वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१- देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण-तपतीका विवाह ..
अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९९
इति रविवचनादथाह कुम्भजन्मा
कृतमिति विद्धि मया हि नीचशृङ्गम्।
तव किरणजितो भविष्यते महीध्रो
मम चरणसमाश्रितस्य का व्यथा ते॥ २७
इत्येवमुक्त्वा कलशोद्भवस्तु
सूर्यं हि संस्तूय विनम्य भक्त्या।
जगाम संत्यज्य हि दण्डकं हि
विन्ध्याचलं वृद्धवपुर्महर्षिः ॥ २८
गत्वा वचः प्राह मुनिर्महीध्रं
यास्ये महातीर्थवरं सुपुण्यम्।
वृद्धोऽस्म्यशक्तश्च तवाधिरोढुं
तस्माद् भवान् नीचतरोऽस्तु सद्यः ॥ २९
इत्येवमुक्तो मुनिसत्तमेन
स नीचशृङ्गस्त्वभवन्महीध्रः।
समाक्रमच्चापि महर्षिमुख्यः
प्रोल्लङ्घ्य विन्ध्यं त्विदमाह शैलम् ॥ ३०
सूर्यकी बात सुनकर अगस्त्यजीने कहा—सूर्यदेव !
विन्ध्यको आप मेरे द्वारा नीचा किया हुआ ही समझें।
यह पर्वत आपकी किरणोंसे पराजित हो जायगा। मेरे
चरणोंके आश्रय लेनेपर आपको अब व्यथा कैसी? वृद्ध
शरीरवाले महर्षि अगस्त्यजी ऐसा कहकर विनम्रतापूर्वक
भक्तिसे सूर्यकी स्तुति करनेके बाद दण्डकको छोड़कर
विन्ध्यपर्वतके निकट चले गये। वहाँ जाकर मुनिने
पर्वतसे कहा—पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य! मैं अत्यन्त पवित्र
महातीर्थको जा रहा हूँ। मैं वृद्ध होनेसे तुम्हारे ऊपर
चढ़नेमें असमर्थ हूँ; अतः तुम तत्काल नीचा हो जाओ।
मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विन्ध्य पर्वत निम्न
शिखरवाला हो गया। तब महर्षिश्रेष्ठ (अगस्त्यजी)-ने
विन्ध्यपर्वतपर चढ़कर विन्ध्यको पार कर लिया और
तब उससे यह कहा— ॥ २७-३० ॥
यावन्न भूयो निजमाव्रजामि
महाश्रमं धौतवपुः सुतीर्थात्।
त्वया न तावत्त्विह वर्धितव्यं
नो चेद् विशप्येऽहमवज्ञया ते॥ ३१
इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्जगाम
दिशं स याम्यां सहसान्तरिक्षम्।
आक्रम्य तस्थौ स हि तां तदाशां
काले व्रजाम्यत्र यदा मुनीन्द्रः ॥ ३२
तत्राश्रमं रम्यतरं हि कृत्वा
संशुद्धजाम्बूनदतोरणान्तम् ।
तत्राथ निक्षिप्य विदर्भपुत्रीं
स्वमाश्रमं सौम्यमुपाजगाम ॥ ३३
ऋतावृतौ पर्वकालेषु नित्यं
तमम्बरे ह्याश्रममावसत् सः।
शेषं च कालं स हि दण्डकस्थ-
स्तपश्चचारामितकान्तिमान् मुनिः ॥ ३४
मैं जबतक पवित्र तीर्थसे स्नान कर पुनः अपने
महान् आश्रममें न लौटूँ, तबतक तुम्हें नहीं बढ़ना
चाहिये; अन्यथा अवज्ञा करनेके कारण मैं तुम्हें घोर
शाप दे दूँगा। 'मैं उचित समयपर फिर आऊँगा'-ऐसा
कहकर भगवान् अगस्त्य सहसा दक्षिण दिशाकी ओर
चले गये तथा वहीं रह गये। मुनिने वहाँ विशुद्ध स्वर्णिम
तोरणोंवाले अति रमणीय आश्रमकी रचना की एवं
उसमें विदर्भपुत्री लोपामुद्राको रखकर स्वयं अपने
आश्रमको चले गये। अत्यन्त प्रकाशमान मुनि (शरद्से
वसन्ततक) विभिन्न ऋतुओंमें पर्व (अष्टमी, चतुर्दशी,
अमावास्या, पूर्णिमा तिथियों तथा रवि-संक्रान्ति, सूर्यग्रहण
एवं चन्द्रग्रहण)-के समय नित्य आकाशमें और शेष
समय दण्डकवनमें अपने आश्रममें निवासकर तप करने
लगे ॥ ३१-३४॥
विन्ध्योऽपि दृष्ट्वा गगने महाश्रमं
वृद्धिं न यात्येव भ्यान्महर्षेः।
नासौ निवृत्तेति मतिं विधाय
स संस्थितो नीचतराग्रशृङ्गः ॥ ३५
विन्ध्यपर्वत भी आकाशमें महान् आश्रमको देखकर
महर्षिके भयसे नहीं बढ़ा। वे नहीं लौटे हैं—ऐसा
समझकर वह अपना शिखर नीचा किये हुए अब भी
| १०० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १९ |
|---|
| एवं त्वगस्त्येन महाचलेन्द्रः<br>स नीचशृङ्गो हि कृतो महर्षे।<br>तस्योर्ध्वशृङ्गे मुनिसंस्तुता सा<br>दुर्गा स्थिता दानवनाशनार्थम्॥ ३६<br>देवाश्च सिद्धाश्च महोरगाश्च<br>विद्याधरा भूतगणाश्च सर्वे।<br>सर्वाप्सरोभिः प्रतिरामयन्तः<br>कात्यायनीं तस्थुरपेतशोकाः॥ ३७ | वैसे ही स्थित है। हे महर्षे ! इस प्रकार अगस्त्यने महान् पर्वतराज विन्ध्यको नीचा कर दिया। उसीके शिखरके ऊपर मुनियोंद्वारा संस्तुता दुर्गादेवी दानवोंके विनाशके लिये स्थित हुईं और देवता, सिद्ध, महानाग, अप्सराओंके सहित विद्याधर एवं समस्त भूतगण इनके बदले कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करते हुए निःशोक होकर उनके निकट रहने लगे ॥ ३५-३७ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय
चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम
| पुलस्त्य उवाच | |
|---|---|
| ततस्तु तां तत्र तदा वसन्तीं<br>कात्यायनीं शैलवरस्य शृङ्गे।<br>अपश्यतां दानवसत्तमौ द्वौ<br>चण्डश्च मुण्डश्च तपस्विनीं ताम्॥ १<br>दृष्ट्वैव शैलादवतीर्य शीघ्र-<br>माजग्मतुः स्वभवनं सुरारी।<br>दृष्ट्वोचतुस्तौ महिषासुरस्य<br>दूताविदं चण्डमुण्डौ दितीशम्॥ २<br>स्वस्थो भवान् किं त्वसुरेन्द्र साम्प्रत-<br>मागच्छ पश्याम च तत्र विन्ध्यम्।<br>तत्रास्ति देवी सुमहानुभावा<br>कन्या सुरूपा सुरसुन्दरीणाम्॥ ३<br>जितास्तया तोयधराऽलकैर्हि<br>जितः शशाङ्को वदनेन तन्व्या।<br>नेत्रैस्त्रिभिस्त्रीणि हुताशनानि<br>जितानि कण्ठेन जितस्तु शङ्खः॥ ४ | पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर निवास करनेवाली उन तपस्विनी कात्यायनी (दुर्गा)-को चण्ड और मुण्ड नामके दो श्रेष्ठ दानवोंने देखा और देखते ही पर्वतसे उतरकर वे दोनों असुर अपने घर चले गये। फिर उन दोनों दूतोंने दैत्यराज महिषासुरके निकट जाकर कहा—'असुरेन्द्र! आप इस समय स्वस्थ तो हैं? आइये, हमलोग विन्ध्यपर्वतपर चलकर देखें; वहाँ सुर-सुन्दरियोंमें अत्यन्त सुन्दर, श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त एक कन्या है। उस तन्वी (सूक्ष्म देहवाली)-ने केशपाशके द्वारा मेघोंको, मुखके द्वारा चन्द्रमाको, तीन नेत्रोंद्वारा तीनों (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय) अग्नियोंको और कण्ठके द्वारा शङ्खको जीत लिया है (उसकी शोभा और तेजसे ये फीके पड़ गये हैं)'॥ १—४॥ |
| स्तनौ सुवृत्तावथ मग्नचूचुकौ<br>स्थितौ विजित्येव गजस्य कुम्भौ।<br>त्वां सर्वजेतारमिति प्रतर्क्य<br>कुचौ स्मरेणैव कृतौ सुदुर्गौ॥ ५ | 'उसके मग्न चूचुकवाले वृत्त (सुडौल गोले)-स्तन हाथीके गण्डस्थलोंको मात कर रहे हैं। मालूम होता है कि कामदेवने अपनेको सर्वविजयी समझकर आपको परास्त करनेके लिये उसके दो कुचरूपी दो |
अध्याय १९ ] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०१
पीनाः सशस्त्राः परिघोपमाश्च
भुजास्तथाऽष्टादश भान्ति तस्याः।
पराक्रमं वै भवतो विदित्वा
कामेन यन्त्रा इव ते कृतास्तु॥ ६
मध्यं च तस्यास्त्रिवलीतरङ्गं
विभाति दैत्येन्द्र सुरोमराजि।
भयात्तुरारोहणकातरस्य
कामस्य सोपानमिव प्रयुक्तम्॥ ७
सा रोमराजी सुतरां हि तस्या
विराजते पीनकुचावलग्ना।
आरोहणे त्वद्व्यकातरस्य
स्वेदप्रवाहोऽसुर मन्मथस्य ॥ ८
नाभिर्गभीरा सुतरां विभाति
प्रदक्षिणाऽस्याः परिवर्तमाना।
तस्यैव लावण्यगृहस्य मुद्रा
कंदर्पराज्ञा स्वयमेव दत्ता ॥ ९
विभाति रम्यं जघनं मृगाक्ष्याः
समंततो मेखलयाऽवजुष्टम् ।
मन्याम तं कामनराधिपस्य
प्राकारगुप्तं नगरं सुदुर्गम् ॥ १०
वृत्तावरोमौ च मृदू कुमार्याः
शोभेत ऊरू समनुत्तमौ हि।
आवासनार्थं मकरध्वजेन
जनस्य देशाविव संनिविष्टौ ॥ ११
तज्जानुयुग्मं महिषासुरेन्द्र
अर्द्धोन्नतं भाति तथैव तस्याः।
सृष्ट्वा विधाता हि निरूपणाय
श्रान्तस्तथा हस्ततले ददौ हि ॥ १२
जङ्घे सुवृत्तेऽपि च रोमहीने
शोभेत दैत्येश्वर ते तदीये।
आक्रम्य लोकानिव निर्मिताया
रूपार्जितस्यैव कृताधरौ हि ॥ १३
पादौ च तस्याः कमलोदराभौ
प्रयत्नतस्तौ हि कृतौ विधात्रा।
आभ्राजि ताभ्यां नखरत्नमाला
नक्षत्रमाला गगने यथैव ॥ १४
दुर्गोंकी रचना की है। शस्त्रसहित उसकी मोटी
परिघके समान अठारह भुजाएँ इस प्रकार सुशोभित हो
रही हैं, मानो आपका पराक्रम जानकर कामदेवने
यन्त्रके समान उसका निर्माण किया है। दैत्येन्द्र !
त्रिवलीसे तरङ्गायमान उसकी कमर इस प्रकार
सुशोभित हो रही है, मानो वह भयार्त तथा अधीर
कामदेवका आरोहण करनेके लिये सोपान हो। असुर!
उसके पीन कुचोंतककी वह रोमावलि इस प्रकार
सुशोभित हो रही है, मानो आरोहण करनेमें आपके
भयसे कातर कामदेवका स्वेद-प्रवाह हो' ॥ ५-८॥
'उसकी गम्भीर दक्षिणावर्त नाभि ऐसी लगती है,
मानो कंदर्पने स्वयं ही उस सौन्दर्यगृहके ऊपर मुहर
लगा दी है। मेखलासे चारों ओर आवेष्टित उस
मृगनयनीका जघन बड़ा सुन्दर सुशोभित हो रहा है।
उसे हम राजा कामका प्राकारसे (चहारदीवारियोंसे)
गुप्त (सुरक्षित) दुर्गम नगर मानते हैं। उस कुमारीके
वृत्ताकार रोमरहित, कोमल तथा उत्तम ऊरु इस प्रकार
शोभित हो रहे हैं, मानो कामदेवने मनुष्योंके निवासके
लिये दो रेखाओंका संनिवेश किया है। महिषासुरेन्द्र! उसके
अर्द्धोन्नत जानुयुगल इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं,
मानो उसकी रचना करनेके बाद थके विधाताने
निरूपण करनेके लिये अपना करतल ही स्थापित कर
दिया हो' ॥ ९-१२॥
'दैत्येश्वर! उसकी सुवृत्त तथा रोमहीन दोनों
जंघाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो
(दिव्य) निर्मित की गयी नायिकाके रूपके द्वारा
सभी लोग पराजित कर दिये गये हैं। विधाताने
प्रयत्नपूर्वक उसके कमलोदरके समान कान्तिवाले दोनों
पैरोंका निर्माण किया है। उन्होंने कात्यायनीके उन
चरणोंके नखरूपी रत्नशृङ्खलाको इस प्रकार प्रकाशित
किया है, मानो वह आकाशमें नक्षत्रोंकी माला हो।
१०२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १९
एवंस्वरूपा दनुनाथ कन्या
महोग्रशस्त्राणि च धारयन्ती।
दृष्ट्वा यथेष्टं न च विद्म का सा
सुताऽथवा कस्यचिदेव बाला ॥ १५
तद्भूतले रत्नमनुत्तमं स्थितं
स्वर्गं परित्यज्य महासुरेन्द्र ।
गत्वाथ विन्ध्यं स्वयमेव पश्य
कुरुष्व यत् तेऽभिमतं क्षमं च ॥ १६
श्रुत्वैव ताभ्यां महिषासुरस्तु
देव्याः प्रवृत्तिं कमनीयरूपाम् ।
चक्रे मतिं नात्र विचारमस्ति
इत्येवमुक्त्वा महिषोऽपि नास्ति ॥ १७
प्रागेव पुंसस्तु शुभाशुभानि
स्थाने विधात्रा प्रतिपादितानि ।
यस्मिन् यथा यानि यतोऽथ विप्र
स नीयते वा व्रजति स्वयं वा ॥ १८
ततोऽनु मुण्डं नमरं सचण्डं
विडालनेत्रं सपिाशङ्गवाष्कलम् ।
उग्रायुधं चिक्षुररक्तबीजौ
समादिदेशाथ महासुरेन्द्रः ॥ १९
आहत्य भेरी रणकर्कशास्ते
स्वर्गं परित्यज्य महीधरं तु ।
आगम्य मूले शिविरं निवेश्य
तस्थुश्च सज्जा दनुनन्दनास्ते ॥ २०
ततस्तु दैत्यो महिषासुरेण
सम्प्रेषितो दानवयूथपालः ।
मयस्य पुत्रो रिपुसैन्यमर्दी
स दुन्दुभिर्दुन्दुभिनिःस्वनस्तु ॥ २१
अभ्येत्य देवीं गगनस्थितोऽपि
स दुन्दुभिर्वाक्यमुवाच विप्र ।
कुमारि दूतोऽस्मि महासुरस्य
रम्भात्मजस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥ २२
कात्यायनी दुन्दुभिमभ्युवाच
एह्येहि दैत्येन्द्र भयं विमुच्य ।
वाक्यं च यद्रम्भसुतो बभाषे
वदस्व तत्सत्यमपेतमोहः ॥ २३
दैत्येश्वर ! वह कन्या बड़े और भयानक शस्त्रोंको धारण
किये हुए है। उसे भलीभाँति देखकर भी हम यह न
जान सके कि वह कौन है तथा किसकी पुत्री या स्त्री
है। महासुरेन्द्र ! वह स्वर्गका परित्याग कर भूतलमें स्थित
श्रेष्ठरत्न है। आप स्वयं विन्ध्यपर्वतपर जाकर उसे देखें
और फिर जो आपकी इच्छा एवं सामर्थ्य हो वह
करें' ॥ १३-१६ ॥
उन दोनों दूतोंसे कात्यायनीके आकर्षक सौन्दर्यकी
बात सुनकर महिषने 'इस विषयमें कुछ भी विचारना
नहीं है'- यह कहकर जानेका निश्चय किया। इस प्रकार
मानो महिषका अन्त ही आ गया। मनुष्यके शुभाशुभको
ब्रह्माने पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है। जिस
व्यक्तिको जहाँपर या जहाँसे जिस प्रकार जो कुछ भी
शुभाशुभ परिणाम होनेवाला होता है, वह वहाँ ले जाया
जाता है या स्वयं चला जाता है। फिर महिषने मुण्ड,
नमर, चण्ड, विडालनेत्र, पिशङ्गके साथ वाष्कल, उग्रायुध,
चिक्षुर और रक्तबीजको आज्ञा दी। वे सभी दानव
रणकर्कश भेरियाँ बजाकर स्वर्गको छोड़कर उस पर्वतके
निकट आ गये और उसके मूलमें सेनाके दलोंका
पड़ाव डालकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १७-२० ॥
तत्पश्चात् महिषासुरने देवीके पास धौंसकी ध्वनिकी
भाँति उच्च और गम्भीर ध्वनिमें बोलनेवाले तथा
शत्रुओंकी सेनाओंके समूहोंका मर्दन करनेवाले दानवोंके
सेनापति मयपुत्र दुन्दुभिको भेजा। ब्राह्मणदेवता नारदजी !
दुन्दुभिने देवीके पास पहुँचकर आकाशमें स्थित होकर
उनसे यह वाक्य कहा - हे कुमारि ! मैं महान् असुर
रम्भके पुत्र महिषका दूत हूँ। वह युद्धमें अद्वितीय
वीर है। इसपर कात्यायनीने दुन्दुभिसे कहा- दैत्येन्द्र !
तुम निडर होकर इधर आओ और रम्भपुत्रने जो
वचन कहा है, उसे स्वस्थ होकर ठीक-ठीक कहो।
अध्याय १९] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथोक्तवाक्ये दितिजः शिवाया-<br>स्त्यज्याम्बरं भूमितले निषण्णः।<br>सुखोपविष्टः परमासने च<br>रम्भात्मजेनोक्तमुवाच वाक्यम्॥ २४ | दुर्गाके इस प्रकार कहनेपर वह दैत्य आकाशसे उतरकर पृथ्वीपर आया और सुन्दर आसनपर सुखपूर्वक बैठकर महिषके वचनोंको इस प्रकार कहने लगा—॥ २१—२४॥ |
| दुन्दुभिरुवाच<br>एवं समाज्ञापयते सुरारि-<br>स्त्वां देवि दैत्यो महिषासुरस्तु।<br>यथामरा हीनबलाः पृथिव्यां<br>भ्रमन्ति युद्धे विजिता मया ते॥ २५<br>स्वर्गं मही वायुपथाश्च वश्याः<br>पातालमन्ये च महेश्वराद्याः।<br>इन्द्रोऽस्मि रुद्रोऽस्मि दिवाकरोऽस्मि<br>सर्वेषु लोकेष्वधिपोऽस्मि बाले॥ २६<br>न सोऽस्ति नाके न महीतले वा<br>रसातले देवभटोऽसुरो वा।<br>यो मां हि संग्राममुपेयिवांस्तु<br>भूतो न यक्षो न जिजीविषुर्यः॥ २७<br>यान्येव रत्नानि महीतले वा<br>स्वर्गेऽपि पातालतलेऽथ मुग्धे।<br>सर्वाणि मामद्य समागतानि<br>वीर्यार्जितानीह विशालनेत्रे॥ २८<br>स्त्रीरत्नमग्र्यं भवती च कन्या<br>प्राप्तोऽस्मि शैलं तव कारणेन।<br>तस्माद् भजस्वेह जगत्पतिं मां<br>पतिस्तवार्होऽस्मि विभुः प्रभुश्च॥ २९ | दुन्दुभि बोला— देवि! असुर महिषने तुम्हें यह अवगत कराया है कि मेरे द्वारा युद्धमें पराजित हुए निर्बल देवतालोग पृथ्वीपर भ्रमण कर रहे हैं। हे बाले! स्वर्ग, पृथ्वी, वायुमार्ग, पाताल और शङ्कर आदि देवगण सभी मेरे वशमें हैं। मैं ही इन्द्र, रुद्र एवं सूर्य हूँ तथा सभी लोकोंका स्वामी हूँ। स्वर्ग, पृथ्वी या रसातलमें जीवित रहनेकी इच्छावाला ऐसा कोई देव, असुर, भूत या यक्ष योद्धा नहीं हुआ, जो युद्धमें मेरे सामने आ सकता हो। (और भी सुनो) पृथ्वी, स्वर्ग या पातालमें जितने भी रत्न हैं, उन सबको मैंने अपने पराक्रमसे जीत लिया है और अब वे मेरे पास आ गये हैं। अतः अबोध बालिके! तुम कन्या हो और स्त्रीरत्नोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे लिये इस पर्वतपर आया हूँ। इसलिये मुझ जगत्पतिको तुम स्वीकार करो। मैं तुम्हारे योग्य सर्वथा समर्थ पति हूँ॥ २५—२९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ता दितिजेन दुर्गा<br>कात्यायनी प्राह मयस्य पुत्रम्।<br>सत्यं प्रभुर्दानवराट् पृथिव्यां<br>सत्यं च युद्धे विजितामराश्च॥ ३०<br>किं त्वस्ति दैत्येश कुलेऽस्मदीये<br>धर्मो हि शुल्काख्य इति प्रसिद्धः।<br>तं चेत् प्रद्यान्महिषो ममाद्य<br>भजामि सत्येन पतिं हयारिम्॥ ३१<br>श्रुत्वाऽथ वाक्यं मयजोऽब्रवीच्च<br>शुल्कं वदस्वाम्बुजपत्रनेत्रे।<br>दद्यात्स्वमूर्धानमपि त्वदर्थे<br>किं नाम शुल्कं यदिहैव लभ्यम्॥ ३२ | पुलस्त्यजीने कहा— उस दैत्यके ऐसा कहनेपर दुर्गाजीने दुन्दुभिसे कहा—(असुरदूत!) यह सत्य है कि दानवराट् महिष पृथ्वीमें समर्थ है एवं यह भी सत्य है कि उसने युद्धमें देवताओंको जीत लिया है; किंतु दैत्येश! हमारे कुलमें (विवाहके विषयमें) शुल्क नामकी एक प्रथा प्रचलित है। यदि महिष आज मुझे वह प्रदान करे तो सत्यरूपमें (सचमुच) मैं उस (महिष)-को पतिरूपमें स्वीकार कर लूँगी। इस वाक्यको सुनकर दुन्दुभिने कहा—(अच्छा) कमलपत्राक्षि! तुम वह शुल्क बतलाओ। महिष तो तुम्हारे लिये अपना सिर भी प्रदान कर सकता है; शुल्ककी तो बात ही क्या, जो यहाँ ही मिल सकता है॥ ३०—३२॥ |