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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

४७- स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक, वेनके उद्धारके लिये पृथुका प्रयत्न और वेनकी शिव-स्तुति

१९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४४

चौवालीसवाँ अध्याय

ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान

सनत्कुमार उवाचसनत्कुमारने कहा— उन सभी ऋषियोंने ब्रह्माकी इस वाणीको सुनकर संसारके कल्याणार्थ पुनः उपाय पूछा॥ १॥
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते।<br>पुनरेव च पप्रच्छुर्जगतः श्रेयकारणम्॥ १
ब्रह्मोवाचब्रह्माने कहा— (उत्तर दिया) (आओ), हम सभी लोग हाथमें शूल धारण करनेवाले, त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरकी शरणमें चलें। तुम सब लोग उन्हीं देवदेवके प्रसादसे पहले-जैसे हो जाओगे। ब्रह्माके ऐसा कहनेपर वे लोग उनके साथ श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर चले गये और वहाँ उन लोगोंने उमा (पार्वती)-के साथ बैठे हुए शंकरका दर्शन किया। उसके बाद संसारके पितामह ब्रह्माने देवोंके इष्टदेव, तीनों लोकोंके स्वामी वरदानी भगवान् शंकरकी स्तुति करनी आरम्भ की—॥ २—४॥
गच्छामः शरणं देवं शूलपाणिं त्रिलोचनम्।<br>प्रसादाद् देवदेवस्य भविष्यथ यथा पुरा॥ २
इत्युक्ता ब्रह्मणा सार्धं कैलासं गिरिमुत्तमम्।<br>ददृशुस्ते समासीनमुमया सहितं हरम्॥ ३
ततः स्तोतुं समारब्धो ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>देवाधिदेवं वरदं त्रैलोक्यस्य प्रभुं शिवम्॥ ४
ब्रह्मोवाचपिनाक धारण करनेवाले वरदानी अनन्त महादेव! स्थाणुस्वरूप परमात्मदेव! आपको मेरा नमस्कार है। भुवनोंके स्वामी भुवनेश्वर तारक भगवान्! आपको सदा नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप ज्ञान देनेवाले अद्वितीय देव हैं। आप कमलगर्भ एवं पद्मेश हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। (प्रचण्ड) घोर-स्वरूप एवं शान्तिमूर्ति! आपको नमस्कार है। विश्वके शासकदेव! आपको नमस्कार है। सुरनायक! आपको नमस्कार है। शूलपाणि शंकर! आपको नमस्कार है। (संसारके रचनेवाले) विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है॥ ५—८॥
अनन्ताय नमस्तुभ्यं वरदाय पिनाकिने।<br>महादेवाय देवाय स्थाणवे परमात्मने॥ ५
नमोऽस्तु भुवनेशाय तुभ्यं तारक सर्वदा।<br>ज्ञानानां दायको देवस्त्वमेकः पुरुषोत्तमः॥ ६
नमस्ते पद्मगर्भाय पद्मेशाय नमो नमः।<br>घोरशान्तिस्वरूपाय चण्डक्रोध नमोऽस्तु ते॥ ७
नमस्ते देव विश्वेश नमस्ते सुरनायक।<br>शूलपाणे नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन॥ ८
एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा ऋषिभिस्तदा।<br>उवाच मा भैर्व्रजत लिङ्गं वो भविता पुनः॥ ९ऋषियों और ब्रह्माने जब इस प्रकार शंकरकी स्तुति की तब महादेव शङ्करने कहा—भय मत करो; जाओ (तुमलोगोंके कल्याणार्थ) लिङ्ग फिर भी (उत्पन्न) हो जायगा। मेरे वचनका शीघ्र पालन करो। लिङ्गकी प्रतिष्ठा कर देनेपर निस्सन्देह मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी। जो व्यक्ति भक्तिके साथ मेरे लिङ्गकी पूजा करेंगे उनके लिये कोई भी पदार्थ कभी दुर्लभ न होगा।
क्रियतां मद्वचः शीघ्रं येन मे प्रीतिरुत्तमा।<br>भविष्यति प्रतिष्ठायां लिङ्गस्यात्र न संशयः॥ १०
ये लिङ्गं पूजयिष्यन्ति मामकं भक्तिमाश्रिताः।<br>न तेषां दुर्लभं किंचिद् भविष्यति कदाचन॥ ११
अध्याय ४४ ]ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन१९१

| सर्वेषामेव पापानां कृतानामपि जानता।<br>शुद्ध्यते लिङ्गपूजायां नात्र कार्या विचारणा॥ १२ | जानकर किये गये समस्त पापोंकी भी शुद्धि लिङ्गकी पूजा करनेसे हो जाती है; इसमें किसी प्रकारका अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ९—१२॥ |
| युष्माभिः पतितं लिङ्गं सारयित्वा महत्सरः।<br>सांनिहत्यं तु विख्यातं तस्मिञ्शीघ्रं प्रतिष्ठितम्॥ १३<br><br>यथाभिलषितं कामं ततः प्राप्स्यथ ब्राह्मणाः।<br>स्थाणुर्नाम्ना हि लोकेषु पूजनीयो दिवौकसाम्॥ १४<br><br>स्थाण्वीश्वरे स्थितो यस्मात्स्थाण्वीश्वरस्ततः स्मृतः।<br>ये स्मरन्ति सदा स्थाणुं ते मुक्ताः सर्वकिल्बिषैः॥ १५<br><br>भविष्यन्ति शुद्धदेहा दर्शनान्मोक्षगामिनः।<br>इत्येवमुक्ता देवेन ऋषयो ब्रह्मणा सह॥ १६<br><br>तस्माद् दारुवनाल्लिङ्गं नेतुं समुपचक्रमुः।<br>न तं चालयितुं शक्तास्ते देवा ऋषिभिः सह॥ १७ | तुमलोगोंने लिङ्गको गिरा दिया है, इसलिये शीघ्र ही उसे उठाकर प्रसिद्ध महान् सांनिहित्य-सरोवरमें स्थापित करो। ब्राह्मणो! ऐसा करनेसे तुमलोग अपने इच्छानुकूल मनोरथोंको प्राप्त करोगे। सारे संसारमें उस लिङ्गकी प्रसिद्धि स्थाणु नामसे होगी। देवताओंद्वारा (भी) वह पूज्य होगा। वह लिङ्ग स्थाण्वीश्वरमें स्थित रहनेके कारण स्थाण्वीश्वर नामसे स्मरण किया जायगा। जो स्थाण्वीश्वरको सदा स्मरण करेंगे, उनके सारे पाप कट जायँगे और वे पवित्र-देह होकर मोक्षकी प्राप्ति करेंगे। जब शंकरने ऐसा कहा तब ब्रह्माके सहित ऋषिलोग लिङ्गको उस दारुवनसे ले जानेका उद्योग करने लगे। किंतु ऋषियोंसहित वे सभी देवगण उसे हिलाने-डुलानेमें समर्थ न हो सके॥ १३—१७॥ |
| श्रमेण महता युक्ता ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>तेषां श्रमाभितप्तानामिदं ब्रह्माऽब्रवीद् वचः॥ १८<br><br>किं वा श्रमेण महता न यूयं वहनक्षमाः।<br>स्वेच्छया पतितं लिङ्गं देवदेवेन शूलिना॥ १९<br><br>तस्मात् तमेव शरणं यास्यामः सहिताः सुराः।<br>प्रसन्नश्च महादेवः स्वयमेव नयिष्यति॥ २०<br><br>इत्येवमुक्ता ऋषयो देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>कैलासं गिरिमासेदू रुद्रदर्शनकाङ्क्षिणः॥ २१ | (फिर) वे बहुत परिश्रम करके ब्रह्माकी शरणमें गये। ब्रह्माने परिश्रमसे श्रान्त-क्लान्त (संतप्त) हुए उन लोगोंसे यह वचन कहा—देवताओ! अत्यन्त कठोर परिश्रम करनेसे क्या लाभ? तुमलोग इसे उठानेमें समर्थ नहीं हो। देवाधिदेव भगवान् शंकरने अपनी इच्छासे इस लिङ्गको गिराया है। अतः हे देवो! हम सभी एक साथ उन्हीं भगवान् शंकरकी शरणमें चलें। महादेव सन्तुष्ट होकर अपने-आप ही (लिङ्गको) ले जायँगे। इस प्रकार ब्रह्माके कहनेपर सभी ऋषि और देवता ब्रह्माके साथ शंकरजीके दर्शनकी अभिलाषासे कैलासपर्वतपर पहुँचे॥ १८—२१॥ |
| न च पश्यन्ति तं देवं ततश्चिन्तासमन्विताः।<br>ब्रह्माणमूचुर्मुनयः क्व स देवो महेश्वरः॥ २२<br><br>ततो ब्रह्मा चिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा देवं महेश्वरम्।<br>हस्तिरूपेण तिष्ठन्तं मुनिभिर्मानसैः स्तुतम्॥ २३<br><br>अथ ते ऋषयः सर्वे देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>गता महत्सरः पुण्यं यत्र देवः स्वयं स्थितः॥ २४<br><br>न च पश्यन्ति तं देवमन्विष्यन्तस्ततस्ततः।<br>ततश्चिन्तान्विता देवा ब्रह्मणा सहिताः स्थिताः॥ २५ | वहाँ उन लोगोंने शंकरजीको नहीं देखा। तब वे चिन्तित हो गये। फिर उन्होंने ब्रह्माजीसे पूछा (कि ब्रह्मन्) वे महेश्वरदेव कहाँ हैं? उसके बाद ब्रह्माने चिरकालतक ध्यान लगाया और देखा कि मुनियोंके अन्तः-करणसे स्तुत महेश्वर देव हाथीके आकारमें स्थित हैं। उसके पश्चात् वे ऋषि और ब्रह्माके सहित सभी देवता उस पावन महान् सरोवरपर गये जहाँ भगवान् शंकर स्वयं उपस्थित थे। वे लोग वहाँ इधर-उधर चारों ओर उन्हें ढूँढ़ने लगे, फिर भी शंकरजीका दर्शन न पा सके। ब्रह्माके साथ दर्शन न पानेके कारण सभी देवता चिन्तित |