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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

६३- अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन

अध्याय ६१ ]पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन२८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शिष्टाचारविनाशं च शिष्टद्वेषं शिशोर्वधम्।<br>शास्त्रस्तेयं धर्मनाशं दशमं परिकीर्तितम्॥ १०<br><br>षडङ्गनिधनं घोरं षाड्गुण्यप्रतिषेधनम्।<br>एकादशममेवोक्तं नरकं सद्भिरुत्तमम्॥ ११<br><br>सत्सु नित्यं सदा वैरमनाचारमसत्क्रिया।<br>संस्कारपरिहीनत्वमिदं द्वादशमं स्मृतम्॥ १२करना नवाँ नरक कहा जाता है। शिष्टाचारका नाश, शिष्टजनोंसे विरोध, नादान बालककी हत्या, शास्त्रग्रन्थोंकी चोरी तथा स्वधर्मका नाश करना दसवाँ नरक कहा जाता है। षडङ्गनिधन अर्थात् छः अङ्गोंवाली वेद-विद्याको नष्ट करना और षाड्गुण्य अर्थात् सन्धि-विग्रह, यान, आसन-द्वैधीभाव, समाश्रय (राजनीति-गुणों)-का प्रतिषेध ग्यारहवाँ घोर नरक कहा गया है। सज्जनोंसे सदा वैर-भाव, आचारसे रहित रहना, बुरे कार्यमें लगे रहना एवं संस्कार-विहीनताको बारहवाँ नरक कहा गया है॥ ९—१२॥
हानिर्धर्मार्थकामानापवर्गस्य हारणम्।<br>संभेदः संविदामेतत् त्रयोदशममुच्यते॥ १३<br><br>कृपणं धर्महीनं च यद् वर्ज्यं यच्च वह्निदम्।<br>चतुर्दशममेवोक्तं नरकं तद् विगर्हितम्॥ १४<br><br>अज्ञानं चाप्यसूयत्वमशौचमशुभावहम्।<br>स्मृतं तत् पञ्चदशममसत्यवचनानि च॥ १५<br><br>आलस्यं वै षोडशममाक्रोशं च विशेषतः।<br>सर्वस्य चाततायित्वमावासेष्वग्निदीपनम्॥ १६धर्म, अर्थ एवं सत्कामनाकी हानि, मोक्षका नाश एवं इनके समन्वयमें विरोध उत्पन्न करनेको तेरहवाँ नरक कहा जाता है। कृपण, धर्महीन, परित्याज्य एवं आग लगानेवालेको चौदहवाँ निन्दित नरक कहते हैं। विवेकहीनता, दूसरेके गुणमें दोष निकालना, अमङ्गल करना, अपवित्रता एवं असत्य वचन बोलनेको पंद्रहवाँ नरक कहते हैं। आलस्य करना, विशेष रूपसे क्रोध करना, सभीके प्रति आततायी बन जाना एवं घरमें आग लगाना सोलहवाँ नरक कहलाता है॥ १३—१६॥
इच्छा च परदारेषु नरकाय निगद्यते।<br>ईर्ष्याभावश्च सत्येषु उद्वृत्तं तु विगर्हितम्॥ १७<br><br>एतैस्तु पापैः पुरुषः पुन्नामाद्यैर्न संशयः।<br>संयुक्तः प्रीणयेद् देवं संतत्या जगतः पतिम्॥ १८<br><br>प्रीतः सृष्ट्या तु शुभया स पापाद् येन मुच्यते।<br>पुन्नामनरकं घोरं विनाशयति सर्वतः॥ १९<br><br>एतस्मात् कारणात् साध्य सुतः पुत्रेति गद्यते।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि शेषपापस्य लक्षणम्॥ २०परस्त्रीकी कामना, सत्यके प्रति ईर्ष्या रखना, निन्दित एवं उद्दण्ड व्यवहार करना नरक देनेवाला कहा गया है। इन पुन्नाम आदि पापोंसे युक्त पुरुष (भी) निस्संदेह 'पुत्र' के द्वारा जगत्पति जनार्दनको प्रसन्न कर सकता है। पापहारी सुसन्ततिसे प्रसन्न होकर भगवान् जनार्दन पुन्नामके घोर नरकको पूर्णतया नष्ट कर देते हैं। साध्य! इसीलिये सुतको 'पुत्र' कहा जाता है। अब इसके बाद मैं शेष पापोंका लक्षण बतलाता हूँ॥ १७—२०॥
ऋणं देवर्षिभूतानां मनुष्याणां विशेषतः।<br>पितॄणां च द्विजश्रेष्ठ सर्ववर्णेषु चैकता॥ २१<br><br>ओंकारादपि निर्वृत्तिः पापकार्यकृतश्च यः।<br>मत्स्यादश्च महापापमगम्यागमनं तथा॥ २२<br><br>घृतादिविक्रयं घोरं चण्डालादिपरिग्रहः।<br>स्वदोषाच्छादनं पापं परदोषप्रकाशनम्॥ २३<br><br>मत्सरित्वं वाग्दुष्टत्वं निष्ठुरत्वं तथा परम्।<br>टाकित्वं तालवादित्वं नाम्ना वाचाऽप्यधर्मजम्॥ २४द्विजश्रेष्ठ! देवऋण, ऋषिऋण, प्राणियोंके ग्रहण—विशेषतः मनुष्यों एवं पितरोंका ऋण, सभी वर्णोंको एक समझना, ॐकारके उच्चारणमें उपेक्षा-भाव रखना, पापकामोंका करना, मछली खाना तथा अगम्या स्त्रीसे संगत होना—ये महापाप हैं। घृत-तैल आदिका बेचना, चाण्डाल आदिसे दान लेना, अपना दोष छिपाना और दूसरेका दोष प्रकट करना—ये घोर पाप हैं। दूसरेका उत्कर्ष देखकर जलना, कड़वी बात बोलना, निर्दयपना, नाम कहनेसे भी अधर्मजनक टाकिता और तालवादिता,
२८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१

| दारुणत्वमधार्मिक्यं नरकावहमुच्यते।<br>एतैश्च पापैः संयुक्तः प्रीणयेद् यदि शङ्करम्॥ २५<br><br>ज्ञानाधिकमशेषेण शेषपापं जयेत् ततः।<br>शारीरं वाचिकं यत् तु मानसं कायिकं तथा॥ २६<br><br>पितृमातृकृतं यच्च कृतं यच्चाश्रितैर्नरैः।<br>भ्रातृभिर्बान्धवैश्चापि तस्मिञ्जन्मनि धर्मज॥ २७<br><br>तत्सर्वं विलयं याति स धर्मः सुतशिष्ययोः।<br>विपरीते भवेत् साध्य विपरीतं पदक्रमः॥ २८<br><br>तस्मात् पुत्रश्च शिष्यश्च विधातव्यौ विपश्चिता।<br>एतदर्थमभिध्याय शिष्याच्छ्रेष्ठतरः सुतः।<br>शेषात् तारयते शिष्यः सर्वतोऽपि हि पुत्रकः॥ २९ | भयङ्करता तथा अधार्मिकताके कार्य नरकके कारण हैं। इन पापोंसे युक्त मनुष्य (भी) यदि परमज्ञानी शङ्करको (अपनी आराधनासे) संतुष्ट कर लेता है तो शेष पापोंको वह पूर्णरूपसे जीत लेता है। धर्मपुत्र! उस जन्ममें किये गये (अपने) सभी कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म तथा माता-पिता एवं आश्रितजनों और भाइयों एवं बान्धवोंद्वारा किये गये कर्म भी विलीन हो जाते हैं। साध्य! सुत और शिष्यका यही धर्म है। इसके विपरीत होनेपर विपरीत गति प्राप्त होती है, अतएव विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि पुत्र और शिष्यकी (परम्परा) बनाये रखे। इसी अभिप्रायकी दृष्टिसे शिष्यकी अपेक्षा पुत्र अत्यन्त श्रेष्ठ होता है कि शिष्य केवल शेष पापोंसे मुक्त करता है और पुत्र सम्पूर्ण पापोंसे बचा लेता है॥ २१—२९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>पितामहवचः श्रुत्वा साध्यः प्राह तपोधनः।<br>त्रिः सत्यं तव पुत्रोऽहं देव योगं वदस्व मे॥ ३०<br><br>तमुवाच महायोगी त्वन्मातापितरौ यदि।<br>दास्येते च ततः सूनुर्दायादो मेऽसि पुत्रक॥ ३१<br><br>सनत्कुमारः प्रोवाच दायादपरिकल्पना।<br>येयं हि भवता प्रोक्ता तां मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३२<br><br>तदुक्तं साध्यमुख्येन वाक्यं श्रुत्वा पितामहः।<br>प्राह प्रहस्य भगवाञ्शृणु वत्सेति नारद॥ ३३ | पुलस्त्यजी बोले—पितामहकी बात सुनकर साध्य तपोधन सनत्कुमारने कहा—देव! मैं तीन बार सत्यका उच्चारण करके कहता हूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ। अतः मुझे आप योगका उपदेश दीजिये। तब महायोगी पितामहने उनसे कहा—पुत्र! तुम्हारे माता-पिता यदि तुमको मुझे दे दें तो तुम मेरे (स्वत्वप्राप्तिमें अधिकृत) ‘दायाद’ (भागीदार) पुत्र हो जाओगे। सनत्कुमारने कहा—भगवन्! आपने जो यह ‘दायाद’ शब्द कहा है उसका अर्थ क्या है? (कृपया) उसकी विवेचना कीजिये। नारदजी! भगवान् पितामह साध्य-प्रधान सनत्कुमारका वचन सुनकर हँसते हुए बोले—वत्स! सुनो॥ ३०—३३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च।<br>गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवास्तु षट्॥ ३४<br><br>अमीषु षट्सु पुत्रेषु ऋणपिण्डधनक्रियाः।<br>गोत्रसाम्यं कुले वृत्तिः प्रतिष्ठा शाश्वती तथा॥ ३५<br><br>कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा।<br>स्वयंदत्तः पारशवः षडदायादबान्धवाः॥ ३६<br><br>अमीभिर्ऋणपिण्डादिकथा नैवेह विद्यते।<br>नामधारका एवेह न गोत्रकुलसंमताः॥ ३७ | ब्रह्माने कहा—औरस, क्षेत्रज, दत्त, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध—ये छः बान्धव दायाद अर्थात् (दायभागके अधिकारी) होते हैं। इन छः पुत्रोंसे ऋण, पिण्ड, धनकी क्रिया, गोत्रसाम्य, कुलवृत्ति और स्थिर प्रतिष्ठा रहती है। (इसके अतिरिक्त) कानीन, सहोढ, क्रीत, पौनर्भव, स्वयंदत्त और पारशव—ये छः दायाद-बान्धव कहे जाते हैं। इनके द्वारा ऋण एवं पिण्ड आदिका कार्य नहीं होता। ये केवल नामधारी होते हैं। ये गोत्र एवं कुलसे सम्मत नहीं होते॥ ३४—३७॥ |

अध्याय ६१ ]पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन२८५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः सनकाग्रजः।<br>उवाचैषां विशेषं मे ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥ ३८<br><br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्विशेषं शृणु पुत्रक।<br>औरसो यः स्वयं जातः प्रतिबिम्बमिवात्मनः॥ ३९<br><br>क्लीबोन्मत्ते व्यसनिनि पत्त्यौ तस्याज्ञया तु या।<br>भार्या ह्यनातुरा पुत्रं जनयेत् क्षेत्रजस्तु सः॥ ४०<br><br>मातापितृभ्यां यो दत्तः स दत्तः परिगीयते।<br>मित्रपुत्रं मित्रदत्तं कृत्रिमं प्राहुरुत्तमाः॥ ४१सनत्कुमारने उनकी बात सुनकर (पुनः) कहा—ब्रह्मन्! आप इन सभीका विशेष लक्षण मुझे बतलाइये। उसके पश्चात् देवोंके स्वामी ब्रह्माने कहा—पुत्र! इन्हें मैं विशेषरूपसे बतलाता हूँ; सुनो—अपने द्वारा उत्पन्न किया गया पुत्र 'औरस' कहलाता है। यह अपना ही प्रतिबिम्ब होता है। पतिके नपुंसक, उन्मत्त (पागल) या व्यसनी होनेपर उसकी आज्ञासे अनातुरा (कामवासनासे रहित) पत्नी जो पुत्र उत्पन्न करती है, उसे 'क्षेत्रज' कहते हैं। माता-पिता यदि दूसरेको अपने पुत्रको सौंप दें तो वह 'दत्तक' (या गोद लिया हुआ) कहा जाता है। श्रेष्ठजन मित्रके पुत्र और मित्रद्वारा दिये गये पुत्रको 'कृत्रिम पुत्र' कहते हैं॥ ३८—४१॥
न ज्ञायते गृहे केन जातस्त्विति स गूढकः।<br>बाह्यतः स्वयमानीतः सोऽपविद्धः प्रकीर्तितः॥ ४२<br><br>कन्याजातस्तु कानीनः सगर्भोढः सहोढकः।<br>मूल्यैर्गृहीतः क्रीतः स्याद् द्विविधः स्यात्पुनर्भवः॥ ४३<br><br>दत्त्वैकस्य च या कन्या हृत्वाऽन्यस्य प्रदीयते।<br>तज्जातस्तनयो ज्ञेयो लोके पौनर्भवो मुने॥ ४४<br><br>दुर्भिक्षे व्यसने चापि येनात्मा विनिवेदितः।<br>स स्वयंदत्त इत्युक्तस्तथान्यः कारणान्तरैः॥ ४५वह पुत्र 'गूढ' होता है, जिसके विषयमें यह ज्ञान न हो कि गृहमें किसके द्वारा वह उत्पन्न हुआ है। बाहरसे स्वयं लाये हुए पुत्रको 'अपविद्ध' कहते हैं। कुमारी कन्याके गर्भसे उत्पन्न पुत्रका नाम 'कानीन' होता है। गर्भिणी कन्यासे विवाहके बाद उत्पन्न पुत्रको 'सहोढ' कहते हैं। मूल्य देकर खरीदा हुआ पुत्र 'क्रीत' पुत्र कहलाता है। 'पुनर्भव' पुत्र दो प्रकारका होता है। एक कन्याको एक पतिके हाथमें देकर पुनः उससे छीनकर दूसरे पतिके हाथमें देनेपर जो पुत्र उत्पन्न होता है उसे 'पौनर्भव' पुत्र कहते हैं। दुर्भिक्ष, व्यसन या अन्य किसी कारणसे जो स्वयंको (किसी दूसरेके हाथमें) समर्पित कर देता है उसे 'स्वयंदत्त' पुत्र कहते हैं॥ ४२—४५॥
ब्राह्मणस्य सुतः शूद्रायां जायते यस्तु सुव्रत।<br>ऊढायां वाप्यनूढायां स पारशव उच्यते॥ ४६<br><br>एतस्मात् कारणात् पुत्र न स्वयं दातुमर्हसि।<br>स्वमात्मानं गच्छ शीघ्रं पितरौ समुपाव्हय॥ ४७<br><br>ततः स मातापितरौ सस्मार वचनाद् विभोः।<br>तावाजग्मतुरीशानं द्रष्टुं वै दम्पती मुने॥ ४८<br><br>धर्मोऽहिंसा च देवेशं प्रणिपत्य न्यषीदताम्।<br>उपविष्टौ सुखासीनौ साध्यो वचनमब्रवीत्॥ ४९सुव्रत! ब्याही गयी या क्वाँरी अविवाहित शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणका जो पुत्र होता है उसका नाम 'पारशव' पुत्र है। पुत्र! इन कारणोंसे तुम स्वयं आत्मदान नहीं कर सकते। अतः शीघ्र जाकर अपने माता-पिताको बुला लाओ। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] मुने! इसके बाद सनत्कुमारने विभु ब्रह्माके कहनेसे अपने माता-पिताका स्मरण किया। नारदमुनि! वे दम्पति पितामहका दर्शन करनेके लिये वहाँ आ गये। धर्म और अहिंसा—दोनों ब्रह्माको प्रणाम कर बैठ गये। उनके सुखसे बैठ जानेपर सनत्कुमारने यह वचन कहा॥ ४६—४९॥

| २८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| सनत्कुमार उवाच<br>योगं जिगमिषुस्तात ब्रह्माणं समचूचुदम्।<br>स चोक्तवान् मां पुत्रार्थे तस्मात् त्वं दातुमर्हसि॥ ५०<br>तावेवमुक्तौ पुत्रेण योगाचार्यं पितामहम्।<br>उक्तवन्तौ प्रभोऽयं हि आवयोस्तनयस्तव॥ ५१<br>अद्यप्रभृत्ययं पुत्रस्तव ब्रह्मन् भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा जग्मतुस्तूर्णं येनैवाभ्यागतौ यथा॥ ५२<br>पितामहोऽपि तं पुत्रं साध्यं सद्विनयान्वितम्।<br>सनत्कुमारं प्रोवाच योगं द्वादशपत्रकम्॥ ५३ | सनत्कुमारने कहा—तात! मैंने योग जाननेके लिये पितामहसे प्रार्थना की थी। उन्होंने मुझसे अपना पुत्र होनेके लिये कहा था। अतः आप मुझे प्रदान कर दें। पुत्रके इस प्रकार कहनेपर उन दोनों योगाचार्योंने पितामहसे कहा—प्रभो! हम दोनोंका यह पुत्र आपका हो। ब्रह्मन्! आजसे यह पुत्र आपका होगा। इतना कहकर वे शीघ्र ही जिस मार्गसे आये थे उसीसे फिर चले गये। पितामहने भी उस विनयी पुत्र सनत्कुमारको द्वादशपत्रयोगका उपदेश किया (जो आगे वर्णित है—)॥ ५०-५३॥ |
| शिखासंस्थं तु ओङ्कारं मेषोऽस्य शिरसि स्थितः।<br>मासो वैशाखनामा च प्रथमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५४<br>नकारो मुखसंस्थो हि वृषस्तत्र प्रकीर्तितः।<br>ज्येष्ठमासश्च तत्पत्रं द्वितीयं परिकीर्तितम्॥ ५५<br>मोकारो भुजयोर्युग्मं मिथुनस्तत्र संस्थितः।<br>मासो आषाढनामा च तृतीयं पत्रकं स्मृतम्॥ ५६<br>भकारं नेत्रयुगलं तत्र कर्कटकः स्थितः।<br>मासः श्रावण इत्युक्तश्चतुर्थं पत्रकं स्मृतम्॥ ५७ | इन (भगवान् वासुदेव)-की शिखामें स्थित 'ओङ्कार', सिरपर स्थित मेष राशि और वैशाखमास—ये इनके प्रथम पत्रक हैं। मुखमें स्थित 'न' अक्षर और वहींपर विद्यमान वृषराशि तथा ज्येष्ठमास—ये उनके द्वितीय पत्रक कहे गये हैं। दोनों भुजाओंमें स्थित 'मो' अक्षर, मिथुनराशि एवं आषाढ़मास—ये उनके तृतीय पत्रक हैं। उनके नेत्रद्वयमें विद्यमान 'भ' अक्षर कर्कराशि और श्रावणमास—ये चतुर्थ पत्रक हैं॥ ५४-५७॥ |
| गकारं हृदयं प्रोक्तं सिंहो वसति तत्र च।<br>मासो भाद्रस्तथा प्रोक्तः पञ्चमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५८<br>वकारं कवचं विद्यात् कन्या तत्र प्रतिष्ठिता।<br>मासश्चाश्वयुजो नाम षष्ठं तत् पत्रकं स्मृतम्॥ ५९<br>तेकारमस्त्रग्रामं च तुलाराशिः कृताश्रयः।<br>मासश्च कार्तिको नाम सप्तमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६०<br>वाकारं नाभिसंयुक्तं स्थितस्तत्र तु वृश्चिकः।<br>मासो मार्गशिरो नाम त्वष्टमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६१ | (उनके) हृदयके रूपमें विद्यमान 'ग'अक्षर, सिंहराशि और भाद्रपदमास—ये पञ्चम पत्रक हैं। (उनके) कवचके रूपमें विद्यमान 'व'अक्षर, कन्याराशि और आश्विनमास—ये षष्ठ पत्रक हैं। (उनके) अस्त्र-समूहके रूपमें विद्यमान 'ते'अक्षर, तुलाराशि और कार्तिकमास—ये सप्तम पत्रक हैं। मुने! (उनके) नाभिरूपसे विद्यमान 'वा'अक्षर वृश्चिकराशि और मार्गशीर्षमास—ये अष्टम पत्रक हैं॥ ५८-६१॥ |
| सुकारं जघनं प्रोक्तं तत्रस्थश्च धनुर्धरः।<br>पौषेति गदितो मासो नवमं परिकीर्तितम्॥ ६२<br>देकारश्चोरुयुगलं मकरोऽप्यत्र संस्थितः।<br>माघो निगदितो मासः पत्रकं दशमं स्मृतम्॥ ६३<br>वाकारो जानुयुग्मं च कुम्भस्तत्रादिसंस्थितः।<br>पत्रकं फाल्गुनं प्रोक्तं तदेकादशमुत्तमम्॥ ६४<br>पादौ यकारो मीनोऽपि स चैत्रे वसते मुने।<br>इदं द्वादशमं प्रोक्तं पत्रं वै केशवस्य हि॥ ६५ | (उनके) जघनरूपमें विद्यमान 'सु'अक्षर, धनुराशि और पौषमास—ये नवम पत्रक हैं। (उनके) ऊरु-युगलरूपमें विद्यमान 'दे'अक्षर, मकरराशि और माघमास—ये दशम पत्रक हैं। (उनके) दोनों घुटनोंके रूपमें विद्यमान 'वा'अक्षर, कुम्भराशि और फाल्गुनमास—ये एकादश पत्रक हैं। (उनके) चरणद्वयरूपमें विद्यमान 'य'अक्षर, मीनराशि और चैत्रमास—ये द्वादश पत्रक हैं। ये ही केशवके द्वादश पत्र हैं॥ ६२-६५॥ |
| द्वादशारं तथा चक्रं षण्णाभि द्वियुतं तथा।<br>त्रिव्यूहमेकमूर्तिश्च तथोक्तः परमेश्वरः॥ ६६ | उनका चक्र बारह अरों, बारह नाभियों और तीन व्यूहोंसे युक्त है। इस प्रकारकी उन परमेश्वरकी एक |

अध्याय ६१ ] पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन २८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतत् तवोक्तं देवस्य रूपं द्वादशपत्रकम्।<br>यस्मिञ्ज्ञाते मुनिश्रेष्ठ न भूयो मरणं भवेत्॥ ६७<br><br>द्वितीयमुक्तं सत्त्वाढ्यं चतुर्वर्णं चतुर्मुखम्।<br>चतुर्बाहुमुदाराङ्गं श्रीवत्सधरमव्ययम्॥ ६८<br><br>तृतीयस्तामसो नाम शेषमूर्तिः सहस्रपात्।<br>सहस्रवदनः श्रीमान् प्रजाप्रलयकारकः॥ ६९मूर्ति है। मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमसे भगवान्‌के इस द्वादश-पत्रक (‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस) स्वरूपका वर्णन किया, जिसके जाननेसे पुनः (जन्म-) मरण नहीं होता। उनका द्वितीय सत्त्वमय, श्रीवत्सधारी, अविनाशीस्वरूप चतुर्वर्ण, चतुर्मुख, चतुर्बाहु एवं उदार अङ्गोंसे युक्त है। हजारों पैरों एवं हजारों मुखोंसे सम्पन्न श्रीसंयुक्त तमोगुणमयी उनकी तृतीय शेषमूर्ति प्रजाओंका प्रलय करती है॥ ६६—६९॥
चतुर्थो राजसो नाम रक्तवर्णश्चतुर्मुखः।<br>द्विभुजो धारयन् मालां सृष्टिकृच्चादिपूरुषः॥ ७०<br><br>अव्यक्तात् सम्भवन्त्येते त्रयो व्यक्ता महामुने।<br>अतो मरीचिप्रमुखास्तथान्येऽपि सहस्रशः॥ ७१<br><br>एतत् तवोक्तं मुनिवर्य रूपं<br>विभोः पुराणं मतिपुष्टिवर्धनम्।<br>चतुर्भुजं तं स मुरुर्दुरात्मा<br>कृतान्तवाक्यात् पुनराससाद॥ ७२<br><br>तमागतं प्राह मुने मधुघ्नः<br>प्राप्तोऽसि केनासुर कारणेन।<br>स प्राह योद्धुं सह वै त्वयाद्य<br>तं प्राह भूयः सुरशत्रुहन्ता॥ ७३उनका चतुर्थ रूप राजस है। वह रक्तवर्ण, चार मुख एवं दो भुजाओंवाला एवं माला धारण किये हुए है। यही सृष्टि करनेवाला आदिपुरुष रूप है। महामुने! ये तीन व्यक्त मूर्तियाँ अव्यक्त (अदृश्य तत्त्व)-से उत्पन्न होती हैं। इनसे ही मरीचि आदि ऋषि तथा अन्यान्य हजारों पुरुष उत्पन्न हुए हैं। मुनिवर! तुम्हारे सामने मैंने विष्णुके अत्यन्त प्राचीन और मति-पुष्टिवर्द्धक रूपका वर्णन किया है। [अब आगेकी कथा सुनिये—] दुरात्मा मुरु यमराजके कहनेसे पुनः उन चतुर्भुज (विष्णु)-के पास गया। मुने! मधुसूदनने आये हुए उससे पूछा—असुर! तुम किसलिये आये हो? उसने कहा—मैं तुम्हारे साथ आज युद्ध करने आया हूँ। असुरारि (विष्णु)-ने फिर उससे कहा॥ ७०—७३॥
यदीह मां योद्धुमुपागतोऽसि<br>तत् कम्पते ते हृदयं किमर्थम्।<br>ज्वरातुरस्येव मुहुर्मुहुर्वै<br>तन्नास्मि योत्स्ये सह कातरेण॥ ७४<br><br>इत्येवमुक्तो मधुसूदनेन<br>मुरुस्तदा स्वे हृदये स्वहस्तम्।<br>कथं क्व कस्येति मुहुस्तथोक्त्वा<br>निपातयामास विपन्नबुद्धिः॥ ७५<br><br>हरिश्च चक्रं मृदुलाघवेन<br>मुमोच तद्धृत्कमलस्य शत्रोः।<br>चिच्छेद देवास्तु गतव्यथाभवन्<br>देवं प्रशंसन्ति च पद्मनाभम्॥ ७६<br><br>एतत् तवोक्तं मुरदैत्यनाशनं<br>कृतं हि युक्त्या शितचक्रपाणिना।<br>अतः प्रसिद्धं समुपाजगाम<br>मुरारिरित्येव विभुर्नृसिंहः॥ ७७यदि तुम मेरे साथ युद्ध करनेके लिये आये हो तो ज्वरसे पीड़ितके सदृश तुम्हारा हृदय बारंबार क्यों काँप रहा है? मैं तो कातरके साथ युद्ध नहीं करूँगा। मधुसूदनके इस प्रकार कहनेपर ‘कैसे, कहाँ? किसका?’ इस प्रकार बार-बार कहते हुए बुद्धिहीन मुरुने अपने हृदयपर हाथ रखा। इसे देखकर हरिने आसानीसे (अत्यन्त लाघवतासे) चक्र निकाला और उस शत्रुके हृदय-कमलपर उसे छोड़ दिया (जिससे उसका हृदय विदीर्ण हो गया)। उसके बाद सभी देवता सन्तापरहित होकर भगवान् पद्मनाभ विष्णुकी स्तुति करने लगे। मैंने (ब्रह्माने) तुमसे तीक्ष्ण चक्र धारण करनेवाले विष्णुद्वारा (कौशलसे) किये गये दैत्यके विनाशका वर्णन किया। इसीसे विभु नृसिंह ‘मुरारि’ नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ७४—७७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६१॥

२८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६२

बासठवाँ अध्याय

शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, हरि-हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य

पुलस्त्य उवाच
ततो मुरारिभवनं समभ्येत्य सुरास्ततः।<br>ऊचुर्देवं नमस्कृत्य जगत्संक्षुब्धिकारणम्॥ १<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्राह गच्छामो हरमन्दिरम्।<br>स वेत्स्यति महाज्ञानी जगत्क्षुब्धं चराचरम्॥ २<br><br>तथोक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>जनार्दनं पुरस्कृत्य प्रजग्मुर्मन्दरं गिरिम्।<br>न तत्र देवं न वृषं न देवीं न च नन्दिनम्॥ ३<br><br>शून्यं गिरिमपश्यन्त अज्ञानतिमिरावृताः।<br>तान् मूढदृष्टीन् संप्रेक्ष्य देवान् विष्णुर्महाद्युतिः॥ ४<br><br>प्रोवाच किं न पश्यध्वं महेशं पुरतः स्थितम्।<br>तमूचुर्नैव देवेशं पश्यामो गिरिजापतिम्॥ ५**पुलस्त्यजी (पुनः) बोले—**उन देवोंने विष्णुभवनमें पहुँचकर उन्हें नमस्कार करनेके बाद जगत्‌के अशान्त होनेका कारण पूछा। भगवान् विष्णुने उनके प्रश्नको सुनकर कहा—हम सभी लोग शिवजीके पास चलें। वे महान् ज्ञानी हैं। इस चराचर जगत्‌के व्याकुल होनेका कारण वे जानते होंगे। वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवगण जनार्दन भगवान्‌को आगे कर मन्दरपर्वतपर गये। (किंतु) वहाँ उन्होंने न तो महादेवको देखा, न वृषको, न देवी पार्वती और न नन्दीको ही। अज्ञानके अन्धकारमें पड़े हुए उन लोगोंने पर्वतको देवशून्य देखा। (फिर तो) महातेजस्वी विष्णुने दर्शन प्राप्त न होनेके कारण चकपकाये हुए देवोंको देखकर कहा—क्या आपलोग सामने स्थित महादेवको नहीं देख रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया—हाँ, हमलोग गिरिजापति देवेशको नहीं देख रहे हैं॥ १–५॥
न विद्मः कारणं तच्च येन दृष्टिर्हता हि नः।<br>तानुवाच जगन्मूर्तिर्यूयं देवस्य सागसः॥ ६<br><br>पापिष्ठा गर्भहन्तारो मृडान्यः स्वार्थतत्पराः।<br>तेन ज्ञानविवेको वै हतो देवेन शूलिना॥ ७<br><br>येनाग्रतः स्थितमपि पश्यन्तोऽपि न पश्यथ।<br>तस्मात् कायविशुद्ध्यर्थं देवदृष्ट्यर्थमादरात्॥ ८<br><br>तप्तकृच्छ्रेण संशुद्धाः कुरुध्वं स्नानमीश्वरे।<br>क्षीरस्नाने प्रयुञ्जीत सार्द्धं कुम्भशतं सुराः॥ ९हमलोग उस कारणको नहीं जानते, जिससे हमारी देखनेकी शक्ति नष्ट हो गयी है। जगन्मूर्ति (विष्णु)-ने उनसे कहा—आपलोगोंनें देवताओंके साथ अपराध किया है। आपलोग स्वार्थी हैं। आपलोग मृडानीका गर्भ नष्ट करनेके कारण महापापसे ग्रस्त हो गये हैं, इसलिये शूलपाणि महादेवने आपलोगोंके सम्यक् अवबोधको और विचारशक्तिको अपहृत कर लिया है। इस कारण आप सब सामने स्थित (शङ्कर)-को देखकर भी नहीं देख रहे हैं। अतः सब लोग विश्वासके साथ शरीरकी पवित्रता और देवका दर्शन प्राप्त करनेके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतद्वारा पावन होकर स्नान करें। और, हे देवताओ! महादेवको दूधसे स्नान करानेके लिये डेढ़ सौ घड़ोंका प्रयोग करें॥ ६–९॥
दधिस्नाने चतुःषष्टिर्द्वात्रिंशद्धविषोऽर्हणे।<br>पञ्चगव्यस्य शुद्धस्य कुम्भाः षोडश कीर्तिताः॥ १०उनके अभिषेकके लिये दहीके चौंसठ, घीके बत्तीस पञ्चगव्यके शुद्ध सोलह घड़ोंका विधान कहा गया है।