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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 47

अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३७
महाव्रती च धनदस्तस्य शिष्यश्च वीर्यवान्।
कर्णोदर इति ख्यातो जात्या शूद्रो महातपाः ॥ ९१
एवं स भगवान् ब्रह्मा पूजनाय शिवस्य तु।
कृत्वा तु चातुराश्रम्यं स्वमेव भवनं गतः ॥ ९२
गते ब्रह्मणि शर्वोऽपि उपसंहृत्य तं तदा।
लिङ्गं चित्रवने सूक्ष्मं प्रतिष्ठाप्य चचार ह॥ ९३
विचरन्तं तदा भूयो महेशं कुसुमायुधः।
आरात्स्थित्वाऽग्रतो धन्वी संतापयितुमुद्यतः ॥ ९४
ततस्तमग्रतो दृष्ट्वा क्रोधाध्मातदृशा हरः।
स्मरमालोकयामास शिखाग्राच्चरणान्तिकम् ॥ ९५
आलोकितस्त्रिनेत्रेण मदनो द्युतिमानपि।
प्रादह्यत तदा ब्रह्मन् पादादारभ्य कक्षवत् ॥ ९६
प्रदह्यमानौ चरणौ दृष्ट्वाऽसौ कुसुमायुधः।
उत्ससर्ज धनुः श्रेष्ठं तज्जगामाथ पञ्चधा ॥ ९७
यदासीन्मुष्टिबन्धं तु रुक्मपृष्ठं महाप्रभम्।
स चम्पकतरुर्जातः सुगन्धाढ्यो गुणाकृतिः ॥ ९८
नाहस्थानं शुभाकारं यदासीद्वज्रभूषितम्।
तज्जातं केसरारण्यं बकुलं नामतो मुने ॥ ९९
या च कोटी शुभा ह्यासीदिन्द्रनीलविभूषिता।
जाता सा पाटला रम्या भृङ्गराजिविभूषिता ॥ १००
नाहोपरि तथा मुष्टौ स्थानं शशिमणिप्रभम्।
पञ्चगुल्माऽभवज्जाती शशाङ्ककिरणोज्ज्वला ॥ १०१
ऊर्ध्वं मुष्ट्या अधः कोट्योः स्थानं विद्रुमभूषितम्।
तस्माद्बहुपुटा मल्ली संजाता विविधा मुने ॥ १०२
पुष्पोत्तमानि रम्याणि सुरभीणि च नारद।
जातियुक्तानि देवेन स्वयमाचरितानि च॥ १०३
मुमोच मार्गणान् भूम्यां शरीरे दह्यति स्मरः।
फलोपगानि वृक्षाणि संभूतानि सहस्त्रशः ॥ १०४
किया। महाव्रती साक्षात् कुबेर प्रथम कापालिक या
भैरव-सम्प्रदायके आचार्य हुए थे। शूद्रजातिके महातपस्वी
कर्णोदर नामक उनके एक प्रसिद्ध शिष्य हुए। इन्होंने
इस मतका विशेष प्रचार किया * ॥ ८८-९१॥
इस प्रकार ब्रह्माजी शिवकी उपासनाके लिये
चार सम्प्रदायोंका विधान कर ब्रह्मलोकको चले गये।
ब्रह्माजीके जानेपर महादेवने उस लिङ्गको उपसंहृत
कर लिया - समेट लिया एवं वे चित्रवनमें सूक्ष्म
लिङ्ग प्रतिष्ठापित कर विचरण करने लगे। यहाँ भी
शिवजीको घूमते देख पुष्पधनुष कामदेव पुनः उनके
सामने सहसा बहुत निकट आकर उन्हें संतापन बाणसे
बेधनेको उद्यत हुआ। तब उसे इस प्रकार सामने खड़ा
देखकर शिवजीने उस कामदेवको सिरसे चरणतक
क्रोधभरी दृष्टिसे देखा ॥ ९२-९५ ॥
ब्रह्मन् ! वह कामदेव अत्यन्त तेजस्वी था। फिर
भी भगवान्द्वारा इस प्रकार दृष्ट होनेपर वह पैरसे लेकर
कटिपर्यन्त दग्ध हो गया। अपने चरणोंको जलते हुए
देखकर पुष्पायुध कामने अपने श्रेष्ठ धनुषको दूर फेंक
दिया। इससे उसके पाँच टुकड़े हो गये। उस धनुषका
जो चमचमाता हुआ सुवर्णयुक्त मुठबंध था, वह सुगन्धपूर्ण
सुन्दर चम्पक वृक्ष हो गया। मुने ! उस धनुषका जो हीरा
जड़ा हुआ सुन्दर कृतिवाला नाहस्थान था, वह केसरवनमें
बकुल (मौलेसरी) नामका वृक्ष बना। इन्द्रनीलसे सुशोभित
उसकी सुन्दर कोटि भृंगोंसे विभूषित सुन्दर पाटला
(गुलाब)-के रूपमें परिणत हो गयी ॥ ९६-१०० ॥
धनुषनाहके ऊपर मुष्टिमें स्थित चन्द्रकान्तमणिकी
प्रभासे युक्त स्थान चन्द्रकिरणके समान उज्ज्वल पाँच
गुल्मवाली जाती (चमेली-पुष्प) बन गया। मुने !
मुष्टिके ऊपर और दोनों कोटियोंके नीचेवाले विद्रुममणि-
विभूषित स्थानसे अनेक पुटोंवाली मल्लिका (मालती)
हो गयी। नारदजी ! देवके द्वारा जातीके साथ अन्य
सुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंकी सृष्टि हुई। ऊर्ध्व शरीरके
दग्ध होनेके समय कामदेवने अपने बाणोंको भी
पृथ्वीपर फेंका था, इससे हजारों प्रकारके फलयुक्त वृक्ष

  • इसपर डॉ० भण्डारकरके 'वैष्णविज्म'-'शैविज्म'में विस्तृत विचार हैं।