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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

४२- काम्यकवन तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन

१७०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो मुनेस्तदा क्षोभाद्रेतः स्कन्नं यदम्भसि।<br>तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः॥ ४<br><br>सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह।<br>तत्रर्षयः सप्त जाता विदुर्यान् मरुतां गणान्॥ ५<br><br>वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः।<br>वायुज्वालो वायुरेतो वायुचक्रश्च वीर्यवान्॥ ६<br><br>एते ह्यपत्यास्तस्यर्षेर्धारयन्ति चराचरम्।<br>पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति मे श्रुतम्॥ ७<br><br>क्षतः किल करे विप्रास्तस्य शाकरसोऽस्रवत्।<br>स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान्॥ ८स्नान करने लगीं। उसके बाद मुनिके मनमें विकृति हो गयी; फलतः उनका शुक्र जलमें स्खलित हो गया। उस रेतको उन महातपस्वीने उठाकर घड़ेमें रख लिया। वह कलशस्थ (रेत) सात भागोंमें विभक्त हो गया। उससे सात ऋषि उत्पन्न हुए, जिन्हें मरुद्गण कहा जाता है। (उनके नाम हैं—) वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, वायुज्वाल, वायुरेता एवं वीर्यवान् वायुचक्र। उन (मङ्कणक) ऋषिके ये सात पुत्र चराचरको धारण करते हैं। ब्राह्मणो! मैंने यह सुना है कि प्राचीन कालमें सिद्ध मङ्कणकके हाथमें कुशके अग्रभागसे छिद जानेके कारण घाव हो गया था; उससे शाकरस निकलने लगा। वे (अपने हाथसे निकलते हुए उस) शाकरसको देखकर प्रसन्न हो गये और नाचने लगे॥ २—८॥
ततः सर्वं प्रनृत्तं च स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>प्रनृत्तं च जगद् दृष्ट्वा तेजसा तस्य मोहितम्॥ ९<br><br>ब्रह्मादिभिः सुरैस्तत्र ऋषिभिश्च तपोधनैः।<br>विज्ञाप्तो वै महादेवो मुनेरर्थे द्विजोत्तमाः॥ १०<br><br>नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव हि॥ ११<br><br>सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत।<br>हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदं मुनिसत्तम।<br>तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम॥ १२इससे (उनके नृत्य करनेसे उनके साथ) सम्पूर्ण अचर-चर जगत् भी नाचने लगा। उनके तेजसे मोहित जगत्को नाचते देखकर ब्रह्मा आदि देव एवं तपस्वी ऋषियोंने मुनिके (हितके) लिये महादेवसे कहा—देव! आप ऐसा (कार्य) करें, जिससे ये नृत्य न करें (उन्हें नृत्यसे विरत करनेका उपाय करें)। उसके बाद हर्षसे अधिक मग्न उन मुनिको देखकर एवं देवोंके हितकी इच्छासे महादेवने कहा—मुनिसत्तम! ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप तो तपस्वी एवं धर्मपथमें स्थित रहनेवाले हैं। फिर आपके इस हर्षका क्या कारण है?॥ ९—१२॥
ऋषिरुवाच<br>किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम्।<br>यं दृष्ट्वाऽहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महताऽन्वितः॥ १३<br><br>तं प्रहस्याब्रवीद् देवो मुनिं रागेण मोहितम्।<br>अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीह प्रपश्यताम्॥ १४<br><br>एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं देवदेवो महाद्युतिः।<br>अङ्गुल्यग्रेण विप्रेन्द्राः स्वाङ्गुष्ठं ताडयद् भवः॥ १५<br><br>ततो भस्म क्षतात् तस्मान्निर्गतं हिमसंनिभम्।<br>तद् दृष्ट्वा व्रीडितो विप्रः पादयोः पतितोऽब्रवीत्॥ १६ऋषिने कहा— ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथसे शाकका रस चू रहा है; जिसे देखकर मैं अत्यन्त आनन्दमग्न होकर नृत्य कर रहा हूँ। महादेवजीने हँसकर आसक्तिसे मोहित हुए उन मुनिसे कहा—विप्रवर! मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा है। (किंतु) आप इधर देखें। विप्रेन्द्रो! श्रेष्ठ मुनिसे ऐसा कहकर देदीप्यमान भगवान् देवाधिदेव महादेवने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अपने अंगूठेको ठीक किया। उसके बाद उस चोटसे हिमतुल्य (स्वच्छ) भस्म निकलने लगा। उसे देखनेके बाद ब्राह्मण लज्जित होकर (महादेवके) चरणोंमें गिर पड़े और बोले—॥ १३—१६॥
नान्यं देवादहं मन्ये शूलपाणेर्महात्मनः।<br>चराचरस्य जगतो वरस्त्वमसि शूलधृक्॥ १७मैं महात्मा शूलपाणि महादेवके अतिरिक्त किसीको नहीं मानता। शूलपाणे! मेरी दृष्टिमें आप ही चराचर
अध्याय ३९ ]कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन१७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वदाश्रयाश्च दृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ।<br>पूर्वस्त्वमसि देवानां कर्त्ता कारयिता महत्॥ १८<br><br>त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्ते ह्यकुतोभयाः।<br>एवं स्तुत्वा महादेवमृषिः स प्रणतोऽब्रवीत्॥ १९<br><br>भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तपो मे न क्षयं व्रजेत्।<br>ततो देवः प्रसन्नात्मा तमृषिं वाक्यमब्रवीत्॥ २०समस्त संसारमें सर्वश्रेष्ठ हैं। अनघ! ब्रह्मा आदि देवता आपके ही आश्रित देखे जाते हैं। आप ही देवताओंमें प्रथम हैं और आप (सब कुछ) करने एवं करानेवाले तथा महत्वस्वरूप हैं। आपकी कृपासे सभी देवगण निर्भय होकर मोदमग्न होते रहते हैं। ऋषिने इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करनेके बाद उन्हें प्रणामकर कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मेरे तपका क्षय न हो। तब महादेवजीने प्रसन्न होकर उन ऋषिसे यह वचन कहा—॥ १७–२०॥
ईश्वर उवाच<br>तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा।<br>आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्द्धमहं सदा॥ २१<br>सप्तसारस्वते स्नात्वा यो मामर्चिष्यते नरः।<br>न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च॥ २२<br>सारस्वतं च तं लोकं गमिष्यति न संशयः।<br>शिवस्य च प्रसादेन प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३(सदाशिव) ईश्वरने कहा— विप्र! मेरी कृपासे तुम्हारी तपस्या सहस्रों प्रकारसे बढ़े। मैं तुम्हारे साथ इस आश्रममें सदा निवास करूँगा। जो मनुष्य इस सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेगा, उसे इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। वह निःसंदेह उस सारस्वतलोकको जायगा एवं (मुझ) शिवके अनुग्रहसे परम पदको प्राप्त करेगा॥ २१–२३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥


उनतालीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लोमहर्षण उवाच<br>ततस्त्वौशनसं तीर्थं गच्छेत्तु श्रद्धयान्वितः।<br>उशना यत्र संसिद्धो ग्रहत्वं च समाप्तवान्॥ १<br><br>तस्मिन् स्नात्वा विमुक्तस्तु पातकैर्जन्मसंभवैः।<br>ततो याति परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः॥ २<br><br>रहोदरो नाम मुनिर्यत्र मुक्तो बभूव ह।<br>महता शिरसा ग्रस्तस्तीर्थमाहात्म्यदर्शनात्॥ ३लोमहर्षणने कहा— (ऋषियो!) सप्तसारस्वतके बाद श्रद्धासे युक्त होकर 'औशनस'तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ शुक्र सिद्धि प्राप्तकर ग्रहत्वको प्राप्त हो गये। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य अनेक जन्मोंमें किये हुए पातकोंसे छूटकर परब्रह्मको प्राप्त करता है, जहाँसे पुनः (जन्म-मरणके चक्करमें) लौटना नहीं पड़ता। (वह तीर्थ ऐसा है) जहाँ तीर्थ-दर्शनकी महिमासे भारी सिरसे जकड़े हुए रहोदर नामके एक मुनि उससे मुक्त हो गये थे॥ १–३॥
ऋषय ऊचुः<br>कथं रहोदरो ग्रस्तः कथं मोक्षमवाप्तवान्।<br>तीर्थस्य तस्य माहात्म्यमिच्छामः श्रोतुमादरात्॥ ४ऋषियोंने कहा (पूछा)— रहोदर मुनि सिरसे ग्रस्त कैसे हो गये थे? और वे उससे मुक्त कैसे हुए? हमलोग उस तीर्थके माहात्म्यको आदरके साथ सुनना चाहते हैं (जिसकी महिमासे ऐसा हुआ।)॥ ४॥

१७२
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ३९
लोमहर्षण उवाच
पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना।
वसता द्विजशार्दूला राक्षसास्तत्र हिंसिताः॥ ५
तत्रैकस्य शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः।
क्षुरेण शितधारेण तत् पपात महावने॥ ६
रहोदरस्य तल्लग्नं जङ्घायां वै यदृच्छया।
वने विचरतस्तत्र अस्थि भित्त्वा विवेश ह॥ ७
स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह।
अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायधनानि च॥ ८
स पूतिना विस्रवता वेदनात्तो महामुनिः।
जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां यानि कानि च॥ ९
ततः स कथयामास ऋषीणां भावितात्मनाम्।
तेऽब्रुवन् ऋषयो विप्रं प्रयाह्यौशनसं प्रति॥ १०
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा जगाम स रहोदरः।
ततस्त्वौशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा॥ ११
तच्छिरश्शरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले द्विजाः।
ततः स विरजो भूत्वा पूतात्मा वीतकल्मषः॥ १२
आजगामाश्रमं प्रीतः कथयामास चाखिलम्।
ते श्रुत्वा ऋषयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्।
कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः॥ १३
तत्रापि सुमहत्तीर्थं विश्वामित्रस्य विश्रुतम्।
ब्राह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रो महामुनिः॥ १४
तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते ध्रुवम्।
ब्राह्मणस्तु विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात्॥ १५
ततः पृथूदकं गच्छेन्नियतो नियताशनः।
तत्र सिद्धस्तु ब्रह्मर्षी रुषङ्गुर्नाम नामतः॥ १६
जातिस्मरो रुषङ्गुस्तु गङ्गाद्वारे सदा स्थितः।
अन्तकालं ततो दृष्ट्वा पुत्रान् वचनमब्रवीत्।
इह श्रेयो न पश्यामि नयध्वं मां पृथूदकम्॥ १७
लोमहर्षणजी बोले- द्विजश्रेष्ठो ! प्राचीन कालमें
दण्डकारण्यमें रहते हुए रघुवंशी महात्मा रामचन्द्रने
बहुत-से राक्षसोंको मारा था। वहाँ एक दुष्टात्मा राक्षसका
सिर तीक्ष्णधारवाले क्षुर नामक बाणसे कटकर उस
महावनमें गिरा। (फिर वह) संयोगवश वनमें विचरण
करते हुए रहोदर मुनिकी जंघामें उनकी हड्डीको
तोड़कर उससे चिपट गया। महाप्राज्ञ वे ब्राह्मणदेव
(जंघेकी टूटी हड्डीमें) उस मस्तकके लग जानेके कारण
तीर्थों और देवालयोंमें नहीं जा पाते थे॥ ५-८॥
वे महामुनि दुर्गन्धपूर्ण पीब आदि बहनेके कारण
तथा वेदनासे अत्यन्त दुःखी रहते थे। पृथ्वीके जिन-जिन
तीर्थोंमें वे गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने पवित्रात्मा ऋषियोंसे
(अपना दुःख) कहा। ऋषियोंने उन विप्रसे कहा-
ब्राह्मणदेव ! आप औशनस (तीर्थ)-में जाइये। (लोमहर्षणने
कहा-) द्विजो ! उनका यह वचन सुनकर रहोदर मुनि
वहाँसे औशनसतीर्थमें गये। वहाँ उन्होंने तीर्थ-जलका
स्पर्श किया। उनके द्वारा (जलका) स्पर्श होते ही वह
मस्तक उनसे (जाँघ)-को छोड़कर जलमें गिर गया।
उसके बाद वे मुनि पापसे रहित निर्मल रजोगुणसे रहित
अतएव पवित्रात्मा होकर प्रसन्नतापूर्वक (अपने) आश्रममें
गये और उन्होंने (ऋषियोंसे) सारी आपबीती कह
सुनायी। फिर तो उन आये हुए सभी ऋषियोंने
औशनसतीर्थके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर उसका
नाम 'कपालमोचन' रख दिया॥ ९-१३॥
वहीं (कपालमोचन तीर्थमें ही) महामुनि विश्वामित्रका
बहुत बड़ा तीर्थ है, जहाँ विश्वामित्रने ब्राह्मणत्वको प्राप्त
किया था। उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको निश्चय
रूपसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है और वह ब्राह्मण
विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मके परम पदको प्राप्त करता है।
कपालमोचनके बाद पृथूदक नामके तीर्थमें जाय और
नियमपूर्वक नियत मात्रामें आहार करे। वहाँ रुषङ्गु
नामके ब्रह्मर्षिने सिद्धि पायी थी। सदा गङ्गाद्वारमें स्थित
रहते हुए पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण रखनेवाले रुषङ्गुने
(अपना) अन्तकाल आया देखकर (अपने) पुत्रोंसे कहा
कि यहाँ (मैं) अपना कल्याण नहीं देख रहा हूँ। मुझे पृथूदक