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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 129

अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य १९९
लोमहर्षण उवाच
लोमहर्षणजी बोले- सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले
ब्रह्माणमग्र्यं कमलासनस्थं
कमलासन ब्रह्मा, लक्ष्मीके सहित विष्णु और महादेव
विष्णुं तथा लक्ष्मिसमन्वितं च।
रुद्रको सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं महान् ब्रह्मसर
रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूर्ध्ना
तीर्थका वर्णन करता हूँ। ब्रह्माने पहले कहा था कि
तीर्थं महत् ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये ॥ ४९
वह 'संनिहित' सरोवर 'रन्तुक' नामक स्थानसे लेकर
रन्तुकादौजसं यावत् पावनाच्च चतुर्मुखम् ।
'औजस' नामक स्थानतक तथा 'पावन' से 'चतुर्मुख'
सरः संनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥ ५०
तक फैला हुआ है। ब्राह्मणश्रेष्ठो ! किंतु अब कलि
कलिद्वापरयोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना ।
और द्वापरके मध्यमें महात्मा व्यासने सरोवरका
सरःप्रमाणं यत्प्रोक्तं तच्छृणुध्वं द्विजोत्तमाः ॥ ५१
जो (वर्तमान) प्रमाण बतलाया है उसे आपलोग
सुनें। 'विश्वेश्वर' स्थानसे 'अस्थिपुर' तक और 'वृद्धा-
विश्वेश्वरादस्थिपुरं तथा कन्या जरद्गवी।
कन्या' से लेकर 'ओघवती' नदीतक यह सरोवर
यावदोधवती प्रोक्ता तावत्संनिहितं सरः ॥ ५२
स्थित है ॥ ४९-५२॥
मया श्रुतं प्रमाणं यत् पठ्यमानं तु वामने ।
ब्राह्मणश्रेष्ठो ! मैंने वामनपुराणमें वर्णित जो प्रमाण
तच्छृणुध्वं द्विजश्रेष्ठाः पुण्यं वृद्धिकरं महत् ॥ ५३
सुना है, आप उस पवित्र एवं कल्याणकारी प्रमाणको
सुनें। विश्वेश्वर स्थानसे देववरतक एवं नृपावनसे
विश्वेश्वराद् देववरो नृपावनात् सरस्वती।
सरस्वतीतक चतुर्दिक् आधे योजन (दो कोसों)-में
सरः संनिहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम् ॥ ५४
फैले इस संनिहित सरको समझना चाहिये। मोक्षकी
इच्छासे आये हुए देवता एवं ऋषिगण इसका आश्रय
एतदाश्रित्य देवाश्च ऋषयश्च समागताः ।
लेकर सदा इसका सेवन करते हैं तथा अन्य लोग
सेवन्ते मुक्तिकामार्थं स्वर्गार्थं चापरे स्थिताः ॥ ५५
स्वर्गके निमित्त यहाँ रहते हैं। योगेश्वर ब्रह्माने सृष्टिकी
ब्रह्मणा सेवितमिदं सृष्टिकामेन योगिना ।
इच्छासे एवं भगवान् श्रीविष्णुने जगत्के पालनकी
विष्णुना स्थितिकामेन हरिरूपेण सेवितम् ॥ ५६
कामनासे इसका आश्रय लिया था ॥ ५३-५६ ॥
रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना ।
(इसी प्रकार) सरोवरके मध्यमें पैठकर महात्मा
सेव्य तीर्थं महातेजाः स्थाणुत्वं प्राप्तवान् हरः ॥ ५७
रुद्रने भी इस तीर्थका सेवन किया, जिससे महातेजस्वी
(उन) हरको स्थाणुत्व (स्थिरत्व) प्राप्त हुआ। आदिमें
आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामह्रदः स्मृतः ।
यह 'ब्रह्मवेदी' कहा गया था, किंतु आगे चलकर
कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ॥ ५८
इसका नाम 'रामह्रद' हुआ। उसके बाद राजर्षि
कुरुद्वारा जोते जानेसे इसका नाम 'कुरुक्षेत्र' पड़ा।
तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं
तरन्तुक एवं अरन्तुक नामके स्थानोंका मध्य तथा
यदन्तरं रामह्रदाच्चतुर्मुखम् ।
रामह्रद एवं चतुर्मुखका मध्यभाग समन्तपञ्चक है, जो
एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं
कुरुक्षेत्र कहा जाता है। इसे पितामहकी उत्तरवेदी भी
पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥ ५९
कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥