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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

३७- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन

१५६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कपिलश्च महायक्षो द्वारपालः स्वयं स्थितः।<br>विघ्नं करोति पापानां दुर्गतिं च प्रयच्छति॥ ४४<br><br>पत्नी तस्य महायक्षी नाम्नोदूखलमेखला।<br>आहत्य दुन्दुभिं तत्र भ्रमते नित्यमेव हि॥ ४५<br><br>सा ददर्श स्त्रियं चैकां सपुत्रां पापदेशजाम्।<br>तामुवाच तदा यक्षी आहत्य निशि दुन्दुभिम्॥ ४६<br><br>युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले।<br>तद्वद् भूतालये स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमिच्छसि॥ ४७<br><br>दिवा मया ते कथितं रात्रौ भक्ष्यामि निश्चितम्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रणिपत्य च यक्षिणीम्॥ ४८<br><br>उवाच दीनया वाचा प्रसादं कुरु भामिनि।<br>ततः सा यक्षिणी तां तु प्रोवाच कृपयान्विता॥ ४९<br><br>यदा सूर्यस्य ग्रहणं कालेन भविता क्वचित्।<br>सन्निहत्यां तदा स्नात्वा पूता स्वर्गं गमिष्यसि॥ ५०कपिल नामक महायक्ष स्वयं द्वारपालके रूपमें स्थित हैं, जो पापियोंके मार्गमें विघ्न उपस्थित कर उनकी दुर्गति करते हैं (जिससे वे पापाचरण न करें तथा धर्मकी मर्यादा स्थित रहे)। 'उदूखलमेखला' नामक उनकी महायक्षी पत्नी दुन्दुभि बजाकर वहाँ नित्य भ्रमण करती रहती है॥ ४१-४५॥<br><br>उस यक्षीने पापवाले देशमें उत्पन्न पुत्रके साथ एक रात्रिमें स्त्रीको देखनेके बाद दुन्दुभि बजाकर उससे कहा—युगन्धरमें दही खाकर तथा अच्युतस्थलमें निवास करनेके बाद भूतालयमें स्नान कर तुम पुत्रके साथ निवास करना चाहती हो। मैंने दिनमें यह बात तुमसे कही है। रात्रिमें मैं अवश्य तुमको खा जाऊँगी।* उसकी यह बात सुननेके बाद यक्षिणीको प्रणाम कर उसने दीन वाणीमें उससे कहा—'हे भामिनि! मेरे ऊपर दया करो।' फिर उस यक्षिणीने उससे कृपापूर्वक कहा—जब किसी समय सूर्य-ग्रहण होगा, उस समय सान्निहत्य (सरोवर)-में स्नान करके पवित्र होकर तुम स्वर्ग चली जाओगी॥ ४६-५०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३४॥


पैंतीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन

लोमहर्षण उवाचलोमहर्षणने कहा—
ततो रामह्रदं गच्छेत् तीर्थसेवी द्विजोत्तमः।<br>यत्र रामेण विप्रेण तरसा दीप्ततेजसा॥ १<br><br>क्षत्रमुत्साद्य वीरेण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः।<br>पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति नः श्रुतम्॥ २<br><br>पितरस्तर्पितास्तेन तथैव प्रपितामहाः।<br>ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुर्द्विजोत्तमाः॥ ३<br><br>राम राम महाबाहो प्रीताः स्मस्तव भार्गव।<br>अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो॥ ४इसके बाद तीर्थका सेवन करनेवाले उत्तम द्विजको रामकुण्ड नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ उद्दीप्त तेजस्वी विप्र-वीर राम (परशुराम)-ने बलपूर्वक क्षत्रियोंका संहारकर पाँच कुण्डोंको स्थापित किया था। पुरुषसिंह! हमलोगोंने ऐसा सुना है कि परशुरामने उन (कुण्डों)-को रक्तसे भरकर उसने अपने पितरों एवं प्रपितामहोंका तर्पण किया था। द्विजोत्तमो! उसके बाद उन प्रसन्न पितरोंने परशुरामसे कहा था कि महाबाहु भार्गव राम! परशुराम! विभो! तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रमसे हम सब तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हैं॥ १-४॥

* इन सबकी सटिप्पण विस्तृत व्याख्या गीताप्रेसके महाभारत वनपर्व १२९। ९-१० में द्रष्टव्य है।

अध्याय ३५ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन [ १५७


श्लोकअर्थ
वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महायशः।<br>एवमुक्तस्तु पितृभी रामः प्रभवतां वरः॥ ५<br>अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं स पितॄन् गगने स्थितान्।<br>भवन्तो यदि मे प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि॥ ६<br>पितृप्रसादादिच्छेयं तपसाप्यायनं पुनः।<br>यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया॥ ७<br>ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसा ह्यहम्।<br>ह्रदाश्चैते तीर्थभूता भवेयुर्भुवि विश्रुताः॥ ८महायशस्विन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम वर माँगो। क्या चाहते हो? पितरोंके इस प्रकार कहनेपर प्रभावशालियोंमें श्रेष्ठ रामने आकाशमें स्थित पितरोंसे हाथ जोड़कर कहा—यदि आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तथा मुझपर आप सबकी दया है तो आप पितरोंके प्रसादसे मैं पुनः तपसे पूर्ण हो जाऊँ। रोषसे अभिभूत होकर मैंने जो क्षत्रियोंका विनाश किया है, आपके तेजद्वारा मैं उस पापसे मुक्त हो जाऊँ एवं ये कुण्ड संसारमें विख्यात तीर्थस्वरूप हो जायँ॥ ५—८॥
एवमुक्ताः शुभं वाक्यं रामस्य पितरस्तदा।<br>प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्षपुरस्कृताः॥ ९<br>तपस्ते वर्द्धतां पुत्र पितृभक्त्या विशेषतः।<br>यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं त्वया॥ १०<br>ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पातितास्ते स्वकर्मभिः।<br>ह्रदाश्च तव तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशयः॥ ११<br>ह्रदेष्वेतेषु ये स्नात्वा स्वान् पितॄंस्तर्पयन्ति च।<br>तेभ्यो दास्यन्ति पितरो यथाभिलषितं वरम्॥ १२<br>ईप्सितान् मानसान् कामान् स्वर्गवासं च शाश्वतम्।<br>एवं दत्त्वा वरान् विप्रा रामस्य पितरस्तदा॥ १३<br>आमन्त्र्य भार्गवं प्रीतास्तत्रैवान्तर्हितास्तदा।<br>एवं रामह्रदाः पुण्या भार्गवस्य महात्मनः॥ १४परशुरामके इस प्रकारके मङ्गलमय वचन कहनेपर उनके परम प्रसन्न पितरोंने हर्षपूर्वक उनसे कहा—'पुत्र! पितृभक्तिसे तुम्हारा तप विशेषरूपसे बढ़े। क्रोधसे अभिभूत होनेके कारण तुमने क्षत्रियोंका जो विनाश किया है उस पापसे तुम मुक्त हो; क्योंकि ये क्षत्रिय अपने कर्मसे ही मारे गये हैं। तुम्हारे ये कुण्ड निःसंदेह तीर्थके गुणोंको प्राप्त करेंगे। जो इन कुण्डोंमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेंगे, उन्हें (उनके) पितृगण मनकी इच्छाके अनुसार वर देंगे, उनकी मनोऽभिलषित कामनाएँ पूर्ण करेंगे एवं उन्हें स्वर्गमें शाश्वत निवास प्रदान करेंगे।' विप्रो! इस प्रकार वर देकर परशुरामके पितर उनसे अनुमति लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार महात्मा परशुरामके ये रामह्रद परम पवित्र हैं॥ ९—१४॥
स्नात्वा ह्रदेषु रामस्य ब्रह्मचारी शुचिव्रतः।<br>राममभ्यर्च्य श्रद्धावान् विन्देद् बहु सुवर्णकम्॥ १५<br><br>वंशमूलं समासाद्य तीर्थसेवी सुसंयतः।<br>स्ववंशसिद्धये विप्राः स्नात्वा वै वंशमूलके॥ १६<br><br>कायशोधनमासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>शरीरशुद्धिमाप्नोति स्नातस्तस्मिन् न संशयः॥ १७<br><br>शुद्धदेहश्च तं याति यस्मान्नावर्तते पुनः।<br>तावद् भ्रमन्ति तीर्थेषु सिद्धास्तीर्थपरायणाः।<br>यावन्न प्राप्नुवन्तीह तीर्थं तत्कायशोधनम्॥ १८श्रद्धालु पवित्रकर्मा व्यक्ति ब्रह्मचर्यपूर्वक परशुरामजीके ह्रदोंमें स्नान करनेके बाद परशुरामका अर्चन कर प्रचुर सुवर्ण प्राप्त करता है। ब्राह्मणो! तीर्थसेवी जितेन्द्रिय मनुष्य वंशमूलक नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे अपने वंशकी सिद्धि प्राप्त करता है। तीनों लोकोंमें विख्यात कायशोधन नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको निस्संदेह शरीरकी शुद्धि प्राप्त होती है और वह शुद्धदेही मनुष्य उस स्थानको जाता है, जहाँसे वह पुनः नहीं लौटता (जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ता)। तीर्थपरायण सिद्ध पुरुष तीर्थोंमें तबतक भ्रमण करते रहते हैं, जबतक वे उस कायशोधन नामक तीर्थमें नहीं पहुँचते॥ १५—१८॥
१५८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मिंस्तीर्थे च संप्लाव्य कायं संयतमानसः।<br>परं पदमवाप्नोति यस्मान्नावर्तते पुनः॥ १९<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>लोका यत्रोद्धृताः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना॥ २०<br><br>लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थस्मरणतत्परः।<br>स्नात्वा तीर्थवरे तस्मिन् लोकान् पश्यति शाश्वतान्॥ २१<br><br>यत्र विष्णुः स्थितो नित्यं शिवो देवः सनातनः।<br>तौ देवौ प्रणिपातेन प्रसाद्य मुक्तिमाप्नुयात्॥ २२<br><br>श्रीतीर्थं तु ततो गच्छेत शालग्राममनुत्तमम्।<br>तत्र स्नातस्य सांनिध्यं सदा देवी प्रयच्छति॥ २३मनको नियन्त्रित करनेवाला मनुष्य उस तीर्थमें शरीरको धोकर (प्रक्षालित कर) उस परम पदको प्राप्त करता है, जहाँसे उसे पुनः परावर्तित नहीं होना पड़ता। विप्रवरो! उसके बाद तीनों लोकोंमें विख्यात लोकोद्धार नामके तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ सर्वसमर्थ विष्णुने समस्त लोकोंका उद्धार किया था। तीर्थका स्मरण करनेमें तत्पर मनुष्य लोकोद्धार नामके तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे शाश्वत लोकोंका दर्शन प्राप्त करता है। वहाँ विष्णु एवं सनातनदेव शिव —ये दोनों ही स्थित हैं। उन दोनों देवोंको प्रणामद्वारा प्रसन्न कर फिर मुक्तिका फल प्राप्त करे। तदनन्तर अनुत्तम शालग्राम एवं श्रीतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेवालोंको भगवती (लक्ष्मी) अपने निकट निवास प्रदान करती हैं॥ १९-२३॥
कपिलाह्रदमासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च दैवतानि पितूंस्तथा॥ २४<br><br>कपिलानां सहस्त्रस्य फलं विन्दति मानवः।<br>तत्र स्थितं महादेवं कापिलं वपुरास्थितम्॥ २५<br><br>दृष्ट्वा मुक्तिमवाप्नोति ऋषिभिः पूजितं शिवम्।<br>सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः॥ २६<br><br>अर्चयित्वा पितॄन् देवानुपवासपरायणः।<br>अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति॥ २७फिर त्रैलोक्यप्रसिद्ध कपिलाह्रद नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेके पश्चात् देवता तथा पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको सहस्र कपिला गायोंके दानका फल प्राप्त होता है। वहाँपर स्थित ऋषियोंसे पूजित कपिल शरीरधारी महादेव शिवका दर्शन करनेसे मुक्तिकी प्राप्ति होती है। स्थिर अन्तःकरणवाला एवं उपवास-परायण व्यक्ति सूर्यतीर्थमें जाकर स्नान करनेके बाद पितरोंका अर्चन करनेसे अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त करता है एवं सूर्यलोकको जाता है॥ २४-२७॥
सहस्त्रकिरणं देवं भानुं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>दृष्ट्वा मुक्तिमवाप्नोति नरो ज्ञानसमन्वितः॥ २८<br><br>भवानीवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम्।<br>तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्त्रफलं लभेत्॥ २९<br><br>पितामहस्य पिबतो ह्यमृतं पूर्वमेव हि।<br>उद्गारात् सुरभिर्जाता सा च पातालमाश्रिता॥ ३०<br><br>तस्याः सुरभयो जाताः तनया लोकमातरः।<br>ताभिस्तत्सकलं व्याप्तं पातालं सुनिरन्तरम्॥ ३१तीनों लोकोंमें विख्यात हजारों किरणोंवाले सूर्यदेव भगवान्‌का दर्शन करनेसे मनुष्य ज्ञानसे युक्त होकर मुक्तिको प्राप्त करता है। तीर्थसेवन करनेवाला मनुष्य क्रमानुसार भवानीवनमें जाकर वहाँ (भवानीका) अभिषेक करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त करता है। प्राचीन कालमें अमृत-पान करते हुए ब्रह्माके उद्गार (डकार)-से सुरभिकी उत्पत्ति हुई और वह पाताल लोकमें चली गयी। उस सुरभिसे लोकमाताएँ (सुरभिकी पुत्रियाँ) (गायें) उत्पन्न हुईं। उनसे समस्त पाताल लोक व्याप्त हो गया॥ २८-३१॥
पितामहस्य यजतो दक्षिणार्थमुपाहृताः।<br>आहूता ब्रह्मणा ताश्च विभ्रान्ता विवरेण हि॥ ३२पितामहके यज्ञ करते समय दक्षिणाके लिये लायी गयी एवं ब्रह्माके द्वारा बुलायी ये गायें विवरके कारण