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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

४- विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यज्ञकी वार्ता, सतीका प्राण-त्याग; शिवका क्रोध एवं उनके गणोंद्वारा दक्ष-यज्ञका विध्वंस

अध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १९
सव्यादन्या द्वितीया च असिरित्येव विश्रुता। सब पापोंको हरनेवाली एवं पवित्र है। वहीं उनके वाम
ते उभे तु सरिच्छ्रेष्ठे लोकपूज्ये बभूवतुः ॥ २८ पादसे 'असि' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरी नदी भी निकली
है। ये दोनों नदियाँ श्रेष्ठ एवं लोकपूज्य हैं ॥ २५-२८ ॥
ताभ्यां मध्ये तु यो देशस्तत्क्षेत्रं योगशायिनः । उन दोनोंके मध्यका प्रदेश योगशायीका क्षेत्र है।
त्रैलोक्यप्रवरं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम्। वह तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा सभी पापोंसे छुड़ा
न तादृशोऽस्ति गगने न भूम्यां न रसातले ॥ २९ देनेवाला तीर्थ है। उसके समान अन्य कोई तीर्थ
तत्रास्ति नगरी पुण्या ख्याता वाराणसी शुभा। आकाश, पृथ्वी एवं रसातलमें नहीं है। ईश! वहाँ पवित्र
यस्यां हि भोगिनोऽपीश प्रयान्ति भवतो लयम् ॥ ३० शुभप्रद विख्यात वाराणसी नगरी है, जिसमें भोगी लोग
विलासिनीनां रशनास्वनेन भी आपके लोकको प्राप्त करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी
श्रुतिस्वनैर्ब्राह्मणपुंगवानाम् । वेदध्वनि विलासिनी स्त्रियोंकी करधनीकी ध्वनिसे
शुचिस्वरत्वं गुरवो निशम्य मिश्रित होकर मङ्गल स्वरका रूप धारण करती है। उस
हास्यादशासन्त मुहुर्मुहुस्तान् ॥ ३१ ध्वनिको सुनकर गुरुजन बारंबार उपहासपूर्वक उनका
व्रजत्सु योषित्सु चतुष्पथेषु शासन करते हैं। जहाँ चौराहोंपर भ्रमण करनेवाली
पदान्यलक्तारुणितानि दृष्ट्वा । स्त्रियोंके अलक्त (महावर) - से अरुणित चरणोंको देखकर
ययौ शशी विस्मयमेव यस्यां चन्द्रमाको स्थल-पद्मिनीके चलनेका भ्रम हो जाता है
किंस्वित् प्रयाता स्थलपद्मिनीयम् ॥ ३२ और जहाँ रात्रिका आरम्भ होनेपर ऊँचे-ऊँचे देवमन्दिर
तुङ्गानि यस्यां सुरमन्दिराणि चन्द्रमाका (मानो) अवरोध करते हैं एवं दिनमें पवनान्दोलित
रुन्धन्ति चन्द्रं रजनीमुखेषु। (हवासे फहरा रही) दीर्घ पताकाओंसे सूर्य भी छिपे
दिवाऽपि सूर्यं पवनाप्लुताभि- रहते हैं ॥ २९-३३ ॥
दीर्घाभिरेवं सुपताकिकाभिः ॥ ३३
भृङ्गाश्च यस्यां शशिकान्तभित्तौ जिस (वाराणसी) - में चन्द्रकान्तमणिकी भित्तियोंपर
प्रलोभ्यमानाः प्रतिबिम्बितेषु। प्रतिबिम्बित चित्रमें निर्मित स्त्रियोंके निर्मल मुख-
आलेख्ययोषिद्विमलाननाब्जे- कमलोंको देखकर भ्रमर उनपर भ्रमवश लुब्ध हो जाते
ष्पीयूर्भ्रमान्नैव च पुष्पकान्तरम् ॥ ३४ हैं और दूसरे पुष्पोंकी ओर नहीं जाते। हे शम्भो ! वहाँ
सम्मोहनलेखनसे पराजित पुरुषोंमें तथा घरकी बावलियोंमें
परिभ्रमंश्चापि पराजितेषु जलक्रीड़ाके लिये एकत्र हुई स्त्रियोंमें ही 'भ्रमण' देखा
नरेषु संमोहनलेखनेन । जाता है, अन्यत्र किसीको 'भ्रमण' (चक्कर रोग) नहीं
यस्यां जलक्रीडनसङ्गतासु होता*। द्यूतक्रीडा (जुआके खेल) - के पासोंके सिवाय
अन्य कोई भी दूसरेके 'पाश' (बन्धन) - में नहीं डाला
न स्त्रीषु शंभो गृहदीर्घिकासु ॥ ३५ जाता तथा सुरत-समयके सिवाय स्त्रियोंके साथ कोई
न चैव कश्चित् परमन्दिराणि आवेगयुक्त पराक्रम नहीं करता। जहाँ हाथियोंके बन्धनमें
रुणद्धि शंभो सहसा ऋतेऽक्षान्। ही पाशग्रन्थि (रस्सीकी गाँठ) होती है, उनकी मदच्युतिमें
न चाबलानां तरसा पराक्रमं (मदके चूनेमें) ही 'दानच्छेद' (मदकी धाराका टूटना)
एवं नर हाथियोंके यौवनागममें ही 'मान' और 'मद'
करोति यस्यां सुरतं हि मुक्त्वा ॥ ३६ होते हैं, अन्यत्र नहीं; तात्पर्य यह कि दान देनेकी धारा
पाशग्रन्थिर्गजेन्द्राणां दानच्छेदो मदच्युतौ । निरन्तर चलती रहती है और अभिमानी एवं मदवाले
यस्यां मानमदौ पुंसां करिणां यौवनागमे ॥ ३७ लोग नहीं हैं ॥ ३४-३७ ॥

  • यहाँ सर्वत्र परिसंख्यालंकार है। परिसंख्यालंकार वहाँ होता है, जहाँ किसी वस्तुका एक स्थानसे निषेध करके उसका दूसरे
    स्थानमें स्थापन हो। ऐसा वर्णन आनन्दरामायणके अयोध्या-वर्णनमें, कादम्बरीमें, काशीखण्डमें काशी आदिके वर्णनमें भी प्राप्त होता है।
२०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३
प्रियदोषाः सदा यस्यां कौशिका नेतरे जनाः।<br>तारागणेऽकुलीनत्वं गद्ये वृत्तच्युतिर्विभो ॥ ३८<br><br>भूतिलुब्धा विलासिन्यो भुजंगपरिवारिताः।<br>चन्द्रभूषितदेहाश्च यस्यां त्वमिव शंकर ॥ ३९<br><br>ईदृशायां सुरेशान वाराणस्यां महाश्रमे।<br>वसते भगवाँल्लोलः सर्वपापहरो रविः ॥ ४०<br><br>दशाश्वमेधं यत्प्रोक्तं मदंशो यत्र केशवः।<br>तत्र गत्वा सुरश्रेष्ठ पापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४१विभो! जहाँ उलूक ही सदा दोषा (रात्रि)-प्रिय होते हैं, अन्य लोग दोषोंके प्रेमी नहीं हैं। तारागणोंमें ही अकुलीनता (पृथ्वीमें न छिपना) है, लोगोंमें कहीं अकुलीनताका नाम नहीं है; गद्यमें ही वृत्तच्युति (छन्दोभङ्ग) होती है, अन्यत्र वृत्त (चरित्र)-च्युति नहीं दीखती। शंकर! जहाँकी विलासिनियाँ आपके सदृश (भस्म) 'भूतिलुब्धा' 'भुजंग (सर्प)-परिवारिता' एवं 'चन्द्रभूषितदेहा' होती हैं। (यहाँ पक्षान्तरमें—विलासिनियोंके पक्षमें—संगतिके लिये, 'भूति' पद 'भस्म' और 'धन' के अर्थमें, 'भुजङ्ग' पद 'सर्प' एवं 'जार' के अर्थमें तथा 'चन्द्र' पद 'चन्द्राभूषण' के अर्थमें प्रयुक्त हैं।)<br>सुरेशान! इस प्रकारकी वाराणसीके महान् आश्रममें सभी पापोंको दूर करनेवाले भगवान् 'लोल' नामके सूर्य निवास करते हैं। सुरश्रेष्ठ! वहीं दशाश्वमेध नामका स्थान है तथा वहीं मेरे अंशस्वरूप केशव स्थित हैं। वहाँ जाकर आप पापसे छुटकारा प्राप्त करेंगे॥ ३८-४१॥
इत्येवमुक्तो गरुडध्वजेन<br>वृषध्वजस्तं शिरसा प्रणम्य।<br>जगाम वेगाद् गरुडो यथाऽसौ<br>वाराणसीं पापविमोचनाय ॥ ४२<br>गत्वा सुपुण्यां नगरीं सुतीर्थां<br>दृष्ट्वा च लोलं सदशाश्वमेधम्।<br>स्नात्वा च तीर्थेषु विमुक्तपापः<br>स केशवं द्रष्टुमुपाजगाम ॥ ४३<br>केशवं शंकरो दृष्ट्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत्।<br>त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश ब्रह्महत्या क्षयं गता ॥ ४४<br>नेदं कपालं देवेश मद्धस्तं परिमुञ्चति।<br>कारणं वेद्मि न च तदेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥ ४५भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर शिवजीने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर वे पाप छुड़ानेके लिये गरुड़के समान तेज वेगसे वाराणसी गये। वहाँ परमपवित्र तथा तीर्थभूत नगरीमें जाकर दशाश्वमेधके साथ 'असी' स्थानमें स्थित भगवान् लोलार्कका* दर्शन किया तथा (वहाँके) तीर्थोंमें स्नान कर और पाप-मुक्त होकर वे (वरुणासंगमपर) केशवका दर्शन करने गये। उन्होंने केशवका दर्शन करके प्रणामकर कहा—हृषीकेश! आपके प्रसादसे ब्रह्महत्या तो नष्ट हो गयी, पर देवेश! यह कपाल मेरे हाथको नहीं छोड़ रहा है। इसका कारण मैं नहीं जानता। आप ही मुझे यह बतला सकते हैं॥ ४२-४५॥
पुलस्त्य उवाच<br>महादेववचः श्रुत्वा केशवो वाक्यमब्रवीत्।<br>विद्यते कारणं रुद्र तत्सर्वं कथयामि ते ॥ ४६<br>योऽसौ ममाग्रतो दिव्यो ह्रदः पद्मोत्पलैर्युतः।<br>एष तीर्थवरः पुण्यो देवगन्धर्वपूजितः ॥ ४७<br>एतस्मिन्प्रवरे तीर्थे स्नानं शंभो समाचर।<br>स्नातमात्रस्य चाद्यैव कपालं परिमोक्ष्यति ॥ ४८**पुलस्त्यजी बोले—**महादेवका वचन सुनकर केशवने यह वाक्य कहा—रुद्र! इसके समस्त कारणोंको मैं तुम्हें बतलाता हूँ। मेरे सामने कमलोंसे भरा यह जो दिव्य सरोवर है, यह पवित्र तथा तीर्थोंमें श्रेष्ठ है एवं देवताओं तथा गन्धर्वोंसे पूजित है। शिवजी! आप इस परम श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करें। स्नान करनेमात्रसे आज ही यह कपाल (आपके हाथको) छोड़ देगा। इससे रुद्र! संसारमें आप

* लोलार्कके सम्बन्धमें विशेष जानकारीके लिये देखिये सूर्याङ्कके ३०८वें से ३१०वें पृष्ठतक प्रकाशित विवरण।

अध्याय ४ ] विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यक्षकी वार्ता, एवं सतीका प्राण-त्याग २१
ततः कपाली लोके च ख्यातो रुद्र भविष्यसि ।
कपालमोचनेत्येवं तीर्थं चेदं भविष्यति ॥ ४९
'कपाली' नामसे प्रसिद्ध होंगे तथा यह तीर्थ भी
'कपालमोचन' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ४६-४९ ॥
पुलस्त्य उवाच
एवमुक्तः सुरेशन केशवेन महेश्वरः।
कपालमोचने सस्नौ वेदोक्तविधिना मुने ॥ ५०
स्नातस्य तीर्थे त्रिपुरान्तकस्य
परिच्युतं हस्ततलात् कपालम्।
नाम्ना बभूवाथ कपालमोचनं
तत्तीर्थवर्यं भगवत्प्रसादात् ॥ ५१
पुलस्त्यजी बोले- मुने ! सुरेश्वर केशवके ऐसा
कहनेपर महेश्वरने कपालमोचनतीर्थमें वेदोक्त विधिसे
स्नान किया। उस तीर्थमें स्नान करते ही उनके
हाथसे ब्रह्म-कपाल गिर गया। तभीसे भगवान्‌की
कृपासे उस उत्तम तीर्थका नाम 'कपालमोचन'
पड़ा* ॥ ५०-५१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यज्ञकी वार्ता, सतीका प्राण-त्याग; शिवका क्रोध
एवं उनके गणोंद्वारा दक्ष-यज्ञका विध्वंस
पुलस्त्य उवाच
एवं कपाली संजातो देवर्षे भगवान् हरः।
अनेन कारणेनासौ दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १
कपालिजायेति सतीं विज्ञायाथ प्रजापतिः।
यज्ञे चार्हापि दुहिता दक्षेण न निमन्त्रिता ॥ २
एतस्मिन्नन्तरे देवीं द्रष्टुं गौतमनन्दिनी।
जया जगाम शैलेन्द्रं मन्दरं चारुकन्दरम् ॥ ३
तामागतां सती दृष्ट्वा जयामेकामुवाच ह।
किमर्थं विजया नागाज्जयन्ती चापराजिता ॥ ४
सा देव्या वचनं श्रुत्वा उवाच परमेश्वरीम्।
गता निमन्त्रिताः सर्वा मखे मातामहस्य ताः ॥ ५
समं पित्रा गौतमेन मात्रा चैवाप्यहल्यया।
अहं समागता द्रष्टुं त्वां तत्र गमनोत्सुका ॥ ६
किं त्वं न व्रजसे तत्र तथा देवो महेश्वरः।
नामन्त्रिताऽसि तातेन उताहोस्वित् व्रजिष्यसि ॥ ७
गतास्तु ऋषयः सर्वे ऋषिपत्न्यः सुरास्तथा।
मातृष्वसः शशाङ्कश्च सपत्नीको गतः क्रतुम् ॥ ८
चतुर्दशेषु लोकेषु जन्तवो ये चराचराः।
निमन्त्रिताः क्रतौ सर्वे किं नासि त्वं निमन्त्रिता ॥ ९
पुलस्त्यजी बोले- देवर्षे ! भगवान् शिव इस
प्रकार कपाली नामसे ख्यात हुए और इसी कारण वे
दक्षके द्वारा निमन्त्रित नहीं हुए। प्रजापति दक्षने सतीको
अपनी पुत्री होनेपर भी कपालीकी पत्नी समझकर
निमन्त्रणके योग्य न मानकर उन्हें यज्ञमें नहीं बुलाया।
इसी बीच देवीका दर्शन करनेके लिये गौतम-पुत्री जया
सुन्दर गुफावाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दरपर गयी। जयाको वहाँ
अकेली आयी देखकर सती बोलीं- विजये! जयन्ती
और अपराजिता यहाँ क्यों नहीं आयीं? ॥ १-४ ॥
देवीके वचनको सुनकर जयाने उन सती परमेश्वरीसे
कहा - अपने पिता गौतम और माता अहल्याके साथ वे
मातामहके सत्र (यज्ञ) -में निमन्त्रित होकर चली गयी हैं।
वहाँ जानेके लिये उत्सुक मैं आपसे मिलने आयी हूँ। क्या
आप तथा भगवान् शिव वहाँ नहीं जा रहे हैं? क्या पिताजीने
आपको नहीं बुलाया है ? अथवा आप वहाँ जायेंगी ?
सभी ऋषि, ऋषि-पत्नियों तथा देवगण वहाँ गये हैं। हे
मातृष्वसः (मौसी)! पत्नीके सहित शशाङ्क भी उस यज्ञमें
गये हैं। चौदहों लोकोंके समस्त चराचर प्राणी उस यज्ञमें
निमन्त्रित हुए हैं। क्या आप निमन्त्रित नहीं हैं? ॥ ५-९ ॥

  • कपालमोचन तीर्थ काशीके परिसरमें बकरियाकुण्डसे १ मीलपर स्थित है।

२२
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ४
पुलस्त्य उवाच
जयायास्तद्वचः श्रुत्वा वज्रपातसमं सती।
मन्युनाऽभिप्लुता ब्रह्मन् पञ्चत्वमगमत् ततः॥ १०
जया मृतां सतीं दृष्ट्वा क्रोधशोकपरप्लुता।
मुञ्चती वारि नेत्राभ्यां सस्वरं विललाप ह॥ ११
आक्रन्दितध्वनिं श्रुत्वा शूलपाणिस्त्रिलोचनः।
आः किमेतदितीत्युक्त्वा जयाभ्याशमुपागतः॥ १२
आगतो ददृशे देवीं लतामिव वनस्पतेः।
कृत्तां परशुना भूमौ श्लथाङ्गीं पतितां सतीम्॥ १३
देवीं निपतितां दृष्ट्वा जयां पप्रच्छ शंकरः।
किमियं पतिता भूमौ निकृत्तेव लता सती॥ १४
सा शंकरवचः श्रुत्वा जया वचनमब्रवीत्।
श्रुत्वा मखस्था दक्षस्य भगिन्यः पतिभिः सह ॥ १५
आदित्याद्यास्त्रिलोकेश समं शक्रादिभिः सुरैः।
मातृष्वसा विपन्नेयमन्तर्दुःखेन दह्यती ॥ १६
पुलस्त्य उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो रौद्रं रुद्रः क्रोधाप्लुतो बभौ।
क्रुद्धस्य सर्वगात्रेभ्यो निश्चेरुः सहसार्चिषः॥ १७
ततः क्रोधात् त्रिनेत्रस्य गात्ररोमोद्भवा मुने।
गणाः सिंहमुखा जाता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १८
गणैः परिवृतस्तस्मान्मन्दराद्धिमसाह्वयम्।
गतः कनखलं तस्माद् यत्र दक्षोऽयजत् क्रतुम्॥ १९
ततो गणानामधिपो वीरभद्रो महाबलः।
दिशि प्रतीच्युत्तरायां तस्थौ शूलधरो मुने॥ २०
जया क्रोधाद् गदां गृह्य पूर्वदक्षिणतः स्थिता।
मध्ये त्रिशूलधृक् शर्वस्तस्थौ क्रोधान्महामुने॥ २१
मृगारिवदनं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः।
ऋषयो यक्षगन्धर्वाः किमिदं त्वित्यचिन्तयन् ॥ २२
ततस्तु धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान्।
द्वारपालस्तदा धर्मो वीरभद्रमुपाद्रवत्॥ २३
तमापतन्तं सहसा धर्मं दृष्ट्वा गणेश्वरः।
करेणैकेन जग्राह त्रिशूलं वह्निसन्निभम्॥ २४
कार्मुकं च द्वितीयेन तृतीयेनाथ मार्गणान्।
चतुर्थेन गदां गृह्य धर्ममभ्यद्रवद् गणः॥ २५
पुलस्त्यजी बोले-ब्रह्मन् ! (नारदजी!) वज्रपातके
समान जयाकी उस बातको सुनकर क्रोध एवं दुःखसे
भरकर सतीने प्राण छोड़ दिये। सतीको मरी हुई देखकर
क्रोध एवं दुःखसे भरी जया आँसू बहाते हुए जोर-
जोरसे विलाप करने लगी। रोनेकी करुणध्वनि सुनकर
शूलपाणि भगवान् शिव 'अरे क्या हुआ, क्या हुआ'-
ऐसा कहकर उसके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने
फरसेसे कटी वृक्षपर चढ़ी लताकी तरह सतीको भूमिपर
मरी पड़ी देखा तो जयासे पूछा-ये सती कटी लताकी
तरह भूमिपर क्यों पड़ी हुई हैं? शिवके वचनको
सुनकर जया बोली-हे त्रिलोकेश्वर ! दक्षके यज्ञमें अपने-
अपने पतिके साथ बहनोंका एवं इन्द्र आदि देवोंके साथ
आदित्य आदिका निमन्त्रित होकर उपस्थित होना
सुनकर आन्तरिक दुःख (की ज्वाला)-से दग्ध हो
गयीं। इससे मेरी माताकी बहन (सती)-के प्राण निकल
गये ॥ १०-१६॥
पुलस्त्यजीने कहा - जयाके इस भयंकर
(अमङ्गल) वचनको सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रुद्ध हो
गये। उनके शरीरसे सहसा अग्निकी तेज ज्वालाएँ निकलने
लगीं। मुने ! इसके बाद क्रोधके कारण त्रिनेत्र भगवान्
शिवके शरीरके लोमोंसे सिंहके समान मुखवाले वीरभद्र
आदि बहुत-से रुद्रगण उत्पन्न हो गये। अपने गणोंसे घिरे
भगवान् शिव मंदरपर्वतसे हिमालयपर गये और वहाँसे
कनखल चले गये, जहाँ दक्ष यज्ञ कर रहे थे। इसके बाद
सभी गणोंमें अग्रणी महाबली वीरभद्र शूल धारण किये
पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशामें चले गये ॥ १७-२० ॥
महामुने ! क्रोधसे गदा लेकर जया पूर्व-दक्षिण
दिशा (अग्निकोण)-में खड़ी हो गयी और मध्यमें
क्रोधसे भरे त्रिशूल लिये शंकर खड़े हो गये। सिंहवदन
(वीरभद्र)-को देखकर इन्द्र आदि देवता, ऋषि, यक्ष
एवं गन्धर्वलोग सोचने लगे कि यह क्या है? तदनन्तर
द्वारपाल धर्म धनुष एवं सर्पके समान बाणोंको लेकर
वीरभद्रकी ओर दौड़े। सहसा धर्मको आता हुआ देखकर
गणेश्वर एक हाथमें अग्निके सदृश त्रिशूल, दूसरे हाथमें
धनुष, तीसरे हाथमें बाण और चौथे हाथमें गदा लेकर
उनकी ओर दौड़ पड़े ॥ २१-२५ ॥