सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

अध्याय २३ ]
वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना
१२१
चतुष्पादे स्थिते धर्मे ह्यधर्मे पादविग्रहे।
प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु।
स्वधर्मसंप्रयुक्तेषु तथाश्रमनिवासिषु ॥ ११
फिर तो धर्म चारों चरणोंसे प्रतिष्ठित हो गया
और अधर्म एक ही चरणपर स्थित रह गया। सभी
राजा (भलीभाँति) प्रजापालन करते हुए सुशोभित
होने लगे और सभी आश्रमोंके लोग अपने-
अपने धर्मका पालन करने लगे। ऐसे समयमें असुरोंने
बलिको दैत्यराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया।
असुरोंका समुदाय हर्षित होकर निनाद (जय-जयकार)
करने लगा। इसके बाद कमलके भीतरी गोफाके
समान कान्तिवाली वरदायिनी और सुन्दर सुवेशवाली
श्रीलक्ष्मीदेवी हाथमें कमल लिये हुए बलिके
समीप आयीं ॥ ११-१३॥
अभिषिक्तो सुरैः सर्वैर्दैत्यराज्ये बलिस्तदा।
हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ॥ १२
अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मान्तरप्रभा।
पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुप्रवेशिनी ॥ १३
श्रीरुवाच
बले बलवतां श्रेष्ठ दैत्यराज महाद्युते।
प्रीताऽस्मि तव भद्रं ते देवराजपराजये ॥ १४
लक्ष्मीने कहा - बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी
दैत्यराज बलि ! देवराजके पराजय हो जानेपर मैं तुमपर
प्रसन्न हूँ। तुम्हारा मङ्गल हो; क्योंकि तुमने संग्राममें
पराक्रम दिखाकर देवोंके राज्यको जीत लिया है।
इसलिये तुम्हारे श्रेष्ठ बलको देखकर मैं स्वयं आयी
हूँ। दानव ! असुरोंके स्वामी ! हिरण्यकशिपुके कुलमें
उत्पन्न हुए तुम्हारा यह कर्म ऐसा है - इसमें कोई
आश्चर्यकी बात नहीं है। राजन् ! आप दैत्यश्रेष्ठ अपने
प्रपितामह हिरण्यकशिपुसे भी विशिष्ट (प्रभावशाली)
हैं; क्योंकि आप पूरे तीनों लोकोंमें समृद्ध इस राज्यका
भोग कर रहे हैं ॥ १४-१७॥
यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराज्यं पराजितम् ।
दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ॥ १५
नाश्चर्यं दानवव्याघ्र हिरण्यकशिपोः कुले।
प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम् ॥ १६
विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ।
येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १७
दैत्यराज बलिसे ऐसा कहनेके बाद
सर्वदेवस्वरूपिणी एवं मनोहर रूपवाली सबकी सेव्य
एवं (सबको) वर देनेवाली श्रीलक्ष्मी देवी राजा
बलिमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सभी श्रेष्ठ देवियाँ - ह्री,
कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, ऋद्धि, दिव्या,
महामति, श्रुति, स्मृति, इडा, कीर्ति, शान्ति, पुष्टि,
क्रिया और नृत्तगीतमें निपुण दिव्य अप्सराएँ भी प्रसन्न
होकर दैत्येन्द्र (बलि) - का सेवन करने लगीं। इस
प्रकार ब्रह्मवादी बलिने चर-अचरवाले त्रिलोकीका
अतुल ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १८-२१ ॥
एवमुक्त्वा तु सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यनृपं बलिम् ।
प्रविष्टा वरदा सेव्या सर्वदेवमनोरमा ॥ १८
तुष्टाश्च देव्यः प्रवराः ह्रीः कीर्तिर्युतिरेव च।
प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्ऋद्धिर्दिव्या महामतिः ॥ १९
श्रुतिः स्मृतिरिडा कीर्तिः शान्तिः पुष्टिस्तथा क्रिया ।
सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्तगीतविशारदाः ॥ २०
प्रपद्यन्ते स्म दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
प्राप्तमैश्वर्यमतुलं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ २१
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥