वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८- प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३३
तं कूजमानं विलपन्तमारात्
समीक्ष्य कामो वृषकेतनं हि।
विव्याध चापं तरसा विनाम्य
संतापनाम्ना तु शरेण भूयः ॥ ४३
संतापनास्त्रेण तदा स विद्धो
भूयः स संतप्ततरो बभूव।
संतापयँश्चापि जगत्समग्रं
फूत्कृत्य फूत्कृत्य विवासते स्म॥ ४४
तं चापि भूयो मदनो जघान
विजृम्भणास्त्रेण ततो विजृम्भे।
ततो भृशं कामशरैर्विदुन्नो
विजृम्भमाणः परितो भ्रमंश्च ॥ ४५
ददर्श यक्षाधिपतेस्तनूजं
पाञ्चालिकं नाम जगत्प्रधानम्।
दृष्ट्वा त्रिनेत्रो धनदस्य पुत्रं
पार्श्वं समभ्येत्य वचो बभाषे।
भ्रातृव्य वक्ष्यामि वचो यदद्य
तत् त्वं कुरुष्वामितविक्रमोऽसि ॥ ४६
पाञ्चालिक उवाच
यन्नाथ मां वक्ष्यसि तत्करिष्ये
सुदुष्करं यद्यपि देवसंघैः ।
आज्ञापयस्वांतुलवीर्य शंभो
दासोऽस्मि ते भक्तियुतस्तथेश ॥ ४७
ईश्वर उवाच
नाशं गतायां वरदाम्बिकायां
कामाग्निना प्लुष्टसुविग्रहोऽस्मि ।
विजृम्भणोन्मादशरैर्विभिन्नो
धृतिं न विन्दामि रतिं सुखं वा ॥ ४८
विजृम्भणं पुत्र तथैव ताप-
मुन्मादमुग्रं मदनप्रणुन्नम् ।
नान्यः पुमान् धारयितुं हि शक्तो
मुक्त्वा भवन्तं हि ततः प्रतीच्छ ॥ ४९
पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन
यक्षः प्रतीच्छत् स विजृम्भणादीन् ।
तोषं जगामाशु ततस्त्रिशूली
तुष्टस्तदैवं वचनं बभाषे ॥ ५०
हर उवाच
यस्मात्त्वया पुत्र सुदुर्धराणि
विजृम्भणादीनि प्रतीच्छितानि ।
विलाप करते हुए भगवान् शंकरको दूरसे देखकर
कामने अपना धनुष झुका (चढ़ा)-कर पुनः वेगसे उन्हें
संतापक अस्त्रसे वेध डाला। अब वे इससे विद्ध
होकर और भी अधिक संतप्त हो गये एवं मुखसे
बारंबार (विलख) फूत्कार कर सम्पूर्ण विश्वको
दुःखी करते हुए जैसे-तैसे समय बिताने लगे। फिर
कामने उनपर विजृम्भण नामक अस्त्रसे प्रहार किया।
इससे उन्हें जँभाई आने लगी। अब कामके बाणोंसे
विशेष पीड़ित होकर जँभाई लेते हुए वे चारों ओर
घूमने लगे। इसी समय उन्होंने कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकको
देखा और उसको देखकर उसके पास जाकर
त्रिनेत्र शंकरने यह बात कही - भ्रातृव्य ! तुम अमित
विक्रमशाली हो, मैं जो आज बात कहता हूँ तुम उसे
करो ॥ ४२-४६ ॥
पाञ्चालिकने कहा - स्वामिन् ! आप जो कहेंगे,
देवताओंद्वारा सुदुष्कर होनेपर भी उसे मैं करूँगा। हे
अतुल बलशाली शिव ! आप आज्ञा करें। ईश ! मैं
आपका श्रद्धालु भक्त एवं दास हूँ ॥ ४७ ॥
भगवान् शिव बोले - वरदायिनी अम्बिका
(सती)-के नष्ट होनेसे मेरा सुन्दर शरीर कामाग्निसे
अत्यन्त दग्ध हो रहा है। कामके विजृम्भण और उन्माद
शरोंसे विद्ध होनेसे मुझे धैर्य, रति या सुख नहीं प्राप्त
हो रहा है। पुत्र ! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष,
कामदेवसे प्रेरित विजृम्भण, संतापन और उन्माद नामक
उग्र अस्त्र सहन करनेमें समर्थ नहीं है। अतः तुम इन्हें
ग्रहण कर लो ॥ ४८-४९॥
पुलस्त्यजी बोले - भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर
उस यक्ष (कुबेर-पुत्र पाञ्चालिक)-ने विजृम्भण आदि
सभी अस्त्रोंको उनसे ले लिया। इससे त्रिशूलीको
तत्काल संतोष प्राप्त हो गया और प्रसन्न होकर उन्होंने
उससे ये वचन कहे - ॥ ५० ॥
भगवान् महादेवजी बोले- पुत्र ! तुमने अति
भयंकर विजृम्भण आदि अस्त्रोंको ग्रहण कर लिया,
३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६
तस्माद्वरं त्वां प्रतिपूजनाय
दास्यामि लोकस्य च हास्यकारि ॥ ५१
यस्त्वां यदा पश्यति चैत्रमासे
स्पृशेनरो वार्चयते च भक्त्या।
वृद्धोऽथ बालोऽथ युवाथ योषित्
सर्वे तदोन्मादधरा भवन्ति ॥ ५२
गायन्ति नृत्यन्ति रमन्ति यक्ष
वाद्यानि यत्नादपि वादयन्ति।
तवाग्रतो हास्यवचोऽभिरक्ता
भवन्ति ते योग्ययुतास्तु ते स्युः ॥ ५३
ममैव नाम्ना भविताऽसि पूज्यः
पाञ्चालिकेशः प्रथितः पृथिव्याम्।
मम प्रसादाद् वरदो नराणां
भविष्यसे पूज्यतमोऽभिगच्छ ॥ ५४
इत्येवमुक्तो विभुना स यक्षो
जगाम देशान् सहसैव सर्वान्।
कालञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्यो
देशो हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः ॥ ५५
तस्मिन् सुपुण्ये विषये निविष्टो
रुद्रप्रसादादभिपूज्यतेऽसौ ।
तस्मिन् प्रयाते भगवांस्त्रिनेत्रो
देवोऽपि विन्ध्यं गिरिमभ्यगच्छत् ॥ ५६
तत्रापि मदनो गत्वा ददर्श वृषकेतनम्।
दृष्ट्वा प्रहर्तुकामं च ततः प्रादुद्रवद्धरः ॥ ५७
ततो दारुवनं घोरं मदनाभिसुतो हरः।
विवेश ऋषयो यत्र सपत्नीका व्यवस्थिताः ॥ ५८
ते चापि ऋषयः सर्वे दृष्ट्वा मूर्ध्ना नताभवन्।
ततस्तान् प्राह भगवान् भिक्षा मे प्रतिदीयताम् ॥ ५९
ततस्ते मौनिनस्तस्थुः सर्व एव महर्षयः।
तदाश्रमाणि सर्वाणि परिचक्राम नारद ॥ ६०
तं प्रविष्टं तदा दृष्ट्वा भार्गवात्रेययोषितः।
प्रक्षोभमगमन् सर्वा हीनसत्त्वाः समन्ततः ॥ ६१
ऋते त्वरुन्धतीमेकामनसूयां च भामिनीम्।
एताभ्यां भर्तृपूजासु तच्चिन्तासु स्थितं मनः ॥ ६२
ततः संक्षुभिताः सर्वा यत्र याति महेश्वरः।
तत्र प्रयान्ति कामार्त्ता मदविह्वलितेन्द्रियाः ॥ ६३
त्यक्त्वाश्रमाणि शून्यानि स्वानि ता मुनियोषितः।
अनुजग्मुर्यथा मत्तं करिण्य इव कुञ्जरम् ॥ ६४
अतः प्रत्युपकारमें तुम्हें सब लोगोंके लिये आनन्ददायक
वर दूँगा। चैत्रमासमें जो वृद्ध, बालक, युवा या स्त्री
तुम्हारा स्पर्श करेंगे या भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेंगे
वे सभी उन्मत्त हो जायेंगे। यक्ष! फिर वे गायेंगे,
नाचेंगे, आनन्दित होंगे और निपुणताके साथ बाजे
बजायेंगे। किंतु तुम्हारे सम्मुख हँसीकी बात करते
हुए भी वे योगयुक्त रहेंगे। मेरे ही नामसे तुम पूज्य
होगे। विश्वमें तुम्हारा पाञ्चालिकेश नाम प्रसिद्ध होगा।
मेरे आशीर्वादसे तुमलोगोंके वरदाता और पूज्यतम
होगे; जाओ ॥ ५१-५४॥
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर वह यक्ष तुरंत
सब देशोंमें घूमने लगा। फिर वह कालञ्जरके उत्तर
और हिमालयके दक्षिण परम पवित्र स्थानमें स्थिर हो
गया। वह शिवजीकी कृपासे पूजित हुआ। उसके चले
जानेपर भगवान् त्रिनेत्र भी विन्ध्यपर्वतपर आ गये।
वहाँ भी कामने उन्हें देखा। उसे पुनः प्रहारकी चेष्टा
करते देख शिवजी भागने लगे। उसके बाद कामदेवके
द्वारा पीछा किये जानेपर महादेवजी घोर दारुवनमें
चले गये, जहाँ ऋषिगण अपनी पत्नियोंके साथ निवास
करते थे ॥ ५५-५८ ॥
उन ऋषियोंने भी उन्हें देखकर सिर झुकाकर
प्रणाम किया। फिर भगवान्ने उनसे कहा-आपलोग
मुझे भिक्षा दीजिये। इसपर सभी महर्षि मौन रह गये।
नारदजी! इसपर महादेवजी सभी आश्रमोंमें घूमने लगे।
उस समय उन्हें आश्रममें आया हुआ देख पतिव्रता
अरुन्धती और अनसूयाको छोड़कर ऋषियोंकी समस्त
पत्नयाँ प्रक्षुब्ध एवं सत्यहीन हो गयीं। पर अरुन्धती
और अनसूया पतिसेवामें ही लगी रहीं ॥ ५९-६२ ॥
अब शिवजी जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ संक्षुभित,
कामार्त एवं मदसे विकल इन्द्रियोंवाली स्त्रियाँ भी जाने
लगीं। मुनियोंकी वे स्त्रियाँ अपने आश्रमोंको सूना छोड़
उनका इस प्रकार अनुसरण करने लगीं, जैसे करेणु
अध्याय ६ ]
नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन
३५
ततस्तु ऋषयो दृष्ट्वा भार्गवाङ्गिरसो मुने।
क्रोधान्विताब्रुवन्सर्वे लिङ्गोऽस्य पततां भुवि ॥ ६५
ततः पपात देवस्य लिङ्गं पृथ्वीं विदारयन्।
अन्तर्द्धानं जगामाथ त्रिशूली नीललोहितः ॥ ६६
ततः स पतितो लिङ्गो विभिद्य वसुधातलम्।
रसातलं विवेशाशु ब्रह्माण्डं चोर्ध्वतोऽभिनत् ॥ ६७
ततश्चचाल पृथिवी गिरयः सरितो नगाः।
पातालभुवनाः सर्वे जङ्गमाजङ्गमैर्वृताः ॥ ६८
संक्षुब्धान् भुवनान् दृष्ट्वा भूर्लोकादीन् पितामहः।
जगाम माधवं द्रष्टुं क्षीरोदं नाम सागरम्॥ ६९
तत्र दृष्ट्वा हृषीकेशं प्रणिपत्य च भक्तितः।
उवाच देव भुवनाः किमर्थं क्षुभिता विभो ॥ ७०
अथोवाच हरिर्ब्रह्मन् शार्वो लिङ्गो महर्षिभिः।
पातितस्तस्य भारार्ता संचचाल वसुंधरा ॥ ७१
ततस्तदद्भुततमं श्रुत्वा देवः पितामहः।
तत्र गच्छाम देवेश एवमाह पुनः पुनः ॥ ७२
ततः पितामहो देवः केशवश्च जगत्पतिः।
आजग्मतुस्तमुद्देशं यत्र लिङ्गं भवस्य तत् ॥ ७३
ततोऽनन्तं हरिलिङ्गं दृष्ट्वारुह्य खगेश्वरम्।
पातालं प्रविवेशाथ विस्मयान्तरितो विभुः ॥ ७४
ब्रह्मा पद्मविमानेन ऊर्ध्वमाक्रम्य सर्वतः।
नैवान्तमलभद् ब्रह्मन् विस्मितः पुनरागतः ॥ ७५
विष्णुर्गत्वाऽथ पातालान् सप्त लोकपरायणः।
चक्रपाणिर्विनिष्क्रान्तो लेभेऽन्तं न महामुने ॥ ७६
विष्णुः पितामहश्चोभौ हरलिङ्गं समेत्य हि।
कृताञ्जलिपुटौ भूत्वा स्तोतुं देवं प्रचक्रतुः ॥ ७७
हरिब्रह्माणावूचतुः
नमोऽस्तु ते शूलपाणे नमोऽस्तु वृषभध्वज।
जीमूतवाहन कवे शर्व त्र्यम्बक शंकर ॥ ७८
महेश्वर महेशान सुवर्णाक्ष वृषाकपे।
दक्षयज्ञक्षयकर कालरूप नमोऽस्तु ते ॥ ७९
त्वमादिरस्य जगतस्त्वं मध्यं परमेश्वर।
भवानन्तश्च भगवान् सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ८०
मदमत्त गजका अनुसरण करे। मुने! यह देखकर
ऋषिगण क्रुद्ध हो गये एवं कहा कि इनका लिङ्ग
भूमिपर गिर जाय। फिर तो महादेवका लिङ्ग
पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ गिर गया एवं तब
नीललोहित त्रिशूली अन्तर्धान हो गये ॥ ६३-६६ ॥
वह पृथ्वीपर गिरा लिंग उसका भेदन कर तुरंत
रसातलमें प्रविष्ट हो गया एवं ऊपरकी ओर भी उसने
विश्वब्रह्माण्डका भेदन कर दिया। इसके बाद पृथ्वी,
पर्वत, नदियाँ, पादप तथा चराचरसे पूर्ण समस्त पाताललोक
काँप उठे। पितामह ब्रह्मा भूर्लोक आदि भुवनोंको
संक्षुब्ध देखकर श्रीविष्णुसे मिलने क्षीरसागर पहुँचे। वहाँ
उन्हें देख भक्तिपूर्वक प्रणाम कर ब्रह्माने कहा- देव !
समस्त भुवन विक्षुब्ध कैसे हो गये हैं ? ॥ ६७-७० ॥
इसपर श्रीहरिने कहा- ब्रह्मन् ! महर्षियोंने शिवके
लिङ्गको गिरा दिया है। उसके भारसे कष्टमें पड़ी आर्त
पृथ्वी विचलित हो रही है। इसके बाद ब्रह्माजी उस
अद्भुत बातको सुनकर देवेश ! हमलोग वहाँ चलें-
ऐसा बार-बार कहने लगे। फिर ब्रह्मा और जगत्पति
विष्णु वहाँ पहुँचे, जहाँ शंकरका लिङ्ग गिरा था। वहाँ
उस अनन्त लिङ्गको देखकर आश्चर्यचकित होकर हरि
गरुड़पर सवार हो उसका पता लगानेके लिये पातालमें
प्रविष्ट हुए ॥ ७१-७४ ॥
नारदजी ! ब्रह्माजी अपने पद्मायानके द्वारा सम्पूर्ण
ऊर्ध्वाकाशको लाँघ गये, पर उस लिङ्गका अन्त नहीं पा
सके और आश्चर्यचकित होकर वे लौट आये। मुने ! इसी
प्रकार जब चक्रपाणि भगवान् विष्णु भी सातों पातालोंमें
प्रवेश कर उस लिङ्गका बिना अन्त पाये ही वहाँसे बाहर
आये, तब ब्रह्मा, विष्णु दोनों शिवलिङ्गके पास जाकर
हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७५-७७ ॥
ब्रह्मा-विष्णु बोले - शूलपाणिजी ! आपको प्रणाम
है। वृषभध्वज ! जीमूतवाहन ! कवि ! शर्व ! त्र्यम्बक !
शंकर ! आपको प्रणाम है। महेश्वर ! महेशान ! सुवर्णाक्ष !
वृषाकपे ! दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक ! कालरूप शिव ! आपको
प्रणाम है। परमेश्वर ! आप इस जगत्के आदि, मध्य एवं
अन्त हैं। आप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् सर्वत्रगामी या
सर्वत्र व्याप्त हैं। आपको प्रणाम है ॥ ७८-८० ॥
| ३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६ |
|---|
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु तस्मिन् दारुवने हरः।<br>स्वरूपी ताविदं वाक्यमुवाच वदतां वरः॥ ८१॥ | पुलस्त्यजी बोले— उस दारुवनमें इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरने अपने स्वरूपमें प्रकट होकर (अर्थात् मूर्तिमान् होकर) उन दोनोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ८१ ॥ |
| हर उवाच<br>किमर्थं देवतानाथौ परिभूतक्रमं त्विह।<br>मां स्तुवाते भृशास्वस्थं कामतापितविग्रहम्॥ ८२ | भगवान् शंकर बोले— आप दोनों सभी देवताओंके स्वामी हैं। आपलोग चलते-चलते थके हुए तथा कामाग्निसे दग्ध और मुझ सब प्रकारसे अस्वस्थ व्यक्तिकी क्यों स्तुति कर रहे हैं?॥ ८२॥ |
| देवावूचतुः<br>भवतः पातितं लिङ्गं यदेतद् भुवि शंकर।<br>एतत् प्रगृह्यतां भूय अतो देव स्तुवावहे॥ ८३ | (इसपर) ब्रह्मा-विष्णु (दोनों) बोले— शिवजी! पृथ्वीपर आपका जो यह लिङ्ग गिराया गया है, उसे पुनः आप ग्रहण करें। इसीलिये हम आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ ८३॥ |
| हर उवाच<br>यद्यर्चयन्ति त्रिदशा मम लिङ्गं सुरोत्तमौ।<br>तदेतत्प्रतिगृह्णीयां नान्यथेति कथंचन॥ ८४<br><br>ततः प्रोवाच भगवानैवमस्त्विति केशवः।<br>ब्रह्मा स्वयं च जग्राह लिङ्गं कनकपिङ्गलम्॥ ८५<br><br>ततश्चकार भगवांश्चातुर्वर्ण्यं हरार्चने।<br>शास्त्राणि चैषां मुख्यानि नानोक्ति विदितानि च॥ ८६<br><br>आद्यं शैवं परिख्यातमन्त्यत्पाशुपतं मुने।<br>तृतीयं कालवदनं चतुर्थं च कपालिनम्॥ ८७ | शिवजीने कहा— श्रेष्ठ देवो! यदि सभी देवता मेरे लिङ्गकी पूजा करना स्वीकार करें, तभी मैं इसे पुनः ग्रहण करूँगा, अन्यथा किसी प्रकार भी इसे नहीं धारण करूँगा। तब भगवान् विष्णु बोले—ऐसा ही होगा। फिर ब्रह्माजीने स्वयं उस स्वर्णके सदृश पिंगल लिङ्गको ग्रहण किया। तब भगवान्ने चारों वर्णोंको हर-लिङ्गकी अर्चनाका अधिकारी बनाया। इनके मुख्य शास्त्र नाना प्रकारके वचनोंसे प्रख्यात हैं। मुने! उन शिव-भक्तोंका प्रथम सम्प्रदाय शैव, द्वितीय पाशुपत, तृतीय कालमुख¹ और चतुर्थ सम्प्रदाय कापालिक या भैरव नामसे विख्यात है²॥ ८४–८७॥ |
| शैवश्चासीत्स्वयं शक्तिर्वसिष्ठस्य प्रियः सुतः।<br>तस्य शिष्यो बभूवाथ गोपायन इति श्रुतः॥ ८८ | महर्षि वसिष्ठके प्रियपुत्र शक्ति ऋषि स्वयं शैव थे। उनके एक शिष्य गोपायन नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने शैव सम्प्रदायको दूरतक फैलाया। |
| महापाशुपतश्चासीद्भरद्वाजस्तपोधनः ।<br>तस्य शिष्योऽप्यभूद्राजा ऋषभः सोमकेश्वरः॥ ८९ | तपोधन भरद्वाज महापाशुपत थे और सोमकेश्वर राजा ऋषभ उनके शिष्य हुए, जिनसे पाशुपत-सम्प्रदाय विशेषरूपसे परिवर्तित हुआ। |
| कालास्यो भगवानासीदापस्तम्बस्तपोधनः।<br>तस्य शिष्यो भवद्वैश्यो नाम्ना क्राथेश्वरो मुने॥ ९० | मुने! ऐश्वर्य एवं तपस्याके धनी महर्षि आपस्तम्ब, कालमुख सम्प्रदायके आचार्य थे। क्राथेश्वर नामके उनके वैश्य शिष्यने इस सम्प्रदायका विशेष रूपसे प्रचार |
१-गणेशसहस्रनामके 'खम्भात' भाष्यमें कालमुखमतका विशेष परिचय है।
२-शैवं पाशुपतं कालमुखं भैरवशासनम्। (गणेशसहस्रनाम १२९)
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३७
महाव्रती च धनदस्तस्य शिष्यश्च वीर्यवान्।
कर्णोदर इति ख्यातो जात्या शूद्रो महातपाः ॥ ९१
एवं स भगवान् ब्रह्मा पूजनाय शिवस्य तु।
कृत्वा तु चातुराश्रम्यं स्वमेव भवनं गतः ॥ ९२
गते ब्रह्मणि शर्वोऽपि उपसंहृत्य तं तदा।
लिङ्गं चित्रवने सूक्ष्मं प्रतिष्ठाप्य चचार ह॥ ९३
विचरन्तं तदा भूयो महेशं कुसुमायुधः।
आरात्स्थित्वाऽग्रतो धन्वी संतापयितुमुद्यतः ॥ ९४
ततस्तमग्रतो दृष्ट्वा क्रोधाध्मातदृशा हरः।
स्मरमालोकयामास शिखाग्राच्चरणान्तिकम् ॥ ९५
आलोकितस्त्रिनेत्रेण मदनो द्युतिमानपि।
प्रादह्यत तदा ब्रह्मन् पादादारभ्य कक्षवत् ॥ ९६
प्रदह्यमानौ चरणौ दृष्ट्वाऽसौ कुसुमायुधः।
उत्ससर्ज धनुः श्रेष्ठं तज्जगामाथ पञ्चधा ॥ ९७
यदासीन्मुष्टिबन्धं तु रुक्मपृष्ठं महाप्रभम्।
स चम्पकतरुर्जातः सुगन्धाढ्यो गुणाकृतिः ॥ ९८
नाहस्थानं शुभाकारं यदासीद्वज्रभूषितम्।
तज्जातं केसरारण्यं बकुलं नामतो मुने ॥ ९९
या च कोटी शुभा ह्यासीदिन्द्रनीलविभूषिता।
जाता सा पाटला रम्या भृङ्गराजिविभूषिता ॥ १००
नाहोपरि तथा मुष्टौ स्थानं शशिमणिप्रभम्।
पञ्चगुल्माऽभवज्जाती शशाङ्ककिरणोज्ज्वला ॥ १०१
ऊर्ध्वं मुष्ट्या अधः कोट्योः स्थानं विद्रुमभूषितम्।
तस्माद्बहुपुटा मल्ली संजाता विविधा मुने ॥ १०२
पुष्पोत्तमानि रम्याणि सुरभीणि च नारद।
जातियुक्तानि देवेन स्वयमाचरितानि च॥ १०३
मुमोच मार्गणान् भूम्यां शरीरे दह्यति स्मरः।
फलोपगानि वृक्षाणि संभूतानि सहस्त्रशः ॥ १०४
किया। महाव्रती साक्षात् कुबेर प्रथम कापालिक या
भैरव-सम्प्रदायके आचार्य हुए थे। शूद्रजातिके महातपस्वी
कर्णोदर नामक उनके एक प्रसिद्ध शिष्य हुए। इन्होंने
इस मतका विशेष प्रचार किया * ॥ ८८-९१॥
इस प्रकार ब्रह्माजी शिवकी उपासनाके लिये
चार सम्प्रदायोंका विधान कर ब्रह्मलोकको चले गये।
ब्रह्माजीके जानेपर महादेवने उस लिङ्गको उपसंहृत
कर लिया - समेट लिया एवं वे चित्रवनमें सूक्ष्म
लिङ्ग प्रतिष्ठापित कर विचरण करने लगे। यहाँ भी
शिवजीको घूमते देख पुष्पधनुष कामदेव पुनः उनके
सामने सहसा बहुत निकट आकर उन्हें संतापन बाणसे
बेधनेको उद्यत हुआ। तब उसे इस प्रकार सामने खड़ा
देखकर शिवजीने उस कामदेवको सिरसे चरणतक
क्रोधभरी दृष्टिसे देखा ॥ ९२-९५ ॥
ब्रह्मन् ! वह कामदेव अत्यन्त तेजस्वी था। फिर
भी भगवान्द्वारा इस प्रकार दृष्ट होनेपर वह पैरसे लेकर
कटिपर्यन्त दग्ध हो गया। अपने चरणोंको जलते हुए
देखकर पुष्पायुध कामने अपने श्रेष्ठ धनुषको दूर फेंक
दिया। इससे उसके पाँच टुकड़े हो गये। उस धनुषका
जो चमचमाता हुआ सुवर्णयुक्त मुठबंध था, वह सुगन्धपूर्ण
सुन्दर चम्पक वृक्ष हो गया। मुने ! उस धनुषका जो हीरा
जड़ा हुआ सुन्दर कृतिवाला नाहस्थान था, वह केसरवनमें
बकुल (मौलेसरी) नामका वृक्ष बना। इन्द्रनीलसे सुशोभित
उसकी सुन्दर कोटि भृंगोंसे विभूषित सुन्दर पाटला
(गुलाब)-के रूपमें परिणत हो गयी ॥ ९६-१०० ॥
धनुषनाहके ऊपर मुष्टिमें स्थित चन्द्रकान्तमणिकी
प्रभासे युक्त स्थान चन्द्रकिरणके समान उज्ज्वल पाँच
गुल्मवाली जाती (चमेली-पुष्प) बन गया। मुने !
मुष्टिके ऊपर और दोनों कोटियोंके नीचेवाले विद्रुममणि-
विभूषित स्थानसे अनेक पुटोंवाली मल्लिका (मालती)
हो गयी। नारदजी ! देवके द्वारा जातीके साथ अन्य
सुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंकी सृष्टि हुई। ऊर्ध्व शरीरके
दग्ध होनेके समय कामदेवने अपने बाणोंको भी
पृथ्वीपर फेंका था, इससे हजारों प्रकारके फलयुक्त वृक्ष
- इसपर डॉ० भण्डारकरके 'वैष्णविज्म'-'शैविज्म'में विस्तृत विचार हैं।
| ३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७ |
|---|
| चूतादीनि सुगन्धीनि स्वादूनि विविधानि च।<br>हरप्रसादाज्जातानि भोज्यान्यपि सुरोत्तमैः ॥ १०५<br><br>एवं दग्ध्वा स्मरं रुद्रः संयम्य स्वतनूं विभुः।<br>पुण्यार्थी शिशिराद्रिं स जगाम तपसेऽव्ययः॥ १०६<br><br>एवं पुरा देववरेण शम्भुना<br>कामस्तु दग्धः सशरः सचापः।<br>ततस्त्वनङ्गेति महाधनुर्द्धरो<br>देवैस्तु गीतः सुरपूर्वपूजितः॥ १०७ | उत्पन्न हो गये। शिवजीकी कृपासे श्रेष्ठ देवताओंद्वारा भी अनेक प्रकारके सुगन्धित एवं स्वादिष्ट आम्र आदि फल उत्पन्न हुए, जो खानेमें स्वादुयुक्त हैं। इस प्रकार कामदेवको भस्म कर एवं अपने शरीरको संयतकर समर्थ, अविनाशी शिव पुण्यकी कामनासे हिमालयपर तपस्या करने चले गये। इस प्रकार प्राचीन समयमें देवश्रेष्ठ शिवजीद्वारा धनुषबाणसहित काम दग्ध किया गया था। तबसे देवताओंमें प्रथम पूजित वह महाधनुर्धर देवोंद्वारा 'अनङ्ग' कहा गया॥ १०१-१०७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छठा अध्याय समाप्त हुआ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग—नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम
</div>| पुलस्त्य उवाच<br>ततोऽनङ्गं विभुर्दृष्ट्वा ब्रह्मन् नारायणो मुनिः।<br>प्रहस्यैवं वचः प्राह कन्दर्प इह आस्यताम्॥ १<br><br>तदक्षुब्धत्वमीक्ष्यास्य कामो विस्मयमागतः।<br>वसन्तोऽपि महाचिन्तां जगामाशु महामुने॥ २<br><br>ततश्चाप्सरसो दृष्ट्वा स्वागतेनाभिपूज्य च।<br>वसन्तमाह भगवानेह्येहि स्थीयतामिति॥ ३<br><br>ततो विहस्य भगवान् मञ्जरीं कुसुमावृताम्।<br>आदाय प्राक्सुवर्णाङ्गीमूर्वोर्बालां विनिर्ममे॥ ४<br><br>ऊरूद्भवां स कन्दर्पो दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरीम्।<br>अमन्यत तदाऽनङ्गः किमियं सा प्रिया रतिः॥ ५<br><br>तदेव वदनं चारु स्वाक्षिभ्रुकुटिलालकम्।<br>सुनासावंशाधरोष्ठमालोकनपरायणम् ॥ ६<br><br>तावेवाहार्यविरलौ पीवरौ मग्नचूचुकौ।<br>राजतेऽस्याः कुचौ पीनौ सज्जनाविव संहतौ॥ ७ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! उसके बाद समर्थ नारायण ऋषि कामदेवको हँसते हुए देखकर यों बोले—काम! तुम यहाँ बैठो। काम उनकी उस अक्षुब्धता (स्थिरता)-को देखकर चकित हो गया। महामुने! वसन्तको भी उस समय बड़ी चिन्ता हुई। फिर अप्सराओंकी ओर देखकर स्वागतके द्वारा उनकी पूजा कर भगवान् नारायणने वसन्तसे कहा—आओ बैठो। उसके पश्चात् भगवान् नारायण मुनिने हँसकर एक फूलसे भरी मञ्जरी ली और अपने ऊरुपर एक सुवर्ण अङ्गवाली तरुणीका चित्र लिखकर उसकी सजीव रचना कर दी। नारायणकी जाँघसे उत्पन्न उस सर्वाङ्ग सुन्दरीको देखकर कामदेव मनमें सोचने लगा—क्या यह सुन्दरी मेरी पत्नी रति है!॥ १—५॥<br><br>इसकी वैसी ही सुन्दर आँखें, भौंह एवं कुटिल अलकें हैं। इसका वैसा ही मुखमण्डल, वैसी सुन्दर नासिका, वैसा वंश और वैसा ही इसका अधरोष्ठ भी सुन्दर है। इसे देखनेसे तृप्ति नहीं होती है। रतिके समान ही मनोहर तथा अत्यन्त मग्न चूचुकवाले स्थूल (मांसल) स्तन दो सज्जन पुरुषोंके सदृश परस्पर मिले हैं। इस |