्दन (विष्णु)-ने क्षणमात्रमें ही अपनी (कौमोदकी) गदासे बादल-जैसे काले रंगवाले हजारों घोड़ोंको मार डाला। स्कन्दने मारे गये घोड़ोंवाले रथसे सारथिको खींचकर शक्तिसे उसके हृदयको विदीर्ण कर दिया और प्राणहीन हो जानेपर उसे पृथ्वीपर फेंक दिया। इन्द्र आदि देवताओंके साथ तपोधन विनायक प्रभृति प्रमथोंने शीघ्र ध्वजा और पहिये तथा धुरेके साथ रथको तोड़ डाला। (जब) महातेजस्वी पराक्रमी (अन्धक)-ने बिना रथके हो जानेपर धनुषको छोड़ दिया और गदा लेकर वह देवताओंकी ओर दौड़ पड़ा - ॥ १५-१८॥ |
| पदान्यष्टौ ततो गत्वा मेघगम्भीरया गिरा।<br>स्थित्वा प्रोवाच दैत्येन्द्रो महादेवं स हेतुमत्॥ १९<br><br>भिक्षो भवान् सहानीकस्त्वसहायोऽस्मि साम्प्रतम्।<br>तथाऽपि त्वां विजेष्यामि पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥ २०<br><br>तद्वाक्यं शङ्करः श्रुत्वा सेन्द्रान्सुरगणांस्तदा।<br>ब्रह्मणा सहितान् सर्वान् स्वशरीरे न्यवेशयत्॥ २१<br><br>शरीरस्थांस्तान् प्रमथान् कृत्वा देवांश्च शङ्करः।<br>प्राह एह्येहि दुष्टात्मन् अहमेकोऽपि संस्थितः॥ २२ | तब दैत्येन्द्रने आठ पग चलकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें महादेवसे अपना अभीष्ट वचन कहा- भिक्षुक! यद्यपि इस समय तुम सेनावाले हो और मैं असहाय हूँ, फिर भी मैं तुमको जीत लूँगा। आज मेरी शक्ति देखो। उसका वचन सुनकर शंकरने इन्द्र और ब्रह्माके साथ सभी देवताओंको अपने शरीरमें निवेशित कर लिया - छिपा लिया। उन प्रमथों एवं देवोंको अपने शरीरमें छिपानेके बाद शंकरने कहा- दुष्टात्मन्! आओ, आओ! मैं अकेला रहनेपर भी (तुमसे लड़नेके लिये) खड़ा हूँ॥ १९-२२॥ |
| तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सर्व्वामरगणक्षयम्।<br>दैत्यः शङ्करमभ्यागाद् गदामादाय वेगवान्॥ २३<br><br>तमापतन्तं भगवान् दृष्ट्वा त्यक्त्वा वृषोत्तमम्।<br>शूलपाणिर्गिरिप्रस्थे पदातिः प्रत्यतिष्ठत॥ २४<br><br>वेगेनैवापतन्तं च बिभेदोरसि भैरवः।<br>दारुणं सुमहद् रूपं कृत्वा त्रैलोक्यभीषणम्॥ २५<br><br>दंष्ट्राकरालं रविकोटिसंनिभं मृगारिचर्माभिवृतं जटाधरम्।<br>भुजङ्गहारामलकण्ठकन्दरं विंशार्धबाहुं सषडर्धलोचनम्॥ २६ | समस्त देवगणोंसे संहार किये जाते उस महान् आश्चर्यको देखकर वह दैत्य गदा लेकर शीघ्रतासे शंकरके पास चला गया। भगवान् शूलपाणि उसे आते देख अपने श्रेष्ठ वृषभ (नन्दी)-को छोड़कर पर्वतपर पैरोंके बल खड़े हो गये। भैरवने तीनों लोकोंको डरा देनेवाला अत्यन्त भयानक रूप धारण करके तेजीसे आ रहे उस (अन्धक)-का हृदय विदीर्ण कर दिया। (उस समय शंकरका रूप) भयानक दाढ़ोंवाले करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, बाघम्बर पहने, जटासे सुशोभित, सर्पके हारसे अलंकृत ग्रीवावाला तथा दस भुजा और तीन नयनोंसे युक्त था॥ २३-२६॥ |
अध्याय ७०] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एतादृशेन रूपेण भगवान् भूतभावनः।<br>बिभेद शत्रुं शूलेन शुभदः शाश्वतः शिवः ॥ २७<br>सशूलं भैरवं गृह्य भिन्नेप्युरसि दानवः।<br>विजहारातिवेगेन क्रोशमात्रं महामुने ॥ २८<br>ततः कथंचिद् भगवान् संस्तभ्यात्मानमात्मना।<br>तूर्णमुत्पाटयामास शूलेन सगदं रिपुम् ॥ २९<br>दैत्याधिपस्त्वपि गदां हरमूर्ध्नि न्यपातयत्।<br>कराभ्यां गृह्य शूलं च समुत्पतत दानवः ॥ ३० | ऐसे लक्षणोंसे संयुक्त मङ्गलदाता, शाश्वत, भूतभावन भगवान् शिवने शूलसे शत्रुको विदीर्ण कर दिया। महामुने ! हृदयके विदीर्ण हो जानेपर भी दानव शूलके साथ भैरवको पकड़कर एक कोसतक उन्हें खींच ले गया। तब भगवान्ने किसी प्रकार अपनेसे अपनेको रोककर गदा लिये हुए शत्रुको अपने शूलसे तुरंत मारा। दैत्योंके स्वामी (अन्धक)-ने भी शंकरके सिरपर गदाका वार किया और शूलको दोनों हाथोंसे पकड़कर ऊपर उछल गया ॥ २७—३० ॥ |
| संस्थितः स महायोगी सर्वाधारः प्रजापतिः।<br>गदापातक्षताद् भूरि चतुर्थाऽसृगथापतत् ॥ ३१<br>पूर्वधारारसमुद्भूतो भैरवोऽग्निसमप्रभः।<br>विद्याराजेति विख्यातः पद्ममालाविभूषितः ॥ ३२<br>तथा दक्षिणधारोत्थो भैरवः प्रेतमण्डितः।<br>कालराजेति विख्यातः कृष्णाञ्जनसमप्रभः ॥ ३३<br>अथ प्रतीचीधारोत्थो भैरवः पत्रभूषितः।<br>अतसीकुसुमप्रख्यः कामराजेति विश्रुतः ॥ ३४ | सबके आधारस्वरूप महायोगी वे प्रजापति शंकरजी खड़े रहे; परंतु इसके बाद गदाके आघातसे हुए चोटसे (चारों दिशाकी) चार धाराओंमें बहुत अधिक रक्त प्रवाहित होने लग गया। पूर्व दिशाकी धारासे अग्निके समान प्रभाववाले, कमलकी मालासे सुशोभित 'विद्याराज' नामसे प्रसिद्ध भैरव उत्पन्न हुए। दक्षिण दिशाकी धारासे प्रेतसे मण्डित काले अञ्जनके समान प्रभाववाले 'कालराज' नामसे प्रसिद्ध भैरव उत्पन्न हुए। उसके बाद पश्चिम दिशाकी धारासे अलसीके फूलके समान पत्रसे शोभित 'कामराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए ॥ ३१—३४ ॥ |
| उदग्धाराभवश्चान्यो भैरवः शूलभूषितः।<br>सोमराजेति विख्यातश्चक्रमालाविभूषितः ॥ ३५<br>क्षतस्य रुधिराज्जातो भैरवः शूलभूषितः।<br>स्वच्छन्दराजो विख्यात इन्द्रायुधसमप्रभः ॥ ३६<br>भूमिस्थाद् रुधिराज्जातो भैरवः शूलभूषितः।<br>ख्यातो ललितराजेति सौभाञ्जनसमप्रभः ॥ ३७<br>एवं हि सप्तरूपोऽसौ कथ्यते भैरवो मुने।<br>विघ्नराजोऽष्टमः प्रोक्तो भैरवाष्टकमुच्यते ॥ ३८ | उत्तर दिशाकी धारासे चक्रमालासे सुशोभित (एवं) शूल लिये 'सोमराज' नामसे प्रसिद्ध अन्य भैरव उत्पन्न हुए। घावके रक्तसे इन्द्रधनुषके समान चमकवाले (एवं) शूल लिये 'स्वच्छन्दराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए। पृथ्वीपर गिरे हुए रक्तसे सौभाञ्जन (सहिजन)-के समान (एवं) शूल लिये शोभायुक्त 'ललितराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए। मुने ! इस प्रकार इन भैरवका सात रूप कहा जाता है। 'विघ्नराज' आठवें भैरव हैं। इन्हें भैरवाष्टक (आठों भैरव) कहा जाता है ॥ ३५—३८ ॥ |
| एवं महात्मना दैत्यः शूलप्रोतो महासुरः।<br>छत्रवद् धारितो ब्रह्मन् भैरवेण त्रिशूलिना ॥ ३९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] ब्रह्मन् ! इस प्रकार त्रिशूल धारण करनेवाले महात्मा भैरवने शूलसे विद्ध हुए महासुर दैत्यको छातेकी भाँति ऊपर उठा लिया। ब्रह्मन् ! |
| तस्यासृगुल्बणं ब्रह्मञ्छूलभेदादवापतत्।<br>येनाकण्ठं महादेवो निमग्नः सप्तमूर्तिमान् ॥ ४०<br>ततः स्वेदोऽभवद् भूरि श्रमजः शङ्करस्य तु।<br>ललाटफलके तस्माज्जाता कन्याऽसृगाप्लुता ॥ ४१ | शूलसे विद्ध होनेके कारण उसका बहुत अधिक रक्त गिरा। उससे सात मूर्तिवाले महादेव गलेतक लहू-लुहान हो गये। परिश्रम करनेके कारण शंकरके पूरे ललाटपर बहुत अधिक पसीना आ गया। उससे खूनसे लथपथ |
| ३४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| यद्भूम्यां न्यपतद् विप्र स्वेदबिन्दुः शिवाननात् ।<br>तस्मादङ्गारपुञ्जाभो बालकः समजायत ॥ ४२<br>स बालस्तृषितोऽत्यर्थं पपौ रुधिरमान्धकम् ।<br>कन्या चोत्कृत्य संजातमसृग्विलिलिहेऽद्भुता ॥ ४३ | एक कन्या उत्पन्न हुई। विप्र! शिवके मुखसे भूमिपर गिरे पसीनोंकी बूँदोंसे अंगारे-जैसी कान्तिवाला एक बालक उत्पन्न हुआ॥ ३९—४२॥<br>अत्यन्त प्यासा वह बालक अन्धकका रक्त पीने लगा और अद्भुत कन्या भी काटकर उत्पन्न हुए रक्तको चाटने लगी। उसके बाद भैरवका रूप धारण करनेवाले वरदानी शंकरने प्रातःकालके सूर्यके समान कान्तिवाली उस कन्यासे जगत्-कल्याणकारी महान् वचन कहा— |
| ततस्तामाह बालार्कप्रभां भैरवमूर्तिमान् ।<br>शङ्करो वरदो लोके श्रेयोऽर्थाय वचो महत् ॥ ४४<br>त्वां पूजयिष्यन्ति सुरा ऋषयः पितरोरगाः ।<br>यक्षविद्याधराश्चैव मानवाश्च शुभङ्करि ॥ ४५<br>त्वां स्तोष्यन्ति सदा देवि बलिपुष्पोत्करैः करैः ।<br>चर्चिकेति शुभं नाम यस्माद् रुधिरचर्चिता ॥ ४६ | शुभकारिणि! देवता, ऋषि, पितर, सर्पादि, यक्ष, विद्याधर एवं मानव तुम्हारी पूजा करेंगे। देवि! (वे लोग) बलि एवं पुष्पाञ्जलिसे तुम्हारी स्तुति करेंगे। यतः तुम रक्तसे चर्चित (लथपथ) हो, अतः तुम्हारा शुभ नाम 'चर्चिका' होगा॥ ४३—४६॥ |
| इत्येवमुक्ता वरदेन चर्चिका<br>भूतानुजाता हरिचर्मवासिनी ।<br>महीं समन्ताद् विचचार सुन्दरी<br>स्थानं गता हिङ्गुलताद्रिमुत्तमम् ॥ ४७<br>तस्यां गतायां वरदः कुजस्य<br>प्रादाद् वरं सर्ववरोत्तमं यत् ।<br>ग्रहाधिपत्यं जगतां शुभाशुभं<br>भविष्यति त्वद्वशगं महात्मन् ॥ ४८ | वरदानी शंकरके ऐसा कहनेपर व्याघ्रचर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाली और सब भूतोंके बाद उत्पन्न हुई सुन्दरी चर्चिका पृथ्वीपर चारों ओर विचरती हुई इंगुरके रंगवाले उत्तम पर्वतपर चली गयी। उसके (वहाँ) चले जानेपर वरदानी शंकरने कुज (मंगल)को सर्वश्रेष्ठ वर दिया। (उन्होंने कहा—) महात्मन्! तुम ग्रहोंके स्वामी बनोगे तथा संसारका शुभ और अशुभ तुम्हारे अधीन होगा। |
| हरोऽन्धकं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>दिव्यं स्वनेत्रार्कहुताशनेन ।<br>चकार संशुष्कतनुं त्वशोणितं<br>त्वगस्थिशेषं भगवान् स भैरवः ॥ ४९<br>तत्राग्निना नेत्रभवेन शुद्धः<br>स मुक्तपापोऽसुरराड् बभूव ।<br>ततः प्रजानां बहुरूपमीशं<br>नाथं हि सर्वस्य चराचरस्य ॥ ५०<br>ज्ञात्वा स सर्वेश्वरमीशमव्ययं<br>त्रैलोक्यनाथं वरदं वरेण्यम् ।<br>सर्वैः सुराद्यैर्नतमीड्यमाद्यं<br>ततोऽन्धकः स्तोत्रमिदं चकार ॥ ५१ | उन भैरव-रूपधारी भगवान् शिवने अपने अग्नि और सूर्यरूपी नेत्रोंसे एक हजार दिव्य वर्षोंतक अन्धकके शरीरको सुखाकर रक्तरहित कर हड्डी तथा चाम शेष रखकर कंकाल बना दिया। शंकरके नेत्रसे उत्पन्न अग्निद्वारा शुद्ध होनेके कारण वह असुरराज पापसे छूट गया। उसके बाद अनेक रूप धारण करके प्रजाओंका नियमन करनेवाले, समस्त चर और अचरके स्वामी, सर्वेश्वर, अविनाशी ईश, त्रैलोक्यपति, वरदानी, वरेण्य, सभी सुरादिकोंद्वारा विनयपूर्वक स्तुति करनेयोग्य एवं सबके आदिमें रहनेवाले शंकरको वास्तवरूपमें जानकर अन्धकने यह स्तुति की—॥ ४७—५१॥ |
| अन्धक उवाच<br>नमोऽस्तु ते भैरव भीममूर्ते<br>त्रिलोकगोप्त्रे शितशूलधारिणे ।<br>विंशार्द्धबाहो भुजगेशहार<br>त्रिनेत्र मां पाहि विपन्नबुद्धिम् ॥ ५२<br>जयस्व सर्वेश्वर विश्वमूर्ते<br>सुरासुरैर्वन्दितपादपीठ ।<br>त्रैलोक्यमातुर्गुरवे वृषाङ्क<br>भीतः शरण्यं शरणागतोऽस्मि ॥ ५३ | अन्धकने कहा— हे विशालकाय भैरव! हे त्रिलोककी रक्षा करनेवाले! हे तीक्ष्ण शूल धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे दस भुजाओंवाले तथा नागेशका हार धारण करनेवाले त्रिनेत्र! आप मुझ नष्टमतिकी रक्षा करें। हे देवों तथा असुरोंसे वन्दित पादपीठवाले विश्वमूर्ति सर्वेश्वर! आपकी जय हो। हे त्रिलोक-जननीके स्वामी वृषाङ्क! मैं भयभीत होकर आप शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें आया हूँ। |
अध्याय ७०] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्वां नाथ देवाः शिवमीरयन्ति<br>सिद्धा हरं स्थाणुं महर्षयश्च।<br>भीमं च यक्षा मनुजा महेश्वरं<br>भूताश्च भूताधिपमाममन्ति॥ ५४<br>निशाचरा उग्रमुपार्चयन्ति<br>भवेति पुण्याः पितरो नमन्ति।<br>दासोऽस्मि तुभ्यं हर पाहि मां<br>पापक्षयं मे कुरु लोकनाथ॥ ५५ | हे नाथ! देवता आपको शिव (मङ्गलमय) कहते हैं। सिद्धलोग आपको हर (पापहारी), महर्षिलोग स्थाणु (अचल), यक्षलोग भीम, मनुष्य महेश्वर और भूत भूताधिपति मानते हैं। निशाचर उग्र नामसे आपकी अर्चना करते हैं तथा पुण्यात्मा पितृगण भव नामसे आपको नमस्कार करते हैं। हे हर! मैं आपका दास हूँ, आप मेरी रक्षा करें। हे लोकनाथ! मेरे पापोंका आप विनाश कीजिये॥ ५२-५५॥ |
| भवांस्त्रिदेवस्त्रियुगस्त्रिधर्मा<br>त्रिपुष्करश्चासि विभो त्रिनेत्र।<br>त्रय्यारुणिस्त्रिश्रुतिरव्ययात्मन्<br>पुनीहि मां त्वां शरणं गतोऽस्मि॥ ५६<br>त्रिणाचिकेतस्त्रिपदप्रतिष्ठः<br>षडङ्गवित् त्वं विषयेष्वलुब्धः।<br>त्रैलोक्यनाथोऽसि पुनीहि शम्भो<br>दासोऽस्मि भीतः शरणागतस्ते॥ ५७<br>कृतं महच्छङ्कर तेऽपराधं<br>मया महाभूतपते गिरीश।<br>कामारिणा निर्जितमानसेन<br>प्रसादये त्वां शिरसा नतोऽस्मि॥ ५८<br>पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भवः।<br>त्राहि मां देव ईशान सर्वपापहरो भव॥ ५९ | हे सर्वसमर्थ त्रिनेत्र! आप त्रिदेव, त्रियुग, त्रिधर्मा तथा त्रिपुष्कर हैं। हे अव्ययात्मन्! आप त्रय्यारुणि तथा त्रिश्रुति हैं। आप मुझे पवित्र करें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप त्रिणाचिकेत, त्रिपदप्रतिष्ठ (स्वर्ग, मर्त्य, पातालरूप तीनों पदोंपर प्रतिष्ठित) षडङ्गवित् (वेदके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—इन छह अङ्गोंके जाननेवाले), विषयोंके प्रति अनासक्त तथा तीनों लोकोंके स्वामी हैं। हे शम्भो! आप मुझे पवित्र करें। मैं आपका दास हूँ। भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे शंकर! हे महाभूतपते! हे गिरीश! कामरूपी शत्रुने मेरे मनको जीत लिया था, इसलिये मैंने आपका महान् अपराध किया है। मैं आपको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मैं पापी, पापकर्मा, पापात्मा तथा पापसे उत्पन्न हूँ। हे देव ईशान! हे समस्त पापोंको हरण करनेवाले महादेव! आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ५६-५९॥ |
| मा मे क्रुध्यस्व देवेश त्वया चैतादृशोऽस्म्यहम्।<br>सृष्टः पापसमाचारो मे प्रसन्नो भवेश्वर॥ ६० | देवेश! आप मेरे ऊपर कुपित न हों। आपने ही मुझे इस प्रकारके पापका आचरण करनेवाला बनाया है। ईश्वर! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। |
| त्वं कर्ता चैव धाता च त्वं जयस्त्वं महाजयः।<br>त्वं मङ्गल्यस्त्वमोंकारस्त्वमीशानो ध्रुवोऽव्ययः॥ ६१ | आप सृष्टि तथा पालन-पोषण करनेवाले हैं। आप ही जय और आप ही महाजय हैं। आप मङ्गलमय हैं। आप ओंकार हैं। आप ही ईशान, अव्यय तथा ध्रुव हैं। |
| त्वं ब्रह्मा सृष्टिकृन्नाथास्त्वं विष्णुस्त्वं महेश्वरः।<br>त्वमिन्द्रस्त्वं वषट्कारो धर्मस्त्वं च सुरोत्तमः॥ ६२ | आप सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा तथा (सब कुछ करनेमें) समर्थ हैं। आप विष्णु और महेश्वर हैं। आप इन्द्र हैं, आप वषट्कार हैं, आप धर्म तथा देवोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। |
| सूक्ष्मस्त्वं व्यक्तरूपस्त्वं त्वमव्यक्तस्त्वमीश्वरः।<br>त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम्॥ ६३ | आप (कठिनतासे देखे जाने योग्य) सूक्ष्म हैं, आप (प्रतीतिका विषय होनेसे) व्यक्तरूप हैं, आप अप्रकटरहस्य—अव्यक्त हैं, आप ईश्वर हैं, आपसे ही यह चर-अचर जगत् व्याप्त (ओतप्रोत या ढका) है। |
| ३५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| त्वमादिरन्तो मध्यश्च त्वमनादिः सहस्रपात्।<br>विजयस्त्वं सहस्राक्षो विरूपाक्षो महाभुजः॥६४<br><br>अनन्तः सर्वगो व्यापी हंसः प्राणाधिपोऽच्युतः।<br>गीर्वाणपतिरव्यग्रो रुद्रः पशुपतिः शिवः॥६५<br><br>त्रैविद्यस्त्वं जितक्रोधो जितारिर्विजितेन्द्रियः।<br>जयश्च शूलपाणिस्त्वं त्राहि मां शरणागतम्॥६६ | आप आदि, मध्य एवं अन्त हैं, (साथ ही) आप आदि-रहित एवं हजारों पैरोंवाले सहस्रपात् हैं। आप विजय हैं। आप हजारों आँखोंवाले, विरूप आँखवाले एवं बड़ी भुजावाले हैं। आप अन्तसे रहित, सर्वगत, व्यापी, हंस, प्राणोंके स्वामी (सदा स्वस्वरूपमें स्थित) अच्युत, देवाधिदेव, शान्त, रुद्र, पशुपति एवं शिव हैं। आप तीनों वेदोंके जाननेवाले, क्रोधको जीत लेनेवाले, शत्रुओंको विजित करनेवाले, इन्द्रियजयी, जय एवं शूलपाणि हैं। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥६०-६६॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्थं महेश्वरो ब्रह्मन् स्तुतो दैत्याधिपेन तु।<br>प्रीतियुक्तः पिङ्गलाक्षो हैरण्याक्षिमुवाच ह॥६७<br><br>सिद्धोऽसि दानवपते परितुष्टोऽस्मि तेऽन्धक।<br>वरं वरय भद्रं ते यमिच्छसि विनाऽम्बिकाम्॥६८ | पुलस्त्यजी बोले—ब्रह्मन्! दैत्योंके स्वामी अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर लालिमा लिये भूरे रंगकी आँखवाले महेश्वरने प्रसन्न होकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—दानवपति अन्धक! तुम सिद्ध हो गये हो; मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अम्बिकाके सिवाय तुम जो चाहो, वह वर माँगो। तुम्हारा कल्याण हो॥६७-६८॥ |
| अन्धक उवाच<br>अम्बिका जननी मह्यं भगवांस्त्र्यम्बकः पिता।<br>वन्दामि चरणौ मातुर्वन्दनीया ममाम्बिका॥६९<br><br>वरदोऽसि यदीश न तद् यातु विलयं मम।<br>शारीरं मानसं वाग्जं दुष्कृतं दुर्विचिन्तितम्॥७०<br><br>तथा मे दानवो भावो व्यपयातु महेश्वर।<br>स्थिराऽस्तु त्वयि भक्तिस्तु वरमेतत् प्रयच्छ मे॥७१ | अन्धकने (विनीत भावसे) कहा—अम्बिका मेरी माता और आप त्र्यम्बक मेरे पिता हैं। अम्बिका मेरी वन्दनीया हैं। मैं उन माताके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। ईशान! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरे शरीरसम्बन्धी, मनसम्बन्धी एवं वचनसम्बन्धी पाप तथा नीच विचार नष्ट हो जायें। महेश्वर! मेरा दानवीय विचार भी दूर हो जाय एवं आपमें मेरी अटल भक्ति हो जाय—मुझे यही वर दीजिये॥६९-७१॥ |
| महादेव उवाच<br>एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम्।<br>मुक्तोऽसि दैत्यभावाच्च भृङ्गी गणपतिर्भव॥७२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वरदः शूलाग्रादवतार्य तम्।<br>निर्मार्ज्य निजहस्तेन चक्रे निर्व्रणमन्धकम्॥७३<br><br>ततः स्वदेहतो देवान् ब्रह्मादीनाजुहाव सः।<br>ते निश्चेरुर्महात्मानो नमस्यन्तस्त्रिलोचनम्॥७४<br><br>गणान् सनन्दीनाहूय संनिवेश्य तदाग्रतः।<br>भृङ्गिनं दर्शयामास धुवं नैषोऽन्धकेति हि॥७५ | (भगवान्) महादेवने कहा—दैत्येन्द्र! ऐसा ही हो। तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँ। तुम दानवीय विचारसे मुक्त हो गये। अब तुम भृङ्गी नामके गणपति हो गये। इस प्रकार कहकर वरदानी महादेवने उस अन्धकको शूलकी नोकसे उतारा और अपने हाथसे सहलाकर बिना घावका कर दिया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीरमें स्थित ब्रह्मादि देवोंका आह्वान किया। वे सभी महान् देवगण त्र्यम्बक शिवको नमस्कार करते हुए बाहर निकले। नन्दीके साथ गणोंको बुलाकर और सामने बैठाकर भृङ्गीको दिखलाते हुए उन्होंने कहा—निश्चय ही यह अन्धक (पहले-जैसा) नहीं रह गया है॥७२-७५॥ |
| तं दृष्ट्वा दानवपतिं संशुष्कपिशितं रिपुम्।<br>गणाधिपत्यमापन्नं प्रशंसुर्वृषध्वजम्॥७६ | उस सूखे हुए मांसवाले शत्रु दानवपतिको गणाधिप हुआ देखकर वे सभी वृषध्वज (शंकर) की प्रशंसा |
अध्याय ७० ] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३५१
| ततस्तान् प्राह भगवान् सम्परिष्वज्य देवताः।<br>गच्छध्वं स्वानि धिष्ण्यानि भुङ्ग्ध्वं त्रिदिवं सुखम्॥ ७७<br><br>सहस्राक्षोऽपि संयातु पर्वतं मलयं शुभम्।<br>तत्र स्वकार्यं कृत्वैव पश्चाद् यातु त्रिविष्टपम्॥ ७८<br><br>इत्येवमुक्त्वा त्रिदशान् समाभाष्य व्यसर्जयत्।<br>पितामहं नमस्कृत्य परिष्वज्य जनार्दनम्।<br>ते विसृष्टा महेशेन सुरा जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ ७९ | करने लगे। उसके बाद भगवान् शंकरने उन देवोंको गले लगाकर कहा—देवताओ! आपलोग अपने-अपने स्थानको जाइये और स्वर्ग-सुखका उपभोग कीजिये। इन्द्र भी सुखद मलयपर्वतपर जायें तथा वहाँ अपना काम समाप्त करके ही स्वर्ग चले जायें। ऐसा कहकर देवोंसे वार्तालाप कर देवोंको विदा कर दिया। महेशने पितामहको नमस्कार तथा जनार्दनको गले लगाकर उन सभीको विदा कर दिया। (महेशसे विदा किये गये) वे देवगण स्वर्गको चले गये॥ ७६—७९॥ |
| महेन्द्रो मलयं गत्वा कृत्वा कार्यं दिवं गतः।<br>गतेषु शक्रप्राग्येषु देवेषु भगवाञ्छिवः॥ ८०<br><br>विसर्जयामास गणाननुमान्य यथार्हतः।<br>गणाश्च शङ्करं दृष्ट्वा स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ८१<br><br>जग्मुस्ते शुभलोकानि महाभोगानि नारद।<br>यत्र कामदुघा गावः सर्वकामफलद्रुमाः॥ ८२<br><br>नद्यस्त्वमृतवाहिन्यो हृदाः पायसकर्दमाः।<br>स्वां स्वां गतिं प्रयातेषु प्रमथेषु महेश्वरः॥ ८३<br><br>समादायान्धकं हस्ते सनन्दिः शैलमभ्यगात्।<br>द्वाभ्यां वर्षसहस्राभ्यां पुनरागाद्धरो गृहम्॥ ८४<br><br>ददृशे च गिरेः पुत्रीं श्वेतार्ककुसुमस्थिताम्।<br>समायातं निरीक्ष्यैव सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ८५<br><br>त्यक्त्वाऽर्कपुष्पं निर्गत्य सखीस्ताः समुपाह्वयत्।<br>समाहूताश्च देव्या ता जयाद्यास्तूर्णमागमन्॥ ८६ | महेन्द्र भी मलयाचलपर जा करके (अपना) कार्य सम्पन्नकर स्वर्ग चले गये। शिवने इन्द्र आदि देवोंके चले जानेपर गणोंको यथायोग्य सम्मानित कर विदा कर दिया। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] नारदजी! गण भी शंकरका दर्शन कर अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो विशाल भोगसे सम्पन्न उन सुखद लोकोंको चले गये, जहाँकी गौएँ इच्छित वस्तु प्रदान करनेवाली थीं, वृक्ष समस्त कर्मरूपी फलोंके दाता थे, नदियाँ अमृतकी धारा बहानेवाली थीं और सरोवर दूधके पङ्कसे भरे थे। महेश्वर प्रमथोंके अपने-अपने स्थानपर चले जानेपर अन्धकका हाथ पकड़कर (उसे साथ लिये हुए) नन्दीसहित पर्वतपर चले गये। (वे) शंकर दो हजार वर्षोंके बाद फिर अपने घर लौटे। उन्होंने सफेद अर्क (आक या मन्दार)-के फूलमें स्थित गिरिजाको देखा। पार्वती समस्त चिह्नोंसे युक्त शंकरको आया हुआ देखते ही अर्कके फूलको छोड़कर बाहर निकल आयीं और उन्होंने (अपनी जयादि) सखियोंको पुकारा। पुकारी गयीं वे जया आदि सभी देवियाँ शीघ्र वहाँ चली आयीं॥ ८०—८६॥ |
| ताभिः परिवृता तस्थौ हरदर्शनलालसा।<br>ततस्त्रिनेत्रो गिरिशां दृष्ट्वा प्रेक्ष्य च दानवम्॥ ८७<br><br>नन्दिनं च तथा हर्षादालिलिङ्गे गिरेः सुताम्।<br>अथोवाचैष दासस्ते कृतो देवि मयाऽन्धकः॥ ८८<br><br>पश्यस्व प्रणतिं यातं स्वसुतं चारुहासिनि।<br>इत्युच्चार्यान्धकं चैव पुत्र एहीति सत्वरम्॥ ८९ | उन (अपनी सहेली जयादि देवियों)-से घिरी हुई पार्वतीजी शिवके दर्शनकी अभिलाषासे (प्रतीक्षामें) खड़ी रहीं। त्रिनेत्रधारी शंकरने गिरिजाको देखकर दानव एवं नन्दीके ऊपर भी दृष्टिपात किया; फिर प्रसन्नतापूर्वक गिरिसुताको गले लगा लिया। उसके बाद उन्होंने कहा—देवि! मैंने अन्धकको तुम्हारा दास बना लिया है। चारुहासिनि! प्रणाम कर रहे अपने पुत्रको देखो। ऐसा कहनेके बाद उन्होंने कहा—पुत्र! |