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वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
१६- देवताओंका शयन-तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन
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| ७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| कर्मान्ताङ्गारशालासु स्तनंधयसुताः स्त्रियः।<br>वाग्विप्रुषो द्विजेन्द्राणां संतप्ताश्चाम्बुबिन्दवः॥ ६७ | कर्मशाला, अन्तर्गृह एवं अग्निशालामें दुधमुँहे बच्चोंको ली हुई स्त्रियाँ, सम्भाषण करते हुए विद्वान् ब्राह्मणोंके मुखके छींटे तथा उष्ण जलके बिन्दु पवित्र होते हैं। |
| भूमिर्विशुध्यते खातदाहमार्जनगोक्रमैः।<br>लेपादुल्लेखनात् सेकाद् वेश्मसंमार्जनार्चनात्॥ ६८ | पृथ्वीकी शुद्धि खोदने, जलाने, झाडू देने, गौओंके चलने, लीपने, खरोंचने तथा सींचनेसे होती है और गृहकी शुद्धि झाडू देने, जलके छिड़कने तथा पूजा आदिसे होती है। |
| केशकीटावपनेऽन्ने गोघ्राते मक्षिकान्विते।<br>मृदम्बुभस्मक्षाराणि प्रक्षेप्तव्यानि शुद्धये॥ ६९ | केश, कीट पड़े हुए और मक्खीके बैठ जानेपर तथा गायके द्वारा सूँघे जानेपर अन्नकी शुद्धिके लिये उसपर जल, भस्म, क्षार या मृत्तिका छिड़कनी चाहिये। |
| औदुम्बराणां चाम्लेन क्षारेण त्रपुसीसयोः।<br>भस्माम्बुभिश्च कांस्यानां शुद्धिः प्लावो द्रव्यस्य च॥ ७० | ताम्रपात्रकी शुद्धि खटाईसे, जस्ते और शीशेकी क्षारके द्वारा, काँसेकी वस्तुएँ भस्म और जलके द्वारा तथा तरल पदार्थ कुछ अंशको बहा देनेसे शुद्ध हो जाते हैं¹॥ ६७–७०॥ |
| अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैर्गन्धापहरणेन च।<br>अन्येषामपि द्रव्याणां शुद्धिर्गन्धापहारतः॥ ७१ | अपवित्र वस्तुसे मिले पदार्थ जल और मिट्टीसे धोने तथा दुर्गन्ध दूर कर देनेसे शुद्ध होते हैं। अन्य (गन्धवाले) पदार्थोंकी शुद्धि भी गन्ध दूर करनेसे होती है। |
| मातुः प्रस्रवणे वत्सः शकुनिः फलपातने।<br>गर्दभो भारवाहित्वे श्वा मृगग्रहणे शुचिः॥ ७२ | माताके स्तनको प्रस्रुत कराने (पेन्हाने)-में बछड़ा, वृक्षसे फल गिरानेमें पक्षी, बोझा ढोनेमें गधा और शिकार पकड़नेमें कुत्ता शुद्ध (माना गया) है। |
| रथ्याकर्दमतोयानि नावः पथि तृणानि च।<br>मारुतेनैव शुद्ध्यन्ति पक्केष्टकचितानि च॥ ७३ | मार्गके कीचड़ और जल, नाव तथा रास्तेकी घास, तृण एवं पके हुए ईंटोंके समूह वायुके द्वारा ही शुद्ध हो जाते हैं। |
| शृतं द्रोणाढकस्याननममेध्याभिप्लुतं भवेत्।<br>अग्रमुद्धृत्य संत्याज्यं शेषस्य प्रोक्षणं स्मृतम्॥ ७४ | यदि एक द्रोण (ढाई सेरसे अधिक) पके अन्नके अपवित्र वस्तुसे सम्पर्क हो जाय तो उसके ऊपरका अंश निकाल कर फेंक देना एवं शेषपर जल छिड़क देना चाहिये। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है। |
| उपवासं त्रिरात्रं वा दूषितान्नस्य भोजने।<br>अज्ञाते ज्ञातपूर्वे च नैव शुद्धिर्विधीयते॥ ७५ | अज्ञातरूपसे दूषित अन्न खा लेनेपर तीन रात्रितक उपवास करनेसे शुद्धि हो जानेका विधान है, किंतु जान-बूझकर दूषित अन्न खानेपर शुद्धि नहीं हो सकती॥ ७१–७५॥ |
| उदक्याश्वाननग्नांश्च सूतिकान्त्यावसायिनः।<br>स्पृष्ट्वा स्नायीत शौचार्थं तथैव मृतहारिणः॥ ७६ | रजस्वला स्त्री, कुत्ता, नग्न (दिगम्बर साधु),² प्रसूता स्त्री, चाण्डाल और शववाहकोंका स्पर्श हो जानेपर अपवित्र हुए व्यक्तिको पवित्र होनेके लिये स्नान करना चाहिये। |
| सस्नेहमस्थि संस्पृश्य सवासाः स्नानमाचरेत्।<br>आचम्यैव तु निःस्नेहं गामलभ्यार्कमीक्ष्य च॥ ७७ | मज्जायुक्त हड्डीके छू जानेपर वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये, किंतु सूखी हड्डीका स्पर्श होनेपर आचमन करने, गो-स्पर्श तथा सूर्यदर्शन करनेमात्रसे ही |
१-द्रव्यशुद्धिका यह प्रकरण मनुस्मृति ५। ११०–१४६ तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १। १८२–१९७ आदिमें भी प्रायः इसी भावका है।
२-पद्मपुराण आदिमें नग्न-धर्मविपाक प्रश्नोत्तर द्रष्टव्य है।
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| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न लङ्घयेत्पुरीषासृक्ष्ठीवनोद्वर्त्तनानि च।<br>गृहादुच्छिष्टविण्मूत्रे पादाम्भांसि क्षिपेद बहिः॥ ७८<br><br>पञ्चपिण्डाननुद्धृत्य न स्नायात् परवारिणि।<br>स्नायीत देवखातेषु सरोह्रदसरित्सु च॥ ७९ | शुद्धि हो जाती है। विष्ठा, रक्त, थूक एवं उबटनका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। जूठे पदार्थ, विष्ठा, मूत्र एवं पैर धोनेके जलको घरसे बाहर फेंक देना चाहिये। दूसरेके द्वारा निर्मित बावली आदिमें मिट्टीके पाँच टुकड़ोंके निकाले बिना स्नान नहीं करना चाहिये। (मुख्यतः) देव-निर्मित झीलोंमें, ताल-तलैयों और नदियोंमें स्नान करना चाहिये॥ ७६-७९॥ |
| नोद्यानादौ विकालेषु प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन।<br>नालपेज्जनविद्विष्टं वीरहीनां तथा स्त्रियम्॥ ८० | बुद्धिमान् पुरुष बाग-बगीचोंमें असमयमें कभी न ठहरे। लोगोंसे द्वेष रखनेवाले व्यक्ति तथा पति-पुत्रसे रहित स्त्रीसे वार्तालाप नहीं करना चाहिये। |
| देवतापितृसच्छास्त्रयज्ञवेदादिनिन्दकैः ।<br>कृत्वा तु स्पर्शमालापं शुद्ध्येते कर्मावलोकनात्॥ ८१ | देवता, पितरों, भले शास्त्रों (पुराण, धर्मशास्त्र, रामायण आदि), यज्ञ एवं वेदादिके निन्दकोंका स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप करनेपर मनुष्य अपवित्र हो जाता है, वह सूर्यदर्शन करनेपर शुद्ध होता है। उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यके समक्ष उपस्थान करके अपने किये हुए स्पर्श और वार्तालाप कर्मके त्याग तथा पश्चात्ताप करनेसे होती है। |
| अभोज्याः सूतिकाषण्ढमार्जारारखुश्वकुक्कुटाः।<br>पतितापविद्धनग्राश्चाण्डालाधामश्च ये॥ ८२ | सूतिक, नपुंसक, बिलाव, चूहा, कुत्ते, मुर्गे, पतित, नग्न (विधर्मी) (इनके लक्षण आगे बतलाये जायेंगे) समाजसे बहिष्कृत और जो चाण्डाल आदि अधम प्राणी हैं उनके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये॥ ८०-८२॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>भवद्भिः कीर्तिताऽभोज्या य एते सूतिकादयः।<br>अमीषां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतो लक्षणानि हि॥ ८३ | **सुकेशि बोला—**ऋषियो! आपलोगोंने जिन सूतिक आदिका अन्न अभक्ष्य कहा है, मैं उनके लक्षण विस्तारसे सुनना चाहता हूँ॥ ८३॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>ब्राह्मणी ब्राह्मणस्यैव याऽवरोधत्वमागता।<br>तावुभौ सूतिकेत्युक्तौ तयोरन्नं विगर्हितम्॥ ८४ | **ऋषियोंने कहा—**सुकेशि! अन्य ब्राह्मणके साथ ब्राह्मणीके व्यभिचरित होनेपर उन दोनोंको ही ‘सूतिक' कहा जाता है। उन दोनोंका अन्न निन्दित है। |
| न जुहोत्युचिते काले न स्नाति न ददाति च।<br>पितृदेवार्चनाद्धीनः स षण्ढः परगीयते॥ ८५ | उचित समयपर हवन, स्नान और दान न करनेवाला तथा पितरों एवं देवताओंकी पूजासे रहित व्यक्तिको ही यहाँ 'षण्ढ' या नपुंसक कहा गया है। |
| दम्भार्थं जपते यश्च तप्यते यजते तथा।<br>न परत्रार्थमुद्युक्तो स मार्जारः प्रकीर्तितः॥ ८६ | दम्भके लिये जप, तप और यज्ञ करनेवाले तथा परलोकार्थ उद्योग न करनेवाले व्यक्तिको यहाँ 'मार्जार' या 'बिलाव' कहा गया है। |
| विभवे सति नैवात्ति न ददाति जुहोति च।<br>तमाहुराखुं तस्यानं भुक्त्वा कृच्छ्रेण शुद्ध्यति ॥ ८७ | ऐश्वर्य रहते हुए भोग, दान एवं हवन न करनेवालेको 'आखु' (चूहा) कहते हैं। उसका अन्न खानेपर मनुष्य कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है॥ ८४-८७॥ |
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| ७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ |
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| Sanskrit Shlokas | Hindi Translation |
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| यः परेषां हि मर्माणि निकृन्तन्निव भाषते।<br>नित्यं परगुणद्वेषो स श्वान इति कथ्यते॥ ८८<br><br>सभागतानां यः सभ्यः पक्षपातं समाश्रयेत्।<br>तमाहुः कुक्कुटं देवास्तस्याप्यन्नं विगर्हितम्॥ ८९<br><br>स्वधर्मं यः समुत्सृज्य परधर्मं समाश्रयेत्।<br>अनापदि स विद्वद्भिः पतितः परिकीर्त्यते॥ ९०<br><br>देवत्यागी पितृत्यागी गुरुभक्त्यरदस्तथा।<br>गोब्राह्मणस्त्रीवधकृदपविद्धः स कीर्त्यते॥ ९१ | दूसरोंका मर्म भेदन करते हुए बातचीत करनेवाले तथा दूसरेके गुणोंसे द्वेष करनेवालेको ‘श्वान’ या ‘कुत्ता’ कहा गया है। सभामें आगत व्यक्तियोंमें जो सभ्य व्यक्ति पक्षपात करता है, उसे देवताओंने ‘कुक्कुट’ (मुर्गा) कहा है; उसका भी अन्न निन्दित है। विपत्तिकालके अतिरिक्त अन्य समयमें अपना धर्म छोड़कर दूसरेका धर्म ग्रहण करनेवालेको विद्वानोंने ‘पतित’ कहा है। देवत्यागी, पितृत्यागी, गुरुभक्तिसे विमुख तथा गो, ब्राह्मण एवं स्त्रीकी हत्या करनेवालेको ‘अपविद्ध’ कहा जाता है॥ ८८—९१ ॥ |
| येषां कुले न वेदोऽस्ति न शास्त्रं नैव च व्रतम्।<br>ते नग्नाः कीर्तिताः सद्भिस्तेषामन्नं विगर्हितम्॥ ९२<br><br>आशार्तानामदाता च दातुश्च प्रतिषेधकः।<br>शरणागतं यस्त्यजति स चाण्डालोऽधमो नरः॥ ९३<br><br>यो बान्धवैः परित्यक्तः साधुभिर्ब्राह्मणैरपि।<br>कुण्डाशीयश्च तस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९४<br><br>यो नित्यकर्मणो हानिं कुर्यान्नैमित्तिकस्य च।<br>भुक्तवान्नं तस्य शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९५ | जिनके कुलमें वेद, शास्त्र एवं व्रत नहीं हैं, उन्हें सज्जन लोग ‘नग्न’ कहते हैं। उनका अन्न निन्दित है। आशा रखनेवालोंको न देनेवाला, दाताको मना करनेवाला तथा शरणागतका परित्याग करनेवाला अधम मनुष्य ‘चाण्डाल’ कहा जाता है। बान्धवों, साधुओं एवं ब्राह्मणोंसे त्यागा गया तथा कुण्ड (पतिके जीवित रहनेपर परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र)-के यहाँ अन्न खानेवालेको चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। नित्य और नैमित्तिक कर्म न करनेवाले व्यक्तिका अन्न खानेपर मनुष्य तीन राततक उपवास करनेसे शुद्ध होता है॥ ९२—९५ ॥ |
| गणकस्य निषादस्य गणिकाभिषजोस्तथा।<br>कदर्यस्यापि शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९६<br><br>नित्यस्य कर्मणो हानिः केवलं मृतजन्मसु।<br>न तु नैमित्तिकोच्छेदः कर्तव्यो हि कथंचन॥ ९७<br><br>जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचैलस्य विधीयते।<br>मृते च सर्वबन्धूनामित्याह भगवान् भृगुः॥ ९८<br><br>प्रेताय सलिलं देयं बहिर्दग्ध्वा तु गोत्रजैः।<br>प्रथमेऽह्नि चतुर्थे वा सप्तमे वाऽस्थिसंचयम्॥ ९९ | गणक (ज्योतिषी), निषाद (मल्लाह), वेश्या, वैद्य तथा कृपणका अन्न खानेपर भी मनुष्य तीन दिन उपवास करनेपर शुद्ध होता है। घरमें जन्म या मृत्यु होनेपर नित्यकर्म रुक जाते हैं, किंतु नैमित्तिक कर्म कभी बंद नहीं करना चाहिये। भगवान् भृगुने कहा है कि पुत्र उत्पन्न होनेपर पिताके लिये एवं मरणमें सभी बन्धुओंके लिये वस्त्रके साथ स्नान करना चाहिये। ग्रामके बाहर शवदाह करना चाहिये। शवदाह करनेके बाद सगोत्रलोग प्रेतके उद्देश्यसे जलदान (तिलाञ्जलि) करें तथा पहले दिन या चौथे अथवा सातवें दिन अस्थि-चयन करें॥ ९६—९९ ॥ |
| ऊर्ध्वं संचयनात्तेषामङ्गस्पर्शो विधीयते।<br>सोदकैस्तु क्रिया कार्या संशुद्धैस्तु सपिण्डजैः॥ १०० | अस्थि-चयनके बाद अङ्ग-स्पर्शका विधान है।<br><br>शुद्ध होकर सोदकों (चौदह पीढ़ीके अन्तर्गतके लोगों)<br><br>एवं सपिण्डजों (सात पीढ़ीके अंदरके लोगों)-को<br><br>और्ध्वदैहिक क्रिया (मरनेके बाद की जानेवाली विहित |
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अध्याय १४ ] दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन ७९
| विषोद्वन्धनशस्त्राम्बुवह्निपातमृतेषु च।<br>बाले प्रव्राजि संन्यासे देशान्तरमृते तथा॥ १०१<br><br>सद्यः शौचं भवेद्वीर तच्चाप्युक्तं चतुर्विधम्।<br>गर्भस्रावे तदेवोक्तं पूर्णकालेन चेतरे॥ १०२<br><br>ब्राह्मणानामहोरात्रं क्षत्रियाणां दिनत्रयम्।<br>षड्रात्रं चैव वैश्यानां शूद्राणां द्वादशाहिकम्॥ १०३ | क्रिया) करनी चाहिये। हे वीर! विष, बन्धन, शस्त्र, जल, अग्नि और गिरनेसे मृत्युके होनेपर तथा बालक, परिव्राजक, संन्यासीकी एवं किसी व्यक्तिकी दूर देशमें मृत्यु होनेपर तत्काल शुद्धि हो जाती है। वह शुद्धि भी चार प्रकारकी कही गयी है। गर्भस्रावमें भी शीघ्र ही शुद्धि होती है। अन्य अशौच पूरे समयपर ही दूर होते हैं। (वह सद्यः शौच) ब्राह्मणोंका एक अहोरात्रका, क्षत्रियोंका तीन दिनोंका, वैश्योंका छः दिनोंका एवं शूद्रोंका बारह दिनोंका होता है॥ १००—१०३॥ |
|---|---|
| दशद्वादशमासार्द्धमाससंख्यैर्दिनैश्च तैः।<br>स्वाः स्वाः कर्मक्रियाः कुर्युः सर्वे वर्णा यथाक्रमम्॥ १०४<br><br>प्रेतमुद्दिश्य कर्तव्यमेकोद्दिष्टं विधानतः।<br>सपिण्डीकरणं कार्यं प्रेते आवत्सरान्तरे॥ १०५<br><br>ततः पितृत्वमापन्ने दर्शपूर्णादिभिः शुभैः।<br>प्रीणनं तस्य कर्त्तव्यं यथा श्रुतिनिदर्शनात्॥ १०६<br><br>पितुरर्थं समुद्दिश्य भूमिदानादिकं स्वयम्।<br>कुर्यात्तेनास्य सुप्रीताः पितरो यान्ति राक्षस॥ १०७ | सभी वर्णोंके लोग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) क्रमशः दस, बारह, पंद्रह दिन एवं एक मासके अन्तरपर अपनी-अपनी क्रियाएँ करें। प्रेतके उद्देश्यसे विधिके अनुसार एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। मरनेके एक वर्ष बीत जानेपर मनुष्यको सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद प्रेतके पितर हो जानेपर अमावास्या और पूर्णिमा तिथिके दिन वेदविहित विधिसे उनका तर्पण करना चाहिये। राक्षस! पिताके उद्देश्यसे स्वयं भूमिदान आदि करे, जिससे पितृगण इसके ऊपर प्रसन्न हो जायँ॥ १०४-१०७॥ |
| यद् यदिष्टतमं किंचिद् यच्चास्य दयितं गृहे।<br>त्तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥ १०८<br><br>अध्येतव्या त्रयी नित्यं भाव्यं च विदुषा सदा।<br>धर्मतो धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि भक्तितः॥ १०९<br><br>यच्चापि कुर्वतो नात्मा जुगुप्सामेति राक्षस।<br>तत् कर्त्तव्यमशङ्केन यन्न गोप्यं महाजने॥ ११०<br><br>एवमाचरतो लोके पुरुषस्य गृहे सतः।<br>धर्मार्थकामसम्प्राप्तिं परत्रेह च शोभनम्॥ १११ | व्यक्तिकी जीवित-अवस्था में घरमें जो-जो पदार्थ उसको अत्यन्त अभिलषित एवं प्रिय रहा हो, उसकी अक्षयताकी कामना करते हुए गुणवान् पात्रको दान देना चाहिये। सदा त्रयी अर्थात् ऋक्, यजुः और सामवेदका अध्ययन करना चाहिये, विद्वान् बनना चाहिये, धर्मपूर्वक धनार्जन एवं यथाशक्ति यज्ञ करना चाहिये। राक्षस! मनुष्यको जिस कार्यके करनेसे कर्त्ताकी आत्मा निन्दित न हो एवं जो कार्य बड़े लोगोंसे छिपाने योग्य न हो ऐसा कार्य निःशङ्क (आसक्तिरहित) होकर करना चाहिये। इस प्रकारके आचरण करनेवाले पुरुषके गृहस्थ होनेपर भी उसे धर्म, अर्थ एवं कामकी प्राप्ति होती है तथा वह व्यक्ति इस लोक और परलोकमें कल्याणका भागी होता है॥ १०८—१११॥ |
| एष तूद्देशतः प्रोक्तो गृहस्थाश्रम उत्तमः।<br>वानप्रस्थाश्रमं धर्मं प्रवक्ष्यामोऽवधार्यताम्॥ ११२ | ऋषियोंने सुकेशिसे कहा— सुकेशि! अबतक हमने संक्षेपसे उत्तम गृहस्थाश्रमका वर्णन किया है। अब हम वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन करेंगे, उसे |