वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८- महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति
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श्रीवामनपुराण
[ अध्याय १६
यदा त्वाषाढी संयाति व्रजते चोत्तरायणम्।
तदा स्वपिति देवेशो भोगिभोगे श्रियः पतिः ॥ ३
प्रतिसुप्ते विभौ तस्मिन् देवगन्धर्वगुह्यकाः।
देवानां मातरश्चापि प्रसुप्ताश्चाप्यनुक्रमात् ॥ ४
नारद उवाच
कथयस्व सुरादीनां शयने विधिमुत्तमम्।
सर्वमनुक्रमेणैव पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ५
पुलस्त्य उवाच
मिथुनाभिगते सूर्ये शुक्लपक्षे तपोधन।
एकादश्यां जगत्स्वामी शयनं परिकल्पयेत् ॥ ६
शेषाहिभोगपर्यङ्कं कृत्वा सम्पूज्य केशवम्।
कृत्वोपवीतकं चैव सम्यक्सम्पूज्य वै द्विजान् ॥ ७
अनुज्ञां ब्राह्मणेभ्यश्च द्वादश्यां प्रयतः शुचिः।
लब्ध्वा पीताम्बरधरः स्वस्तिनिद्रां समानयेत् ॥ ८
त्रयोदश्यां ततः कामः स्वपते शयने शुभे।
कदम्बानां सुगन्धानां कुसुमैः परिकल्पिते ॥ ९
चतुर्दश्यां ततो यक्षाः स्वपन्ति सुखशीतले।
सौवर्णपङ्कजकृते सुखास्तीर्णोपधानके ॥ १०
पौर्णमास्यामुमानाथः स्वपते चर्मसंस्तरे।
वैयाघ्रे च जटाभारं समुद्ग्रन्थ्यान्यचर्मणा ॥ ११
ततो दिवाकरो राशिं संप्रयाति च कर्कटम्।
ततोऽमराणां रजनी भवति दक्षिणायनम् ॥ १२
ब्रह्मा प्रतिपदि तथा नीलोत्पलमयेऽनघ।
तल्पे स्वपिति लोकानां दर्शयन् मार्गमुत्तमम् ॥ १३
विश्वकर्मा द्वितीयायां तृतीयायां गिरेः सुता।
विनायकश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यामपि धर्मराट् ॥ १४
षष्ठ्यां स्कन्दः प्रस्वपिति सप्तम्यां भगवान् रविः।
कात्यायनी तथाष्टम्यां नवम्यां कमलालया ॥ १५
दशम्यां भुजगेन्द्राश्च स्वपन्ते वायुभोजनाः।
एकादश्यां तु कृष्णायां साध्या ब्रह्मन् स्वपन्ति च ॥ १६
एष क्रमस्ते गदितो नभादौ स्वप्ने मुने।
स्वपत्सु तत्र देवेषु प्रावृट्कालः समाययौ ॥ १७
जब आषाढ़ी पूर्णिमा बीत जाती है एवं उत्तरायण
चलता रहता है, तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु भोगिभोग
(शेषशय्या) - पर सो जाते हैं। उन विष्णुके सो जानेपर
देवता, गन्धर्व, गुह्यक एवं देवमाताएँ भी क्रमशः सो
जाती हैं ॥ २-४॥
नारदने कहा - जनार्दनसे लेकर अनुक्रमसे देवता
आदिके शयनकी सब उत्तम विधि मुझे बतलाइये ॥ ५ ॥
पुलस्त्यजी बोले- तपोधन नारदजी ! आषाढ़के
शुक्लपक्षमें सूर्यके मिथुनराशिमें चले जानेपर एकादशी
तिथिके दिन जगदीश्वर विष्णुकी शय्याकी परिकल्पना
करनी चाहिये। उस शय्यापर शेषनागके शरीर और
फणकी रचना कर यज्ञोपवीतयुक्त श्रीकेशव (-की
प्रतिमा)-की पूजा कर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे संयम एवं
पवित्रतापूर्वक रहते हुए स्वयं भी पीताम्बर धारण कर
द्वादशी तिथिमें सुखपूर्वक उन्हें सुलाना चाहिये ॥ ६-८ ॥
इसके बाद त्रयोदशी तिथिमें सुगन्धित कदम्बके
पुष्पोंसे बनी पवित्र शय्यापर कामदेव शयन करते हैं। फिर
चतुर्दशीको सुशीतल स्वर्णपङ्कजसे निर्मित सुखदायकरूपमें
बिछाये गये एवं तकियेवाली शय्यापर यक्षलोग शयन
करते हैं। पूर्णमासी तिथिको चर्मवस्त्र धारणकर उमानाथ
शंकर एक-दूसरे चर्मद्वारा जटाभार बाँधकर व्याघ्र-चर्मकी
शय्यापर सोते हैं। उसके बाद जब सूर्य कर्कराशिमें गमन
करते हैं तब देवताओंके लिये रात्रिस्वरूप दक्षिणायनका
आरम्भ हो जाता है ॥ ९-१२॥
निष्पाप नारदजी ! लोगोंको उत्तम मार्ग दिखलाते
हुए ब्रह्माजी (श्रावण कृष्ण) प्रतिपदाको नीले कमलकी
शय्यापर सो जाते हैं। विश्वकर्मा द्वितीयाको, पार्वतीजी
तृतीयाको, गणेशजी चतुर्थीको, धर्मराज पञ्चमीको,
कार्तिकेयजी षष्ठीको, सूर्य भगवान् सप्तमीको, दुर्गादेवी
अष्टमीको, लक्ष्मीजी नवमीको, वायु पीनेवाले श्रेष्ठ सर्प
दशमीको और साध्यगण कृष्णपक्षकी एकादशीको सो
जाते हैं ॥ १३-१६॥
मुने! इस प्रकार हमने तुम्हें श्रावण आदिके
महीनोंमें देवताओंके सोनेका क्रम बतलाया। देवोंके
सो जानेपर वर्षाकालका आगमन हो जाता है।
अध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८७
कङ्काः समं बलाकाभिरारोहन्ति नभोत्तमान्।
ऋषिश्रेष्ठ ! (तब) बलाकाओं (बगुलोंके झुंडों)-के साथ
वायसाश्चापि कुर्वन्ति नीडानि ऋषिपूंगव ।
कङ्क पक्षी ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ जाते हैं तथा कौए घोंसले
वायसाश्च स्वपन्त्येते ऋतौ गर्भभरालसाः ॥ १८
बनाने लगते हैं। इस ऋतुमें मादा कौएँ गर्भभारके कारण
यस्यां तिथ्यां प्रस्वपिति विश्वकर्मा प्रजापतिः।
आलस्यसे सोती हैं। प्रजापति विश्वकर्मा जिस द्वितीया
तिथिमें सोते हैं, वह कल्याणकारिणी पवित्र तिथि अशून्यशयना
द्वितीया सा शुभा पुण्या अशून्यशयनोदिता ॥ १९
द्वितीया तिथि कही जाती है। मुने ! उस तिथिमें लक्ष्मीके
तस्यां तिथावर्च्य हरिं श्रीवत्साङ्कं चतुर्भुजम् ।
साथ पर्यङ्कस्थ श्रीवत्स नामक चिह्न धारण करनेवाले
पर्यङ्कस्थं समं लक्ष्म्या गन्धपुष्पादिभिर्मुने ॥ २०
चतुर्भुज विष्णुभगवान्की गन्ध-पुष्पादिके द्वारा पूजाके
ततो देवाय शय्यायां फलानि प्रक्षिपेत् क्रमात्।
हेतु शय्यापर क्रमशः फल तथा सुगन्ध-द्रव्य निवेदित
सुरभीणि निवेद्येत्थं विज्ञाप्यो मधुसूदनः ॥ २१
कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे कि— ॥ १७–२१ ॥
यथा हि लक्ष्म्या न वियुज्यसे त्वं
हे त्रिविक्रम ! हे अनन्त !! हे जगन्निवास !!! जिस
त्रिविक्रमानन्त जगन्निवास।
प्रकार आप लक्ष्मीसे कभी अलग नहीं होते, उसी
तथा त्वशून्यं शयनं सदैव
प्रकार आपकी कृपासे हमारी शय्या भी कभी शून्य न
अस्माकमेवेह तव प्रसादात् ॥ २२
हो। हे देव! हे वरद! हे अच्युत! हे ईश ! हे
यथा त्वशून्यं तव देव तल्पं
अमितवीर्यशाली विष्णो ! आपकी शय्या लक्ष्मीसे शून्य
समं हि लक्ष्म्या वरदाच्युतेश।
नहीं होती, उसी सत्यके प्रभावसे हमारी भी गृहस्थीके
सत्येन तेनामितवीर्य विष्णो
नाशका अवसर न आवे—पत्नीका वियोग न हो। देवर्षे !
गार्हस्थ्यनाशो मम नास्तु देव ॥ २३
इस प्रकार स्तुति करनेके बाद भगवान् विष्णुको
इत्युच्चार्य प्रणम्येशं प्रसाद्य च पुनः पुनः।
प्रणामद्वारा बार-बार प्रसन्नकर रात्रिमें तेल एवं नमकसे
नक्तं भुञ्जीत देवर्षे तैलक्षारविवर्जितम् ॥ २४
रहित भोजन करे। दूसरे दिन बुद्धिमान् व्यक्ति, भगवान्
द्वितीयेऽह्नि द्विजाग्र्याय फलान् दद्याद् विचक्षणः।
लक्ष्मीधर मेरे ऊपर प्रसन्न हों-यह वाक्य उच्चारण
लक्ष्मीधरः प्रीयतां मे इत्युच्चार्य निवेदयेत् ॥ २५
कर श्रेष्ठ ब्राह्मणको फलोंका दान दे ॥ २२-२५ ॥
अनेन तु विधानेन चातुर्मास्यव्रतं चरेत्।
जबतक सूर्य वृश्चिकराशिपर रहते हैं, तबतक इसी
यावद् वृश्चिकराशिस्थः प्रतिभाति दिवाकरः ॥ २६
विधिसे चातुर्मास्य-व्रतका पालन किया जाना चाहिये।
ततो विबुध्यन्ति सुराः क्रमशः क्रमशो मुने।
मुने ! उसके बाद क्रमशः देवता जागते हैं। सूर्यके तुलाराशिमें
स्थित होनेपर विष्णु जाग जाते हैं। उसके बाद काम और
तुलास्थेऽर्के हरिः कामः शिवः पश्चाद्विबुध्यते ॥ २७
शिव जागते हैं। उसके पश्चात् द्वितीयाके दिन अपने
तत्र दानं द्वितीयायां मूर्तिर्लक्ष्मीधरस्य तु।
विभवके अनुसार बिछौनेवाली शय्याके साथ लक्ष्मीधरकी
सशय्यास्तरणोपेता यथा विभवमात्मनः ॥ २८
मूर्तिका दान करे। महामुने ! इस प्रकार मैंने आपको यह
एष व्रतस्तु प्रथमः प्रोक्तस्तव महामुने ।
प्रथम व्रत बतलाया, जिसका आचरण करनेपर इस
यस्मिंश्चीर्णे वियोगस्तु न भवेदिह कस्यचित् ॥ २९
संसारमें किसीको वियोग नहीं होता ॥ २६-२९ ॥
नभस्ये मासि च तथा या स्यात्कृष्णाष्टमी शुभा।
इसी प्रकार भाद्रपदमासमें मृगशिरा नक्षत्रसे
युक्ता मृगशिरेणैव सा तु कालाष्टमी स्मृता ॥ ३०
युक्त जो पवित्र कृष्णाष्टमी होती है उसे कालाष्टमी
माना गया है। उस तिथिमें भगवान् शंकर समस्त लिङ्गोंमें
तस्यां सर्वेषु लिङ्गेषु तिथौ स्वपिति शंकरः।
सोते एवं उनके संनिधानमें निवास करते हैं। इस
वसते संनिधाने तु तत्र पूजाऽक्षया स्मृता ॥ ३१
अवसरपर की गयी शंकरजीकी पूजा अक्षय मानी गयी है।
८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्नायीत वै विद्वान् गोमूत्रेण जलेन च।<br>स्नातः संपूजयेत् पुष्पैर्धत्तूरस्य त्रिलोचनम्॥ ३२<br><br>धूपं केसरनिर्यासं नैवेद्यं मधुसर्पिषी।<br>प्रीयतां मे विरूपाक्षस्त्वित्युच्चार्य च दक्षिणाम्।<br>विप्राय दद्यान्नैवेद्यं सहिरणयं द्विजोत्तम॥ ३३ | उस तिथिमें विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि गोमूत्र और जलसे स्नान करे। स्नानके बाद धतूरेके पुष्पोंसे शंकरकी पूजा करे। द्विजोत्तम! केसरके गोंदका धूप तथा मधु एवं घृतका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद 'विरूपाक्ष (त्रिनेत्र) मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहकर ब्राह्मणको दक्षिणा तथा सुवर्णके साथ नैवेद्य प्रदान करे॥ ३०—३३॥ |
| तद्वदाश्वयुजे मासि उपवासी जितेन्द्रियः।<br>नवम्यां गोमयस्नानं कुर्यात्पूजां तु पङ्कजैः।<br>धूपयेत् सर्जनिर्यासं नैवेद्यं मधुमोदकैः॥ ३४<br><br>कृतोपवासस्त्वष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>प्रीयतां मे हिरण्याक्षो दक्षिणा सतिला स्मृता॥ ३५<br><br>कार्तिके पयसा स्नानं करवीरेण चार्चनम्।<br>धूपं श्रीवासनिर्र्यासं नैवेद्यं मधुपायसम्॥ ३६<br><br>सनैवेद्यं च रजतं दातव्यं दानमग्रजे।<br>प्रीयतां भगवान् स्थाणुरिति वाच्यमनिष्ठुरम्॥ ३७ | इसी प्रकार आश्विनमासमें नवमी तिथिको इन्द्रियोंको वशमें करके उपवास रहकर गोबरसे स्नान करनेके पश्चात् कमलोंसे पूजन करे तथा सर्ज वृक्षके निर्यास (गोंद)-का धूप एवं मधु और मोदकका नैवेद्य अर्पित करे। अष्टमीको उपवास करके नवमीको स्नान करनेके बाद 'हिरण्याक्ष मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए तिलके साथ दक्षिणा प्रदान करे। कार्तिक (मास)-में दुग्धस्नान तथा कनेरके पुष्पसे पूजा करे और सरल वृक्षकी गोंदका धूप तथा मधु एवं खीर नैवेद्य अर्पितकर विनयपूर्वक 'भगवान् शिव मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह उच्चारण करते हुए ब्राह्मणको नैवेद्यके साथ रजतका दान करे॥ ३४—३७॥ |
| कृत्वोपवासमष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>मासि मार्गशिरे स्नानं दध्नार्चा भद्रया स्मृता॥ ३८<br><br>धूपं श्रीवृक्षनिर्यासं नैवेद्यं मधुनोदनम्।<br>संनिवेद्या रक्तशालिर्दक्षिणा परिकीर्तिता।<br>नमोऽस्तु प्रीयतां शर्वस्त्विति वाच्यं च पण्डितैः॥ ३९<br><br>पौषे स्नानं च हविषा पूजा स्यात्तगरैः शुभैः।<br>धूपो मधुकनिर्यासो नैवेद्यं मधु शष्कुली॥ ४०<br><br>समुद्गा दक्षिणा प्रोक्ता प्रीणनाय जगद्गुरोः।<br>वाच्यं नमस्ते देवेश त्र्यम्बकेति प्रकीर्तयेत्॥ ४१ | मार्गशीर्ष (अगहन) मासमें अष्टमी तिथिको उपवास करके नवमी तिथिमें दधिसे स्नान करना चाहिये। इस समय 'भद्रा' ओषधिके द्वारा पूजाका विधान है। पण्डित व्यक्ति श्रीवृक्षके गोंदका धूप एवं मधु और ओदनका नैवेद्य देकर 'शर्व (शिवजी)-को नमस्कार है, वे मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए रक्तशालि (लाल चावल)-की दक्षिणा प्रदान करे—ऐसा कहा गया है। पौषमासमें घृतका स्नान तथा सुन्दर तगर-पुष्पोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। फिर महुएके वृक्षकी गोंदका धूप देकर मधु एवं पूड़ीका नैवेद्य अर्पित करे और 'हे देवेश त्र्यम्बक! आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए शंकरजीकी प्रसन्नताके लिये मूँगसहित दक्षिणा प्रदान करे॥ ३८—४१॥ |
| माघे कुशोदकस्नानं मृगमदेन चार्चनम्।<br>धूपः कदम्बनिर्यासो नैवेद्यं सतिलोदनम्॥ ४२<br><br>पयोभक्तं सनैवेद्यं सरुक्मं प्रतिपादयेत्।<br>प्रीयतां मे महादेव उमापतिरितीरयेत्॥ ४३ | माघमासमें कुशके जलसे स्नान करे और मृगमद (कस्तूरीसे) अर्चन करे। उसके बाद कदम्ब-वृक्षके गोंदका धूप देकर तिल एवं ओदन (भात)-का नैवेद्य अर्पित करनेके पश्चात् 'महादेव उमापति मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए सुवर्णके साथ दूध एवं भातकी दक्षिणा |
अध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८९
एवमेव समुद्दिष्टं षड्भिर्मासैस्तु पारणम्।
पारणान्ते त्रिनेत्रस्य स्नपनं कारयेत्क्रमात्॥ ४४
गोरोचनायाः सहिता गुडेन
देवं समालभ्य च पूजयेत।
प्रीयस्व दीनोऽस्मि भवन्तमीश
मच्छोकनाशं कुरुष्व योग्यम्॥ ४५
ततस्तु फाल्गुने मासि कृष्णाष्टम्यां यतव्रत।
उपवासं समुदितं कर्तव्यं द्विजसत्तम॥ ४६
द्वितीयेऽह्नि ततः स्नानं पञ्चगव्येन कारयेत्।
पूजयेत्कुन्दकुसुमैर्धूपयेच्चन्दनं त्वपि॥ ४७
नैवेद्यं सघृतं दद्यात् ताम्रपात्रे गुडोदनम्।
दक्षिणां च द्विजातिभ्यो नैवेद्यसहितां मुने।
वासोयुगं प्रीणयेच्च रुद्रमुच्चार्य नामतः॥ ४८
चैत्रे चोदुम्बरफलैः स्नानं मन्दारकार्चनम्।
गुग्गुलं महिषाख्यं च घृताक्तं धूपयेद् बुधः॥ ४९
समोदकं तथा सर्पिः प्रीणनं विनिवेदयेत्।
दक्षिणा च सनैवेद्यं मृगाजिनमुदाहृतम्॥ ५०
नाट्येश्वर नमस्तेऽस्तु इदमुच्चार्य नारद।
प्रीणनं देवनाथाय कुर्याच्छ्रद्धासमन्वितः॥ ५१
वैशाखे स्नानमुदितं सुगन्धकुसुमाम्भसा।
पूजनं शंकरस्योक्तं चूतसञ्जरिभिर्विभो॥ ५२
धूपं सर्जाज्ययुक्तं च नैवेद्यं सफलं घृतम्।
नामजप्यमपीशस्य कालघ्नेति विपश्चिता॥ ५३
जलकुम्भान् सनैवेद्यान् ब्राह्मणाय निवेदयेत्।
सोपवीतान् सहानाद्यांस्तच्चित्तैस्तत्परायणैः॥ ५४
ज्येष्ठे स्नानं चामलकैः पूजार्ककुसुमैस्तथा।
धूपयेत्तत्त्रिनेत्रं च आयत्यां पुष्टिकार कम्॥ ५५
सक्तूंश्च सघृतान् देवे दध्नाक्तान् विनिवेदयेत्।
उपानद्युगलं छत्रं दानं दद्याच्च भक्तिमान्॥ ५६
नमस्ते भगनेत्रघ्न पूष्णो दशननाशन।
इदमुच्चारयेद् भक्त्या प्रीणनाय जगत्पतेः॥ ५७
प्रदान करनी चाहिये। इस प्रकार छः मासके बाद (प्रथम)
पारणकी विधि कही गयी है। पारणके अन्तमें त्रिनेत्रधारी
महादेवका क्रमसे स्नान-कार्य सम्पन्न कराये। गोरोचनके
सहित गुड़द्वारा महादेवकी प्रतिमाका अनुलेपन कर उसकी
पूजा करे तथा इस प्रकार प्रार्थना करे कि 'हे ईश! मैं
दीन हूँ तथा आपकी शरणमें हूँ; आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों
तथा मेरे दुःख-शोकका नाश करें'॥ ४२-४५॥
व्रतधारी द्विजसत्तम ! इसके बाद फाल्गुन मासकी
कृष्णाष्टमीको उपवास करना चाहिये। दूसरे दिन नवमीको
पञ्चगव्यसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा कुन्दद्वारा
अर्चनकर चन्दनका धूप और ताम्रपात्रमें घृतसहित गुड
तथा ओदनका नैवेद्य प्रदान करे। उसके बाद 'रुद्र' शब्दका
उच्चारण कर ब्राह्मणोंको नैवेद्यके साथ दक्षिणा तथा दो वस्त्र
प्रदान कर महादेवको प्रसन्न करे। चैत्र मासमें गूलरके
फलके जलसे स्नान कराये और मदारके फूलोंसे पूजा
करे। उसके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति घृतमिश्रित 'महिष'
नामक गुग्गुलसे धूप देकर मोदकके साथ घृत उनकी
प्रसन्नताके लिये अर्पित करे एवं 'नाट्येश्वर (भगवान्) !
आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए नैवेद्यसहित
दक्षिणारूपमें मृगचर्म प्रदान करे। इस प्रकार पूर्ण
श्रद्धायुक्त होकर महादेवजीको प्रसन्न करे॥ ४६-५१॥
नारदजी! वैशाखमासमें सुगन्धित पुष्पोंके जलसे
स्नान तथा आमकी मञ्जरियोंसे शंकरके पूजनका विधान
है। इस समय घी-मिले सर्ज-वृक्षके गोंदका धूप तथा
फलसहित घृतका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। बुद्धिमान्
व्यक्तिको इस समय श्रीशिवके 'कालघ्न' नामका जप
करना चाहिये और तल्लीनतापूर्वक ब्राह्मणको नैवेद्य,
उपवीत (जनेऊ) एवं अन्न आदिके साथ पानीसे भरा
घड़ा दक्षिणा देनी चाहिये। ज्येष्ठमासमें आँवलेके जलसे
स्नान कराये तथा मन्दारके पुष्पोंसे उनकी पूजा करे।
उसके बाद त्रिनेत्रधारी पुष्टि-कर्ता श्रीशिवको धूपदानमें
धूप दिखलाये। फिर घी तथा दही मिला सत्तूका नैवेद्य
अर्पित करे। जगत्पतिके प्रीत्यर्थ 'हे पूषाके दाँत तोड़नेवाले,
भगनेत्रघ्न शिव ! आपको नमस्कार है'—यह कहकर
भक्तिपूर्वक छत्र एवं उपानद्युगल (एक जोड़ा जूता)
दक्षिणामें प्रदान करना चाहिये ॥ ५२-५७॥