वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२९- बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु-महिमाका कथन तथा स्तवन
अध्याय २४] वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना १२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथ प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः ।<br>ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३<br><br>अजेयो युधि शक्रेण बलिर्दैत्यो बलाधिकः ।<br>तस्माद् विधत्त नः श्रेयो देवानां पुष्टिवर्धनम् ॥ १४<br><br>श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपः प्रभुः ।<br>अकरोद् गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५ | रहे थे जैसे तीसरे प्रजापति ही हों। फिर अदितिके साथ समस्त देववीर उन्हें प्रणाम कर उनसे हाथ जोड़कर ऐसे बोले जैसे ब्रह्मासे उनके मानस-पुत्र बोलते हैं— बलशाली दैत्यराज बलि युद्धमें इन्द्रसे अपराजेय हो गया है। अतः हम देवोंके सामर्थ्यकी पुष्टि-वृद्धिके लिये आप कल्याणकारी उपाय करें। उन पुरुषोंकी बातें सुनकर लोकोंको रचनेवाले सामर्थ्यशाली कश्यपने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया॥ १२—१५॥ |
| कश्यप उवाच<br>शक्र गच्छाम सदनं ब्रह्मणः परमाद्भुतम् ।<br>तथा पराजयं सर्वे ब्रह्मणः ख्यातुमुद्यताः ॥ १६<br><br>सहादित्या ततो देवा याताः काश्यपमाश्रमम् ।<br>प्रस्थिता ब्रह्मसदनं महर्षिगणसेवितम् ॥ १७<br><br>ते मुहूर्तेन संप्राप्ता ब्रह्मलोकं सुवर्चसः ।<br>दिव्यैः कामगमैर्यानैर्यथार्हस्ते महाबलाः ॥ १८<br><br>ब्रह्माणं द्रष्टुमिच्छन्तस्तपोराशिनमव्ययम् ।<br>अध्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम् ॥ १९ | (फिर) कश्यपने कहा— इन्द्र! हम सभी अपनी पराजयकी बात ब्रह्माजीसे कहनेके लिये तैयार होकर उनके परम अद्भुत लोकको चलें। कश्यपके इस प्रकार कहनेपर अदितिके साथ कश्यपके आश्रममें आये हुए सभी देवताओंने महर्षिगणोंसे सेवित ब्रह्मसदनकी ओर प्रस्थान किया। यथायोग्य इच्छाके अनुसार चलनेवाले दिव्य यानोंसे महाबली एवं तेजस्वी वे सभी देवता क्षणमात्रमें ही ब्रह्मलोकमें पहुँच गये और तब वे लोग तपराशि अव्यय ब्रह्माको देखनेकी इच्छा करते हुए ब्रह्माकी विशाल परम श्रेष्ठ सभामें पहुँचे॥ १६—१९॥ |
| षट्पदोद्गीतमधुरां सामगैः समुदीरिताम् ।<br>श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुस्तदा ॥ २०<br><br>ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च प्रोक्ताः क्रमपदाक्षराः ।<br>शुश्रुवुर्विबुधव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु ॥ २१<br><br>यज्ञविद्यावेदविदः पदक्रमविदस्तथा ।<br>स्वरेण परमर्षीणां सा बभूव प्रणादिता ॥ २२<br><br>यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिस्तथा द्विजैः ।<br>छन्दसां चैव चार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः ॥ २३<br><br>लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वरमीरितम् ।<br>तत्र तत्र च विप्रेन्द्रा नियताः शंसितव्रताः ॥ २४<br><br>जपहोमपरा मुख्या ददृशुः कश्यपात्मजाः ।<br>तस्यां सभायामास्ते स ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २५ | वे (देवतालोग) भ्रमरोंकी गुञ्जारसे गुञ्जित, सामगानसे मुखरित, कल्याणकी विधायिका और शत्रुओंका विनाश करनेवाली उस सभाको देखकर प्रसन्न हो गये। (उस स्थानपर) उन श्रेष्ठ देवगणोंने विस्तृत (विशाल) अनेक कर्मानुष्ठानोंके समय श्रेष्ठ ऋग्वेदियोंके द्वारा 'क्रमपदादि' (वेद पढ़नेकी विशिष्ट शैलियोंसे) उच्चरित ऋचाओं (वेदमन्त्रों)-को सुना। वह सभा यज्ञविद्याके ज्ञाता एवं 'पदक्रम' प्रभृति वेदपाठके ज्ञानवाले परमर्षियोंके उच्चारणकी ध्वनिसे प्रतिध्वनित हो रही थी। देवोंने वहाँ यज्ञके संस्तवोंके ज्ञाताओं, शिक्षाविदों और वेदमन्त्रोंके अर्थ जाननेवालों, समस्त विद्याओंमें पारङ्गत द्विजों एवं श्रेष्ठ लोकायतिकोंके (चार्वाकके मतानुयायियों)-द्वारा उच्चरित स्वरको भी सुना। कश्यपके पुत्रोंने वहाँ सर्वत्र नियमपूर्वक तीर्थ-व्रतको धारण करनेवाले जप-होम करनेमें लगे हुए श्रेष्ठ विप्रोंको देखा। उसी सभामें लोक-पितामह ब्रह्मा विराजमान थे॥ २०—२५॥ |
| सुरासुरगुरुः श्रीमान् विद्यया वेदमायया ।<br>उपासन्त च तत्रैव प्रजानां पतयः प्रभुम् ॥ २६ | (उस) सभामें वेदमाया विद्यासे सम्पन्न, सुरों एवं असुरोंके गुरु (श्रीमान् ब्रह्माजी) भी उपस्थित थे। प्रजापतिगण उन (प्रभुता-सम्पन्न) प्रभुकी उपासना कर |
१२४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५
दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमाः ।
भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमो नारदस्तथा ॥ २७
विद्यास्थान्तरिक्षं च वायुस्तेजो जलं मही ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥ २८
प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत् कारणं महत् ।
साङ्गोपाङ्गाश्च चत्वारो वेदा लोकपतिस्तथा ॥ २९
नयाश्च क्रतवश्चैव सङ्कल्पः प्राण एव च ।
एते चान्ये च बहवः स्वयंभुवमुपासते ॥ ३०
अर्थो धर्मश्च कामश्च क्रोधो हर्षश्च नित्यशः ।
शुक्रो बृहस्पतिश्चैव संवर्त्तोऽथ बुधस्तथा ॥ ३१
शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः ।
मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्च द्विजोत्तमाः ॥ ३२
दिवाकरश्च सोमश्च दिवा रात्रिस्तथैव च ।
अर्द्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च संस्थिताः ॥ ३३
तां प्रविश्य सभां दिव्यां ब्रह्मणः सर्वकामिकाम् ।
कश्यपस्त्रिदशैः सार्द्धं पुत्रैर्धर्मभृतां वरः ॥ ३४
सर्वतेजोमयीं दिव्यां ब्रह्मर्षिगणसेविताम् ।
ब्राह्मया श्रिया सेव्यमानामचिन्त्यां विगतक्लमाम् ॥ ३५
ब्रह्माणं प्रेक्ष्य ते सर्वे परमासनमास्थितम् ।
शिरोभिः प्रणता देवं देवा ब्रह्मर्षिभिः सह ॥ ३६
ततः प्रणम्य चरणौ नियताः परमात्मनः ।
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः शान्ता विगतकल्मषाः ॥ ३७
दृष्ट्वा तु तान् सुरान् सर्वान् कश्यपेन सहागतान् ।
आह ब्रह्मा महातेजा देवानां प्रभुरीश्वरः ॥ ३८
रहे थे। द्विजोत्तमो! दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, भृगु,
अत्रि, वसिष्ठ, गौतम और नारद एवं सभी विद्याएँ,
आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस
और गन्ध एवं प्रकृति, विकार, अन्यान्य महत् कारण,
अङ्गों एवं उपाङ्गोंके साथ चारों वेद और लोकपति,
नीति, यज्ञ, संकल्प, प्राण - ये तथा अन्यान्य देव, ऋषि,
भूत, तत्त्वादि ब्रह्माकी उपासना कर रहे थे। द्विजश्रेष्ठो !
अर्थ, धर्म, काम, क्रोध, हर्ष, शुक्र, बृहस्पति, संवर्त,
बुध, शनैश्चर और राहु आदि सभी ग्रह भी वहाँ
यथास्थान बैठे थे। मरुद्गण, विश्वकर्मा, वसु, सूर्य,
चन्द्रमा, दिन, रात्रि, पक्ष, मास तथा छः ऋतुएँ भी वहाँ
उपस्थित थीं ॥ २६-३३ ॥
धार्मिकोंमें श्रेष्ठ कश्यपने अपने पुत्र देवताओंके
साथ ब्रह्माकी उस सर्वमनोरथमयी, सर्वतेजोमयी, दिव्य
एवं ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित तथा ब्रह्म-विचारमयी सरस्वती
एवं लक्ष्मीसे सेवित अचिन्त्य तथा खिन्नतासे रहित
सभामें प्रवेश किया। तब उनके साथमें गये सभी
देवताओंने श्रेष्ठ आसनपर विराजमान ब्रह्माजीको देखा
और उन्हें ब्रह्मर्षियोंके साथ झुककर सिरसे प्रणाम
किया। नियमका पालन करनेवाले वे सभी परमात्माके
चरणोंमें प्रणाम करके सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर निर्मल
एवं शान्त हो गये। (फिर) महान् तेजस्वी देवेश्वर ब्रह्माने
कश्यपके साथ आये हुए उन सभी देवताओंको देखकर
कहा - ॥ ३४-३८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २४ ॥
पचीसवाँ अध्याय
वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका
श्वेतद्वीपमें तपस्या करना
ब्रह्मोवाच
यदर्थमिह संप्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि।
चिन्तयाम्यहमप्यग्रे तदर्थं च महाबलाः ॥ १
भविष्यति च वः सर्वं काङ्क्षितं यत् सुरोत्तमाः ।
बलेर्दानवमुख्यस्य योऽस्य जेता भविष्यति ॥ २
ब्रह्माने कहा- महाबलशाली देवगण ! आपलोग
जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसके विषयमें मैं
पहलेसे ही सोच रहा हूँ। सुरश्रेष्ठ ! आपलोगोंको जो
अभिलषित है, वह पूर्ण होकर रहेगा। दानवोंमें प्रधान
बलिको पराजित करनेवाले एवं विश्वको रचनेवाले
अध्याय २५ ] वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना १२५
न केवलं सुरादीनां गतिर्मम स विश्वकृत्।
त्रैलोक्यस्यापि नेता च देवानामति स प्रभुः॥ ३
यः प्रभुः सर्वलोकानां विश्वेशश्च सनातनः।
पूर्वजोऽयं सदाप्याहुरादिदेवं सनातनम्॥ ४
तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति।
देवानस्मान् श्रुतिं विश्वं स वेत्ति पुरुषोत्तमः॥ ५
(परमात्मा) न केवल (आप सब) देवोंके, प्रत्युत
हमारे भी सहारे हैं। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा
देवोंके भी शासक हैं। इन्हें ही सनातन आदिदेव भी
कहते हैं॥१-४॥
उन महान् आत्मा (सनातन आदिदेव)-को
देवता आदि कोई भी वास्तवरूपमें नहीं जानते कि वे
कौन हैं; परंतु वे पुरुषोत्तम (समस्त) देवोंको, मुझे
तथा श्रुति (वेद) एवं समस्त विश्वको जानते हैं
(संसारके समस्त क्रिया-कलाप उनकी जानकारीमें ही
होते हैं; वे सर्वज्ञ हैं)। उन्हींके कृपा-प्रसादसे
(आपलोगोंको) मैं अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय बतलाता हूँ।
(आपलोग सुनें।) आप सभी उत्तर-दिशामें क्षीरसागरके
उत्तरी तटपर स्थित उस स्थानपर जाइये जिसे
विचारशील विद्वान् लोग (अमृत) नामसे उच्चारित
करते हैं। विश्वकी रचना करनेवाले (परमात्मा) वहीं
योगधारणामें स्थित होकर कठिन तपस्या कर रहे हैं।
आप सभी लोग उस अमृत नामक स्थानपर जायें और
आलस्यरहित होकर आपलोग भी लक्ष्यकी सिद्धिके
लिये वहाँ कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दें॥५-८॥
तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्ये परमां गतिम्।
यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुश्चरम्॥ ६
क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि विश्वकृत्।
अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः॥ ७
भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा शंसितव्रताः।
अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरत दुश्चरम्॥ ८
ततः श्रोष्यथ संघुष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्।
उष्णान्ते तोयदस्येव तोयपूर्णस्य निःस्वनम्॥ ९
(जब आपलोग वहाँ जाकर कठिन तपस्या करने
लगेंगे) तब ग्रीष्मके अन्तमें देवाधिदेवकी शब्दरूपिणी,
स्निग्ध-गम्भीर ध्वनिवाली, प्रेमसे भरी हुई शुद्ध और
स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त मनोहर एवं निर्भयताकी सूचना
देनेवाली, सर्वदा मङ्गलमयी, उच्च स्वरसे अध्ययन
करनेवाले ब्रह्मवादियोंकी वाणीके समान स्पष्ट, उत्तम
संस्कारसे युक्त, दिव्य, सत्य-स्वरूपिणी, सत्यताकी
ओर उन्मुख होनेके लिये प्रेरणा देनेवाली और पापोंको
नष्ट करनेवाली जलसे पूर्ण मेघके गर्जनके समान गम्भीर
वाणीको सुनेंगे। उसके बाद भावितात्माके (आत्मज्ञानसे
परिपूर्ण महात्मा कश्यपके योगव्रतके अवसरपर) व्रतकी
समाप्ति हो जानेके बाद अमोघ तेजसे सम्पन्न वे देव
आपसे कहेंगे-सुरश्रेष्ठो! आपलोग मेरे पास आये,
आपलोगोंका स्वागत है। मैं (आपलोगोंको) वरदान
देनेके लिये आप सबके समक्ष स्थित हूँ कहो-किसे
कौन-सा वर दूँ॥९-१३॥
रक्तां पुष्टाक्षरां रम्यामभयां सर्वदा शिवाम्।
वाणीं परमसंस्कारां वदतां ब्रह्मवादिनाम्॥ १०
दिव्यां सत्यकरीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्।
सर्वदेवाधिदेवस्य ततोऽसौ भावितात्मनः॥ ११
तस्य व्रतसमाप्त्यां तु योगव्रतविसर्जने।
अमोघं तस्य देवस्य विश्वतेजो महात्मनः॥ १२
कस्य किं वो वरं देवा ददामि वरदः स्थितः।
स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्समीपमुपागताः॥ १३
१२६
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय २५
ततोऽदितिः कश्यपश्च गृह्णीयातां वरं तदा।
प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै देवाय धीमते ॥ १४
भगवान्नेव नः पुत्रो भवत्विति प्रसीद नः।
उक्तश्च परया वाचा तथाऽस्त्विति स वक्ष्यति ॥ १५
देवा ब्रुवन्ति ते सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च।
तथास्त्विति सुराः सर्वे प्रणम्य शिरसा प्रभुम्।
श्वेतद्वीपं समुद्दिश्य गताः सौम्यदिशं प्रति ॥ १६
तेऽचिरेणैव संप्राप्ताः क्षीरोदं सरितां पतिम्।
यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा सत्यवादिना ॥ १७
और, जब भगवान् इस प्रकार वरदान देनेके
लिये उपस्थित होंगे तथा अदिति एवं कश्यप उन
प्रज्ञावान् प्रभुके चरणोंमें झुककर सिरसे प्रणाम और
वरकी याचना करेंगे कि 'भगवान् ही हमारे पुत्र बनें;
इसके लिये आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों' तब वे
ब्रह्मवाणीके द्वारा 'ऐसा ही हो' - यह कहेंगे। (इस
प्रकार संकेत है - ) निर्देश पाकर कश्यप, अदिति एवं
सभी देवताओंने 'ऐसा ही हो' - यह कहकर प्रभु
(ब्रह्मा) - को सिरसे प्रणाम किया और श्वेतद्वीपकी ओर
लक्ष्य करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। वे
अत्यन्त शीघ्रतासे सत्यप्रवक्ता भगवान् ब्रह्माके द्वारा
निर्दिष्ट की गयी व्यवस्थाके अनुसार क्षीरसागरके तटपर
पहुँच गये ॥ १४-१७॥
ते क्रान्ताः सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च सकाननान्।
नदीश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां ते सुरोत्तमाः ॥ १८
अपश्यन्त तमो घोरं सर्वसत्त्वविवर्जितम्।
अभास्करममर्यादं तमसा सर्वतो वृतम् ॥ १९
अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन महात्मना।
दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २०
प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते।
नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय भूतये ॥ २१
ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थाने वीरासनेन च।
क्रमेण च सुराः सर्वे तप उग्रं समास्थिताः ॥ २२
कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः।
उदीरयत वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २३
उन देववरोंने पृथिवीके सभी समुद्रों, वनसे भरे
हुए पर्वतों एवं भाँति-भाँतिकी दिव्य नदियोंको पार
किया। उसके बाद (उसके आगे) उन लोगोंने ऐसे
स्थानको देखा जहाँ न कोई प्राणी था, न सूर्यका
प्रकाश ही था; प्रत्युत चारों ओर घनघोर अन्धकार था,
जिसमें सीमा मालूम ही नहीं होती थी। इस प्रकारके
उस 'अमृत' नामक स्थानपर पहुँचकर महात्मा
कश्यपने प्रज्ञा-सम्पन्न योगी, देवेश्वर, कल्याणकी मूर्ति,
सहस्रचक्षु नारायणदेवकी प्रसन्नताकी प्राप्तिके उद्देश्यसे
(देवताओंको) सहस्रवार्षिक (हजारों वर्षोंमें पूर्ण
होनेवाले) दिव्य (देव-सम्बन्धी) इच्छा पूर्ण करनेवाले
कामद-व्रतकी दीक्षा दी। फिर वे सभी देवता क्रमशः
अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके और मौन धारणकर
उचित स्थानपर वीरासनसे बैठकर कठोर तपस्या करने
लगे। वहाँ भगवान् कश्यपने महात्मा विष्णुको प्रसन्न
करनेके लिये वेदमें कहे हुए स्तवका (सूक्त या स्तोत्रका)
स्पष्ट वाणीमें पाठ किया, जिसे 'परमस्तव' कहते
हैं ॥ १८-२३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥
अध्याय २६ ] कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति १२७
छब्बीसवाँ अध्याय
कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति
| कश्यप उवाच | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमोऽस्तु ते देवदेव एकशृङ्ग वृषाच्चे सिन्धुवृष वृषाकपे सुरवृष अनादिसम्भव रुद्र कपिल विष्वक्सेन सर्वभूतपते ध्रुव धर्माधर्म वैकुण्ठ वृषावर्त्त अनादिमध्यनिधन धनञ्जय शुचिश्रवः पृश्नितेजः निजजय अमृतेशाय सनातन त्रिधाम तुषित महातत्त्व लोकनाथ पद्मनाभ विरिञ्चे बहुरूप अक्षय अक्षर हव्यभुज खण्डपरशो शक्र मुञ्जकेश हंस महादक्षिण हृषीकेश सूक्ष्म महानियमधर विरज लोकप्रतिष्ठ अरूप अग्रज धर्मज धर्मनाभ गभस्तिनाभ शतक्रतुनाभ चन्द्ररथ सूर्यतेजः समुद्रवासः अजः सहस्रशिरः सहस्रपाद अधोमुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्रबाहो सहस्रमूर्त्ते सहस्रास्य सहस्रसम्भव सहस्रसत्त्वं त्वामाहुः । पुष्पहास चरम त्वमेव वौषट् वषट्कारं त्वामाहुरग्र्यं मखेषु प्राशितारं सहस्रधारं च भूश्च भुवश्च स्वश्च त्वमेव वेदवेद्य ब्रह्मशय ब्राह्मणप्रिय त्वमेव द्यौरसि मातरिश्वाऽसि धर्मोऽसि होता पोता मन्ता नेता होमहेतुस्त्वमेव अग्र्य विश्वधाम्ना त्वमेव दिग्भिः सुभाण्ड इज्योऽसि सुमेधोऽसि समिधस्त्वमेव मतिर्गतिर्दाता त्वमसि । मोक्षोऽसि योगोऽसि । सृजसि । धाता परमयज्ञोऽसि सोमोऽसि दीक्षितोऽसि दक्षिणाऽसि विश्वमसि । स्थविर हिरण्यनाभ नारायण त्रिनयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष पुरुषोत्तम आदिदेव सुविक्रम प्रभाकर शम्भो स्वयम्भो भूतादिः महाभूतोऽसि विश्वभूत विश्वं त्वमेव विश्वगोप्ताऽसि पवित्रमसि | कश्यपने कहा— हे देवदेव, एकशृङ्ग, वृषार्चि, सिन्धुवृष, वृषाकपि, सुरवृष, अनादिसम्भव, रुद्र, कपिल, विष्वक्सेन, सर्वभूतपति (सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी), ध्रुव, धर्माधर्म, वैकुण्ठ, वृषावर्त्त, अनादिमध्यनिधन, धनञ्जय, शुचिश्रव, पृश्नितेज, निजजय, अमृतेशाय, सनातन, त्रिधाम, तुषित, महातत्त्व, लोकनाथ, पद्मनाभ, विरिञ्चि, बहुरूप, अक्षय, अक्षर, हव्यभुज, खण्डपरशु, शक्र, मुञ्जकेश, हंस, महादक्षिण, हृषीकेश, सूक्ष्म, महानियमधर, विरज, लोकप्रतिष्ठ, अरूप, अग्रज, धर्मज, धर्मनाभ, गभस्तिनाभ, शतक्रतुनाभ, चन्द्ररथ, सूर्यतेज, समुद्रवास, अज, सहस्रशिर, सहस्रपाद, अधोमुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रास्य, सहस्रसम्भव ! मेरा आपके चरणोंमें नमस्कार है। (आपके भक्तजन) आपको सहस्रसत्त्व कहते हैं। (खिले हुए पुष्पके समान मधुर मुसकानवाले) पुष्पहास, चरम (सर्वोत्तम) ! लोग आपको ही वौषट् एवं वषट्कार कहते हैं। आप ही अग्र्य, (सर्वश्रेष्ठ) यज्ञोंमें प्राशिता (भोक्ता) हैं; सहस्रधार, भूः, भुवः एवं स्वः हैं। आप ही वेदवेद्य (वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य), ब्रह्मशय, ब्राह्मणप्रिय (अग्निके प्रेमी), द्यौः (आकाशके समान सर्वव्यापी), मातरिश्वा (वायुके समान गतिमान्), धर्म, होता, पोता (विष्णु), मन्ता, नेता एवं होमके हेतु हैं। आप ही विश्वतेजके द्वारा अग्र्य (सर्वश्रेष्ठ) हैं और दिशाओंके द्वारा सुभाण्ड (विस्तृत पात्ररूप) हैं अर्थात् दिशाएँ आपमें समाविष्ट हैं। आप (यजन करनेयोग्य) इज्य, सुमेध, समिधा, मति, गति एवं दाता हैं। आप ही मोक्ष, योग, स्रष्टा (सृष्टि करनेवाले), धाता (धारण और पोषण करनेवाले), परमयज्ञ, सोम, दीक्षित, दक्षिणा एवं विश्व हैं। आप ही स्थविर, हिरण्यनाभ, नारायण, त्रिनयन, आदित्यवर्ण, आदित्यतेज, महापुरुष, पुरुषोत्तम, आदिदेव, सुविक्रम, प्रभाकर, शम्भु, स्वयम्भू, भूतादि, महाभूत, विश्वभूत एवं विश्व हैं। आप ही |