वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५७- कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु,उनका सेनापति होना तथा उनका गण, मयूर, शक्ति और दण्डादिका पाना
अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश २४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्तो विभावर्या बलवान् धूम्रलोचनः।<br>समभ्यधावत् त्वरितो गदामादाय वीर्यवान्॥ ४६<br>तमापतन्तं सगदं हुंकारेणैव कौशिकी।<br>सबलं भस्मसाच्चक्रे शुष्कमग्निरिवेन्धनम्॥ ४७<br>ततो हाहाकृतमभूज्जगत्स्यस्मिंश्चराचरे।<br>सबलं भस्मसानीतं कौशिक्या वीक्ष्य दानवम्॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— विभावरी (देवी)-के इस प्रकार कहनेपर बलवान् एवं पराक्रमी धूम्रलोचन गदा लेकर झट दौड़ पड़ा। कौशिकीने गदा लेकर आ रहे उस असुरको, साथ ही उसकी सेनाको भी हुंकारसे ही ऐसे भस्म कर दिया जैसे आग सूखी लकड़ीको जला देती है। कौशिकीद्वारा सेनाके साथ बलवान् दानवको भस्म किये जाते देखकर सारे संसारमें हाहाकार मच गया॥ ४६–४८॥ |
| तच्च शुम्भोऽपि शुश्राव महच्छब्दमुदीरितम्।<br>अथादिदेश बलिनौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥ ४९<br>रुरुं च बलिनां श्रेष्ठं तथा जग्मुर्मुदान्विताः।<br>तेषां च सैन्यमतुलं गजाश्वरथसंकुलम्॥ ५०<br>समाजगाम सहसा यत्रास्ते कोशसम्भवा।<br>तदायान्तं रिपुबलं दृष्ट्वा कोटिशतावरम्॥ ५१<br>सिंहोऽद्रवद् धुतसटः पाटयन् दानवान् रणे।<br>कांश्चित् करप्रहारेण कांश्चिदास्येन लीलया॥ ५२<br>नखैः कांश्चिदाक्रम्य उरसा प्रममाथ च।<br>ते वध्यमानाः सिंहेन गिरिकन्दरवासिना॥ ५३<br>भूतैश्च देव्यनुचरैश्चण्डमुण्डौ समाश्रयन्।<br>तावार्त्तं स्वबलं दृष्ट्वा कोपप्रस्फुरिताधरौ॥ ५४ | शुम्भने भी (हाहाकारका) वह महान् शब्द सुना। उसके बाद उसने चण्ड एवं मुण्ड नामके दोनों महान् एवं बलवान् असुरों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ रुरुको आदेश दिया और वे प्रसन्नतापूर्वक (युद्धके लिये) चल पड़े। हाथियों और रथोंसे भरी उनकी बड़ी सेना शीघ्र ही वहाँ पहुँच गयी, जहाँ कौशिकी खड़ी थीं। उस समय शत्रु की सैकड़ों सेनाओंको आते देखकर सिंह युद्धमें अपनी गर्दनके बालोंको फटकारने लगा तथा खेल-खेलमें—बिना किसी परिश्रमके ही दानवोंको पछाड़-पछाड़कर मारने लगा। उसने कुछको पंजोंके थपेड़ोंसे, कुछको मुखसे, कुछको तेज नखोंसे एवं कुछको अपनी छातीके धक्के देकर भयत्रस्त कर दिया। फिर तो पर्वतकी गुफामें रहनेवाले सिंहसे एवं देवीके अनुगत भूतोंसे मारे जा रहे वे सभी दानव (भागकर) चण्ड-मुण्डकी शरणमें चले गये। चण्ड और मुण्ड अपनी सेनाको घबरायी एवं दुखी हुई देखकर कुपित हो गये और अपने ओठ फड़फड़ाने लगे॥ ४९–५४॥ |
| समाद्रवेतां दुर्गां वै पतङ्गाविव पावकम्।<br>तावापतन्तौ रौद्रौ वै दृष्ट्वा क्रोधपरिप्लुता॥ ५५<br>त्रिशाखां भृकुटीं वक्त्रे चकार परमेश्वरी।<br>भ्रुकुटीकुटिलाद् देव्या ललाटफलकाद्द्रुतम्।<br>काली करालवदना निःसृता योगिनी शुभा॥ ५६<br>खट्वाङ्गमादाय करेण रौद्र-<br>मसिञ्च कालाञ्जनकोशमुग्रम्।<br>संशुष्कगात्रा रुधिराप्लुताङ्गी<br>नरेन्द्रमूर्ध्नां स्रजमुद्वहन्ती॥ ५७ | अग्निकी ओर उड़कर जानेवाले (जलकर मरनेवाले) पतंगोंके समान वे दोनों दैत्य देवीकी ओर दौड़े। उन दोनों भयङ्कर दानवोंको सामने आते हुए देखकर देवी अत्यन्त क्रुद्ध हो गयीं। परमेश्वरीने मुखके ऊपर तीन रेखाओंवाली भृकुटि चढ़ायी। देवीके टेढ़ी भौंहोंसे युक्त भालस्थलसे शीघ्र ही विकराल मुखवाली, (भक्तोंके लिये) मङ्गलदायिनी योगिनी काली निकल आयीं। उनके हाथमें भयङ्कर खट्वाङ्ग (नामक) हथियार तथा काले अञ्जनके समान तरकससे युक्त भयङ्कर तलवार थी। उनका शरीर कंकाल और खूनसे सना हुआ था तथा उनके गलेमें राजाओंके कटे हुए सिरोंकी बनी हुई |
२४६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कांश्चित् खड्गेन चिच्छेद खट्वाङ्गेन परान् रणे।<br>न्यषूदयद् भृशं क्रुद्धा सरथाश्वगजान् रिपून्॥ ५८ | मुण्डमाला थी। उन्होंने बहुत अधिक क्रुद्ध होकर युद्धमें कुछको तलवारके घाट उतार दिया और हाथी, रथ एवं घोड़ोंसे युक्त कुछ अन्य असुर-शत्रुओंको खट्वाङ्गसे मार डाला॥ ५५-५८॥ |
| चर्माङ्कुशं मुद्गरं च सधनुष्कं सघण्टिकम्।<br>कुञ्जरं सह यन्त्रेण प्रचिक्षेप मुखेऽम्बिका॥ ५९<br>सचक्रकूबररथं ससारथितुरङ्गमम्।<br>समं योधेन वदने क्षिप्य चर्वयतेऽम्बिका॥ ६०<br>एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामपरं तथा।<br>पादेनाक्रम्य चैवान्यं प्रेषयामास मृत्यवे॥ ६१<br>ततस्तु तद् बलं देव्या भक्षितं सबलाधिपम्।<br>रुरुर्दृष्ट्वा प्रदुद्राव तं चण्डी ददृशे स्वयम्॥ ६२<br>आजघानाथ शिरसि खट्वाङ्गेन महासुरम्।<br>स पपात हतो भूम्यां छिन्नमूल इव द्रुमः॥ ६३ | अम्बिकादेवी चर्म, अङ्कुश, मुद्गर, धनुष, घंटियों और यन्त्रके साथ हाथियोंको अपने मुखमें झोंकने लगीं और चक्र तथा सारथी, घोड़े और योद्धाके साथ कूबरसे युक्त रथको अपने मुखमें डालकर वे चबाने लगीं। फिर उन्होंने किसीको सिरके केश पकड़कर, किसीको गला पकड़कर और अन्य किसीको पैरोंसे रौंद-रौंदकर मृत्युके समीप पहुँचा दिया। उसके बाद सेनापतिके साथ उस सेनाको देवीद्वारा भक्षण किया जाता हुआ देखकर रुरु दौड़ पड़ा। चण्डीने स्वयं उसे देखा और खट्वाङ्गसे उस महान् असुरके सिरपर आघात कर दिया। वह मरकर जड़से कटे हुए वृक्षके समान पृथ्वीपर (धड़ामसे) गिर पड़ा॥ ५९-६३॥ |
| ततस्तं पतितं दृष्ट्वा पशोरिव विभावरी।<br>कोशमुत्कर्तयामास कर्णादिचरणान्तिकम्॥ ६४<br>सा च कोशं समादाय बबन्ध विमला जटाः।<br>एका न बन्धमगमत् तामुत्पाट्याक्षिपद् भुवि॥ ६५<br>सा जाता सुतरां रौद्री तैलाभ्यक्तशिरोरुहा।<br>कृष्णार्धमर्धशुक्लं च धारयन्ती स्वकं वपुः॥ ६६<br>साऽब्रवीद् वरमेकं तु मारयामि महासुरम्।<br>तस्या नाम तदा चक्रे चण्डमारीति विश्रुतम्॥ ६७ | देवीने उसे जमीनपर गिरा हुआ देखकर पशुके समान उसके कानसे पैरतकका कोश काट दिया—उसकी चमड़ी उधेड़ ली। उस कोश (चमड़ी)-को लेकर उन्होंने अपनी निर्मल जटाओंको बाँध लिया। उनमें एक जटा नहीं बाँधी गयी। उसे उखाड़कर उन्होंने जमीनपर फेंक दिया। वह जटा एक भयावनी देवी हो गयी। उसके सिरके बाल तेलसे सिक्त (सने) थे एवं वह आधा काला तथा आधा सफेद वर्णका शरीर धारण किये हुए थी। उसने कहा—मैं एक श्रेष्ठ महान् असुरको मारूँगी। तब देवीने उसका चण्डमारी—यह प्रसिद्ध नाम रख दिया॥ ६४—६७॥ |
| प्राह गच्छस्व शुभगे चण्डमुण्डविहानय।<br>स्वयं हि मारयिष्यामि तावानेतुं त्वमर्हसि॥ ६८<br>श्रुत्वैवं वचनं देव्याः साऽभ्यद्रवत तावुभौ।<br>प्रदुद्रुवतुर्भयात्तौ दिशमाश्रित्य दक्षिणाम्॥ ६९<br>ततस्तावपि वेगेन प्राधावत् त्यक्तवाससौ।<br>साऽधिरुह्य महावेगं रासभं गरुडोपमम्॥ ७०<br>यतो गतौ च तौ दैत्यौ तत्रैवानुययौ शिवा।<br>सा ददर्श तदा पौण्ड्रं महिषं वै यमस्य च॥ ७१ | देवीने कहा—शुभगे! तुम जाओ और चण्ड-मुण्डको यहाँ पकड़ लाओ! उन्हें पकड़ लानेमें तुम समर्थ हो। मैं स्वयं उन्हें मारूँगी। इस प्रकार देवीके उस कथनको सुनकर वह उन दोनोंकी ओर दौड़ पड़ी। वे दोनों भयसे दुःखी होकर दक्षिण दिशाकी ओर भाग गये। तब चण्डमारी गरुड़के समान वेगवान् गदहेपर सवार होकर वेगसे भगनेके कारण वस्त्रहीन हुए उन दोनोंके पीछे दौड़ पड़ी। (फिर तो) जहाँ-जहाँ चण्ड और मुण्ड दोनों दैत्य गये, वहाँ-वहाँ उनके पीछे शिवा भी पहुँचती गयीं। उस समय उन्होंने यमराजके पौण्ड्र नामक महिषको देखा॥ ६८-७१॥ |
अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश २४७
| सा तस्योत्पाटयामास विषाणं भुजगाकृतिम्।<br>तं प्रगृह्य करेणैव दानवावन्वगाज्जवात् ॥ ७२<br><br>तौ चापि भूमिं संत्यज्य जगमतुर्गगनं तदा।<br>वेगेनाभिसृता सा च रासभेन महेश्वरी ॥ ७३<br><br>ततो ददर्श गरुडं पन्नगेन्द्रं चिखादिषुम्।<br>कर्कोटकं स दृष्ट्वैव ऊर्ध्वरोमा व्यजायत ॥ ७४<br><br>भयान्मार्याश्च गरुडो मांसपिण्डोपमो बभौ।<br>न्यपतंस्तस्य पत्राणि रौद्राणि हि पतत्रिणः ॥ ७५ | उसने (चण्डमारीने) उस महिषकी साँपके आकारवाली सींगको उखाड़ लिया और उसे हाथमें लेकर वह शीघ्रतासे दानवोंके पीछे पील पड़ी। तब वे दोनों दैत्य पृथ्वी छोड़कर आकाशमें चले गये। फिर महेश्वरीने अपने गधेके साथ शीघ्रतासे उन दोनोंका पीछा किया। (देवीने) सर्पराज कर्कोटकको खानेकी इच्छावाले गरुड़को देखा। (फिर तो देवीको) देखते ही उनके रोंगटे खड़े हो गये; वे डर गये। चण्डमारीके भयसे गरुड़ मांसपिण्डके समान—लोथड़े-से हो गये। उन पक्षिराजके भयङ्कर पाँख (भयके कारण) गिर पड़े ॥ ७२—७५ ॥ |
| खगेन्द्रपत्राण्यादाय नागं कर्कोटकं तथा।<br>वेगेनानुसरद् देवी चण्डमुण्डौ भयातुरौ ॥ ७६<br><br>सम्प्राप्तौ च तदा देव्या चण्डमुण्डौ महासुरौ।<br>बद्धौ कर्कोटकेनैव बद्ध्वा विन्ध्यमुपागमत् ॥ ७७<br><br>निवेदयित्वा कौशिक्यै कोशमादाय भैरवम्।<br>शिरोभिर्दानवेन्द्राणां तार्क्ष्यपत्रैश्च शोभनैः ॥ ७८<br><br>कृत्वा स्रजमनौपम्यां चण्डिकायै न्यवेदयत्।<br>घर्घरां च मृगेन्द्रस्य चर्मणः सा समर्पयत् ॥ ७९ | पक्षिराजके (गिरे हुए) पाँखों तथा कर्कोटक सर्पको लेकर चण्डमारी भयसे आर्त चण्ड और मुण्डके पीछे दौड़ी। उसके बाद तुरंत ही वह देवी चण्ड और मुण्ड नामक महान् असुरोंके निकट पहुँच गयी एवं उन दोनोंको कर्कोटक नागसे बाँधकर विन्ध्यपर्वतपर ले आयी। उस चण्डमारीने देवीके पास उन दानवोंको निवेदित करके बाद भयङ्कर कोश लेकर दानवोंके मस्तकों तथा गरुडके सुन्दर पाँखोंसे बनी अनुपम माला निर्मितकर देवीको दे दी एवं सिंहचर्मका घाघरा भी देवीको समर्पित किया ॥ ७६—७९ ॥ |
| स्रजमन्यैः खगेन्द्रस्य पत्रैर्मूर्ध्नि निबध्य च।<br>आत्मना सा पपौ पानं रुधिरं दानवेष्वपि ॥ ८०<br><br>चण्डा त्वादाय चण्डं च मुण्डं चासुरनायकम्।<br>चकार कुपिता दुर्गा विशिरस्कौ महासुरौ ॥ ८१<br><br>तयोरेवाहिना देवी शेखरं शुष्करेवती।<br>कृत्वा जगाम कौशिक्याः सकाशं मार्यया सह ॥ ८२<br><br>समेत्य साब्रवीद् देवि गृह्यतां शेखरोत्तमः।<br>ग्रथितो दैत्यशीर्षाभ्यां नागराजेन वेष्टितः ॥ ८३<br><br>तं शेखरं शिवा गृह्य चण्डाया मूर्ध्नि विस्तृतम्।<br>बबन्ध प्राह चैवैनां कृतं कर्म सुदारुणम् ॥ ८४ | उन्होंने स्वयं गरुड़के अन्य पाँखोंसे दूसरी माला बनाकर उसे अपने सिरमें बाँध लिया और (फिर वे) दानवोंका खून पीने लगीं। उसके बाद प्रचण्ड दुर्गाने चण्ड और असुरनायक मुण्डको पकड़ लिया एवं कुपित होकर उन दोनों महासुरोंका सिर काट डाला। शुष्करेवती देवीने सर्पद्वारा उनके सिरका अलंकार बनाया और वह चण्डमारीके साथ कौशिकीके पास गयी। वहाँ जाकर उसने कहा—देवि! दैत्योंके सिरसे गुँथे एवं नागराजसे लपेटकर सिरपर पहने जानेवाले इस श्रेष्ठ अलंकारको धारण करें। शिवा देवीने उस विस्तृत सिरके आभूषणको लेकर उसे चामुण्डाके मस्तकपर बाँध दिया और उनसे कहा—आपने अत्यन्त भयंकर कार्य किया है ॥ ८०—८४ ॥ |
| शेखरं चण्डमुण्डाभ्यां यस्माद् धारयसे शुभम्।<br>तस्माल्लोके तव ख्यातिश्चामुण्डेति भविष्यति ॥ ८५<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्रा<br>सा चण्डमुण्डस्रजधारिणीं वै।<br>दिग्वाससं चाभ्यवदत् प्रतीता<br>निष्षूदय स्वारिबलान्यमूनि ॥ ८६ | यतः आपने चण्ड और मुण्डके सिरोंका शुभ आभूषण धारण किया है, अतः आप लोकमें चामुण्डा नामसे प्रख्यात होंगी। चण्ड और मुण्डकी माला धारण करनेवाली उन देवीसे त्रिनेत्राने इस प्रकार कहकर दिगम्बरसे कहा—तुम अपने इन शत्रुसैनिकोंका विनाश करो। |
| २४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
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| सा त्वेवमुक्ताऽथ विषाणकोट्या<br>सुवेगयुक्तेन च रासभेन।<br>निषूदयन्ती रिपुसैन्यमुग्रं<br>चचार चान्यानसुरांश्चखाद॥ ८७<br>ततोऽम्बिकायास्त्वथ चर्ममुण्डया<br>मार्या च सिंहेन च भूतसंघैः।<br>निपात्यमाना दनुपुङ्गवास्ते<br>ककुद्मिनं शुम्भमुपाश्रयन्त॥ ८८ | ऐसा कहनेपर बहुत तेज गतिवाले गधेके साथ वह देवी सींगकी नोकसे उग्र शत्रु-सेनाके दलोंका संहार करती हुई विचरण करने लगी और (इस प्रकार) असुरोंको चबाने लगी। उसके बाद अम्बिकाकी अनुगामिनियों—चर्ममुण्डा, मारी, सिंह एवं भूतगणोंद्वारा मारे जा रहे वे महादानव अपने नायक शुम्भकी शरणमें गये॥ ८५–८८॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५५॥
छप्पनवाँ अध्याय
चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध, देवताओंके द्वारा देवीकी स्तुति, देवीद्वारा वरदान और भविष्यमें प्रादुर्भावका कथन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>चण्डमुण्डौ च निहतौ दृष्ट्वा सैन्यं च विद्रुतम्।<br>समादिदेशातिबलं रक्तबीजं महासुरम्।<br>अक्षौहिणीनां त्रिंशद्भिः कोटिभिः परिवारितम्॥ १<br><br>तमापतन्तं दैत्यानां बलं दृष्ट्वैव चण्डिका।<br>मुमोच सिंहनादं वै ताभ्यां सह महेश्वरी॥ २<br><br>निनदन्त्यास्ततो देव्या ब्रह्माणी मुखतोऽभवत्।<br>हंसयुक्तविमानस्था साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ ३<br><br>माहेश्वरी त्रिनेत्रा च वृषारूढा त्रिशूलिनी।<br>महाहिवलया रौद्रा जाता कुण्डलिनी क्षणात्॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) शुम्भने चण्ड और मुण्डको मृत तथा सैनिकोंको भगा हुआ देखकर अत्यन्त बलवान् महान् असुर रक्तबीजको (लड़नेके लिये) आज्ञा दी। उसके बाद महेश्वरी चण्डिकाने दैत्योंकी तीस करोड़ अक्षौहिणीवाली उस सेनाको आती हुई देखकर उन दोनों देवियोंके साथ सिंहके समान गर्जन किया। उसके बाद सिंहके समान निनाद (हुंकार) करती हुई देवीके मुखसे हंसके विमानपर बैठी हुई तथा अक्षमाला और कमण्डलु लिये ब्रह्माणी उत्पन्न हो गयी। क्षणभरमें ही वृषपर आरूढ़ त्रिशूलधारिणी महासर्पके कंगन पहने और कुण्डल धारण किये हुए तीन नेत्रोंवाली माहेश्वरी भी उत्पन्न हो गयी॥ १–४॥ |
| कण्ठादथ च कौमारी बर्हिपत्रा च शक्तिनी।<br>समुद्भूता च देवर्षे मयूरवरवाहना॥ ५ | देवर्षि नारदजी! मोरपंखसे सुशोभित, शक्तिरूपिणी एवं श्रेष्ठ मोरके वाहनपर आरूढ़ ‘कौमारी' देवीके कण्ठसे उत्पन्न हुई। |
| बाहुभ्यां गरुडारूढा शङ्खचक्रगदासिनी।<br>शार्ङ्गबाणधरा जाता वैष्णवी रूपशालिनी॥ ६ | गरुडपर सवार, शङ्ख, चक्र, गदा, तलवार एवं धनुष-बाण धारण करनेवाली सौन्दर्यशालिनी 'वैष्णवी' शक्ति देवीकी दोनों भुजाओंसे उत्पन्न हुई। |
| महोग्रमुशला रौद्रा दंष्ट्रोल्लिखितभूतला।<br>वाराही पृष्ठतो जाता शेषनागोपरि स्थिता॥ ७ | भारी भयङ्कर मूसल लिये, दाढ़ोंसे पृथ्वीको खोदनेवाली, शेषनागके ऊपर स्थित 'वाराही' शक्ति देवीकी पीठसे उत्पन्न हुई। |
अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध २४९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वज्राङ्कुशोद्यतकरा नानालङ्कारभूषिता।<br>जाता गजेन्द्रपृष्ठस्था माहेन्द्री स्तनमण्डलात् ॥ ८ | हाथमें वज्र और अंकुशको लिये, भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित, गजराजकी पीठपर बैठी हुई 'माहेन्द्री' शक्ति उनके स्तन-मण्डलसे उत्पन्न हुई॥५-८॥ |
| विक्षिपन्ती सटाक्षेपैर्ग्रहनक्षत्रतारकाः।<br>नखिनी हृदयाज्जाता नारसिंही सुदारुणा ॥ ९ | गर्दनके बालोंको फटकारनेसे ग्रह, नक्षत्र और ताराओंको विक्षुब्ध करती हुई तीक्ष्ण नखोंवाली अत्यन्त भयङ्कर नारसिंही शक्ति देवीके हृदयसे उत्पन्न हुई। |
| ताभिर्निपात्यमानं तु निरीक्ष्य बलमासुरम्।<br>ननाद भूयो नादान् वै चण्डिका निर्भया रिपून्।<br>तन्निनादं महच्छ्रुत्वा त्रैलोक्यप्रतिपूरकम् ॥ १० | फिर चण्डिकाने उन शक्तियोंद्वारा संहार की जाती हुई असुर-सेना एवं शत्रुओंको देखकर भयरहित होकर घोर गर्जना की। तीनों लोकोंको ध्वनिसे गुँजा देनेवाले |
| समाजगाम देवेशः शूलपाणिखिलोचनः।<br>अभ्येत्य वन्द्य चैवैनां प्राह वाक्यं तदाऽम्बिके ॥ ११ | उस गर्जनको सुनकर शूलपाणि त्रिलोचन महादेवजी देवीके निकट आये और उनको प्रणामकर (उन्होंने) यह कहा—अम्बिके! दुर्गे! मैं आ गया हूँ। मैं आपका |
| समायातोऽस्मि वै दुर्गे देह्याज्ञां किं करोमि ते।<br>तद्वाक्यसमकालं च देव्या देहोद्भवा शिवा ॥ १२ | कौन-सा कार्य करूँ? मुझे आज्ञा दीजिये। उस उक्तिके साथ ही देवीकी देहसे शिवा उत्पन्न हो गयीं। उन्होंने |
| जाता सा चाह देवेशं गच्छ दौत्येन शंकर।<br>ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च यदि जीवितुमिच्छथ ॥ १३ | देवेश्वरसे कहा—शङ्कर! आप दूत बनकर जाइये और शुम्भ-निशुम्भसे कहिये कि अये दुराचारियो! यदि तुम सब जानेकी इच्छा करते हो तो सातवें (लोक) |
| तद् गच्छध्वं दुराचाराः सप्तमं हि रसातलम्।<br>वासवो लभतां स्वर्गं देवाः सन्तु गतव्यथाः ॥ १४ | रसातलमें चले जाओ। इन्द्रको स्वर्गकी प्राप्ति हो एवं देवगण पीड़ा (बाधासे) रहित हो जायें॥ ९-१४॥ |
| यजन्तु ब्राह्मणाद्यामी वर्णा यज्ञांश्च साम्प्रतम्।<br>नोचेद् बलावलेपेन भवन्तो योद्धुमिच्छथ ॥ १५ | ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्ण विधि-विधानसे यज्ञ (अनुष्ठान) करें। यदि तुम (सब) अपने पूरे बलके घमण्डसे युद्ध करना चाहते हो, तो आओ। यह मैं बिना |
| तदागच्छध्वमव्यग्रा एषाऽहं विनिषूदये।<br>यतस्तु सा शिवं दौत्ये न्ययोजयत नारद ॥ १६<br>ततो नाम महादेव्याः शिवदूतीत्यजायत। | किसी घबराहटके—आसानीसे तुमलोगोंका विनाश करूँ—किये देती हूँ। नारदजी! उन्होंने शिवको दूत बनाया, अतः महादेवीका नाम शिवदूती हुआ। वे सारे |
| ते चापि शंकरवचः श्रुत्वा गर्वसमन्वितम्।<br>हुंकृत्वाऽभ्यद्रवन् सर्वे यत्र कात्यायनी स्थिता ॥ १७ | असुर भी शङ्करके गर्वीले वचनको सुनकर हुंकार करते हुए, जहाँ कात्यायनी स्थित थीं वहाँ दौड़ पड़े। उसके |
| ततः शरैः शक्तिभिरङ्कुशैश्र्वरैः<br>परश्वधैः शूलभुशुण्डिपट्टिशैः।<br>प्रासैः सुतीक्ष्णैः परिघैश्च विस्तृतै-<br>र्ववर्षतुर्दैत्यवरौ सुरेश्रीम् ॥ १८ | बाद दोनों असुर सुरेश्रीके ऊपर बाण, शक्ति, अङ्कुश, श्रेष्ठ कुठार, शूल, भुशुण्डी, पट्टिश, तीक्ष्ण प्रास और बहुत बड़े परिघ आदि अस्त्रोंकी बौछार करने लगे ॥ १५-१८॥ |
| सा चापि बाणैर्वरकार्मुकच्युतै-<br>श्चिच्छेद शस्त्राण्यथ बाहुभिः सह।<br>जघान चान्यान् रणचण्डविक्रमा<br>महासुरान् बाणशतैर्महेश्वरी ॥ १९ | युद्धमें प्रचण्ड पराक्रमशालिनी उस महेश्वरीने भी श्रेष्ठ धनुषसे निकले बाणोंसे असुरोंके शस्त्रोंको उनकी भुजाओंसहित काट दिया एवं सैकड़ों बाणोंसे अन्य असुरोंको मौतके घाट उतार दिया। |
| मारी त्रिशूलेन जघान चान्यान्<br>खट्वाङ्गपातैरपरांश्च कौशिकी।<br>महाजलक्षेपहतप्रभावान्<br>ब्राह्मी तथान्यानसुरांश्चकार ॥ २० | मारीने त्रिशूलसे बहुतोंको मारा, कौशिकीने खट्वाङ्गके प्रहारसे बहुतोंका वध किया तथा ब्राह्मीने जलराशि फेंककर दूसरे बहुत-से असुरोंको प्रभावहीन कर दिया। |
| २५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| माहेश्वरी शूलविदारितोरस-<br>श्चकार दग्धानपरांश्च वैष्णवी।<br>शक्त्या कुमारी कुलिशेन चैन्द्री<br>तुण्डेन चक्रेण वराहरूपिणी ॥ २१<br>नखैर्विभिन्नानपि नारसिंही<br>अट्टाट्टहासैरपि रुद्रदूती।<br>रुद्रस्त्रिशूलेन तथैव चान्यान्<br>विनायकश्चापि परश्वधेन ॥ २२ | माहेश्वरीने शूलसे बहुत-से असुरोंकी छाती छेदकर जर्जर कर दिया। वैष्णवीने बहुतोंको जला कर भस्म कर डाला। कुमारीने शक्तिसे, ऐन्द्रीने वज्रसे, वाराहीने मुखसे एवं चक्रसे असुरोंका संहार किया। नारसिंहीने नखोंके प्रहारसे दैत्योंको चीर डाला, शिवदूतीने अट्टहाससे, रुद्रने त्रिशूलसे एवं विनायकने फरसेकी मारसे अन्य असुरोंको विनष्ट कर दिया॥ १९–२२॥ |
| एवं हि देव्या विविधैस्तु रूपै-<br>र्निपात्यमाना दनुपुङ्गवास्ते।<br>पेतुः पृथिव्यां भुवि चापि भूतै-<br>स्ते भक्ष्यमाणाः प्रलयं प्रजग्मुः ॥ २३<br>ते वध्यमानास्त्वथ देवताभि-<br>र्महासुरा मातृभिराकुलाश्च।<br>विमुक्तकेशास्तरलेक्षणा भयात्<br>ते रक्तबीजं शरणं हि जग्मुः ॥ २४<br>स रक्तबीजः सहसाभ्युपेत्य<br>वरास्त्रमादाय च मातृमण्डलम्।<br>विद्रावयन् भूतगणान् समन्ताद्<br>विवेश कोपात् स्फुरिताधरश्च ॥ २५<br>तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मातरः<br>शस्त्रैः शिताग्रैर्दितिजं ववर्षुः।<br>यो रक्तबिन्दुर्न्यपतत् पृथिव्यां<br>स तत्प्रमाणस्त्वसुरोऽपि जज्ञे ॥ २६ | इस प्रकार देवीके बहुत-से रूपोंद्वारा संहार किये जाते हुए दानव धराशायी होने लगे। भूतगण पृथ्वीपर (गिरे हुए) उन दानवोंको खा-खाकर उन्हें नष्ट करने लगे। देवताओं और मातृशक्तियोंद्वारा संहार किये जा रहे एवं व्याकुल किये गये वे सारे महान् असुर खुले बालों एवं भयसे इधर-उधर देखते हुए रक्तबीजकी शरणमें गये। क्रोधसे ओठको फड़फड़ाते हुए रक्तबीज तेज धारवाले अस्त्रोंको लेकर एकाएक आ धमका एवं भूतगणोंको इधर-उधर खदेड़ते हुए मातृव्यूहमें प्रवेश कर गया। उसको आते हुए देखकर मातृशक्तियोंने उस असुरपर अपने तेज शस्त्रोंकी बौछार कीं। (उनके शरीरसे) रक्तकी जो बूँदें पृथ्वीपर गिरती थीं उनसे उतने ही बलवान् असुर उत्पन्न हो जाते थे॥ २३–२६॥ |
| ततस्तदाश्चर्यमयं निरीक्ष्य<br>सा कौशिकी केशिनिमभ्युवाच।<br>पिबस्व चण्डे रुधिरं त्वराते-<br>र्वितत्य वक्त्रं वडवानलाभम् ॥ २७<br>सा त्वेवमुक्ता वरदाम्बिका हि<br>वितत्य वक्त्रं विकरालमुग्रम्।<br>ओष्ठं नभस्पृक् पृथिवीं स्पृशन्तं<br>कृत्वाऽधरं तिष्ठति चर्ममुण्डा ॥ २८<br>ततोऽम्बिका केशविकर्षणाकुलं<br>कृत्वा रिपुं प्राक्षिपत स्ववक्त्रे।<br>बिभेद शूलेन तथाऽप्युरस्तः<br>क्षतोद्भवान्ये न्यपतंश्च वक्त्रे ॥ २९<br>ततस्तु शोषं प्रजगाम रक्तं<br>रक्तक्षये हीनबलो बभूव।<br>तं हीनवीर्यं शतधा चकार<br>चक्रेण चामीकरभूषितेन ॥ ३० | उसके बाद उस अद्भुत दृश्यको देखकर कौशिकीने केशिनीसे कहा—चण्डिके! वडवानल (समुद्रकी आग)-की भाँति अपने मुखको फैलाकर शत्रु का खून पी डालो। ऐसा कहनेपर वरदायिनी अम्बिकाने अपना विशाल भयङ्कर मुँह फैलाया। ऊपरी ओठसे आकाश एवं निचले ओठसे पृथ्वीका स्पर्श करती हुई चामुण्डा सामने खड़ी हो गयी। उसके बाद अम्बिकाने शत्रुके बालोंको पकड़ करके उसे घसीटकर व्याकुल कर दिया और उसे अपने मुखमें डाल लिया और उसकी छातीमें शूलका प्रहार कर दिया। तब रक्तसे उत्पन्न होनेवाले दूसरे राक्षस भी उनके मुखमें ही गिरने लगे। उसके बाद उसका रक्त सूख गया। रक्तके नष्ट हो जानेसे वह बलहीन हो गया। निर्बल हो जानेपर उसको देवीने सुवर्णसे विभूषित चक्रसे सौ टुकड़ोंमें काट डाला॥ २७–३०॥ |
अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध २५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्मिन् विशस्ते दनुसैन्यनाथे<br>ते दानवा दीनतरं विनेदुः।<br>हा तात हा भ्रातरिति ब्रुवन्तः<br>क्व यासि तिष्ठस्व मुहूर्त्तमेहि॥ ३१<br>तथाऽपरे विलुलितकेशपाशा<br>विशीर्णवर्माभरणा दिगम्बराः।<br>निपातिता धरणितले मृडन्या<br>प्रदुद्रुवुर्गिरिवरमुह्य दैत्याः॥ ३२<br>विशीर्णवर्मायुधभूषणं तद्<br>बलं निरीक्ष्यैव हि दानवेन्द्रः।<br>विशीर्णचक्राक्षरथो निशुम्भः<br>क्रोधान्मृडानीं समुपाजगाम॥ ३३<br>खड्गं समादाय च चर्म भास्वरं<br>धुन्वञ्शिरः प्रेक्ष्य च रूपमस्याः।<br>सस्तम्भमोहज्वरपीडितोऽथ<br>चित्रे यथाऽसौ लिखितो बभूव॥ ३४ | उस दानव-सेनापतिके मारे जानेपर वे सभी दानव हा तात! हा भाई! कहाँ जा रहे हो, क्षणभर रुको, यहाँ आओ—ऐसा कहते हुए करुण क्रन्दन करने लगे। मृडानीने खुले और बिखरे बालोंवाले तथा टुकड़े-टुकड़े हुए कवचवाले अनेक नंगे दैत्योंको पृथ्वीपर गिरा दिया। वे दैत्य पर्वतश्रेष्ठको छोड़कर भाग गये। टूटे कवच, हथियारों एवं आभूषणोंसे युक्त अपनी सेनाको देखकर टूटे (ही) चक्र एवं धुरीवाले रथपर चढ़कर दानवश्रेष्ठ निशुम्भ क्रोधपूर्वक मृडानी (देवी)-के पास गया। चमकती हुई तलवार और ढाल लेकर सिर हिलाते हुए वह देवीका रूप देखकर मोहज्वरसे पीड़ित हो चित्र-लिखे हुएकी भाँति ठिठक गया॥ ३१-३४॥ |
| तं स्तम्भितं वीक्ष्य सुरारिमग्रे<br>प्रोवाच देवी वचनं विहस्य।<br>अनेन वीर्येण सुरास्त्वया जिता<br>अनेन मां प्रार्थयसे बलेन॥ ३५<br>श्रुत्वा तु वाक्यं कौशिक्या दानवः सुचिरादिव।<br>प्रोवाच चिन्तयित्वाऽथ वचनं वदतां वरः॥ ३६<br>सुकुमारशरीरोऽयं मच्छस्त्रपतनादपि।<br>शतधा यास्यते भीरु आमपात्रमिवाम्भसि॥ ३७<br>एतद् विचिन्तयन्नर्थं त्वां प्रहर्तुं न सुन्दरि।<br>करोमि बुद्धिं तस्मात् त्वं मां भजस्वायतेक्षणे॥ ३८ | देवीने उस स्तब्ध हुए देवताओंके शत्रुको सामने देखकर हँसते हुए यह वचन कहा—क्या इसी शक्तिके बलपर तुमने देवताओंको पराजित किया है? और, क्या इसी बलपर मुझको (पत्नीरूपमें) पानेके लिये याचना करते रहे? कौशिकीकी बात सुननेके बाद देरतक विचार करके बोलनेवालोंमें श्रेष्ठ वह दानव यह वचन बोला—भीरु! यह तुम्हारा अत्यन्त कोमल शरीर मेरे शस्त्रोंकी मारसे जलमें कच्चे बर्तनकी तरह सैकड़ों टुकड़ोंमें अलग-अलग हो जायगा। सुन्दरि! यह सोचकर मैं तुम्हारे ऊपर आघात करनेका विचार नहीं कर रहा हूँ। अतः विशालनयने! तुम मुझे अङ्गीकार कर लो॥ ३५-३८॥ |
| मम खड्गनिपातं हि नेन्द्रो धारयितुं क्षमः।<br>निवर्तय मतिं युद्धाद् भार्या मे भव साम्प्रतम्॥ ३९<br>इत्थं निशुम्भवचनं श्रुत्वा योगीश्वरी मुने।<br>विहस्य भावगम्भीरं निशुम्भं वाक्यमब्रवीत्॥ ४०<br>नाजिताऽहं रणे वीर भवे भार्या हि कस्यचित्।<br>भवान् यदिह भार्यार्थी ततो मां जय संयुगे॥ ४१<br>इत्येवमुक्ते वचने खड्गमुद्यम्य दानवः।<br>प्रचिक्षेप तदा वेगात् कौशिकीं प्रति नारद॥ ४२ | मेरी तलवारकी मारको इन्द्र भी नहीं सह सकते। तुम युद्धका विचार छोड़ दो एवं अब मेरी पत्नी बन जाओ। मुने! योगीश्वरीने निशुम्भकी यह बात सुनकर हँसते हुए उससे भावभरे वचनमें कहा—वीर! लड़ाईके मैदानमें बिना हारे हुए मैं किसीकी पत्नी नहीं बन सकती। यदि तुम मुझे अपनी स्त्री बनाना चाहते हो तो संग्राममें मुझे जीत लो। नारदजी! इस बातके कहनेपर उस दानवने तलवार उठाकर कौशिकीकी ओर उसे वेगसे चलाया॥ ३९-४२॥ |
| तमापतन्तं निस्त्रिंशं षड्भिर्बर्हिणराजितैः।<br>चिच्छेद चर्मणा सार्द्धं तदद्भुतमिवाभवत्॥ ४३ | देवीने अपनी ओर आती हुई उस तलवारको ढालसहित मोरके पंखसे सुशोभित छः बाणोंसे काट दिया। वह (दृश्य) बड़ा ही विचित्र हुआ। |