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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

२७- भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना

११८
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय २२
तथा च त्वं दिव्यवपुर्भव भूयो महीपते।
तथाऽन्तकाले मामेव लयमेष्यसि सुव्रत ॥ ३७
कीर्तिश्च शाश्वती तुभ्यं भविष्यति न संशयः।
तत्रैव याजका यज्ञान् यजिष्यन्ति सहस्त्रशः ॥ ३८
तस्य क्षेत्रस्य रक्षार्थं ददौ स पुरुषोत्तमः।
यक्षं च चन्द्रनामानं वासुकिं चापि पन्नगम् ॥ ३९
विद्याधरं शङ्कुकर्णं सुकेशिं राक्षसेश्वरम्।
अजावनं च नृपतिं महादेवं च पावकम् ॥ ४०
एतानि सर्वतोऽभ्येत्य रक्षन्ति कुरुजाङ्गलम्।
अमीषां बलिनोऽन्ये च भृत्याश्चैवानुयायिनः ॥ ४१
अष्टौ सहस्राणि धनुर्धराणां
ये वारयन्तीह सुदुष्कृतान् वै।
स्नातुं न यच्छन्ति महोग्ररूपा-
स्त्वन्यस्य भूताः सचराचराणाम् ॥ ४२
तस्यैव मध्ये बहुपुण्य उक्तः
पृथूदकः पापहरः शिवश्च।
पुण्या नदी प्राङ्मुखतां प्रयाता
यत्रौघयुक्तस्य शुभा जलाढ्या ॥ ४३
पूर्वं प्रजेयं प्रपितामहेन
सृष्टा समं भूतगणैः समस्तैः।
मही जलं वह्निसमीरमेव
खं त्वेवमादौ विबभौ पृथूदकः ॥ ४४
तथा च सर्वाणि महार्णवानि
तीर्थानि नद्यः स्त्रवणाः सरांसि ।
संनिर्मितानीह महाभुजेन
तच्चैक्यमागात् सलिलं महीषु ॥ ४५
देवदेव उवाच
सरस्वतीदृषद्वत्योरन्तरे कुरुजाङ्गले।
मुनिप्रवरमासीनं पुराणं लोमहर्षणम्।
अपृच्छन्त द्विजवराः प्रभावं सरसस्तदा ॥ ४६
प्रमाणं सरसो ब्रूहि तीर्थानां च विशेषतः।
देवतानां च माहात्म्यमुत्पत्तिं वामनस्य च ॥ ४७
एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां रोमहर्षसमन्वितः ।
प्रणिपत्य पुराणर्षिरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८
अच्छा, ऐसा ही होगा। राजन्! तुम पुनः दिव्य
शरीरवाले हो जाओ तथा हे सुव्रत ! (दृढ़तासे व्रतका
सुष्ठु पालन करनेवाले) अन्तकालमें तुम मुझमें ही लीन
हो जाओगे ॥ ३३-३७ ॥
[ भगवान् विष्णुने आगे कहा-] निःसंदेह तुम्हारी
कीर्ति सदा रहनेवाली होगी। यहाँपर यज्ञ करनेवाले
व्यक्ति (यजमान) यज्ञ करेंगे। फिर, उस क्षेत्रकी रक्षा
करनेके लिये उन पुरुषोत्तमभगवान्ने राजाको चन्द्र नामक
यक्ष, वासुकि नामक सर्प, शङ्कुकर्ण नामक विद्याधर,
सुकेशी नामक राक्षसेश्वर, अजावन नामक राजा और
महादेव नामक अग्निको दे दिया। ये सभी तथा इनके
अन्य बली भृत्य एवं अनुयायी वहाँ आकर कुरुजाङ्गलकी
सब ओरसे रक्षा करते हैं ॥ ३८-४१ ॥
आठ हजार धनुषधारी, जो पापियोंको यहाँसे
हटाते रहते हैं, वे उग्र रूप धारणकर चराचरके दूसरे
भूतगण (पापियों)-को स्नान नहीं करने देते। उसी
(कुरुजाङ्गल)-के मध्य पाप दूर करनेवाला एवं अति
पवित्र कल्याणकारी पृथूदक (पोहोआ) नामक तीर्थ
है, जहाँ शुभ जलसे पूर्ण एक पवित्र नदी पूर्वकी ओर
बहती है। इसे प्रपितामह ब्रह्माने सृष्टिके आदिमें पृथ्वी,
जल, अग्नि, पवन और आकाशादि समस्त भूतोंके साथ
ही रचा था, महाबाहु ब्रह्माने पृथ्वीपर जिन महासमुद्रों,
तीर्थों, नदियों, स्रोतों एवं सरोवरोंकी रचना की उन
सभीके जल उसमें एकत्र प्राप्त हैं ॥ ४२-४५ ॥
[ यहाँसे कुरुक्षेत्र और उसके सरोवरका
माहात्म्य कहते हैं— ]
देवदेव भगवान् विष्णु बोले - पहले समयमें
ब्राह्मणोंने सरस्वती और दृषद्वती (घग्गर)-के बीचमें
स्थित कुरुक्षेत्रमें आसीन मुनिप्रवर वृद्ध लोमहर्षणसे वहाँ
स्थित सरोवरकी महिमा पूछी और इस सरोवरके
विस्तार, विशेषतः तीर्थों और देवताओंके माहात्म्य
एवं वामनके प्रादुर्भावकी कथा कहनेकी प्रार्थना की।
उनके इस वचनको सुनकर रोमाञ्चित होते हुए पौराणिक
ऋषि लोमहर्षण उन्हें प्रणाम कर (फिर) इस प्रकार
बोले - ॥ ४६-४८ ॥

अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य १९९
लोमहर्षण उवाच
लोमहर्षणजी बोले- सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले
ब्रह्माणमग्र्यं कमलासनस्थं
कमलासन ब्रह्मा, लक्ष्मीके सहित विष्णु और महादेव
विष्णुं तथा लक्ष्मिसमन्वितं च।
रुद्रको सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं महान् ब्रह्मसर
रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूर्ध्ना
तीर्थका वर्णन करता हूँ। ब्रह्माने पहले कहा था कि
तीर्थं महत् ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये ॥ ४९
वह 'संनिहित' सरोवर 'रन्तुक' नामक स्थानसे लेकर
रन्तुकादौजसं यावत् पावनाच्च चतुर्मुखम् ।
'औजस' नामक स्थानतक तथा 'पावन' से 'चतुर्मुख'
सरः संनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥ ५०
तक फैला हुआ है। ब्राह्मणश्रेष्ठो ! किंतु अब कलि
कलिद्वापरयोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना ।
और द्वापरके मध्यमें महात्मा व्यासने सरोवरका
सरःप्रमाणं यत्प्रोक्तं तच्छृणुध्वं द्विजोत्तमाः ॥ ५१
जो (वर्तमान) प्रमाण बतलाया है उसे आपलोग
सुनें। 'विश्वेश्वर' स्थानसे 'अस्थिपुर' तक और 'वृद्धा-
विश्वेश्वरादस्थिपुरं तथा कन्या जरद्गवी।
कन्या' से लेकर 'ओघवती' नदीतक यह सरोवर
यावदोधवती प्रोक्ता तावत्संनिहितं सरः ॥ ५२
स्थित है ॥ ४९-५२॥
मया श्रुतं प्रमाणं यत् पठ्यमानं तु वामने ।
ब्राह्मणश्रेष्ठो ! मैंने वामनपुराणमें वर्णित जो प्रमाण
तच्छृणुध्वं द्विजश्रेष्ठाः पुण्यं वृद्धिकरं महत् ॥ ५३
सुना है, आप उस पवित्र एवं कल्याणकारी प्रमाणको
सुनें। विश्वेश्वर स्थानसे देववरतक एवं नृपावनसे
विश्वेश्वराद् देववरो नृपावनात् सरस्वती।
सरस्वतीतक चतुर्दिक् आधे योजन (दो कोसों)-में
सरः संनिहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम् ॥ ५४
फैले इस संनिहित सरको समझना चाहिये। मोक्षकी
इच्छासे आये हुए देवता एवं ऋषिगण इसका आश्रय
एतदाश्रित्य देवाश्च ऋषयश्च समागताः ।
लेकर सदा इसका सेवन करते हैं तथा अन्य लोग
सेवन्ते मुक्तिकामार्थं स्वर्गार्थं चापरे स्थिताः ॥ ५५
स्वर्गके निमित्त यहाँ रहते हैं। योगेश्वर ब्रह्माने सृष्टिकी
ब्रह्मणा सेवितमिदं सृष्टिकामेन योगिना ।
इच्छासे एवं भगवान् श्रीविष्णुने जगत्के पालनकी
विष्णुना स्थितिकामेन हरिरूपेण सेवितम् ॥ ५६
कामनासे इसका आश्रय लिया था ॥ ५३-५६ ॥
रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना ।
(इसी प्रकार) सरोवरके मध्यमें पैठकर महात्मा
सेव्य तीर्थं महातेजाः स्थाणुत्वं प्राप्तवान् हरः ॥ ५७
रुद्रने भी इस तीर्थका सेवन किया, जिससे महातेजस्वी
(उन) हरको स्थाणुत्व (स्थिरत्व) प्राप्त हुआ। आदिमें
आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामह्रदः स्मृतः ।
यह 'ब्रह्मवेदी' कहा गया था, किंतु आगे चलकर
कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ॥ ५८
इसका नाम 'रामह्रद' हुआ। उसके बाद राजर्षि
कुरुद्वारा जोते जानेसे इसका नाम 'कुरुक्षेत्र' पड़ा।
तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं
तरन्तुक एवं अरन्तुक नामके स्थानोंका मध्य तथा
यदन्तरं रामह्रदाच्चतुर्मुखम् ।
रामह्रद एवं चतुर्मुखका मध्यभाग समन्तपञ्चक है, जो
एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं
कुरुक्षेत्र कहा जाता है। इसे पितामहकी उत्तरवेदी भी
पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥ ५९
कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥

१२०श्रीवामनपुराण[ अध्याय २३

तेईसवाँ अध्याय

वामन-चरितका उपक्रम, बलिका दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य-लक्ष्मीका वर्णन

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br><br>ब्रूहि वामनमाहात्म्यमुत्पत्तिं च विशेषतः।<br>यथा बलिर्नियमतो दत्तं राज्यं शतक्रतोः॥ १ऋषियोंने कहा—(कृपया आप) वामनके माहात्म्य और विशेषकर उनकी उत्पत्तिका वर्णन (विस्तारसे) करें तथा यह भी बतलायें कि बलिको किस प्रकार बाँधकर इन्द्रको राज्य दिया गया॥ १॥
लोमहर्षण उवाच<br><br>शृणुध्वं मुनयः प्रीता वामनस्य महात्मनः।<br>उत्पत्तिं च प्रभावं च निवासं कुरुजाङ्गले॥ २<br><br>तदेव वंशं दैत्यानां शृणुध्वं द्विजसत्तमाः।<br>यस्य वंशे समभवद् बलिवैरोचनिः पुरा॥ ३<br><br>दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुः पुरा।<br>तस्य पुत्रो महातेजाः प्रह्लादो नाम दानवः॥ ४<br><br>तस्माद् विरोचनो जज्ञे बलिर्जज्ञे विरोचनात्।<br>हते हिरण्यकशिपौ देवानुत्साद्य सर्वतः॥ ५<br><br>राज्यं कृतं च तेनेष्टं त्रैलोक्ये सचराचरे।<br>कृतयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यतां गते॥ ६**लोमहर्षणने कहा—**मुनियो! आपलोग प्रसन्नतापूर्वक महात्मा वामनकी उत्पत्ति, उनका प्रभाव और कुरुजाङ्गल स्थानमें उनके निवासका वर्णन सुनें! द्विजश्रेष्ठो! आपलोग दैत्योंके उस वंशके सम्बन्धमें भी सुनें, जिस वंशमें प्राचीनकालमें विरोचनके पुत्र बलि उत्पन्न हुए थे। पहले समयमें दैत्योंका आदिपुरुष हिरण्यकशिपु था। उसका प्रह्लाद नामक पुत्र अत्यन्त तेजस्वी दानव था। उससे विरोचन उत्पन्न हुआ और विरोचनसे बलि। हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर बलिने सभी स्थानोंसे देवताओंको खदेड़ दिया और वह चराचरसहित तीनों लोकोंका राज्य स्वच्छन्दतासे करने लगा। (विरोधमें) देवताओंके (बहुत) प्रयत्न करते रहनेपर भी तीनों लोक दैत्योंके अधीन हो ही गये (एवं त्रैलोक्यपर देवताओंका अधिकार नहीं रह गया)॥ २—६॥
जये तथा बलवतोर्मयशम्बरयोस्तथा।<br>शुद्धासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि॥ ७<br><br>संप्रवृत्ते दैत्यपथे अयनस्थे दिवाकरे।<br>प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि॥ ८<br><br>दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते।<br>देवेषु मखशोभां च स्वर्गस्थां दर्शयत्सु च॥ ९<br><br>प्रकृतिस्थे ततो लोके वर्तमाने च सत्पथे।<br>अभावे सर्वपापानां धर्मभावे सदोत्थिते॥ १०बलशाली मय और शम्बरकी विजय-वैजयन्ती फहराने लग गयी। धर्मकार्य सर्वत्र होने लग गये। फलतः दिशाएँ शुद्ध हो गयीं। सूर्य दैत्योंके मार्ग (दक्षिण अयन)-में चले गये। (दैत्योंके शासनमें) प्रह्लाद, शम्बर, मय तथा अनुह्लाद—ये सभी दैत्य सभी दिशाओंकी रक्षा करने लगे। आकाश भी दैत्योंसे रक्षित हो गया। देवगण स्वर्गमें होनेवाले यज्ञोंकी शोभा देखने लगे। सारा संसार प्रकृतिमें स्थित और (व्यवस्थित) हो गया तथा सभी सन्मार्गपर चलने लगे। सर्वत्र पापोंका अभाव और धर्मभावका उत्कर्ष हो गया॥ ७—१०॥

अध्याय २३ ]
वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना
१२१
चतुष्पादे स्थिते धर्मे ह्यधर्मे पादविग्रहे।
प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु।
स्वधर्मसंप्रयुक्तेषु तथाश्रमनिवासिषु ॥ ११
फिर तो धर्म चारों चरणोंसे प्रतिष्ठित हो गया
और अधर्म एक ही चरणपर स्थित रह गया। सभी
राजा (भलीभाँति) प्रजापालन करते हुए सुशोभित
होने लगे और सभी आश्रमोंके लोग अपने-
अपने धर्मका पालन करने लगे। ऐसे समयमें असुरोंने
बलिको दैत्यराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया।
असुरोंका समुदाय हर्षित होकर निनाद (जय-जयकार)
करने लगा। इसके बाद कमलके भीतरी गोफाके
समान कान्तिवाली वरदायिनी और सुन्दर सुवेशवाली
श्रीलक्ष्मीदेवी हाथमें कमल लिये हुए बलिके
समीप आयीं ॥ ११-१३॥
अभिषिक्तो सुरैः सर्वैर्दैत्यराज्ये बलिस्तदा।
हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ॥ १२
अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मान्तरप्रभा।
पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुप्रवेशिनी ॥ १३
श्रीरुवाच
बले बलवतां श्रेष्ठ दैत्यराज महाद्युते।
प्रीताऽस्मि तव भद्रं ते देवराजपराजये ॥ १४
लक्ष्मीने कहा - बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी
दैत्यराज बलि ! देवराजके पराजय हो जानेपर मैं तुमपर
प्रसन्न हूँ। तुम्हारा मङ्गल हो; क्योंकि तुमने संग्राममें
पराक्रम दिखाकर देवोंके राज्यको जीत लिया है।
इसलिये तुम्हारे श्रेष्ठ बलको देखकर मैं स्वयं आयी
हूँ। दानव ! असुरोंके स्वामी ! हिरण्यकशिपुके कुलमें
उत्पन्न हुए तुम्हारा यह कर्म ऐसा है - इसमें कोई
आश्चर्यकी बात नहीं है। राजन् ! आप दैत्यश्रेष्ठ अपने
प्रपितामह हिरण्यकशिपुसे भी विशिष्ट (प्रभावशाली)
हैं; क्योंकि आप पूरे तीनों लोकोंमें समृद्ध इस राज्यका
भोग कर रहे हैं ॥ १४-१७॥
यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराज्यं पराजितम् ।
दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ॥ १५
नाश्चर्यं दानवव्याघ्र हिरण्यकशिपोः कुले।
प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम् ॥ १६
विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ।
येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १७
दैत्यराज बलिसे ऐसा कहनेके बाद
सर्वदेवस्वरूपिणी एवं मनोहर रूपवाली सबकी सेव्य
एवं (सबको) वर देनेवाली श्रीलक्ष्मी देवी राजा
बलिमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सभी श्रेष्ठ देवियाँ - ह्री,
कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, ऋद्धि, दिव्या,
महामति, श्रुति, स्मृति, इडा, कीर्ति, शान्ति, पुष्टि,
क्रिया और नृत्तगीतमें निपुण दिव्य अप्सराएँ भी प्रसन्न
होकर दैत्येन्द्र (बलि) - का सेवन करने लगीं। इस
प्रकार ब्रह्मवादी बलिने चर-अचरवाले त्रिलोकीका
अतुल ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १८-२१ ॥
एवमुक्त्वा तु सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यनृपं बलिम् ।
प्रविष्टा वरदा सेव्या सर्वदेवमनोरमा ॥ १८
तुष्टाश्च देव्यः प्रवराः ह्रीः कीर्तिर्युतिरेव च।
प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्ऋद्धिर्दिव्या महामतिः ॥ १९
श्रुतिः स्मृतिरिडा कीर्तिः शान्तिः पुष्टिस्तथा क्रिया ।
सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्तगीतविशारदाः ॥ २०
प्रपद्यन्ते स्म दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
प्राप्तमैश्वर्यमतुलं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ २१
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥