वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३४- कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवंसम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४३
त्वयाऽस्य दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि ।
प्रतिज्ञा नैव वोढव्या वाच्यं साम तथाऽफलम् ॥ १५
कृतकृत्यस्य देवस्य देवार्थं चैव कुर्वतः ।
अलं दद्यां धनं देवे त्वेतद्वाच्यं तु याचतः ।
कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १६
बलिरुवाच
ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः ।
नास्तीति किमु देवस्य संसारस्याघहारिणः ॥ १७
व्रतोपवासैर्विविधैर्यः प्रभुर्गृह्यते हरिः।
स मे वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥ १८
यदर्थं सुसमारम्भा दमशौचगुणान्वितैः ।
यज्ञाः क्रियन्ते यज्ञेशः स मे देहीति वक्ष्यति ॥ १९
तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं च नः।
यन्मां देहीति विश्वेशः स्वयमेव वदिष्यति ॥ २०
नास्तीत्यहं गुरो वक्ष्ये तमभ्यागतमीश्वरम् ।
प्राणत्यागं करिष्येऽहं न तु नास्ति जने क्वचित् ॥ २१
नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् ।
वक्ष्यामि कथमायाते तदद्य चामरेऽच्युते ॥ २२
श्लाघ्य एव हि वीराणां दानाच्चापत्समागमः ।
न बाधाकारि यद्दानं तदङ्ग बलवत् स्मृतम् ॥ २३
मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः ।
न दुःखितो न चोद्विग्नो न शमादिविवर्जितः ॥ २४
इच्छा हो वैसा करो। दैत्यपते! (देखना) तुम थोड़ी-
सी भी वस्तु देनेके लिये उनसे प्रतिज्ञा मत करना।
व्यर्थकी कोमल और मधुर बातें करना। महासुर!
कृतकृत्य एवं देवताओंका कार्य पूरा करनेवाले तथा
देवताओंके ऐश्वर्यके लिये प्रयत्नशील भगवान् श्रीकृष्णके
याचना करनेपर 'मैं देवताओंके हेतु पर्याप्त धन दूँगा'
ऐसा कहना ॥ १२- १६ ॥
बलि बोले- ब्रह्मन् ! मैं दूसरोंके याचना करनेपर
भी 'नहीं है' - ऐसा कैसे कह सकता हूँ? फिर
संसारके पापोंको दूर करनेवाले (उन) देवसे कहनेकी
तो बात ही क्या है? विविध प्रकारके व्रतों एवं
उपवासोंसे जो परमेश्वर ग्रहण किये जाने योग्य हैं, वे
ही गोविन्द मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो इससे
बढ़कर (मेरे लिये) और (भाग्य) क्या हो सकता
है? जिनके लिये दम-शमादि शौच -भीतरी-बाहरी
पवित्रता आदि गुणोंसे युक्त लोग यज्ञीय उपकरणों एवं
सम्पत्तियोंको लगाकर यज्ञ करते हैं, वे ही यज्ञेश
(यज्ञके स्वामी) यदि मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो
मेरे किये हुए सभी कर्म सफल हो गये और हमारा
तपश्चरण भी सफल हो गया; क्योंकि विश्वके स्वामी
स्वयं मुझसे 'दो'- इस तरह कहेंगे ॥ १७-२०॥
गुरुदेव ! क्या अपने यहाँ (याचकरूपमें) आये उन
परमेश्वरसे 'नहीं है' - मैं ऐसा कहूँ? (यह तो उचित
नहीं जँचता) भले ही प्राणोंका त्याग कर दूँगा; किंतु
किसी भी याचक मनुष्यसे 'नहीं है' - यह नहीं कह
सकता। दूसरोंके भी याचना करनेपर जब मैंने 'नहीं
है'-ऐसा नहीं कहा तो आज अपने यहाँ स्वयं पूर्ण
परमेश्वरके आ जानेपर मैं यह कैसे कहूँगा कि 'नहीं
है'? दानके कारण यदि कठिनाई आती है तो उसे वीर
पुरुष प्रशंसनीय ही मानते हैं। क्योंकि दानका महत्त्व उससे
और बढ़ जाता है। गुरो! (हाँ, साधारणतया यह समझा
जाता है कि-) जो दान बाधा डालनेवाला नहीं होता,
वह निःसंदेह बलवान् कहा गया है। (पर ऐसा प्रसङ्ग नहीं
आ सकता; क्योंकि) मेरे राज्यमें ऐसा कोई भी नहीं है,
जो सुखी न हो और न कोई रोगी या दुःखी ही है, न
कोई किसीके द्वारा उद्वेलित किया गया है और न कोई
| १४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३१ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हृष्टस्तुष्टः सुगन्धी च तृप्तः सर्वसुखान्वितः।<br>जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥ २५ | शम आदि गुणोंसे रहित है। महाभाग ! सभी लोग हृष्ट, तुष्ट, पुण्यात्मा-धर्मपरायण तृप्त एवं सुखी हैं। अधिक क्या है? मैं तो सदा सुखी हूँ ॥ २१—२५ ॥ |
| एतद्विशिष्टमत्राहं दानबीजफलं लभे।<br>विदितं मुनिशार्दूल मयैतत्त्वन्मुखाच्छ्रुतम् ॥ २६<br><br>मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>मम दानमवाप्यासौ पुष्णाति यदि देवताः ॥ २७<br><br>एतद्बीजवरे दानबीजं पतति चेद् गुरौ।<br>जनार्दने महापात्रे किं न प्राप्तं ततो मया ॥ २८<br><br>विशिष्टं मम तद्दानं परितुष्टाश्च देवताः।<br>उपभोगाच्छतगुणं दानं सुखकरं स्मृतम्॥ २९ | मुनिशार्दूल ! आपके मुखसे सुनकर मुझे यह मालूम हो गया कि मैं यहाँपर विशिष्ट दानरूपी बीजका शुभ फल प्राप्त कर रहा हूँ। वे हरि यदि मुझसे दान लेकर देवताओंकी पुष्टि करते हैं तो यज्ञसे आराधित वे (हरि) मुझपर निश्चय ही प्रसन्न हैं। यदि श्रेष्ठ बीज (ऐसा दान) महान् (योग्य) पात्र, पूज्य जनार्दनको मिल गया तो फिर मुझे क्या नहीं मिला ? निश्चय ही मेरा यह दान विशिष्ट गुणोंवाला है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। दानके उपभोगकी अपेक्षा दान देना सौ-गुना सुख देनेवाला माना गया है ॥ २६—२९ ॥ |
| मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्॥ ३०<br><br>अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधतः।<br>मां निहंतुं ततो हि स्याद् वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्॥ ३१<br><br>एतज्ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ दानविघ्नकरेण मे।<br>नैव भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३२ | यज्ञसे पूजे गये श्रीहरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। तभी तो निस्संदेह मुझे दर्शन देकर मेरा कल्याण करनेवाले वे प्रभु आ रहे हैं, निश्चय ही यही बात है। देवताओंके देवभागकी प्राप्तिमें रुकावट होनेके कारण यदि वे क्रोधवश मेरा वध करने भी आ रहे हों तो भी उन अच्युतसे होनेवाला मेरा वध भी प्रशंसनीय ही होगा। मुनिश्रेष्ठ ! यह समझकर जगन्नाथ गोविन्दके यहाँ समुपस्थित होनेपर आप मेरे दानमें विघ्न न डालें ॥ ३०—३२ ॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br>इत्येवं वदतस्तस्य प्राप्तस्तत्र जनार्दनः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् ॥ ३३<br><br>तं दृष्ट्वा यज्ञवाटं तु प्रविष्टमसुराः प्रभुम्।<br>जग्मुः प्रभावतः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः॥ ३४<br><br>जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे।<br>वसिष्ठो गाधिजो गर्गो अन्ये च मुनिसत्तमाः ॥ ३५<br><br>बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः।<br>ततःसंक्षोभमापन्नो न कश्चित् किंचिदुक्तवान् ॥ ३६ | **लोमहर्षण बोले—**शुक्राचार्य और बलिमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य भगवान् अपनी मायासे अपना वामनरूप धारणकर वहाँ पहुँच गये। उन प्रभुको यज्ञस्थानमें उपस्थित देखकर दैत्यलोग उनके प्रभावसे अशान्त और तीव्र तेजसे रहित हो गये। उस महायज्ञमें एकत्र (उपस्थित) वसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य श्रेष्ठ मुनिजन अपना-अपना जप करने लगे। बलिने भी अपने सम्पूर्ण जन्मको सफल माना; किंतु उसके बाद (इधर) खलबली मच गयी और संक्षुब्ध होनेके कारण किसीने कुछ भी नहीं कहा ॥ ३३—३६ ॥ |
| प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास तेजसा।<br>अथासुरपतिं प्रह्रं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान् ॥ ३७ | उनके देदीप्यमान तेजके कारण प्रत्येकने देवाधिदेवकी पूजा की। उसके बाद वामनरूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए विष्णुभगवान्ने लोगोंसे पूजित होनेके बाद एक दृष्टिसे (चारों ओर देखकर) उन विनम्र दैत्यपति एवं |
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवदेवपतिः साक्षाद् विष्णुर्वामनरूपधृक्।<br>तुष्टाव यज्ञं वह्निं च यजमानमथार्चितः।<br>यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदम् ॥ ३८<br>सदस्याः पात्रमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात्।<br>यज्ञवाटस्थितं विप्राः साधु साध्वित्युदीरयन् ॥ ३९<br>स चार्घमादाय बलिः प्रोद्भूतपुलकस्तदा।<br>पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः॥ ४० | मुनिवरोंको देखा तथा यज्ञ, अग्नि, यजमान, यज्ञकर्ममें अधिकृत सदस्यों एवं द्रव्यकी सामग्रियोंकी प्रशंसा की। विप्रो! तत्काल ही सभी सदस्यगण यज्ञमण्डपमें उपस्थित पात्रस्वरूप वामनके प्रति ‘साधु-साधु’ कहने लगे। उस समय हर्षमें विह्वल होकर महासुर बलिने अर्घ लिया और गोविन्दकी पूजा की तथा उनसे यह कहा॥ ३७-४०॥ |
| बलिरुवाच<br>सुवर्णरत्नसंघातो गजाश्वसमितिस्तथा।<br>स्त्रियो वस्त्रान्यलंकारान् गावो ग्रामाश्च पुष्कलाः॥ ४१<br>सर्वे च सकला पृथ्वी भवतो वा यदीप्सितम्।<br>तद् ददामि वृणुष्वेष्टं ममार्थः सन्ति ते प्रियाः॥ ४२ | बलिने कहा— (वामनदेव!) अनन्त सुवर्ण और रत्नोंके ढेर तथा हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण, गायें तथा ग्रामसमूह—ये सभी वस्तुएँ, समस्त पृथ्वी अथवा आपकी जो अभिलाषा हो वह मैं देता हूँ। आप अपना अभीष्ट बतलायें। मेरे प्रिय लगनेवाले समस्त अर्थ आपके लिये हैं॥ ४१-४२॥ |
| इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः।<br>प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः ॥ ४३<br>ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम्।<br>सुवर्णग्रामरत्नादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ४४ | दैत्यपति बलिके इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक उदार वचन कहनेपर वामनका आकार धारण करनेवाले भगवान्ने हँसते हुए दुर्बोध वाणीमें कहा—राजन्! मुझे अग्निशालाके लिये तीन पग (भूमि) दें। सुवर्ण, ग्राम एवं रत्न आदि उनकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको प्रदान करें॥ ४३-४४॥ |
| बलिरुवाच<br>त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पदैः पदवतां वर।<br>शतं शतसहस्रं वा पदानां मार्गतां भवान् ॥ ४५ | बलिने कहा— हे पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग भूमिसे आपका कौन-सा स्वार्थ सिद्ध होगा। सौ अथवा सौ हजार पग भूमि आप माँगिये॥ ४५॥ |
| श्रीवामन उवाच<br>एतावता दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि मार्गणे।<br>अन्येषामर्थिनां वित्तमिच्छया दास्यते भवान् ॥ ४६<br>एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः।<br>वाचयामास वै तस्मै वामनाय महात्मने ॥ ४७<br>पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः।<br>सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ४८<br>चन्द्रसूर्यौ तु नयने द्यौः शिरश्चरणौ क्षितिः।<br>पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः ॥ ४९ | श्रीवामनने कहा— हे दैत्यपते! मैं इतना पानेसे ही कृतकृत्य हूँ। (मेरा स्वार्थ इतनेसे ही सिद्ध हो जायगा।) आप दूसरे याचना करनेवाले याचकोंको उनके इच्छानुकूल दान दीजियेगा। महात्मा वामनकी यह वाणी सुनकर (बलिने) उन महात्मा वामनको तीन पग भूमि देनेके लिये वचन दे दिया। दान देनेके लिये हाथपर जल गिरते ही वामन अवामन (विराट्) बन गये। तत्क्षण उन्होंने उन्हें अपना सर्वदेवमय स्वरूप दिखाया। चन्द्र और सूर्य उनके दोनों नेत्र, आकाश सिर, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाच पैरकी अँगुलियाँ एवं गुह्यक हाथोंकी अँगुलियाँ थे॥ ४६-४९॥ |
| विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः।<br>यक्षा नखेषु सम्भूता रेखास्वप्सरसस्तथा ॥ ५० | जानुओंमें विश्वेदेवगण, दोनों जङ्घाओंमें सुरश्रेष्ठ साध्यगण, नखोंमें यक्ष एवं रेखाओंमें अप्सराएँ थीं। |