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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

६- नर-नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम-दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन

२८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५

| विशाखांशमनुराधा ज्येष्ठा भौमगृहं त्विदम्।<br>द्वितीयं वृश्चिको राशिर्मेढ्रं कालस्वरूपिणः॥ ३८<br><br>मूलं पूर्वोत्तरांशश्च देवाचार्यगृहं धनुः।<br>ऊरुयुगलमीशस्य अमरर्षे प्रगीयते॥ ३९<br><br>उत्तरांशास्त्रयो ऋक्षं श्रवणं मकरो मुने।<br>धनिष्ठार्थं शनिक्षेत्रं जानुनी परमेष्ठिनः॥ ४०<br><br>धनिष्ठार्धं शतभिषा प्रौष्ठपद्यांशकत्रयम्।<br>सौरेः सद्मापरमिदं कुम्भो जङ्घे च विश्रुते॥ ४१ | विशाखाका एक चरण, सम्पूर्ण अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्र, मङ्गलका द्वितीय क्षेत्र वृश्चिक राशि कालरूपी महादेवका उपस्थ है। सम्पूर्ण मूल, पूरा पूर्वाषाढ और उत्तराषाढकी प्रथम चरणवाली धनु राशि जो बृहस्पतिका क्षेत्र है, महेश्वरके दोनों ऊरु हैं। मुने! उत्तराषाढ़के शेष तीन चरण, सम्पूर्ण श्रवण नक्षत्र और धनिष्ठाके दो पूर्व चरणकी मकर राशि शनिका क्षेत्र और परमेष्ठी महेश्वरके दोनों घुटने हैं। धनिष्ठाके दो चरण, सम्पूर्ण शतभिष और पूर्वभाद्रपदके तीन चरणवाली कुम्भ राशि शनिका द्वितीय गृह और शिवकी दो जंघाएँ हैं॥ ३८—४१॥ |
| प्रौष्ठपद्यांशमेकं तु उत्तरा रेवती तथा।<br>द्वितीयं जीवसदनं मीनस्तु चरणावुभौ॥ ४२<br><br>एवं कृत्वा कालरूपं त्रिनेत्रो<br>यज्ञं क्रोधान्मार्गणैराजघान।<br>विद्धश्चासौ वेदनाबुद्धिमुक्तः<br>खे संतस्थौ तारकाभिश्चिताङ्गः॥ ४३ | पूर्वाभाद्रपदके शेष एक चरण, सम्पूर्ण उत्तरभाद्रपद और सम्पूर्ण रेवती नक्षत्रोंवाला बृहस्पतिका द्वितीय क्षेत्र एवं मीन राशि उनके दो चरण हैं। इस प्रकार कालरूप धारणकर शिवने क्रोधपूर्वक हरणिरूपधारी यज्ञको बाणोंसे मारा। उसके बाद बाणोंसे विद्ध होकर, किंतु वेदनाकी अनुभूति न करता हुआ, वह यज्ञ ताराओंसे घिरे शरीरवाला होकर आकाशमें स्थित हो गया॥ ४२-४३॥ |
| नारद उवाच<br>राशयो गदिता ब्रह्मंस्त्वया द्वादश वै मम।<br>तेषां विशेषतो ब्रूहि लक्षणानि स्वरूपतः॥ ४४ | नारदजीने कहा— ब्रह्मन्! आपने मुझसे बारहौं राशियोंका वर्णन किया। अब विशेषरूपसे उनके स्वरूपके अनुसार लक्षणोंको बतलायें॥ ४४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>स्वरूपं तव वक्ष्यामि राशीनां शृणु नारद।<br>यादृशा यत्र संचारा यस्मिन् स्थाने वसन्ति च॥ ४५<br><br>मेषः समानमूर्तिश्च अजाविकधनादिषु।<br>संचारस्थानमेवास्य धान्यरत्नाकरादिषु॥ ४६<br><br>नवशाद्वलसंछन्नवसुधायां च सर्वशः।<br>नित्यं चरति फुल्लेषु सरसां पुलिनेषु च॥ ४७<br><br>वृषः सदृशरूपो हि चरते गोकुलादिषु।<br>तस्याधिवासभूमिस्तु कृषीवलधराश्रयः॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आपको मैं राशियोंका स्वरूप बतलाता हूँ; सुनिये। वे जैसी हैं तथा जहाँ संचार और निवास करती हैं वह सभी वर्णित करता हूँ। मेष राशि भेड़के समान आकारवाली है। बकरी, भेड़, धन-धान्य एवं रत्नाकरादि इसके संचार-स्थान हैं तथा नवदूर्वासे आच्छादित समग्र पृथ्वी एवं पुष्पित वनस्पतियोंसे युक्त सरोवरोंके पुलिनोंमें यह नित्य संचरण करती है। वृषभके समान रूपयुक्त वृषराशि गोकुलादिमें विचरण करती है तथा कृषकोंकी भूमि इसका निवास-स्थान है॥ ४५—४८॥ |
| स्त्रीपुंसयोः समं रूपं शय्यासनपरिग्रहः।<br>वीणावाद्यधृङ् मिथुनं गीतनर्तकशिल्पिषु॥ ४९<br><br>स्थितः क्रीडारतिर्नित्यं विहारावनिरेस्य तु।<br>मिथुनं नाम विख्यातं राशिर्द्वैधात्मकः स्थितः॥ ५० | मिथुन राशि एक स्त्री और एक पुरुषके साथ-साथ रहनेके समान रूपवाली है। यह शय्या और आसनोंपर स्थित है। पुरुष-स्त्रीके हाथोंमें वीणा एवं (अन्य) वाद्य हैं। इस राशिका संचरण गानेवालों, नाचनेवालों एवं शिल्पियोंमें होता है। इस द्विखभाव राशिको मिथुन कहते हैं। इस राशिका निवास क्रीडास्थल एवं |

अध्याय ५ ] दक्ष-यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २९
कर्कः कुलीरेण समः सलिलस्थः प्रकीर्तितः ।
केदारवापीपुलिने विविक्तावनिरेव च ॥ ५१
सिंहस्तु पर्वतारण्यदुर्गकन्दरभूमिषु ।
वसते व्याधपल्लीषु गह्वरेषु गुहासु च ॥ ५२
ब्रीहिप्रदीपिककरा नावारूढा च कन्यका।
चरते स्त्रीरतिस्थाने वसते नड्वलेषु च ॥ ५३
तुलापाणिश्च पुरुषो वीथ्यापणविचारकः ।
नगराध्वानशालासु वसते तत्र नारद ॥ ५४
श्वभ्रवल्मीकसंचारी वृश्चिको वृश्चिकाकृतिः ।
विषगोमयकीटादिपाषाणादिषु संस्थितः ॥ ५५
धनुस्तुरङ्गजघनो दीप्यमानो धनुर्धरः।
वाजिशूरास्त्रविद्वीरः स्थायी गजरथादिषु ॥ ५६
मृगास्यो मकरो ब्रह्मन् वृषस्कन्धेक्षणाङ्गजः ।
मकरोऽसौ नदीचारी वसते च महोदधौ ॥ ५७
रिक्तकुम्भश्च पुरुषः स्कन्धधारी जलाप्लुतः ।
द्यूतशालाचरः कुम्भः स्थायी शौण्डिकसद्मसु ॥ ५८
मीनद्वयमथासक्तं मीनस्तीर्थाब्धिसंचरः ।
वसते पुण्यदेशेषु देवब्राह्मणसद्मसु ॥ ५९
लक्षणा गदितास्तुभ्यं मेषादीनां महामुने ।
न कस्यचित् त्वयाख्येयं गुह्यमेतत्पुरातनम् ॥ ६०
एतन् मया ते कथितं सुरर्षे
यथा त्रिनेत्रः प्रममाथ यज्ञम्।
पुण्यं पुराणं परमं पवित्र-
माख्यातवान्यापहरं शिवं च ॥ ६१
विहार-भूमियोंमें होता है। कर्क राशि केकड़ेके रूपके
समान रूपवाली है एवं जलमें रहनेवाली है। जलसे पूर्ण
क्यारी एवं नदी-तीर अथवा बालुका एवं एकान्त भूमि
इसके रहनेके स्थान हैं। सिंह राशिका निवास वन,
पर्वत, दुर्गमस्थान, कन्दरा, व्याधोंके स्थान, गुफा आदि
होता है ॥ ४९-५२॥
कन्या राशि अन्न एवं दीपक हाथमें लिये हुए है
तथा नौकापर आरूढ़ है। यह स्त्रियोंके रतिस्थान और
सरपत, कण्डा आदिमें विचरण करती है। नारद ! तुला
राशि हाथमें तुला लिये हुए पुरुषके रूपमें गलियों और
बाजारोंमें विचरण करती है तथा नगरों, मार्गों एवं भवनोंमें
निवास करती है। वृश्चिक राशिका आकार बिच्छू-जैसा
है। यह गड्ढे एवं वल्मीक आदिमें विचरण करती है।
यह विष, गोबर, कीट एवं पत्थर आदिमें भी निवास करती
है। धनु राशिकी जंघा घोड़ेके समान है। यह ज्योतिःस्वरूप
एवं धनुष लिये है। यह घुड़सवारी, वीरताके कार्य एवं
अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता तथा शूर है। गज एवं रथ आदिमें
इसका निवास होता है ॥ ५३-५६॥
ब्रह्मन् ! मकर राशिका मुख मृगके मुख-सदृश एवं
कंधे वृषके कंधोंके तुल्य तथा नेत्र हाथीके नेत्रके समान
हैं। यह राशि नदीमें विचरण करती तथा समुद्रमें विश्राम
करती है। कुम्भ राशि रिक्त घड़ेको कंधेपर लिये जलसे
भीगे पुरुषके समान है। इसका संचार-स्थान द्यूतगृह एवं
सुरालय (मद्यशाला) है। मीन राशि दो संयुक्त मछलियोंके
आकारवाली है। यह तीर्थस्थान एवं समुद्र-देशमें संचरण
करती है। इसका निवास पवित्र देशों, देवमन्दिरों एवं
ब्राह्मणोंके घरोंमें होता है। महामुने ! मैंने आपको मेषादि
राशियोंका लक्षण बतलाया। आप इस प्राचीन रहस्यको
किसी अपात्रसे न बतलाइयेगा। देवर्षे ! भगवान् शिवने
जिस प्रकार यज्ञको प्रमथित किया, उसका मैंने आपसे
वर्णन कर दिया। इस प्रकार मैंने आपको श्रेयस्कर,
परम पवित्र, पापहारी एवं कल्याणकारी अत्यन्त पुराना
पुराण-आख्यान सुनाया ॥ ५७-६१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥

३०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६

छठा अध्याय

नर-नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम-दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>हृद्भवो ब्रह्मणो योऽसौ धर्मो दिव्यवपुर्मुने।<br>दाक्षायणी तस्य भार्या तस्यामजनयत्सुतान्॥ १<br>हरिं कृष्णं च देवर्षे नारायणनरौ तथा।<br>योगाभ्यासरतो नित्यं हरिकृष्णौ बभूवतुः॥ २<br>नरनारायणौ चैव जगतो हितकाम्यया।<br>तप्येतां च तपः सौम्यौ पुराणावृषिसत्तमौ॥ ३<br>प्रालेयाद्रिं समागम्य तीर्थे बदरिकाश्रमे।<br>गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे॥ ४पुलस्त्यजी बोले— मुने! ब्रह्माजीके हृदयसे जो दिव्यदेहधारी धर्म प्रकट हुआ था, उसने दक्षकी पुत्री ‘मूर्ति’ नामकी भार्यासे हरि, कृष्ण, नर और नारायण नामक चार पुत्रोंको उत्पन्न किया।* देवर्षे! इनमें हरि और कृष्ण ये दो तो नित्य योगाभ्यासमें निरत हो गये और पुरातन ऋषि शान्तमना नर तथा नारायण संसारके कल्याणके लिये हिमालय पर्वतपर जाकर बदरिकाश्रम तीर्थमें गङ्गाके निर्मल तटपर (परब्रह्मका नाम ॐकारका जप करते हुए) तप करने लगे॥ १–४॥
नरनारायणाभ्यां च जगदेतच्चराचरम्।<br>तापितं तपसा ब्रह्मञ्छक्रः क्षोभं तदा ययौ॥ ५<br>संक्षुब्धस्तपसा ताभ्यां क्षोभणाय शतक्रतुः।<br>रम्भाद्याप्सरसः श्रेष्ठाः प्रेषयत्तन् महाश्रमम्॥ ६<br>कन्दर्पश्च सुदुर्धर्षश्चूताङ्कुरमहायुधः।<br>समं सहचरेणैव वसन्तेनाश्रमं गतः॥ ७<br>ततो माधवकन्दर्पौ ताश्चैवाप्सरसो वराः।<br>बदर्याश्रममागम्य विचिक्रीडुर्यथेच्छया॥ ८ब्रह्मन्! नर-नारायणकी दुष्कर तपस्यासे सारा स्थावर-जंगमात्मक यह जगत् परितप्त हो गया। इससे इन्द्र विक्षुब्ध हो उठे। उन दोनोंकी तपस्यासे अत्यन्त व्यग्र इन्द्रने उन्हें मोहित करनेके लिये रम्भा आदि श्रेष्ठ अप्सराओंको उनके विशाल आश्रममें भेजा। कामदेवके आयुधोंमें अशोक, आम्रादिकी मंजरियाँ विशेष प्रभावक हैं। इन्हें तथा अपने सहयोगी वसन्त-ऋतुको साथ लेकर वह भी उस आश्रममें गया। अब वे वसन्त, कामदेव तथा श्रेष्ठ अप्सराएँ—ये सब बदरिकाश्रममें जाकर निर्बाध क्रीड़ा करने लग गये॥ ५–८॥
ततो वसन्ते संप्राप्ते किंशुका ज्वलनप्रभाः।<br>निष्पत्राः सततं रेजुः शोभयन्तो धरातलम्॥ ९<br>शिशिरं नाम मातङ्गं विदार्य नखरैरिव।<br>वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने॥ १०<br>मया तुषारौघकरी निर्जितः स्वेन तेजसा।<br>तमेव हसतेत्युच्चैः वसन्तः कुन्दकुड्मलैः॥ ११<br>वनानि कर्णिकाराणां पुष्पितानि विरेजिरे।<br>यथा नरेन्द्रपुत्राणि कनकाभरणानि हि॥ १२तब वसन्त-ऋतुके आ जानेपर अग्नि-शिखाके सदृश कान्तिवाले पलाश पत्रहीन होकर रात-दिन पृथिवीकी शोभा बढ़ाते हुए सुशोभित होने लगे। मुने! वसन्तरूपी सिंह मानो पलाश-पुष्परूपी नखोंसे शिशिररूपी गजराजको विदीर्ण कर वहाँ अपना साम्राज्य जमा चुका था। वह सोचने लगा—मैंने अपने तेजसे शीतसमूहरूपी हाथीको जीत लिया है और वह कुन्दकी कलियोंके बहाने उसका उपहास भी करने लगा है। इधर सुवर्णके अलंकारोंसे मण्डित राजकुमारोंके समान पुष्पित कचनार-अमलतासके वन सुशोभित होने लगे॥ ९–१२॥

* यह बात भागवत २।७।६ आदिमें विशेष स्पष्टरूपसे कही गयी है। जिज्ञासु वहाँ भी देखें।

अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३१
तेषामनु तथा नीपाः किङ्करा इव रेजिरे।
स्वामिसंलब्धसंमाना भृत्या राजसुतानिव ॥ १३
रक्ताशोकवना भान्ति पुष्पिताः सहसोज्ज्वलाः।
भृत्या वसन्तनृपतेः संग्रामे सृक्प्लुता इव ॥ १४
मृगवृन्दाः पिञ्जरिता राजन्ते गहने वने।
पुलकाभिर्वृता यद्वत् सज्जनाः सुहृदागमे ॥ १५
मञ्जरीभिर्विराजन्ते नदीकूलेषु वेतसाः।
वक्तुकामा इवाङ्गुल्या कोऽस्माकं सदृशो नगः ॥ १६
रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका ।
नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना ॥ १७
नीलेन्दीवरनेत्रा च ब्रह्मन् बिल्वफलस्तनी ।
प्रफुल्लकुन्ददशना मञ्जरीकरशोभिता ॥ १८
बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्दुवारनखाद्भुता ।
पुंस्कोकिलस्वना दिव्या अङ्कोलवसना शुभा ॥ १९
बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वरनूपुरा ।
प्राग्वंशरसना ब्रह्मन् मत्तहंसगतिस्तथा ॥ २०
पुत्रजीवांशुका भृङ्गरोमराजिविराजिता ।
वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे ॥ २१
ततो नारायणो दृष्ट्वा आश्रमस्यानवद्यताम् ।
समीक्ष्य च दिशः सर्वास्ततोऽनङ्गमपश्यत ॥ २२
नारद उवाच
कोऽसावनङ्गो ब्रह्मर्षे तस्मिन् बदरिकाश्रमे ।
यं ददर्श जगन्नाथो देवो नारायणोऽव्ययः ॥ २३
पुलस्त्य उवाच
कन्दर्पो हर्षतनयो योऽसौ कामो निगद्यते ।
स शंकरेण संदग्धो ह्यनङ्गत्वमुपागतः ॥ २४
नारद उवाच
किमर्थं कामदेवोऽसौ देवदेवेन शंभुना ।
दग्धस्तु कारणे कस्मिन्नेतद्व्याख्यातुमर्हसि ॥ २५
पुलस्त्य उवाच
यदा दक्षसुता ब्रह्मन् सती याता यमक्षयम् ।
विनाश्य दक्षयज्ञं तं विचचार त्रिलोचनः ॥ २६
ततो वृषध्वजं दृष्ट्वा कन्दर्पः कुसुमायुधः ।
अपत्नीकं तदाऽस्त्रेण उन्मादेनाभ्यताडयत् ॥ २७
जैसे राजपुत्रोंके पीछे उनके द्वारा सम्मानित सेवक
खड़े रहते हैं, वैसे ही उन (वर्णित-वनों)-के पीछे-
पीछे कदम्बवृक्ष सुशोभित हो रहे थे। इसी प्रकार लाल
अशोक आदिके समूह भी सहसा पुष्पित एवं उद्भासित
हो सुशोभित होने लगे। लगता था मानो ऋतुराज
वसन्तके अनुयायी युद्धमें रक्तसे लथपथ हो रहे हों। घने
वनमें पीले रंगके हरिण इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे
जिस प्रकार सुहृद्के आनेसे सज्जन (आनन्दसे) पुलकित
होकर सुशोभित होते हैं। नदीके तटोंपर अपनी
मंजरियोंके द्वारा वेतस ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो
वे अंगुलियोंके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि हमारे
सदृश अन्य कौन वृक्ष है ॥ १३-१६ ॥
देवर्षे ! जो दिव्य पतली एवं यौवनसे भरी वसन्त-
लक्ष्मी उस बदरिकाश्रममें प्रकट हुई थी, उसके मानो
रक्ताशोक ही हाथ, पलाश ही चरण, नीला शोक केश-
पाश, विकसित कमल ही मुख और नीलकमल ही नेत्र
थे। उसके बिल्वफल मानों स्तन, कुन्दपुष्प दन्त, मञ्जरी
हाथ, दोपहरियाफूल अधर, सिन्दुवार नख, नर कोयलकी
काकली (बोली) स्वर, अंकोल वस्त्र, मयूरयूथ आभूषण,
सारस नूपुरस्वरूप और आश्रमके शिखर करधनी थे।
उसके मत्त हंस गति, पुत्रजीव ऊर्ध्व वस्त्र और भ्रमर
मानो रोमावलीरूपमें विराजित थे। तब नारायणने
आश्रमकी अद्भुत रमणीयता देखकर सभी दिशाओंकी
ओर देखा और फिर कामदेवको भी देखा ॥ १७-२२ ॥
नारदजीने पूछा- ब्रह्मर्षे ! जिसे अव्यय जगन्नाथ
नारायणने बदरिकाश्रममें देखा था, वह अनङ्ग (काम)
कौन है ? ॥ २३ ॥
पुलस्त्यजीने कहा- यह कंदर्प हर्षका पुत्र है,
इसे ही काम कहा जाता है। शंकर (-की नेत्राग्नि)-द्वारा
भस्म होकर वह 'अनङ्ग' हो गया ॥ २४ ॥
नारदजीने पूछा- पुलस्त्यजी ! आप यह बतलायें
कि देवाधिदेव शंकरने कामदेवको किस कारणसे
भस्म किया ? ॥ २५ ॥
पुलस्त्यजीने कहा- ब्रह्मन् ! दक्ष-पुत्री सतीके
प्राण-त्याग करनेपर शिवजी दक्ष-यज्ञका ध्वंस कर
(जहाँ-तहाँ) विचरण करने लगे। तब शिवजीको स्त्री-
रहित देखकर पुष्पास्त्रवाले कामदेवने उनपर अपना
'उन्मादन' नामक अस्त्र छोड़ा। इस उन्मादन-बाणसे

३२
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ६
ततो हरः शरेणाथ उन्मादेनाशु ताडितः।
विचचार मदोन्मत्तः काननानि सरांसि च ॥ २८
स्मरन् सतीं महादेवस्तथोन्मादेन ताडितः।
न शर्म लेभे देवर्षे बाणविद्ध इव द्विपः ॥ २९
ततः पपात देवेशः कालिन्दीसरितं मुने।
निमग्ने शंकरे आपो दग्धाः कृष्णत्वमागताः ॥ ३०
तदाप्रभृति कालिन्द्या भृङ्गाञ्जननिभं जलम्।
आस्यन्दत् पुण्यतीर्था सा केशपाशमिवावनेः ॥ ३१
ततो नदीषु पुण्यासु सरस्सु च नदेषु च।
पुलिनेषु च रम्येषु वापीषु नलिनीषु च ॥ ३२
पर्वतेषु च रम्येषु काननेषु च सानुषु।
विचरन् स्वेच्छया नैव शर्म लेभे महेश्वरः ॥ ३३
क्षणं गायति देवर्षे क्षणं रोदिति शंकरः।
क्षणं ध्यायति तन्वङ्गीं दक्षकन्यां मनोरमाम् ॥ ३४
ध्यात्वा क्षणं प्रस्वपिति क्षणं स्वप्नायते हरः।
स्वप्ने तथे॒दं गदति तां दृष्ट्वा दक्षकन्यकाम् ॥ ३५
निर्घृणे तिष्ठ किं मूढे त्यजसे मामनिन्दिते।
मुग्धे त्वया विरहितो दग्धोऽस्मि मदनाग्निना ॥ ३६
सति सत्यं प्रकुपिता मा कोपं कुरु सुन्दरि।
पादप्रणामावनतमभिभाषितुमर्हसि ॥ ३७
श्रूयसे दृश्यसे नित्यं स्पृश्यसे वन्द्यसे प्रिये।
आलिङ्ग्यसे च सततं किमर्थं नाभिभाषसे ॥ ३८
विलपन्तं जनं दृष्ट्वा कृपा कस्य न जायते।
विशेषतः पतिं बाले ननु त्वमतिनिर्घृणा ॥ ३९
त्वयोक्तानि वचांस्येवं पूर्वं मम कृशोदरि।
विना त्वया न जीवेयं तदसत्यं त्वया कृतम् ॥ ४०
एहोहि कामसंतप्तं परिष्वज सुलोचने।
नान्यथा नश्यते तापः सत्येनापि शपे प्रिये ॥ ४१
इत्थं विलप्य स्वप्नान्ते प्रतिबुद्धस्तु तत्क्षणात्।
उत्कूजति तथारण्ये मुक्तकण्ठं पुनः पुनः ॥ ४२
आहत होकर शिवजी उन्मत्त होकर वनों और सरोवरोंमें
घूमने लगे। देवर्षे ! बाणविद्ध गजके समान उन्मादसे
व्यथित महादेव सतीका स्मरण करते हुए बड़े अशान्त
हो रहे थे—उन्हें चैन नहीं था ॥ २६–२९ ॥
मुने ! उसके बाद शिवजी यमुना नदीमें कूद पड़े।
उनके जलमें निमज्जन करनेसे उस नदीका जल काला
हो गया। उस समयसे कालिन्दी नदीका जल भृंग
और अंजनके सदृश कृष्णवर्णका हो गया एवं वह पवित्र
तीर्थोंवाली नदी पृथ्वीके केशपाशके सदृश प्रवाहित
होने लगी। उसके बाद पवित्र नदियों, सरोवरों, नदों,
रमणीय नदी-तटों, वापियों, कमलवनों, पर्वतों, मनोहर
काननों तथा पर्वत-शृङ्गोंपर स्वेच्छापूर्वक विचरण
करते हुए भगवान् शिव कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त
कर सके ॥ ३०-३३।
देवर्षे ! वे कभी गाते, कभी रोते और कभी
कृशाङ्गी सुन्दरी सतीका ध्यान करते। ध्यान करके कभी
सोते और कभी स्वप्न देखने लगते थे; स्वप्नकालमें
सतीको देखकर वे इस प्रकार कहते थे—निर्दये ! रुको,
हे मूढे ! मुझे क्यों छोड़ रही हो ? हे अनिन्दिते ! हे मुग्धे !
तुम्हारे विरहमें मैं कामाग्निसे दग्ध हो रहा हूँ। हे सति !
क्या तुम वस्तुतः क्रुद्ध हो ? सुन्दरि ! क्रोध मत करो।
मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत होकर प्रणाम करता हूँ। तुम्हें
मेरे साथ बात तो करनी ही चाहिये ॥ ३४-३७॥
प्रिये ! मैं सतत तुम्हारी ध्वनि सुनता हूँ, तुम्हें
देखता हूँ, तुम्हारा स्पर्श करता हूँ, तुम्हारी वन्दना करता
हूँ और तुम्हारा परिष्वङ्ग करता हूँ। तुम मुझसे बात क्यों
नहीं कर रही हो ? बाले ! विलाप करनेवाले व्यक्तिको
देखकर किसे दया नहीं उत्पन्न होती ? विशेषतः अपने
पतिको विलाप करता देखकर तो किसे दया नहीं
आती ? निश्चय ही तुम अति निर्दयी हो । सूक्ष्मकटिवाली !
तुमने पहले मुझसे कहा था कि तुम्हारे बिना मैं जीवित
नहीं रहूँगी। उसे तुमने असत्य कर दिया। सुलोचने !
आओ, आओ; कामसन्तप्त मुझे आलिङ्गित करो। प्रिये !
मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि अन्य किसी
प्रकार मेरा ताप नहीं शान्त होगा ॥ ३८-४१॥
इस प्रकार वे विलाप कर स्वप्नके अन्तमें उठकर
वनमें बार-बार रोने लगे। इस प्रकार मुक्तकण्ठसे

गीताप्रेस, गोरखपुर


भगवान् वामन

पृष्ठ कूर्म

त्वचा वामन

अंगों पर अंकित पुराण-नाम:

  • मस्तक: ब्रह्म
  • कण्ठ: ब्रह्माण्ड, पद्म
  • वक्ष/हृदय: मत्स्य, स्कन्द, गरुड़
  • भुजाएँ: विष्णु, शिव
  • कटि/नाभि: नारद
  • ऊरु/वस्त्र: भागवत, भागवत, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त
  • चरण: लिङ्ग, मार्कण्डेय, अग्नि, वाराह

गीताप्रेस, गोरखपुर

वामनावतारी भगवान् विष्णु

दक्ष-यज्ञका विध्वंस

[चित्र: गीताप्रेस, गोरखपुर]