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वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
५१- मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, कुटिला और रागिणीको शाप, उमाकी तपस्या, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन
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अध्याय ४७] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०९
| प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च।<br>उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च॥ १२३ | आप ही प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष, छींक एवं जँभाई हैं॥ १२०-१२३॥ |
| लोहितान्तर्गतो दृष्टिमहावक्त्रो महोदरः।<br>शुचिरोमा हरिशमश्रूरूर्ध्वकेशश्चलाचलः॥ १२४<br><br>गीतवादित्रनृत्यज्ञो गीतवादित्रप्रियः।<br>मत्स्यो जालो जलौकाश्र्च कालः केलिकला कलिः॥ १२५<br><br>अकालश्च विकालश्च दुष्कालः काल एव च।<br>मृत्युश्च मृत्युकर्ता च यक्षो यक्षभयंकरः॥ १२६<br><br>संवर्त्तकोऽन्तकश्चैव संवर्त्तकबलाहकः।<br>घण्टा घण्टी महाघण्टी चिरी माली च मातलिः॥ १२७ | आप लोहितके अन्तःस्थित, दृष्टि, बड़े मुँहवाले, भारी पेटवाले, पवित्र रोमावलीवाले, हरिश्चश्मश्रु, ऊर्ध्वकेश एवं चल तथा अचल हैं। आप गाने, बजाने, नृत्यकलाके विद्वान् हैं तथा गाना-बजाना करनेवालोंके भी आप प्रिय हैं। आप मत्स्य, जाल, जलौका, काल तथा केलिकला एवं कलह हैं। आप अकाल, विकाल, दुष्काल और कालस्वरूप हैं। आप मृत्यु, मृत्युकर्ता, यक्ष तथा यक्षको भी भय देनेवाले हैं। आप संवर्तक, अन्तक एवं संवर्तक नामक बादल हैं। आप घण्टा, घण्टी, महाघण्टी, चिरी, माली और मातलि भी हैं॥ १२४-१२७॥ |
| ब्रह्मकालयमाग्नीनां दण्डी मुण्डी त्रिमुण्डधृक्।<br>चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुर्होत्रप्रवर्त्तकः ॥ १२८<br><br>चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरस्तथा।<br>नित्यमक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिपः॥ १२९<br><br>रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिको गिरिकप्रियः।<br>शिल्पं च शिल्पिनां श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्त्तकः॥ १३०<br><br>भगनेत्राङ्कुशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः।<br>स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः॥ १३१ | आप ब्रह्मा, काल, यम और अग्निको दण्ड देनेवाले, मुण्डी एवं त्रिमुण्डधारी हैं। आप चतुर्युग, चतुर्वेद एवं चातुर्होत्रके प्रवर्तक हैं। आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोंकी सृष्टि करनेवाले हैं। आप नित्यद्यूतप्रिय, (धर्म्य) धूर्त्तईके भी प्रयोक्ता, गणाध्यक्ष और गणोंके स्वामी हैं। आप लाल माला और लाल वस्त्र धारण करनेवाले हैं तथा गिरिक, गिरिकप्रिय, शिल्प, शिल्पिश्रेष्ठ तथा हर प्रकारके शिल्पोंके प्रवर्तक हैं। आप भगनेत्राङ्कुश, चण्ड एवं पूषाके दाँतोंके विनाशक हैं। आप स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और नमस्कार हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १२८-१३१॥ |
| गूढव्रतो गुह्यतपास्तारकास्तारकामयः।<br>धाता विधाता संधाता पृथिव्या धरणोऽपरः॥ १३२<br><br>ब्रह्मा तपश्च सत्यं च व्रतचर्यमथार्जवम्।<br>भूतात्मा भूतकृद् भूतिर्भूतभव्यभवोद्भवः॥ १३३<br><br>भूर्भुवः स्वर्ऋतं चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वरः।<br>दीक्षितोऽदीक्षितः कान्तो दुर्दान्तो दान्तसम्भवः॥ १३४<br><br>चन्द्रावर्त्तो युगावर्त्तः संवर्त्तकप्रवर्त्तकः।<br>बिन्दुः कामो ह्यणुः स्थूलः कर्णिकारस्त्रजप्रियः॥ १३५ | आप गूढ़व्रतवाले, गुप्ततपस्यावाले, तारक और तारकामय हैं। आप धाता, विधाता, संधाता और पृथ्वीके श्रेष्ठ धारण और पोषण करनेवाले हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, व्रत-चर्या और सरल एवं शुद्ध हैं। आप (पञ्च) भूतस्वरूप ऐश्वर्य और प्राणियोंके उत्पत्ति-स्थान हैं। आप भूः, भुवः, स्वः, ऋतः, ध्रुव, कोमल तथा महेश्वर हैं। आप दीक्षित, अदीक्षित, कान्त, दुर्दान्त (उग्र) और दान्तसे उत्पन्न हैं। आप चन्द्रावर्त, युगावर्त, संवर्तक और प्रवर्तक हैं। आप बिन्दु, काम, अणु, स्थूल तथा कनेरकी मालाके प्रेमी हैं॥ १३२-१३५॥ |
| नन्दीमुखो भीममुखः सुमुखो दुर्मुखस्तथा।<br>हिरण्यगर्भः शकुनिर्महोरगपतिर्विराट्॥ १३६ | आप नन्दीमुख, भीममुख, सुमुख तथा दुर्मुख हैं। आप हिरण्यगर्भ, शकुनि, महासर्पपति तथा विराट् हैं। |
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| २१० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अधर्महा महादेवो दण्डधारो गणोत्कटः।<br>गोनर्दो गोप्रतारश्च गोवृषेश्वरवाहनः॥ १३७<br>त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गो मार्ग एव च।<br>स्थिरः श्रेष्ठश्च स्थाणुश्च विक्रोशः क्रोश एव च॥ १३८<br>दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः।<br>दुर्द्धर्षो दुष्प्रकाशश्च दुर्दर्शो दुर्जयो जयः॥ १३९ | आप अधर्मका नाश करनेवाले महादेव, दण्डधार, गणोत्कट, गोनर्द, गोप्रतार तथा गोवृषेश्वर-वाहन हैं। आप त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द, गोमार्ग तथा मार्ग हैं। आप स्थिर, श्रेष्ठ, स्थाणु, विक्रोश तथा क्रोश हैं। आप दुर्वारण, दुर्विषह, दुःसह, दुरतिक्रम, दुर्धर्ष, दुष्प्रकाश, दुर्दर्श, दुर्जय तथा जय हैं॥ १३६—१३९॥ |
| शशाङ्कानलशीतोष्णः क्षुत्तृष्णा च निरामयः।<br>आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिनाशनः॥ १४०<br><br>समूहश्च समूहस्य हन्ता देवः सनातनः।<br>शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः॥ १४१<br><br>त्र्यम्बको दण्डधारश्च उग्रदंष्ट्रः कुलान्तकः।<br>विषापहः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरुत्पते।<br>अमृताशी जगन्नाथो देवदेव गणेश्वरः॥ १४२<br><br>मधुश्च्युतानां मधुपो ब्रह्मवाक् त्वं घृतच्युत।<br>सर्वलोकस्य भोक्ता त्वं सर्वलोकपितामहः॥ १४३ | आप चन्द्र, अनल, शीत, उष्ण, क्षुधा, तृष्णा, निरामय, आधिव्याधि, व्याधिहन्ता एवं व्याधियोंको नष्ट करनेवाले हैं। आप समूह हैं और समूहके हन्ता तथा सनातन देव हैं। आप शिखण्डी, पुण्डरीकाक्ष तथा पुण्डरीकवनके आश्रय हैं। मरुत्पति! हे देवदेव! आप तीन नेत्रवाले, दण्डधारी, भयंकर दाँतवाले, कुलके अन्त करनेवाले, विषको नष्ट करनेवाले, सुरश्रेष्ठ, सोमरस पीनेवाले, अमृताशी, जगत्के स्वामी तथा गणेश्वर हैं। आप मधुसंग्रह करनेवालोंमें मधुप, वाणियोंमें ब्रह्मवाक्, घृतच्युत, समस्त लोकोंका पालन-पोषण और उपसंहार करनेवाले एवं सर्वलोकके पितामह हैं॥ १४०—१४३॥ |
| हिरण्यरेताः पुरुषस्त्वमेकः<br>त्वं स्त्री पुमांस्त्वं हि नपुंसकं च।<br>बालो युवा स्थविरो देवदंष्ट्रा<br>त्वन्नो गिरिविश्वकृद् विश्वहर्ता॥ १४४<br>त्वं वै धाता विश्वकृतां वरेण्य-<br>स्त्वां पूजयन्ति प्रणताः सदैव।<br>चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते भवान् हि<br>त्वमेव चाग्निः प्रपितामहश्च।<br>आराध्य त्वां सरस्वतीं वाग्लभन्ते<br>अहोरात्रे निमिषोन्मेषकत्र्ता॥ १४५<br>न ब्रह्मा न च गोविन्दः पौराणा ऋषयो न ते।<br>माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन शंकर॥ १४६<br>पुंसां शतसहस्राणि यत्समावृत्य तिष्ठति।<br>महत्तस्तमसः पारे गोप्ता मन्ता भवान् सदा॥ १४७ | आप हिरण्यरेता तथा अद्वितीय पुरुष हैं। आप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक भी हैं। आप ही बालक, युवक, वृद्ध, देवदंष्ट्रा, गिरि, संसारके रचयिता तथा संसारके संहार करनेवाले भी हैं। आप विश्व रचनेवालोंमें वरणीय धाता हैं। विनयी जन सदैव आपकी पूजा करते हैं। चन्द्रमा एवं सूर्य आपके नेत्रस्वरूप हैं। आप ही अग्नि एवं प्रपितामह हैं। सरस्वतीरूप आपकी आराधना कर लोग (प्राञ्जल) वाणीकी प्राप्ति करते हैं। आप दिन और रात्रि हैं और निमेष एवं उन्मेषके कर्त्ता हैं। हे शंकर! ब्रह्मा, गोविन्द तथा प्राचीन ऋषि भी आपकी महिमाको ठीक-ठीक नहीं जान सकते। आप (अपनेमें) लाखों पुरुषोंको समावृत कर स्थित हैं। आप सदा महान् तमसे परे रहनेवाले परम रक्षक एवं (सबके) अवबोधक हैं॥ १४४—१४७॥ |
| यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः।<br>ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥ १४८ | निद्रारहित (अतः सदा जागरूक), श्वासपर विजय प्राप्त करनेवाले, सत्त्वगुणमें सदा स्थित एवं संयतेन्द्रिय योगिजन जिस ज्योतिका दर्शन करते हैं, उस योगात्मक (आप)-को नमस्कार है। |
| या मूर्तयश्च सूक्ष्मास्ते न शक्या या निदर्शितुम्।<br>ताभिर्मां सततं रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम्॥ १४९ | सूक्ष्म होनेके कारण आपकी जो मूर्तियाँ प्रदर्शित नहीं की जा सकतीं उनके द्वारा आप सदा मेरी इस प्रकार रक्षा करें जैसे पिता अपने औरस |
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| अध्याय ४७ ] | स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक | २११ |
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| रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते।<br>भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि॥ १५०<br><br>जटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे।<br>कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै रुद्रात्मने नमः॥ १५१ | पुत्रकी रक्षा करता है। पुण्यात्मन्! आप मेरी रक्षा करें। मैं आपका रक्षणीय हूँ। आपको नमस्कार है। आप भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् हैं; मैं सदा आपका भक्त हूँ। जटी, दण्डी, लम्बोदरशरीरी तथा कमण्डलुनिषङ्ग रुद्रात्माको नमस्कार है॥ १४८—१५१॥ |
| यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसन्धिषु।<br>कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः॥ १५२<br><br>संभक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते।<br>यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम्॥ १५३<br><br>प्रविश्य वदनं राहोर्र्यः सोमं पिबते निशि।<br>ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानू रक्षितस्तव तेजसा॥ १५४<br><br>ये चात्र पतिता गर्भा रुद्रगन्धस्य रक्षणे।<br>नमस्तेऽस्तु स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्ति तदद्भुते॥ १५५ | जिनके केशोंमें बादल, समस्त अङ्गोंकी सन्धियोंमें नदियाँ एवं कुक्षिमें चारों समुद्र हैं, उन तोयात्मा भगवान्को नमस्कार है। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर भूतोंको अपने उदरमें स्थित रखकर जो जलके मध्यमें शयन करते हैं उन जलशायी (विष्णु)-की मैं शरण लेता हूँ। रात्रिमें आप जो राहुके मुखमें प्रवेश कर सोमको पीते हैं तथा आपके तेजसे रक्षित राहु सूर्यको ग्रस लेता है, ऐसे आपको नमस्कार है। रुद्रगन्धकी रक्षामें जो यहाँ गर्भ (वाष्पराशि) गिरे, आपके ही तेजसे गिरे; अतः आपको नमस्कार है; उन्हीं अद्भुत (तेजों)-में स्वाहा तथा स्वधाको वे प्राप्त करते हैं॥ १५२—१५५॥ |
| येऽङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम्।<br>रक्षन्तु ते हि मां नित्यं ते मामाप्याययन्तु वै॥ १५६<br><br>ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च।<br>वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारगहनेषु च॥ १५७<br><br>चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च।<br>हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च॥ १५८<br><br>ये च पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च।<br>चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु॥ १५९<br><br>रसातलगता ये च ये च तस्मात् परं गताः।<br>नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यश्च नित्यशः॥ १६० | सभी देहधारियोंकी देहमें स्थित अङ्गुष्ठमात्रमें निवास करनेवाले जो पुरुष हैं, वे नित्य मेरी रक्षा करें तथा वे मुझे सर्वदा संतृप्त करें। जो नदियों, समुद्रों, पर्वतों, गुहाओं, वृक्षकी जड़ों, गायोंके रहनेके स्थानों, घने जंगलों, चौराहों, गलियों, चबूतरों, सभाओं, हथसारों, घुड़सारों और रथशालाओं, जीर्ण बाग-बगीचों, आलयों, पञ्चभूतों, पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण दिशाओं एवं अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण एवं ईशानकोणोंमें स्थित हैं। जो चन्द्र और सूर्यके बीचमें रहनेवाले, चन्द्र तथा सूर्यकी किरणोंमें स्थित, रसातलमें रहनेवाले एवं उससे भी आगे पहुँचे हुए हैं, उनको नित्य बारम्बार नमस्कार है; नमस्कार है; नमस्कार है॥ १५६—१६०॥ |
| येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च।<br>असंख्येयगणा रुद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः॥ १६१<br><br>प्रसीद मम भद्रं ते तव भावगतस्य च।<br>त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिमतिस्त्वयि॥ १६२<br><br>स्तुत्वैवं स महादेवं विरराम द्विजोत्तमः॥ १६३ | जिनकी कोई संख्या नहीं है और न प्रमाण तथा रूप ही है, उन अनगिनत रुद्रगणोंको सदा नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आपके भक्तिभावमें स्थित मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों। हे देव! आपहीमें मेरा हृदय, मेरी बुद्धि एवं मति है। द्विजोत्तमने इस प्रकार महादेवकी स्तुति करके विराम ले लिया॥ १६१—१६३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४७॥
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| २१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४८ |
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अड़तालीसवाँ अध्याय
वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, वेन आदिकी सुगतिका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— |
|---|---|
| अथैनमब्रवीद् देवस्त्रैलोक्याधिपतिर्भवः।<br>आश्वासनकरं चास्य वाक्यविद् वाक्यमुत्तमम्॥ १<br><br>अहो तुष्टोऽस्मि ते राजन् स्तवेनानेन सुव्रत।<br>बहुनाऽत्र किमुक्तेन मत्समीपे वसिष्यसि॥ २<br><br>उषित्वा सुचिरं कालं मम गात्रोद्भवः पुनः।<br>असुरो ह्यन्धको नाम भविष्यसि सुरान्तकृत्॥ ३<br><br>हिरण्याक्षगृहे जन्म प्राप्य वृद्धिं गमिष्यसि।<br>पूर्वाधर्मेण घोरेण वेदनिन्दाकृतेन च॥ ४ | इसके बाद किसीकी किसी प्रकारकी भी उक्तिके अभिप्रायको भलीभाँति जाननेवाले तीनों लोकोंके स्वामी शंकरभगवान्ने उस (वेन)-को आश्वासन देनेवाला उत्तम वचन कहा—राजन्! सुव्रत! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं संतुष्ट हूँ। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है; तुम मेरे निकट (में ही सदा) निवास करोगे। बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद तुम फिर देवोंको नष्ट करनेवाले अन्धक नामक असुर होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होओगे और वेदकी निन्दा करनेसे पूर्वकालिक प्रचण्ड पापके कारण पुनः हिरण्याक्षके घरमें उत्पन्न होकर बड़े होगे—सयाने होगे॥ १—४॥ |
| साभिलाषो जगन्मातुर्भविष्यसि यदा तदा।<br>देहं शूलेन हत्वाहं पावयिष्यामि समार्बुदम्॥ ५<br><br>तत्राप्यकल्मषो भूत्वा स्तुत्वा मां भक्तितः पुनः।<br>ख्यातो गणाधिपो भूत्वा नाम्ना भृङ्गिरिटिः स्मृतः॥ ६<br><br>मत्सन्निधाने स्थित्वा त्वं ततः सिद्धिं गमिष्यसि।<br>वेनप्रोक्तं स्तवमिमं कीर्त्तयेद् यः शृणोति च॥ ७<br><br>नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुरवाप्नुयात्।<br>यथा सर्वेषु देवेषु विशिष्टो भगवाञ्छिवः॥ ८<br><br>तथा स्तवो वरिष्ठोऽयं स्तवानां वेननिर्मितः।<br>यशो राज्यसुखैश्वर्यधनमानाय कीर्त्तितः॥ ९ | जब तुम जगत्की माता (पार्वती)-की अभिलाषा करोगे तब मैं शूलद्वारा तुम्हारी देहका हनन करके दस करोड़ वर्षोंतकके लिये (तुम्हें) पवित्र करूँगा। उसके बाद वहाँ पापसे रहित होकर पुनः मेरी स्तुति करोगे और तब तुम भृङ्गिरिटि नामसे प्रसिद्ध गणाधिप बनोगे। फिर मेरी संनिधिमें रहकर तुम सिद्धिको प्राप्त करोगे। जो मनुष्य वेनके द्वारा कही हुई इस स्तुतिका कीर्तन करेगा या इसे सुनेगा, वह कभी अशुभ (अकल्याण)-को नहीं प्राप्त होगा और दीर्घ आयु प्राप्त करेगा। जैसे सभी देवताओंमें भगवान् शिवकी विशिष्टता है, वैसे ही वेनसे निर्मित यह स्तव सभी स्तवोंमें श्रेष्ठ (विशिष्ट) है। इसका कीर्तन यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, धन एवं मानका देनेवाला है॥ ५—९॥ |
| श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्च यत्नतः।<br>व्याधितो दुःखितो दीनश्चौरराजभयान्वितः॥ १०<br><br>राजकार्यविमुक्तो वा मुच्यते महतो भयात्।<br>अनेनैव तु देहेन गणानां श्रेष्ठतां व्रजेत्॥ ११<br><br>तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मलः।<br>न राक्षसाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः॥ १२ | विद्याकी इच्छा रखनेवालेको श्रद्धासहित यत्नपूर्वक इस स्तुतिको सुनना चाहिये। व्याधिसे ग्रस्त, दुःखित, दीन, चोर या राजासे भयभीत अथवा राजकार्यसे अलग किया गया पुरुष (इस स्तुतिके द्वारा) महान् भयसे मुक्त होकर इसी देहसे गणोंमें श्रेष्ठता प्राप्त करता है एवं निर्मल होकर तेज एवं यशसे युक्त होता है। जिस गृहमें इस स्तवका पाठ होता है उसमें राक्षस, पिशाच, भूत या विनायकगण विघ्न नहीं करते। पतिकी आज्ञा प्राप्त कर |
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अध्याय ४८ ] वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य [ २१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विघ्नं कुर्युर्गृहे तत्र यत्रायं पठ्यते स्तवैः।<br>शृणुयाद् या स्तवं नारी अनुज्ञां प्राप्य भर्तृतः ॥ १३<br>मातृपक्षे पितुः पक्षे पूज्या भवति देववत्।<br>शृणुयाद् यः स्तवं दिव्यं कीर्तयेद् वा समाहितः ॥ १४<br>तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं गच्छन्ति नित्यशः।<br>मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचाऽनुकीर्तितम् ॥ १५<br>सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवनस्यानुकीर्तनात्।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृतमेनो विनश्यति।<br>वरं वरय भद्रं ते यत्त्वया मनसेप्सितम् ॥ १६ | इस स्तवका श्रवण करनेवाली नारी मातृपक्ष एवं पितृपक्षमें देवताके समान पूजनीया हो जाती है। जो मनुष्य समाहित होकर इस दिव्य स्तवको सुनेगा या कीर्तन करेगा, उसके सभी कार्य नित्य सिद्ध होंगे। इस स्तवका कीर्तन करनेवाले मनुष्यके मनमें चिन्तित तथा वचनके द्वारा कथित सभी कार्य सम्पन्न होते जायँगे और मानसिक, वाचिक तथा कार्मिक—सारे पाप विनष्ट हो जायँगे। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो उस वरको माँग लो; तुम्हारा कल्याण हो॥ १०–१६॥ |
| वेन उवाच<br>अस्य लिङ्गस्य माहात्म्यात् तथा लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>मुक्तोऽहं पातकैः सर्वैस्तव दर्शनतः किल ॥ १७<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>देवस्वभक्षणाज्जातं श्वयोनौ तव सेवकम् ॥ १८<br>एतस्यापि प्रसादं त्वं कर्तुमर्हसि शंकर।<br>एतस्यापि भयान्येद्ये सरसोऽहं निमज्जितः ॥ १९<br>देवैर्निवारितः पूर्वं तीर्थेऽस्मिन् स्नानकारणात्।<br>अयं कृतोपकारश्च एतदर्थे वृणोम्यहम् ॥ २०<br>तस्यैतद् वचनं श्रुत्वा तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>एषोऽपि पापनिर्मुक्तो भविष्यति न संशयः ॥ २१<br>प्रसादान्मे महाबाहो शिवलोकं गमिष्यति।<br>तथा स्तवमिमं श्रुत्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥ २२<br>कुरुक्षेत्रस्य माहात्म्यं सरसोऽस्य महीपते।<br>मम लिङ्गस्य चोत्पत्तिं श्रुत्वा पापैः प्रमुच्यते ॥ २३ | वेनने कहा— इस लिङ्गके माहात्म्यसे, इसके तथा आपके दर्शनसे मैं समस्त पापोंसे निश्चित रूपसे छूट गया हूँ। देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो हे शङ्कर! अपने उस सेवकपर कृपा करें जो देवद्रव्यका भक्षण करनेके कारण कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ है। पहले इस तीर्थमें स्नान करनेके लिये देवोंके मना करनेपर भी इस (कुत्ते)-के भयसे मैंने सरोवरमें स्नान किया। इसने मेरा उपकार किया है। अतएव मैं इसके लिये वर माँगता हूँ। उस (वेन)-के इस वचनको सुनकर शंकर सन्तुष्ट होकर बोले—महाबाहो! यह भी मेरी कृपासे निःसन्देह सभी पापोंसे बिलकुल छूट जायगा और शिवलोकको प्राप्त करेगा। इस स्तवको सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। राजन्! इस कुरुक्षेत्र तथा इस सरोवरका माहात्म्य और मेरे लिङ्गकी उत्पत्तिका वर्णन सुननेसे मनुष्य पापसे बिलकुल छूट जाता है॥ १७–२३॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् सर्वलोकनमस्कृतः।<br>पश्यतां सर्वलोकानां तत्रैवान्तरधीयत ॥ २४<br>स च श्वा तत्क्षणादेव स्मृत्वा जन्म पुरातनम्।<br>दिव्यमूर्त्तिधरो भूत्वा तं राजानमुपस्थितः ॥ २५<br>कृत्वा स्नानं ततो वैन्यः पितृदर्शनलालसः।<br>स्थाणुतीर्थे कुटीं शून्यां दृष्ट्वा शोकसमन्वितः ॥ २६<br>दृष्ट्वा वेनोऽब्रवीद् वाक्यं हर्षेण महताऽन्वितः।<br>सत्पुत्रेण त्वया वत्स त्रातोऽहं नरकार्णवात् ॥ २७ | सनत्कुमारने कहा— इस प्रकार कहकर समस्त लोकोंद्वारा नमस्कृत भगवान् सभी लोगोंके देखते हुए वहीं अन्तर्हित हो गये। वह कुत्ता भी उसी समय पूर्वजन्मका स्मरण करके दिव्य शरीर धारणकर उस राजाके सामने उपस्थित हुआ। उसके बाद वेनका पुत्र पृथु स्नान करके पितृदर्शनकी अभिलाषासे स्थाणु-तीर्थमें आनेपर कुटीको सूनी देख चिन्तित हो गया। वेन उसे देखकर बड़ी प्रसन्नतापूर्वक बोला—वत्स! तुमने नरक-सागरमें जानेसे मेरी रक्षा कर ली, अतः तुम सत्पुत्र सिद्ध हुए॥ २४–२७॥ |
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| २१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४९ |
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| त्वयाभिषिञ्चितो नित्यं तीर्थस्य पुलिने स्थितः।<br>अस्य साधोः प्रसादेन स्थाणोर्देवस्य दर्शनात्॥ २८<br><br>मुक्तपापश्च स्वर्लोकं यास्ये यत्र शिवः स्थितः।<br>इत्येवमुक्त्वा राजानं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्॥ २९<br><br>स्थाणुतीर्थे ययौ सिद्धिं तेन पुत्रेण तारितः।<br>स च श्वा परमां सिद्धिं स्थाणुतीर्थप्रभावतः॥ ३०<br><br>विमुक्तः कलुषैः सर्वैर्जगाम भवमन्दिरम्।<br>राजा पितॄन्नृणैर्मुक्तः परिपाल्य वसुन्धराम्॥ ३१<br><br>पुत्रानुत्पाद्य धर्मेण कृत्वा यज्ञं निरर्गलम्।<br>दत्त्वा कामांश्च विप्रेभ्यो भुक्त्वा भोगान् पृथग्विधान्॥ ३२ | तीर्थके तटपर रहने एवं तुम्हारे द्वारा नित्य अभिषिञ्चित होनेके कारण तथा इस साधुके अनुग्रह एवं स्थाणुदेवके दर्शन करनेसे मैं पापोंसे छूटकर उस स्वर्गलोकको जा रहा हूँ, जहाँ शिवजी (स्वयं) स्थित हैं। राजा पृथुसे ऐसा कहनेके पश्चात् उस पुत्रद्वारा (पापनिर्मुक्त) तारित वेनने स्थाणुतीर्थमें महेश्वरको प्रतिष्ठापित करके सिद्धि प्राप्त कर ली। स्थाणुतीर्थके प्रभावसे वह कुत्ता भी पापसे रहित होकर परम सिद्धिको प्राप्त हुआ और शिवलोकको चला गया। राजा पृथु पितृ-ऋणसे मुक्त हो गये और पृथ्वीका पालन करते हुए उन्होंने धर्मपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करके बाधारहित होकर यज्ञ (यज्ञानुष्ठान) किया। उन्होंने ब्राह्मणोंको मनोऽभिलषित पदार्थोंका दान दिया तथा भाँति-भाँतिके भोगोंका उपभोग किया॥ २८–३२॥ |
| सुहृदोऽथ ऋणैर्मुक्त्वा कामैः संतर्प्य च स्त्रियः।<br>अभिषिच्य सुतं राज्ये कुरुक्षेत्रं ययौ नृपः॥ ३३<br><br>तत्र तप्त्वा तपो घोरं पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>आत्मेच्छया तनुं त्यक्त्वा प्रयातः परं पदम्॥ ३४<br><br>एतत्प्रभावं तीर्थस्य स्थाणोर्यः शृणुयान्नरः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमां गतिम्॥ ३५ | मित्रोंको (भी) ऋणसे मुक्त तथा स्त्रियोंके मनोरथोंको संतुष्टि प्रदान करनेके पश्चात् पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर पृथु राजा कुरुक्षेत्रमें चले गये। वहाँ घोर तपस्या तथा शङ्करका पूजन करके अपनी इच्छासे शरीरका त्याग कर उन्होंने परमपदको प्राप्त किया। जो मनुष्य स्थाणुतीर्थके इस प्रभावको सुनेगा, वह सभी पापोंसे छूट जायगा और परम गतिको प्राप्त करेगा॥ ३३–३५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४८॥
उनचासवाँ अध्याय
चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति और स्थाणुतीर्थका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच<br>चतुर्मुखानामुत्पत्तिं विस्तरेण ममानघ।<br>तथा ब्रह्मेश्वराणां च श्रोतुमिच्छा प्रवर्तते॥ १ | मार्कण्डेयने कहा— निष्पाप! चार मुखों और ब्रह्मेश्वरोंकी उत्पत्तिको विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी इच्छा हो रही है (अतः आप उसे सुनानेकी कृपा करें)॥ १॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>शृणु सर्वमशेषेण कथयिष्यामि तेऽनघ।<br>ब्रह्मणः स्रष्टुकामस्य यद् वृत्तं पद्मजन्मनः॥ २<br><br>उत्पन्न एव भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ससर्ज सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ३ | सनत्कुमार बोले— अनघ! सृष्टिकी कामना करनेवाले एवं कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माका जो वृत्तान्त है, उसे मैं तुमसे पूर्णतः कहता हूँ, सुनो। लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने उत्पन्न होते ही पहले अचर और चररूप सम्पूर्ण भूतोंकी रचना की। |