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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३३
तं कूजमानं विलपन्तमारात्
समीक्ष्य कामो वृषकेतनं हि।
विव्याध चापं तरसा विनाम्य
संतापनाम्ना तु शरेण भूयः ॥ ४३
संतापनास्त्रेण तदा स विद्धो
भूयः स संतप्ततरो बभूव।
संतापयँश्चापि जगत्समग्रं
फूत्कृत्य फूत्कृत्य विवासते स्म॥ ४४
तं चापि भूयो मदनो जघान
विजृम्भणास्त्रेण ततो विजृम्भे।
ततो भृशं कामशरैर्विदुन्नो
विजृम्भमाणः परितो भ्रमंश्च ॥ ४५
ददर्श यक्षाधिपतेस्तनूजं
पाञ्चालिकं नाम जगत्प्रधानम्।
दृष्ट्वा त्रिनेत्रो धनदस्य पुत्रं
पार्श्वं समभ्येत्य वचो बभाषे।
भ्रातृव्य वक्ष्यामि वचो यदद्य
तत् त्वं कुरुष्वामितविक्रमोऽसि ॥ ४६
पाञ्चालिक उवाच
यन्नाथ मां वक्ष्यसि तत्करिष्ये
सुदुष्करं यद्यपि देवसंघैः ।
आज्ञापयस्वांतुलवीर्य शंभो
दासोऽस्मि ते भक्तियुतस्तथेश ॥ ४७
ईश्वर उवाच
नाशं गतायां वरदाम्बिकायां
कामाग्निना प्लुष्टसुविग्रहोऽस्मि ।
विजृम्भणोन्मादशरैर्विभिन्नो
धृतिं न विन्दामि रतिं सुखं वा ॥ ४८
विजृम्भणं पुत्र तथैव ताप-
मुन्मादमुग्रं मदनप्रणुन्नम् ।
नान्यः पुमान् धारयितुं हि शक्तो
मुक्त्वा भवन्तं हि ततः प्रतीच्छ ॥ ४९
पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन
यक्षः प्रतीच्छत् स विजृम्भणादीन् ।
तोषं जगामाशु ततस्त्रिशूली
तुष्टस्तदैवं वचनं बभाषे ॥ ५०
हर उवाच
यस्मात्त्वया पुत्र सुदुर्धराणि
विजृम्भणादीनि प्रतीच्छितानि ।
विलाप करते हुए भगवान् शंकरको दूरसे देखकर
कामने अपना धनुष झुका (चढ़ा)-कर पुनः वेगसे उन्हें
संतापक अस्त्रसे वेध डाला। अब वे इससे विद्ध
होकर और भी अधिक संतप्त हो गये एवं मुखसे
बारंबार (विलख) फूत्कार कर सम्पूर्ण विश्वको
दुःखी करते हुए जैसे-तैसे समय बिताने लगे। फिर
कामने उनपर विजृम्भण नामक अस्त्रसे प्रहार किया।
इससे उन्हें जँभाई आने लगी। अब कामके बाणोंसे
विशेष पीड़ित होकर जँभाई लेते हुए वे चारों ओर
घूमने लगे। इसी समय उन्होंने कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकको
देखा और उसको देखकर उसके पास जाकर
त्रिनेत्र शंकरने यह बात कही - भ्रातृव्य ! तुम अमित
विक्रमशाली हो, मैं जो आज बात कहता हूँ तुम उसे
करो ॥ ४२-४६ ॥
पाञ्चालिकने कहा - स्वामिन् ! आप जो कहेंगे,
देवताओंद्वारा सुदुष्कर होनेपर भी उसे मैं करूँगा। हे
अतुल बलशाली शिव ! आप आज्ञा करें। ईश ! मैं
आपका श्रद्धालु भक्त एवं दास हूँ ॥ ४७ ॥
भगवान् शिव बोले - वरदायिनी अम्बिका
(सती)-के नष्ट होनेसे मेरा सुन्दर शरीर कामाग्निसे
अत्यन्त दग्ध हो रहा है। कामके विजृम्भण और उन्माद
शरोंसे विद्ध होनेसे मुझे धैर्य, रति या सुख नहीं प्राप्त
हो रहा है। पुत्र ! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष,
कामदेवसे प्रेरित विजृम्भण, संतापन और उन्माद नामक
उग्र अस्त्र सहन करनेमें समर्थ नहीं है। अतः तुम इन्हें
ग्रहण कर लो ॥ ४८-४९॥
पुलस्त्यजी बोले - भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर
उस यक्ष (कुबेर-पुत्र पाञ्चालिक)-ने विजृम्भण आदि
सभी अस्त्रोंको उनसे ले लिया। इससे त्रिशूलीको
तत्काल संतोष प्राप्त हो गया और प्रसन्न होकर उन्होंने
उससे ये वचन कहे - ॥ ५० ॥
भगवान् महादेवजी बोले- पुत्र ! तुमने अति
भयंकर विजृम्भण आदि अस्त्रोंको ग्रहण कर लिया,