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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

२- शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ

१०श्रीवामनपुराण[ अध्याय १
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रूयते च द्विजश्रेष्ठ दक्षस्य दुहिता सती।<br>शंकरस्य प्रिया भार्या बभूव वरवर्णिनी ॥ ५<br><br>किमर्थं सा परित्यज्य स्वशरीरं वरानना।<br>जाता हिमवतो गेहे गिरीन्द्रस्य महात्मनः ॥ ६<br><br>पुनश्च देवदेवस्य पत्नीत्वमगमच्छुभा।<br>एतन्मे संशयं छिन्धि सर्ववित् त्वं मतोऽसि मे ॥ ७<br><br>तीर्थानां चैव माहात्म्यं दानानां चैव सत्तम।<br>व्रतानां विविधानां च विधिमाचक्ष्व मे द्विज ॥ ८देवताओंके साथ युद्ध कैसे किया और ब्राह्मणश्रेष्ठ! दूसरी जिज्ञासा यह है कि दक्षप्रजापतिकी पुत्री भगवती सती, जो भगवान् शंकरकी प्रिय पत्नी थीं, उन श्रेष्ठ मुखवाली (सती)-ने अपना शरीर त्यागकर पर्वतराज हिमालयके घरमें किसलिये जन्म लिया? और पुनः वे कल्याणी देवदेव (महादेव)-की पत्नी कैसे बनीं? मैं मानता हूँ कि आपको सब कुछका ज्ञान है, अतः आप मेरी इस शंकाको दूर कर दें। साथ ही सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ हे द्विज! तीर्थों तथा दानोंकी महिमा और विविध व्रतोंकी अनुष्ठान-विधि भी मुझे बताइये॥ १—८॥
एवमुक्तो नारदेन पुलस्त्यो मुनिसत्तमः।<br>प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो नारदं तपसो निधिम् ॥ ९नारदजीके इस प्रकार कहनेपर मुनियोंमें मुख्य तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ तपोधन पुलस्त्यजी नारदजीसे कहने लगे॥ ९॥
पुलस्त्य उवाच<br><br>पुराणं वामनं वक्ष्ये क्रमान्निखिलमादितः।<br>अवधानं स्थिरं कृत्वा शृणुष्व मुनिसत्तम॥ १०<br><br>पुरा हैमवती देवी मन्दरस्थं महेश्वरम्।<br>उवाच वचनं दृष्ट्वा ग्रीष्मकालमुपस्थितम् ॥ ११<br><br>ग्रीष्मः प्रवृत्तो देवेश न च ते विद्यते गृहम्।<br>यत्र वातातपौ ग्रीष्मे स्थितयोर्नौ गमिष्यतः ॥ १२<br><br>एवमुक्तो भवान्या तु शंकरो वाक्यमब्रवीत्।<br>निराश्रयोऽहं सुदति सदारण्यचरः शुभे॥ १३पुलस्त्यजी बोले— नारद! आपसे मैं सम्पूर्ण वामनपुराणकी कथा आदिसे (अन्ततक) वर्णन करूँगा। मुनिश्रेष्ठ! आप मनको स्थिर कर ध्यानसे सुनें!* प्राचीन समयमें देवी हैमवती (सती)-ने ग्रीष्म-ऋतुका आगमन देखकर मन्दर पर्वतपर बैठे हुए भगवान् शंकरसे कहा—देवेश! ग्रीष्म-ऋतु तो आ गयी है, परंतु आपका कोई घर नहीं है, जहाँ हम दोनों ग्रीष्मकालमें निवास करते हुए वायु और तापजनित कठिन समयको बिता सकेंगे। सतीके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर बोले—हे सुन्दर दाँतोंवाली सति! मेरा कभी कोई घर नहीं रहा। मैं तो सदा वनोंमें ही घूमता रहता हूँ॥ १०—१३॥
इत्युक्ता शंकरेणाथ वृक्षच्छायासु नारद।<br>निदाघकालमनयत् समं शर्वेण सा सती ॥ १४<br><br>निदाघान्ते समुद्भूतो निर्जनाचरितोऽद्भुतः।<br>घनान्धकारिताशो वै प्रावृट्कालोऽतिरागवान्॥ १५<br><br>तं दृष्ट्वा दक्षतनुजा प्रावृट्कालमुपस्थितम्।<br>प्रोवाच वाक्यं देवेशं सती सप्रणयं तदा ॥ १६नारदजी! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सती-देवीने उनके साथ वृक्षोंकी छायामें (जैसे-तैसे रहकर) निदाघ (गर्मी)-का समय बिताया। फिर ग्रीष्मके अन्तमें अद्भुत वर्षा-ऋतु आ गयी, जो अत्यधिक रागको बढ़ानेवाली होती है और जिसमें प्रायः सबका आवागमन अवरुद्ध हो जाता है। (उस समय) मेघोंसे आवृत हो जानेसे दिशाएँ अन्धकारमय हो जाती हैं। उस वर्षा-ऋतुको आयी देखकर दक्ष-पुत्री सतीने प्रेमसे महादेवजीसे यह वचन कहा —॥ १४—१६॥

* भविष्यपुराणके प्रमाणानुसार वामनपुराणके वक्ता चतुर्मुख (ब्रह्माजी) हैं, पर यहाँ पुलस्त्यजी ऐसा उल्लेख नहीं करते कि 'पुराणं वामनं वक्ष्ये ब्रह्मण च मया श्रुतम्।' इससे प्रतीत होता है कि एतत्-सम्बन्धी श्लोक अनुपलब्ध है। मत्स्यपुराणमें भी चतुर्मुख (ब्रह्मा)-के वक्ता होनेका उल्लेख है—

'त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः। त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम् ॥'

अध्याय १ ] श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनाश्रयी प्रश्न, शिवजीका लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना ११


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विवहन्ति वाता हृदयावदारणा<br>गर्जन्त्यमी तोयधरा महेश्वर।<br>स्फुरन्ति नीलाभ्रगणेषु विद्युतो<br>वाशन्ति केकारवमेव बर्हिणः॥ १७<br><br>पतन्ति धारा गगनात् परिच्युता<br>बका बलाकाश्च सरन्ति तोयदान्।<br>कदम्बसर्जार्जुनकेतकीद्रुमाः<br>पुष्पाणि मुञ्चन्ति सुमारुताहताः॥ १८<br><br>श्रुत्वैव मेघस्य दृढं तु गर्जितं<br>त्यजन्ति हंसाश्च सरांसि तत्क्षणात्।<br>यथाश्रयान् योगिगणाः समन्तात्<br>प्रवृद्धमूलानपि संत्यजन्ति॥ १९<br><br>इमानि यूथानि वने मृगाणां<br>चरन्ति धावन्ति रमन्ति शंभो।<br>तथाचिराभाः सुतरां स्फुरन्ति<br>पश्येह नीलेषु घनेषु देव।<br>नूनं समृद्धिं सलिलस्य दृष्ट्वा<br>चरन्ति शूरास्तरुणद्रुमेषु॥ २०<br><br>उद्वृत्तवेगाः सहसैव निम्नगा<br>जाताः शशाङ्काङ्कितचारुमौले।<br>किमत्र चित्रं यदनुज्ज्वलं जनं<br>निषेव्य योषिद् भवति त्वशीला॥ २१महेश्वर! हृदयको विदीर्ण करनेवाली वायु वेगसे चल रही है। ये मेघ भी गर्जन कर रहे हैं, नीले मेघोंमें बिजलियाँ कौंध रही हैं और मयूरगण केकाध्वनि कर रहे हैं। आकाशसे गिरती हुई जलधाराएँ नीचे आ रही हैं। बगुले तथा बगुलोंकी पंक्तियाँ जलाशयोंमें तैर रही हैं। प्रबल वायुके झोंके खाकर कदम्ब, सर्ज, अर्जुन तथा केतकीके वृक्ष पुष्पोंको गिरा रहे हैं—वृक्षोंसे फूल झड़ रहे हैं। मेघका गम्भीर गर्जन सुनकर हंस तुरंत जलाशयोंको छोड़कर चले जा रहे हैं, जिस प्रकार योगिजन अपने सब प्रकारसे समृद्ध घरको भी छोड़ देते हैं। शिवजी! वनमें मृगोंके ये यूथ आनन्दित होकर इधर-उधर दौड़ लगाकर, खेल-कूदकर आनन्दित हो रहे हैं और देव! देखिये, नीले बादलोंमें विद्युत् भलीभाँति चमक रही है। लगता है, जलकी वृद्धिको देखकर वीरगण हरे-भरे सुपुष्ट नये वृक्षोंपर विचरण कर रहे हैं। नदियाँ सहसा उद्दाम (बड़े) वेगसे बहने लगीं हैं। चन्द्रशेखर! ऐसे उत्तेजक समयमें यदि असुवृत्त व्यक्तिके फंदेमें आकर स्त्री दुःशील हो जाती है तो इसमें क्या आश्चर्य ॥ १७—२१॥
नीलैश्च मेघैश्च समावृतं नभः<br>पुष्पैश्च सर्जा मुकुलैश्च नीपाः।<br>फलैश्च बिल्वाः पयसा तथापगाः<br>पत्रैः सपद्मैश्च महासरांसि॥ २२<br><br>इतीदृशे शंकर दुःसहेऽद्भुते<br>काले सुरौद्रे ननु ते ब्रवीमि।<br>गृहं कुरुष्वात्र महाचलोत्तमे<br>सुनिर्वृता येन भवामि शंभो॥ २३<br><br>इत्थं त्रिनेत्रः श्रुतिरामणीयकं<br>श्रुत्वा वचो वाक्यमिदं बभाषे।<br>न मेऽस्ति वित्तं गृहसंचयार्थे<br>मृगारिचर्मावरणं मम प्रिये॥ २४<br><br>ममोपवीतं भुजगेश्वरः शुभे<br>कर्णेऽपि पद्मश्च तथैव पिङ्गलः।<br>केयूरमेकं मम कम्बलस्त्वहि-<br>र्द्वितीयमन्यो भुजगो धनंजयः॥ २५आकाश नीले बादलोंसे घिर गया है। इसी प्रकार पुष्पोंके द्वारा सर्ज, मुकुलों (कलियों)-के द्वारा नीप (कदम्ब), फलोंके द्वारा बिल्व-वृक्ष एवं जलके द्वारा नदियाँ और कमल-पुष्पों एवं कमल-पत्रोंसे बड़े-बड़े सरोवर भी ढक गये हैं। हे शंकरजी! ऐसी दुःसह, अद्भुत तथा भयंकर दशामें आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस महान् तथा उत्तम पर्वतपर गृह-निर्माण कीजिये; हे शंभो! जिससे मैं सर्वथा निश्चिन्त हो जाऊँ। कानोंको प्रिय लगनेवाले सतीके इन वचनोंको सुनकर तीन नयनवाले भगवान् शंकरजी बोले—प्रिये! घर बनानेके लिये (और उसकी साज-सज्जाके लिये) मेरे पास धन नहीं है। मैं व्याघ्रके चर्ममात्रसे अपना शरीर ढकता हूँ। शुभे! (सूत्रोंके अभावमें) सर्पराज ही मेरा उपवीत (जनेऊ) बना है। पद्म और पिंगल नामके दो सर्प मेरे दोनों कानोंमें (कुण्डलका काम करते) हैं। कंबल और धनंजय नामके ये दो सर्प मेरी दोनों बाँहोंके बाजूबंद

| १२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २ |
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| नागस्तथैवाश्वतरो हि कङ्कणं<br>सव्येतरे तक्षक उत्तरे तथा।<br>नीलोऽपि नीलाञ्जनतुल्यवर्णः<br>श्रोणीतटे राजति सुप्रतिष्ठः॥ २६ | हैं। मेरे दाहिने और बाँयें हाथोंमें भी क्रमशः अश्वतर तथा तक्षक नाग कङ्कण बने हुए हैं। इसी प्रकार मेरी कमरमें नीलाञ्जनके वर्णवाला नील नामका सर्प अवस्थित होकर सुशोभित हो रहा है॥ २२—२६॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इति वचनमथोग्रं शंकरात्सा मृडानी<br>ऋतमपि तदसत्यं श्रीमदाकर्ण्य भीता।<br>अवनितलमवेक्ष्य स्वामिनो वासकृच्छ्रात्<br>परिवदति सरोषं लज्जयोच्छ्वस्य चोष्णम्॥ २७ | पुलस्त्यजी बोले— महादेवजीसे इस प्रकार कठोर तथा ओजस्वी एवं सत्य होनेपर भी असत्य प्रतीत हो रहे वचनको सुनकर सतीजी बहुत डर गयीं और स्वामीके निवासकष्टको देखकर गरम साँस छोड़ती हुई और पृथ्वीकी ओर देखती हुई (कुछ) क्रोध और लज्जासे इस प्रकार कहने लगीं— ॥ २७॥ |
| देव्युवाच<br>कथं हि देवदेवेश प्रावृट्कालो गमिष्यति।<br>वृक्षमूले स्थिताया मे सुदुःखेन वदाम्यतः॥ २८ | सतीदेवी बोलीं— देवेश! वृक्षके मूलमें दुःखपूर्वक रहकर भी मेरा वर्षाकाल कैसे व्यतीत होगा! इसीलिये तो मैं आपसे (गृहके निर्माणकी बात) कहती हूँ॥ २८॥ |
| शंकर उवाच<br>घनावस्थितदेहायाः प्रावृट्कालः प्रयास्यति।<br>यथाम्बुधारा न तव निपतिष्यन्ति विग्रहे॥ २९ | शंकरजी बोले— देवि! मेघ-मण्डलके ऊपर अपने शरीरको स्थित कर तुम वर्षाकाल भलीभाँति व्यतीत कर सकोगी। इससे वर्षकी जलधाराएँ तुम्हारे शरीरपर नहीं गिर पायेंगी॥ २९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>ततो हरस्तद्धनखण्डमुन्नत-<br>मारुह्य तस्थौ सह दक्षकन्यया।<br>ततोऽभवन्नाम महेश्वरस्य<br>जीमूतकेतुस्त्विति विश्रुतं दिवि॥ ३० | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद महादेवजी दक्षकन्या सतीके साथ आकाशमें उन्नत मेघमण्डलके ऊपर चढ़कर बैठ गये। तभीसे स्वर्गमें उन महादेवजीका नाम 'जीमूतकेतु' या 'जीमूतवाहन' विख्यात हो गया॥ ३०॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पहला अध्याय समाप्त हुआ॥ १॥


दूसरा अध्याय

शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ

| पुलस्त्य उवाच<br>ततस्त्रिनेत्रस्य गतः प्रावृट्कालो घनोपरि।<br>लोकानन्दकरी रम्या शरत् समभवन्मुने॥ १<br><br>त्यजन्ति नीलाम्बुधरा नभस्तलं<br>वृक्षांश्च कङ्काः सरितस्तटानि।<br>पद्माः सुगन्धं निलयानि वायसा<br>रुरुर्विषाणं कलुषं जलाशयाः॥ २ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार तीन नयनवाले भगवान् शिवका वर्षाकाल मेघोंपर बसते हुए ही व्यतीत हो गया। हे मुने! तत्पश्चात् लोगोंको आनन्द देनेवाली रमणीय शरद्-ऋतु आ गयी। इस ऋतुमें नीले मेघ आकाशको और बगुले वृक्षोंको छोड़कर अलग हो जाते हैं। नदियाँ भी तटको छोड़कर बहने लगती हैं। इसमें कमलपुष्प सुगन्ध फैलाते हैं, कौवे भी घोसलोंको छोड़ देते हैं। रुरुमृगोंके शृङ्ग गिर पड़ते हैं और जलाशय |

अध्याय २ ]
शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ
१३
विकासमायान्ति च पङ्कजानि
चन्द्रांशवो भान्ति लताः सुपुष्पाः।
नन्दन्ति हृष्टान्यपि गोकुलानि
सन्तश्च सन्तोषमनुव्रजन्ति ॥ ३
सरःसु पद्मा गगने च तारका
जलाशयेष्वेव तथा पयांसि ।
सतां च चित्तं हि दिशां मुखैः समं
वैमल्यमायान्ति शशाङ्ककान्तयः ॥ ४
सर्वथा स्वच्छ हो जाते हैं। इस समय कमल विकसित
होते हैं, शुभ्र चन्द्रमाकी किरणें आनन्ददायिनी होकर
फैल जाती हैं, लताएँ पुष्पित हो जाती हैं, गौवें हृष्ट-
पुष्ट होकर आनन्दसे विहरती हैं तथा संतोंको बड़ा सुख
मिलता है। तालाबोंमें कमल, गगनमें तारागण, जलाशयोंमें
निर्मल जल और दिशाओंके मुखमण्डलके साथ सज्जनोंका
चित्त तथा चन्द्रमाकी ज्योति भी सर्वथा स्वच्छ एवं
निर्मल हो जाती है ॥ १-४ ॥
एतादृशे हरः काले मेघपृष्ठाधिवासिनीम्।
सतीमादाय शैलेन्द्रं मन्दरं समुपायायौ ॥ ५
ततो मन्दरपृष्ठेऽसौ स्थितः समशिलातले।
रराम शंभुर्भगवान् सत्या सह महाद्युतिः ॥ ६
ततो व्यतीते शरदि प्रतिबुद्धे च केशवे ।
दक्षः प्रजापतिश्रेष्ठो यष्टुमारेभत क्रतुम् ॥ ७
ऐसी शरद्-ऋतुमें शंकरजी मेघके ऊपर वास
करनेवाली सतीको साथ लेकर श्रेष्ठ मन्दरपर्वतपर पहुँचे
और महातेजस्वी (महाकान्तिमान्) भगवान् शंकर
मन्दराचलके ऊपरी भागमें एक समतल शिलापर
अवस्थित होकर सतीके साथ विश्राम करने लगे। उसके
बाद शरद्-ऋतुके बीत जानेपर तथा भगवान् विष्णुके
जाग जानेपर प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ दक्षने एक विशाल
यज्ञका आयोजन किया। उन्होंने द्वादश आदित्यों तथा
कश्यप आदि (ऋषियों)-के साथ ही इन्द्र आदि श्रेष्ठ
देवताओंको भी निमन्त्रित कर उन्हें यज्ञका सदस्य
बनाया ॥ ५-८॥
द्वादशैव स चादित्याञ्छक्रादींश्च सुरोत्तमान् ।
सकश्यपान् समामन्त्र्य सदस्यान् समचीकरत् ॥ ८
अरुन्धत्या च सहितं वसिष्ठं शंसितव्रतम्।
सहानसूययात्रिं च सह धृत्या च कौशिकम् ॥ ९
अहल्या गौतमं च भरद्वाजममायया ।
चन्द्रया सहितं ब्रह्मन्नृषिमङ्गिरसं तथा ॥ १०
आमन्त्र्य कृतवान्दक्षः सदस्यान् यज्ञसंसदि।
विद्वान् गुणसंपन्नान् वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ ११
धर्मं च स समाहूय भार्ययाऽहिंसया सह ।
निमन्त्र्य यज्ञवाटस्य द्वारपालत्वमादिशत् ॥ १२
नारदजी! उन्होंने अरुन्धतीसहित प्रशस्तव्रतधारी
वसिष्ठको, अनसूयासहित अत्रिमुनिको, धृतिके
सहित कौशिक (विश्वामित्र) मुनिको, अहल्याके साथ
गौतमको, अमायाके सहित भरद्वाजको और चन्द्राके
साथ अङ्गिरा ऋषिको आमन्त्रित किया। विद्वान् दक्षने
इन गुणसम्पन्न वेद-वेदाङ्गपारगामी विद्वान् ऋषियोंको
निमन्त्रितकर उन्हें अपने यज्ञमें सदस्य बनाया। और,
उन्होंने (प्रजापति दक्षने) यज्ञमें धर्मको भी उनकी
पत्नी अहिंसाके साथ निमन्त्रितकर यज्ञमण्डपका द्वारपाल
नियुक्त किया ॥ ९-१२ ॥
अरिष्टनेमिनं चक्रे इध्माहरणकारिणम् ।
भृगुं च मन्त्रसंस्कारे सम्यग् दक्षः प्रयुक्तवान् ॥ १३
तथा चन्द्रमसं देवं रोहिण्या सहितं शुचिम्।
धनानामाधिपत्ये च युक्तवान् हि प्रजापतिः ॥ १४
जामातृदुहितॄंश्चैव दौहित्रांश्च प्रजापतिः ।
सशंकरां सतीं मुक्त्वा मखे सर्वान् न्यमन्त्रयत् ॥ १५
दक्षने अरिष्टनेमिको समिधा लानेका कार्य सौंपा
और भृगुको समुचित मन्त्र-पाठमें नियुक्त किया। फिर दक्ष-
प्रजापतिने रोहिणीसहित 'अर्थशुचि' चन्द्रमाको कोषाध्यक्षके
पदपर नियुक्त किया। इस प्रकार दक्षप्रजापतिने केवल
शंकरसहित सतीको छोड़कर अपने सभी जामाताओं, पुत्रियों
एवं दौहित्रोंको यज्ञमें आमन्त्रित किया ॥ १३-१५ ॥
नारद उवाच
किमथ लोकपतिना धनाध्यक्षो महेश्वरः।
ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि न निमन्त्रितः ॥ १६
नारदजीने कहा (पूछा)- (पुलस्त्यजी महाराज !)
लोकस्वामी दक्षने महेश्वरको सबसे बड़े, श्रेष्ठ, वरिष्ठ,
सबके आदिमें रहनेवाले एवं समग्र ऐश्वर्योंके स्वामी
होनेपर भी (यज्ञमें) क्यों नहीं निमन्त्रित किया ? ॥ १६ ॥

९४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २
पुलस्त्य उवाच
ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि भगवान्छिवः।
कपालीति विदित्वेशो दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १७
नारद उवाच
किमर्थं देवताश्रेष्ठः शूलपाणिस्त्रिलोचनः ।
कपाली भगवान् जातः कर्मणा केन शंकरः ॥ १८
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्।
प्रोक्तामादिपुराणे च ब्रह्मणाऽव्यक्तमूर्त्तिना ॥ १९
पुरा त्वेकार्णवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।
नष्टचन्द्रार्कनक्षत्रं प्रनष्टपवनानलम् ॥ २०
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं भावाभावविवर्जितम् ।
निमग्नपर्वततरू तमोभूतं सुदुर्दर्शम् ॥ २१
तस्मिन् स शेते भगवान् निद्रां वर्षसहस्रिकीम् ।
रात्र्यन्ते सृजते लोकान् राजसं रूपमास्थितः ॥ २२
राजसः पञ्चवदनो वेदवेदाङ्गपारगः।
स्रष्टा चराचरस्यास्य जगतोऽद्भुतदर्शनः ॥ २३
तमोमयस्तथैवान्यः समुद्भूतस्त्रिलोचनः ।
शूलपाणिः कपर्दी च अक्षमालां च दर्शयन् ॥ २४
ततो महात्मा ह्यसृजदहंकारं सुदारुणम्।
येनाक्रान्तावुभौ देवौ तावेव ब्रह्मशंकरौ ॥ २५
अहंकारावृतो रुद्रः प्रत्युवाच पितामहम्।
को भवानिह संप्राप्तः केन सृष्टोऽसि मां वद ॥ २६
पितामहोऽप्यहंकारात् प्रत्युवाचाथ को भवान् ।
भवतो जनकः कोऽत्र जननी वा तदुच्यताम् ॥ २७
इत्यन्योन्यं पुरा ताभ्यां ब्रह्मोशाभ्यां कलिप्रिय ।
परिवादोऽभवत् तत्र उत्पत्तिर्भवतोऽभवत् ॥ २८
भवानप्यन्तरिक्षं हि जातमात्रस्तदोत्पतत्।
धारयनतुलां वीणां कुर्वन् किलकिलाध्वनिम् ॥ २९
पुलस्त्यजीने कहा- (नारदजी !) ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, वरिष्ठ
तथा अग्रगणी होनेपर भी भगवान् शिवको कपाली जानकर
प्रजापति दक्षने उन्हें (यज्ञमें) निमन्त्रित नहीं किया ॥ १७ ॥
नारदजीने (फिर) पूछा- (महाराज !) देवश्रेष्ठ
शूलपाणि, त्रिलोचन भगवान् शंकर किस कर्मसे और
किस प्रकार कपाली हो गये, यह बतलायें ॥ १८ ॥
पुलस्त्यजीने कहा- नारदजी ! आप ध्यान देकर
सुनें। यह पुरानी कथा आदिपुराणमें अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके
द्वारा कही गयी है। (मैं उसी प्राचीन कथाको आपसे
कहता हूँ।) प्राचीन समयमें समस्त स्थावर-जङ्गमात्मक
जगत् एकीभूत महासमुद्रमें निमग्न (डूबा हुआ) था।
चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, वायु एवं अग्नि - किसीका भी कोई
(अलग) अस्तित्व नहीं था। 'भाव' एवं 'अभाव' से
रहित जगत्की उस समयकी अवस्थाका कोई ठीक-
ठीक ज्ञान, विचार, तर्कना या वर्णन सम्भव नहीं है।
सभी पर्वत एवं वृक्ष जलमें निमग्न थे तथा सम्पूर्ण जगत्
अन्धकारसे व्याप्त एवं दुर्दशाग्रस्त था। ऐसे समयमें
भगवान् विष्णु हजारों वर्षोंकी निद्रामें शयन करते हैं एवं
रात्रिके अन्तमें राजस रूप ग्रहणकर वे सभी लोकोंकी
रचना करते हैं ॥ १९-२२ ॥
इस चराचरात्मक जगत्का स्रष्टा भगवान् विष्णुका
वह अद्भुत राजस स्वरूप पञ्चमुख एवं वेद-वेदाङ्गोंका
ज्ञाता था। उसी समय तमोमय, त्रिलोचन, शूलपाणि,
कपर्दी तथा रुद्राक्षमाला धारण किया हुआ एक अन्य
पुरुष भी प्रकट हुआ। उसके बाद भगवान्ने अतिदारुण
अहंकारकी रचना की, जिससे ब्रह्मा तथा शंकर-वे
दोनों ही देवता आक्रान्त हो गये। अहंकारसे व्याप्त
शिवने ब्रह्मासे कहा- तुम कौन हो और यहाँ कैसे आये
हो? तुम मुझे यह भी बतलाओ कि तुम्हारी सृष्टि
किसने की है ? ॥ २३-२६ ॥
(फिर) इसपर ब्रह्माने भी अहंकारसे उत्तर दिया-
आप भी बतलाइये कि आप कौन हैं तथा आपके माता-
पिता कौन हैं? लोक-कल्याणके लिये कलहको प्रिय
माननेवाले नारदजी ! इस प्रकार प्राचीनकालमें ब्रह्मा और
शंकरके बीच एक-दूसरेसे दुर्विवाद हुआ। उसी समय
आपका भी प्रादुर्भाव हुआ। आप उत्पन्न होते ही अनुपम
वीणा धारण किये किलकिला शब्द करते हुए अन्तरिक्षकी
ओर ऊपर चले गये। इसके बाद भगवान् शिव मानो