वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२५- वामन-चरितके संदर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना
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श्रीवामनपुराण
[ अध्याय २१
ददस्व मां नाथ तपस्विनेऽस्मै
गुणोपपन्नाय समीहिताय।
नेहान्यकामां प्रवदन्ति सन्तो
दातुं तथान्यस्य विभो क्षमस्व॥५४
दोनों कपोल-ये चार अङ्ग सुगन्धवाले हैं। उनके नेत्र,
मुख-विवर, मुखमण्डल, जिह्वा, ओठ, तालु, स्तन, नख,
हाथ और पैर-ये दस अङ्ग कमलके समान हैं।
भगवन्! मैंने खूब सोच-विचारकर पृथ्वीपर उस राजपुत्रको
पहले ही पतिरूपसे वरण कर लिया है। विभो ! मुझे
क्षमा करें। आप गुणोंसे युक्त (मेरी) इच्छाके अनुकूल
तथा वाञ्छित उस तपस्वीको मुझे दे दें; क्योंकि
सन्तोंका यह कहना है कि अन्यकी कामना करनेवाली
कन्याको किसी औरको नहीं देना चाहिये ॥ ५२-५४॥
देवदेव उवाच
इत्येवमुक्तः सवितुश्च पुत्र्या
ऋषिस्तदा ध्यानपरो बभूव।
ज्ञात्वा च तत्रार्कसुतां सकामां
मुदा युतो वाक्यमिदं जगाद॥५५
स एव पुत्रि नृपतेस्तनूजो
दृष्टः पुरा कामयसे यमद्य।
स एव चायाति ममाश्रमं वै
ऋक्षात्मजः संवरणो हि नाम्ना ॥५६
अथाजगाम स नृपस्य पुत्र-
स्तमाश्रमं ब्राह्मणपुंगवस्य।
दृष्ट्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य मूर्ध्ना
स्थितस्तवपश्यत् तपतीं नरेन्द्रः ॥५७
दृष्ट्वा च तां पद्मविशालनेत्रां
तां पूर्वदृष्टामिति चिन्तयित्वा ।
पप्रच्छ केयं ललना द्विजेन्द्र
स वारुणिः प्राह नराधिपेन्द्रम् ॥ ५८
इयं विवस्वद्दुहिता नरेन्द्र
नाम्ना प्रसिद्धा तपती पृथिव्याम्।
मया तवार्थाय दिवाकरोऽर्थितः
प्रादान्मया त्वाश्रममानिनिन्ये ॥ ५९
तस्मात् समुत्तिष्ठ नरेन्द्र देव्याः
पाणिं तपत्या विधिवद् गृहाण।
इत्येवमुक्तो नृपतिः प्रहृष्टो
जग्राह पाणिं विधिवत् तपत्याः ॥ ६०
सा तं पतिं प्राप्य मनोऽभिरामं
सूर्यात्मजा शक्रसमप्रभावम्।
रराम तन्वी भवनोत्तमेषु
यथा महेन्द्रं दिवि दैत्यकन्या॥ ६१
देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ] ने कहा - फिर
सूर्यपुत्री तपतीके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी ध्यानमें मग्न हो
गये और तपतीको उस कुमारमें आसक्त समझकर
प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने यह बात कही - पुत्रि ! जिस
राजपुत्रका तुमने पहले दर्शन किया था और जिसकी कामना
तुम आज कर रही हो, वह ऋक्षका पुत्र (राजा) संवरण
ही है। वह आज मेरे आश्रममें आ रहा है। उसके पश्चात्
वह राजकुमार भी ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीके आश्रममें
आया। उस राजाने वसिष्ठको देखकर सिर झुकाकर
प्रणाम किया; बैठनेपर तपतीको भी देखा। खिले
कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस तपतीको देखकर
उसने सोचा कि इसे मैंने पहले भी देखा है। (तब) उसने
पूछा- ब्राह्मणश्रेष्ठ ! यह सुन्दर स्त्री कौन है? इसपर
वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ संवरणसे कहा- ॥ ५५-५८ ॥
'नरेन्द्र ! पृथ्वीमें तपती नामसे प्रसिद्ध यह सूर्यकी
पुत्री है। मैंने तुम्हारे ही लिये सूर्यसे इसकी याचना की थी
और उन्होंने तुम्हारे लिये इसे मुझे सौंपा था। मैं तुम्हारे
लिये ही इसे आश्रममें लाया हूँ; अतः नरेन्द्र ! उठो एवं
विधिवत् इस सूर्यपुत्री तपतीका पाणिग्रहण करो।'
[ वसिष्ठजीके ] - ऐसा कहनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुआ।
उसने तपतीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। सूर्यकी
तनया तपती भी इन्द्रके तुल्य प्रभावशाली उस सुन्दर
पतिको पाकर [ अत्यन्त] प्रसन्न हुई। वह उत्तम महलोंमें
उसके साथ इस प्रकार विहार करने लगी, जैसे इन्द्रको
पाकर स्वर्गमें शची विहार करती है ॥ ५९-६१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २१ ॥
अध्याय २२ ]
कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य
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बाइसवाँ अध्याय
कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य
देवदेव उवाच
देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ]-ने कहा-उस
तस्यां तपत्यां नरसत्तमेन
तपतीके गर्भसे मनुष्योंमें श्रेष्ठ संवरणके द्वारा राजलक्षणोंवाला
जातः सुतः पार्थिवलक्षणस्तु।
एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह जातकर्म आदि संस्कारोंसे
स जातकर्मादिभिरेव संस्कृतो
संस्कृत होकर इस प्रकार बढ़ने लगा जैसे घीकी आहुति
विवर्द्धताज्येन हुतो यथाऽग्निः ॥ १
डालनेसे अग्नि बढ़ती है। देवगण! मित्रावरुणके पुत्र
कृतोऽस्य चूडाकरणश्च देवा
वसिष्ठजीने उसका (यथासमय) चौल-संस्कार कराया।
विप्रेण मित्रावरुणात्मजेन।
नवें वर्षमें उसका उपनयन-संस्कार हुआ। फिर वह
नवाब्दिकस्य व्रतबन्धनं च
( श्रम-क्रमसे अध्ययन कर) वेद तथा शास्त्रोंका पारगामी
वेदे च शास्त्रे विधिपारगोऽभूत् ॥ २
विद्वान् हो गया एवं चौबीस वर्षोंमें तो फिर वह सर्वज्ञ-
ततश्रुतुःषड्भिरपीह वर्षैः
सा हो गया। पुरुषश्रेष्ठ संवरणका वह पुत्र इस भूभागपर
सर्वज्ञतामभ्यगमत् ततोऽसौ।
'कुरु' नामसे प्रसिद्ध हुआ। तब राजा (उस) कल्याणकारी
ख्यातः पृथिव्यां पुरुषोत्तमोऽसौ
अपने धार्मिक पुत्रको (उपयुक्त अवस्थामें आये हुए)
नाम्ना कुरुः संवरणस्य पुत्रः॥ ३
देखकर किसी उत्तम कुलमें उसके विवाहका यत्न
ततो नरपतिर्दृष्ट्वा धार्मिकं तनयं शुभम्।
दारक्रियार्थमकरोद् यत्नं शुभकुले ततः ॥ ४
करने लगे ॥ १-४॥
सौदामिनीं सुदाम्नस्तु सुतां रूपाधिकां नृपः।
राजाने कुरुके लिये सुन्दर स्वरूपवाली सुदामाकी
पुत्री सौदामिनीको चुना और सुदामा राजाने भी उसे कुरुको
कुरोरर्थाय वृतवान् स प्रादात् कुरवेऽपि ताम् ॥ ५
विधिवत् प्रदान कर दिया। उस राजकुमारीको पाकर
वह (कुरु) धर्म और अर्थका (यथावत्) पालन करते
स तां नृपसुतां लब्ध्वा धर्मार्थाविरोधयन्।
हुए उस तन्वङ्गी अर्थात् कृशाङ्गीके साथ गार्हस्थ्य धर्ममें
रेमे तन्व्या सह तया पौलोम्या मघवानिव ॥ ६
वैसे ही रहने लगा, जैसे पौलोमी (शची)-के साथ इन्द्र
दाम्पत्य-जीवन व्यतीत करते (हुए रहते) हैं। उसके बाद
ततो नरपतिः पुत्रं राज्यभारक्षमं बली।
बलवान् राजाने राज्य-भारके वहन करनेमें - राज्यकार्य
विदित्वा यौवराज्याय विधानेनाभ्यषेचयत् ॥ ७
संचालनमें - उसे समर्थ जानकर विधिपूर्वक युवराज-
पदपर अभिषिक्त कर दिया। तब पिताके द्वारा अपने
ततो राज्येऽभिषिक्तस्तु कुरुः पित्रा निजे पदे।
राज्यपदपर अभिषिक्त होकर कुरु औरस पुत्रकी भाँति
पालयामास स महीं पुत्रवच्च स्वयं प्रजाः ॥ ८
अपनी प्रजाका और पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ५-८ ॥
स एव क्षेत्रपालोऽभूत् पशुपालः स एव हि।
(प्रजा और पृथ्वीके पालनमें लगे) वे राजकुमार
स सर्वपालकश्चासीत् प्रजापालो महाबलः ॥ ९
कुरु 'क्षेत्रपाल' तथा 'पशुपाल' भी हुए! महाबली वे
सर्वपालक एवं प्रजापालक भी हुए। फिर उन्होंने सोचा
कि संसारमें यश ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है (उसे प्राप्त करना
ततोऽस्य बुद्धिरुत्पन्ना कीर्तिर्लोके गरीयसी।
चाहिये); क्योंकि जबतक संसारमें कीर्ति भलीभाँति स्थित
यावत्कीर्तिः सुसंस्था हि तावद्वासः सुरैः सह ॥ १०
रहती है, तबतक मनुष्य देवताओंके साथ निवास करता है।
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श्रीवामनपुराण
[ अध्याय २२
स त्वेवं नृपतिश्रेष्ठो याथातथ्यमवेक्ष्य च।
विचचार महीं सर्वां कीर्त्यर्थं तु नराधिपः ॥ ११
ततो द्वैतवनं नाम पुण्यं लोकेश्वरो बली।
तदासाद्य सुसंतुष्टो विवेशाभ्यन्तरं ततः ॥ १२
तत्र देवीं ददर्शाथ पुण्यां पापविमोचनीम्।
प्लक्षजां ब्रह्मणः पुत्रीं हरिजह्वां सरस्वतीम् ॥ १३
सुदर्शनस्य जननीं हृदं कृत्वा सुविस्तरम्।
स्थितां भगवतीं कूले तीर्थकोटिभिराप्लुताम् ॥ १४
तस्यास्तज्जलमीक्ष्यैव स्नात्वा प्रीतोऽभवन्नृपः।
समाजगाम च पुनर्ब्रह्मणो वेदिमुत्तराम् ॥ १५
समन्तपञ्चकं नाम धर्मस्थानमनुत्तमम्।
आसमन्ताद् योजनानि पञ्च पञ्च च सर्वतः ॥ १६
देवा ऊचुः
कियन्त्यो वेदयः सन्ति ब्रह्मणः पुरुषोत्तम।
येनोत्तरतया वेदिर्गदिता सर्वपञ्चका* ॥ १७
देवदेव उवाच
वेद्यो लोकनाथस्य पञ्च धर्मस्य सेतवः।
यासु यष्टं सुरेशन लोकनाथेन शम्भुना ॥ १८
प्रयागो मध्यमा वेदिः पूर्वा वेदिर्गयाशिरः।
विरजा दक्षिणा वेदिनन्तफलदायिनी ॥ १९
प्रतीची पुष्करा वेदिस्त्रिभिः कुण्डैरलंकृता।
समन्तपञ्चका चोक्ता वेदिरेवोत्तराऽव्यया ॥ २०
तममन्यत राजर्षिरिदं क्षेत्रं महाफलम्।
करिष्यामि कृषिष्यामि सर्वान् कामान् यथेप्सितान् ॥ २१
इति संचिन्त्य मनसा त्यक्त्वा स्यन्दनमुत्तमम्।
चक्रे कीर्त्यर्थमतुलं संस्थानं पार्थिवर्षभः ॥ २२
इस प्रकार यथार्थताका विचार कर वे राजा यश-प्राप्तिके
लिये समस्त पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उसी सिलसिलेमें
वे बलशाली राजा पवित्र द्वैतवन पहुँचे एवं पूर्ण सुसंतुष्ट
होकर उसके भीतर प्रविष्ट हो गये ॥ ९-१२॥
[प्रविष्ट होनेके बाद राजाने] वहाँपर पापनाशिनी
उस पवित्र सरस्वती नदीको देखा, जो पर्कटि (पाकड़)
वृक्षसे उत्पन्न ब्रह्माकी पुत्री है। वह हरिजह्वा,
ब्रह्मपुत्री और सुदर्शन-जननी नामसे भी प्रसिद्ध है। वह
सुविस्तृत हृद (बड़ा ताल या झील)-में स्थित है।
उसके तटपर करोड़ों तीर्थ हैं। उसके जलको देखते ही
राजाको उसमें स्नान करनेकी इच्छा हुई। उन्होंने स्नान
किया और बड़े प्रसन्न हुए। फिर वे उत्तर दिशामें स्थित
ब्रह्माकी समन्तपञ्चक वेदीपर गये। वह समन्तपञ्चक
नामक धर्मस्थान चारों ओर पाँच-पाँच योजनतक फैला
हुआ है ॥ १३-१६ ॥
देवताओँने पूछा- पुरुषोत्तम! ब्रह्माकी कितनी
वेदियाँ हैं? क्योंकि आपने इस सर्वपञ्चक वेदीको उत्तर
वेदी (अन्य दिशा-सापेक्ष शब्द 'उत्तर'से विशिष्ट) कहा
है ॥ १७ ॥
[ भगवान् विष्णु बोले ] - लोकोंके स्वामी
ब्रह्माकी पाँच वेदियाँ धर्म-सेतुके सदृश हैं, जिनपर
देवाधिदेव विश्वेश्वर श्रीशम्भुने यज्ञ किया था। प्रयाग
मध्यवेदी है, गया पूर्ववेदी और अनन्त फलदायिनी
जगन्नाथपुरी दक्षिणवेदी है। (इसी प्रकार) तीन कुण्डोंसे
अलंकृत पुष्करक्षेत्र पश्चिम वेदी है और अव्यय
समन्तपञ्चक उत्तर वेदी है। राजर्षि कुरुने सोचा कि
इस (समन्तपञ्चक) क्षेत्रको महाफलदायी करूँगा
(बनाऊँगा) और यहीं समस्त मनोरथों (कामनाओं)-
की खेती करूँगा ॥ १८-२१॥
अपने मनमें इस प्रकार विचारकर वे राजाओंमें
शिरोमणि कुरु रथसे उतर पड़े एवं उन्होंने अपनी
कीर्तिके लिये अनुपम स्थानका निर्माण किया। उन
- समन्तपञ्चक और सर्वपञ्चक समानार्थी शब्द हैं; क्योंकि 'सम' और सर्व दोनों सर्ववाची शब्द हैं, अतः दोनों शब्दोंका
अर्थ एक ही है। इसमें पाठभेदसे भ्रम नहीं होना चाहिये।