चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ३६
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ३६
नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः ।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥ ४६ ॥
हितकारी आहार और हितकारी विहार का सेवन करने तथा सोच विचार
कर कार्य करने वाले, विषयों मे न फँसे, त्यागशील, दानी, सब प्राणियों मे
समान भाव रखने वाले, सत्यपरायण, क्षमाशील, आप्त जन के सेवी, सत्संग
करने वाले पुरुष को रोग नहीं सताते, वह सदा नीरोग रहता है ॥ ४६ ॥
मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धि सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः ।
ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुत्तपन्ति रोगाः ॥ ४७ ॥
जिसकी मति, ( मन ) कर्म और वचन सुख उत्पन्न करने वाले हो, जिसका
मन, पाप रहित और वश में है जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो, जो स्वयं तप और
योग में तत्पर होता है, उसको रोग नहीं सताते ॥ ४७ ॥
तत्र श्लोकाः ।
इहाग्निवेशस्य महार्थयुक्तं षट्त्रिंशकं प्रश्नगणं महर्षिः ।
अतुल्यगोत्रे भगवान् यथावन्निर्णितवाञ्ज्ञानविवर्धनार्थम् ॥ ४८ ॥
भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने इस अतुल्य गोत्रीय शारीर में शिष्यों के ज्ञान
बढ़ाने के लिये बड़े अर्थयुक्त छत्तीस प्रश्नों का यथावत् निर्णय किया है ।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने अतुल्य-
गोत्रीयशारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ।
अथात खुड्डीकां गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे खुड्डीका गर्भावक्रान्ति (गर्भाशय में जीव के आगमन) नामक
शारीर का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
पुरुषस्यानुपहतरेतसः स्त्रियाश्चाप्रदुष्ट-योनि शोणित-गर्भाशयाया-
यदा भवति संसर्ग ऋतुक़ाले, यदा चानयोस्तथैव युक्ते च संसर्गे शुक्र-
शोणित-संसर्गमन्तर्गर्भाशयगत जीवोऽवक्रामति सत्त्वसंप्रयोगात्तदा
गर्भोऽभिनिर्वर्त्तते, स सात्म्यरसोपयोगादरोगोऽभिसंवर्धते सम्यगुपचा-
४० चरकसंहिता [ अ० ३
रैश्चोपचर्यमाणस्ततः प्राप्तकालः सर्वेन्द्रियोपपन्नः परिपूर्णसर्वशरीरो बल-
वर्ण-सत्त्व-संहनन-संपदुपेतः सुखेन जायते समुदायादेषां भावानाम् ॥३॥
दोष से रहित वीर्य वाला पुरुष, जब दोष से रहित योनि रक्त (रज) और
गर्भाशय वाली स्त्री के साथ ऋतु-समय में ससर्ग करता है और जब इनके
ऋतु-काल में ससर्ग करने पर शुक्र गर्भाशय में पहुच कर शोणित (रज) के
साथ मिलता है तब मन से युक्त जीव (चेतन) उसमें आ जाता है, तब गर्भ
बनता है। और यह गर्भ सात्म्य रसों के उपयोग से तथा गर्भिणी के गर्भाशय में
हितकारक उपचारों से पोषित होकर नीरोग रह कर बढ़ता है। पीछे ठीक
प्रसव काल (नवम या दशम मास) तक सब इन्द्रियों से युक्त पूर्ण शरीर
वाला, बल, वर्ण, सत्त्व और शरीर रचना के उत्तम गुणों से युक्त होकर निम्न-
लिखित माता आदि छ पदार्थों के मयोग से सुखपूर्वक उत्पन्न हो जाता है ॥३॥
मातृजश्चायं गर्भः पितृजश्चाऽऽत्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च । अस्ति
च सत्त्वमुपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः ॥ ४ ॥
इसलिये यह गर्भ माता से उत्पन्न अर्थात् (शोणितजन्य) है, पिता से उत्पन्न
(शुक्रजन्य) है, आत्मा से उत्पन्न, सात्म्य से उत्पन्न, रस से उत्पन्न है और
सत्त्वसंज्ञावाला मन भी इसकी उत्पत्ति में घटक है। [क्योंकि शुक्र शोणित के
साथ ही यह मन आत्मा का सम्बन्ध कराता है, इसलिये गर्भ सत्त्वजन्य भी है]।
ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ ४ ॥
नेति भरद्वाजः । किं कारणम् । न हि माता, न पिता, नात्मा, न
सात्म्यं, न पानाशन-भक्ष्य-लेह्योपयोगा गर्भं जनयन्ति, न च परलोका-
देत्य गर्भं सत्त्वमवक्रामति ॥ ५ ॥
विद्वान् भरद्वाज ने कहा—नही यह बात नहीं है। क्योंकि न माता, न
पिता, न आत्मा, न सात्म्य, न पान, अशन, भक्ष्य और लेह्य इन से उत्पन्न
रस गर्भ को उत्पन्न करते हैं और न 'सत्त्व' (चित्त) परलोक से आकर गर्भ मे
प्रवेश करता है, अतः गर्भ माता आदि छः पदार्थों से उत्पन्न नहीं होता ॥ ५ ॥
यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेताम् भूयस्यः स्त्रियः पुमांसश्च
भूयासः पुत्रकामाः, ते सर्वे पुत्रजन्माभिसंधाय मैथुनधर्ममापद्यमानाः
पुत्रानेव जनयेयुर्दुहितॄर्वा दुहितृकामाः, न तु काश्चित् स्त्रियः केचिद्वा
पुरुषा निरपत्याः स्युरपत्यकामा वा परिदेवेरन् ॥ ६ ॥
यदि गर्भ की उत्पत्ति मे माता पिता कारण हों तो बहुत सी स्त्रियाँ और
बहुत से पुरुष पुत्रकामना और कन्याकामना वाले होते है। वे पुत्र की कामना
से पुत्रों और कन्या की कामना से कन्याओं को उत्पन्न कर लिया करें। कोई
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४१
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४१
भी स्त्री वा पुरुष बिना संतान के न रहे । कोई संतान की इच्छा वाले स्त्री वा
पुरुष संतान के लिये कभी दुःखी न हों और न विलाप किया करे ॥ ६ ॥
न चाऽऽत्माऽऽत्मानं जनयति । यदि ह्यात्माऽऽत्मानं जनयेज्जातो
वा जनयेदात्मानमजातो वा ? तच्चोभयथाऽप्ययुक्तं, न हि जातो जनयति,
सत्त्वात्, न चाजातो जनयति, असत्त्वात्, तस्मादुभयथाऽप्यनुपपत्तिः,-
तिष्ठतु तावदेतत्, यद्ययमात्मानं शक्तो जनयितुं स्यात् , नत्वेवमिष्टास्वेव
कथ योनिषु जनयेदृशिनमप्रतिहतगति कामरूपिण तेजो बल-जव-वर्ण-
सत्त्व-संहनन-समुदितमजरममरुजममरम् । एवविधं ह्यात्माऽऽत्मान-
मिच्छत्यतो वा भूयः ॥ ७ ॥
आत्मा भी आत्मा को उत्पन्न नहीं करता । यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न
करे तब तो क्या वह स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को उत्पन्न करता है या
बिना उत्पन्न हुए ही दूसरे को पैदा करता है ? दोनो प्रकार से सम्भव नही है ।
क्योंकि स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को पैदा नही करता, क्योकि वह स्वयं
ही अविद्यमान है ? और उत्पन्न हुए बिना भी ( कारण का अभाव होने से )
वह उत्पन्न नहीं कर सकता । क्योंकि वह स्वयं नहीं है, इसलिये दोनों ही प्रकार
से आत्मा की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अच्छा यही मान लेते हैं कि-आत्मा
आत्मा को उत्पन्न करता है, तो फिर आत्मा इष्ट योनियों में ही जन्म क्यों न
लेवे ? अनिष्ट योनियों में क्यों जन्म लेवे ? यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न कर
सके तो जिसके अधीन यह भूत-भौतिक सब ससार है ऐसे वशी, अप्रतिहत गति
वाले (बे-रोकटोक जाने वाले), यथेच्छ रूपधारी, तेज, बल, वर्ण, सत्त्व, संहनन से
युक्त अजर, अमर, नीरोग आत्मा को ही उत्पन्न करे । क्योकि आत्मा अपनी
आत्मा को इन उपरोक्त गुणों से युक्त अथवा इन से भी अधिक गुणो वाला
चाहता है ॥ ७ ॥
असात्म्यजश्चायं गर्भः । यदि हि सात्म्यज स्यात्, नहि सात्म्य-
सेविनामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्,असात्म्यसेविनश्च निखिलेनानपत्याःस्युः,
तच्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ८ ॥
यह गर्भ सात्म्य से भी उत्पन्न नहीं होता है। यदि गर्भ की उत्पत्ति मे सात्म्य
ही कारण हो तो सात्म्यसेवियो के ही केवल संतान उत्पन्न होनी चाहिये और असा-
त्म्यसेवी सब के सब बिना संतान के रहने चाहिये । परन्तु दोनों दोनों प्रकार के
देखे जाते हैं ॥ ८ ॥
अरसजश्चायं गर्भः, यदि हि रसजः स्यात् , न केचित्स्त्रीपुरुषेष्वन-
पत्याः स्युः, न हि कश्चिदस्त्येषां यो रसान्नोपयुङ्क्ते । श्रेष्ठरसोपयोगिनां चेद्
४२ चरकसंहिता [ अ० ३
गर्भा जायन्ते इत्यतोऽभिप्रत, इत्येवं सत्याजौरभ्र-मार्ग-मायूर-रस-गोक्षीर-
दधि-घृत-मधु-तैल-सैन्धवेक्षु-रस-मुद्ग-शालिभृतानामेवैकान्तेन प्रजा
स्यात्, श्यामाक-वरकोद्दाल कोरदूषक-कन्द-मूल-भक्ष्याश्च निखिलेनान-
पत्याः स्युः, तच्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ६ ॥
गर्भ रस से भी उत्पन्न नहीं होता। यदि रस से उत्पन्न होता तो कोई भी
स्त्री वा पुरुष बिना सन्तान के न रहते । ऐसा काई भी मनुष्य नहीं जो रसों का
सेवन नहीं करता । यदि यह अभिप्राय है कि श्रेष्ठ रस सेवन करने वालों के ही
सन्तान होती है तो बकरा, मेढ़ा, मृग, मोर, इनके मांस रस, गाय का दूध, दही,
घी, शहद, तेल, नमक, गन्ने का रस, मूंग, शालि धान्य आदि से पुष्ट व्यक्तियों
के ही सन्तान होवे और श्यामाक, वर, कोद्दालक, कोरदूषक, कन्द, मूल, फल आदि
हीन धान्य खाने वाले सब बिना सन्तान के रहने चाहिये । परन्तु दोनों में दोनों
बातें देखी जाती है ॥ ६ ॥
न खल्वपि परलोकादेत्य सत्त्वं गर्भमवक्रामति । यदि ह्येनमवक्रामेन्
नास्य किंचिदेव पौर्वदेहिकं स्यादविदितमदृष्टं वा, न च किंचिदपि
स्मरति ॥ १० ॥
तस्मादेतद् ब्रूमहे-अमातृजश्चायं गर्भोऽपितृजश्चानात्मजश्चासात्म्य-
जश्चार सजश्च, न चास्ति सत्त्वमौपपादुकमिति होवाच भरद्वाजः ॥११॥
सत्त्व भी परलोक से आकर भी गर्भ में नहीं आता । क्योंकि यदि सत्त्व पर-
लोक से आकर जन्म ग्रहण करे तो इस गर्भ को पूर्व जन्म की कोई भी बात
अज्ञात और न देखी होनी चाहिये, प्रत्युत उसे पिछले जन्म की सब बाते ज्ञात
रहना चाहिये । परन्तु वह पूर्व जन्म की कोई भी बात स्मरण नहीं रखता । इस-
लिये सत्त्व भी कारण नहीं । इसी लिये हम कहते हैं कि गर्भ न माता से, न
पिता से, न आत्मा से, न सात्म्य से, न रस से उत्पन्न होता है और न सत्त्व ही
इसका उत्पत्ति कारण है ॥ ११ ॥
नेति भगवानात्रेयः, सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभि-
निवर्त्तते ॥ १२ ॥
मातृजश्चायं गर्भः । न हि मातुर्विना गर्भोपपत्तिः स्यान्न च जन्म-
जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य मातृजानि यानि चास्य मातुतः
सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—त्वक् च लोहितं
च मांसं च मेदश्च नाभिश्च हृदयं च क्लोम च यकृच्च प्लीहा च वृक्कौ च
बस्तिश्च पुरीषाधानं चाऽऽमाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं च
क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वपा च वपावहनं चेति मातृजानि ॥ १३ ॥
[अ० ३] शारीरस्थानम् ४३
[अ० ३] शारीरस्थानम् ४३
भगवान् आत्रेय कहते हैं—भरद्वाज का ऐसा कथन ठीक नहीं है। क्योकि
माता आदि इन सब पदार्थो के मिलने से ही गर्भ बनता है। यह सब गर्भ माता
से उत्पन्न होता है। माता के बिना गर्भ की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। जरायु से
उत्पन्न प्राणियों की उत्पत्ति माता के बिना सम्भव ही नहीं। इस गर्भ के जो
अवयव माता से उत्पन्न होते हैं, उनको विस्तार से कहते हैं। यथा—त्वचा, रक्त,
मांस, मेद, नाभि, हृदय, क्लोम, (तिलक), यकृत्, प्लीहा, दो वृक्क (दो कुक्षि
गोष्ठक, गुर्दै), बस्ति, पक्वाशय, आमाशय, मलाशय, (बृहदान्त्र), उत्तर गुदा
अधर गुदा, क्षुद्रान्त्र, स्थूलान्त्र और वपा (हृदयस्थ मेद), तथा वपावाही स्रोत
ये सब मृदु भाग माता से उत्पन्न होते हैं ॥ १२-१३ ॥
पितृजश्चायं गर्भः, न हि पितुऋते गर्भोत्पत्तिः स्यान्न च जन्म
जरायुजानाम्। यानि खल्वस्य गर्भस्य पितृजानि, यानि चास्य पितृतः
सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—केश-श्मश्रु-नख-
लोम-दन्तास्थि-सिरा-स्नायु-धमन्यः शुक्रमिति पितृजानि ॥ १४ ॥
यह गर्भ पिता से भी उत्पन्न होता है। पिता के बिना गर्भ की उत्पत्ति
नहीं हो सकती ओर न जरायुज प्राणि ही उत्पन्न हो सकते हैं। इस गर्भ के जो
अवयव पिता से बनते हैं उनका अब वर्णन करते हैं। जैसे-केश, श्मश्रु, लोम,
नख, दन्त, अस्थि (हड्डी) सिरा, स्नायु, धमनियां और शुक्र ॥ १४ ॥
आत्मजश्चायं गर्भः । गर्भात्मा ह्यन्तरात्मा यस्तं जीव इत्याचक्षते
शाश्वतमरुजमजरममरमक्षयमभेद्यमच्छेद्यमलोड्यं विश्वरूपं विश्व-
कर्माणमव्यक्तमनादिनिधनमक्षरमपि । स गर्भाशयमनुप्रविश्य शुक्र-
शोणिताभ्यां संयोगमेत्य गर्भत्वेन जनयत्यात्मानं, आत्मसञ्ज्ञा हि गर्भे ।
तस्य पुनरात्मनो जन्मनादित्वाच्चोपपद्यते, तस्मादजात एवायं गर्भं
जनयति, अजातो ह्ययमजातं गर्भं जनयति । स चैव गर्भः कालान्तरेण
बाल-युव-स्थविर-भावानवाप्नोति, स यस्यां यस्यामवस्थायां वर्तते
तस्यां तस्यां जातो भवति, या त्वस्य पुरस्कृता तस्यां जनिष्यमाणश्च,
तस्मात्स एव जातश्चाजातश्च युगपद्भवति, यस्मिंश्चैतदुभयं सम्भवति
जातत्वं जनिष्यमाणत्वं च, स च जातो जन्यते, स चैवानागतेष्ववस्था-
न्तरेष्वजातो जनयत्यात्मनाऽऽत्मानं, सतां ह्यवस्थान्तरगमनमात्रमेव
हि जन्म चोच्यते तत्र तत्र वयसि तस्यां तस्यामवस्थायां, यथा सता-
मेव शुक्रशोणितजीवानां प्राक्संयोगाद् गर्भत्वं न भवति, तच्च संयोगा
द्भवति, यथा सततस्तस्यैव च पुरुषस्य प्रागपत्यात्पितृत्वं न भवति, तच्चा-
पत्याद्भवति, तथा सततस्तस्यैव गर्भस्य तस्यां तस्यामवस्थायां जातत्व-
मजातत्त्वं चोच्यते ॥ १५ ॥
४४ चरकसंहिता [ अ० ३
यह गर्भ आत्मा से उत्पन्न है, गर्भ के आत्मा को ही अन्तरात्मा कहते हैं,
यही जीव है । इसीको शाश्वत , अज, अमर, अक्षय, अभेद्य, अच्छेद्य, अलोढ्य,
विश्वरूप, विश्वकर्मा, अव्यक्त, अनादि, अनिधन, अक्षर आदि पर्य्यायो से कहते
हैं । यह अन्तरात्मा जीव, गर्भाशय में प्रविष्ट होकर शुक्रशोणित के साथ मिलकर
अपने आप को रूप मे उत्पन्न करता है । इसलिये गर्भ में इसका नाम 'आत्मा'
है । इस आत्मा के अनादि होने से इस का जन्म नहीं होता । इसलिये वह
स्वयं उत्पन्न न होकर भी आत्मा गर्भ को ही उत्पन्न करता है, स्वयं उत्पन्न हुए
बिना ही वह न उत्पन्न हुए गर्भ को उत्पन्न करता है । यह गर्भ कालक्रम से
बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होता है । यह जिस जिस
अवस्था में रहता है, उस उस अवस्था मे उत्पन्न हुआ कहा जाता है । जो
अवस्था इसकी आगे भविष्य में आने को होती है उसमें यह अज्ञात, अनुत्पन्न
रहता है । इस लिये वह उत्पन्न और अनुत्पन्न एक समय में दोनों ही एक
साथ रहता है । क्योकि उसमें उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होना यह दोनों
धर्म रहते हैं । अत यह आत्मा उत्पन्न होकर भी अनुत्पन्न ही है और भविष्य
में आनेवाली अवस्थाओं में न उत्पन्न हो कर ही अपने को अपने आप उत्पन्न
करता है । सत् विद्यमान आत्मा का एक अवस्था से दूसरी अवस्था में विद्य-
मान रहते हुए भी उस उस आयु और उस उस अवस्था मे जाने का नाम ही
'जन्म' है और शुक्र-आर्त्तव और जीव इनके संयोग होने से पूर्व गर्भ नही
होता । इनके संयोग से ही गर्भ बनता है और जिस प्रकार पुरुष के रहते हुए
भी पुत्र के बिना हुए इसमें पितृभाव नहीं होता, पुत्र उत्पन्न होने से वह पिता
हो जाता है, इसी प्रकार आत्मा के रहते हुए भी उस उस अवस्था मे 'उत्पन्न'
होने से वह उत्पन्न और न होने से 'अनुत्पन्न' हो जाता है ॥ १५ ॥
न तु खलु गर्भस्य मातुर्न पितुर्नात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति ।
ते किञ्चित्स्ववशात्कुर्वन्ति किंचित् कर्मवशात्, क्वचिच्चैषां करणशक्तेर्भव-
त्ति क्वचिन्न भवति, यत्र सत्त्वादिकरणसपत्तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारि-
त्वमतोऽन्यथा विपर्ययः । न च करणदोषादकरणमात्मा संभवति गर्भ-
जनने, दृष्टं चेष्टयोनिरैश्वर्यं मोक्षश्चात्मविद्भिरात्मायत्तं, न ह्यान्यः
सुखदुःखयोः कर्ता, न चान्यतो गर्भो जायते जायमानः, न चाङ्कु-
रोत्पत्तिर्बीजात् ॥ १६ ॥
गर्भ के बारे में माता, पिता और आत्मा अपनी इच्छा से सब कुछ नहीं
कर सकते । वे कुछ अपनी इच्छा से करते हैं और कुछ कर्मों के वश से करते
हैं । कहीं पर इनके साधन, उपाय आदि का शक्ति स कार्य होता है और कही
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अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४५
पर नहीं होता । जहां पर सत्त्व आदि साधन उत्तम होते हैं, वहा पर साधनों के
बल के अनुसार वे यथेष्ट कर सकते हैं। इस के विपरीत अर्थात् करण उत्तम
न रहने पर वे यथेष्ट नही कर सकते । इस प्रकार 'साधन के दोष से आत्मा
गर्भोत्पत्ति में कारण नहीं' यह कहना ठीक नहीं। देखा भी है कि इष्ट योनि,
ऐश्वर्य्य ( आवेश आदि ) और मोक्ष ये सब आत्मा के अधीन हैं, इसका
आत्मविद् ज्ञानियों ने साक्षात् अनुभव किया है । आत्मा के सिवाय दूसरा कोई
सुख दुख का कर्त्ता नहीं है । उत्पन्न होने वाला गर्भ आत्मा के सिवाय दूसरे
से उत्पन्न नहीं होता । जैसे बीज के बिना अंकुर की उत्पत्ति नहीं हो सकती
उसी प्रकार आत्मा के विना गर्भ उत्पन्न नहीं हो सकता ॥१६॥
यानि तु खल्वस्य गर्भस्याऽऽत्मजानि, यानि चास्याऽऽत्मतः संभ-
वत संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा-तासु तासु योनिषू-
त्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणि प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वर-
वर्णविशेषाः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ चेतना धृतिर्बुद्धि स्मृतिरहङ्कारः
प्रयत्नश्चेत्यात्मजानि ॥ १७ ॥
गर्भ की जो बाते आत्मा से उत्पन्न होती हे, या आत्मा के होने पर ही
होनी संभव है, उनका वर्णन करते हैं । जैसे-मनुष्य, तिर्यग् आदि नाना
योनियों मे जन्म, आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रिया, प्राण और अपान, प्रेरण
( इन्द्रिय मन का विषयो मे प्रेरित करना ) शरीर का धारण करना आदि
[ उन्मेष, निमेष, प्रयत्न आदि कर्म भी ], नाना आकृतिया, नाना स्वर और
नाना वर्ण आदि सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति, अहंकार
और प्रयत्न । इतनी बातें आत्मा से उत्पन्न होती है ॥ १७ ॥
सात्म्यजश्चायं गर्भः । न ह्यसात्म्यसेवित्वमन्तरेण स्त्रीपुरुषयोर्व-
न्ध्यत्वमस्ति गर्भेषु वाऽप्यनिष्टो भावः, यावत्खल्वसात्म्यसेविनां स्त्री-
पुरुषाणा त्रयो दोषाः प्रकुपिता. शरीरमुपसर्पन्तो न शुक्रशोणितगर्भा-
शयोपघातायोपपद्यन्ते, तावत्समर्था गभजननाय भवन्ति । सात्म्यसे-
विनां पुनः स्त्रीपुरुषाणामनुपहत-शुक्र-शोणित-गर्भाशयानामृतुकाले संनि-
पतितानां जीवस्यानवक्रमणाद् गर्भा न प्रादुर्भवन्ति, न हि केवलं
सात्म्यज एवायं गर्भ , समुदायोऽत्र कारणमुच्यते, यानि तु खल्वस्य
गर्भस्य सात्म्यजानि, यानि चास्य सात्म्यतः संभवतः संभवन्ति, तान्य-
नुव्याख्यास्यामः, तद्यथा-आरोग्यमनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः
स्वर-वर्ण-बीज-संपत् प्रहर्षभूयस्त्वं चेति सात्म्यजानि ॥ १८ ॥
४६ चरकसंहिता [ अ० ३
सात्म्य से गर्भ उत्पन्न होता है। असात्म्य-सेवन के बिना स्त्री पुरुष मे बांझ
पन या नपुसकता नहीं आती, अथवा गर्भ मे अनिष्ट दोष उत्पन्न नहीं होता।
असात्म्यसेवी स्त्री पुरुषों मे कुपित हुए तीनो वात आदि दोष जब तक शरीर में
फैल कर शुक्र आत्तव और गर्भाशय के नाश का कारण नहीं बनते, तब तक ये
स्त्री पुरुष गर्भ उत्पन्न करने में समर्थ रहते हैं। सात्म्यसेवी स्त्री पुरुषो के शुद्ध
शुक्र और आत्र्त्तव तथा गर्भाशय के शुद्ध होने पर ऋतुकाल में सम्भोग द्वारा
परस्पर मिल जाने पर भी जीव के प्रवेश न होने से गर्भ उत्पन्न नहीं होता।
क्योकि गर्भ की उत्पत्ति केवल सात्म्य पर ही निर्भर नहीं करती। गर्भोत्पत्ति में
समुदाय कारण है। गर्भ की जो बाते सात्म्य से उत्पन्न होती हैं या सात्म्य के
होने पर ही जिनका होना सम्भव है, उनका वर्णन करते हैं। जैसे—आरोग्य,
अप्रमाद, लोभ का न होना, इन्द्रियो का सौम्य भाव, प्रसन्नता, उत्तम स्वर,
उत्तम वर्ण, उत्तम बीज (शुक्र) और मैथुन मे हर्ष की अधिकता ये सात्म्य से
उत्पन्न होने वाले अश हैं ॥ १८ ॥
रसजश्चायं गर्भः । न हि रसादृते मातुः प्राणयात्राऽपि स्यात्किं
पुनर्गर्भजन्म, न चैवमसम्यगुपयुज्यमाना रसा गर्भमभिनिर्वर्तयन्ति,
न च केवल सम्यगुपयोगादेव रसानां गर्भाभिनिर्वृत्तिर्भवति, समु-
दायोऽप्यत्र कारणमुच्यते, यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि
चास्य रसतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्याम, तद्यथा—
शरीरस्याभिनिर्वृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति
रसजानि ॥ १६ ॥
यह गर्भ रस से उत्पन्न होता है । रस के विना तो माता की भी जीवन-
यात्रा नहीं चल सकती, फिर गर्भ के जन्म की तो बात ही क्या ? गर्भिणी के
रसों को अनुचित रीति में सेवन करने से भी गर्भ नही बनता और रसो के
सम्यग् उपयोग मात्र से भी गर्भ नहीं बनता। गर्भोत्पत्ति मे माता आदि का
समुदाय भी कारण है। इस गर्भ के जो अंश रस से उत्पन्न होते हैं, या जिन
अशो का रस के रहते हुए ही बनना सम्भव है, उनका वर्णन करते हैं। जैसे—
शरीर के प्रत्येक अग की पृथक् २ स्पष्टता, वृद्धि, प्राणों का, बल का अनुबन्ध
अर्थात् स्थिर रहना, तृप्ति, पुष्टि, उपचय और उत्साह । ये अंश रस से उत्पन्न
होते हैं ॥ १९ ॥
अस्ति खल्वपि सत्त्वमुपपादुकं यज्जीव स्पृक् शरीरेणाभिसंबध्नाति,
यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रि-
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४७
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४७
याण्युपतप्यन्ते, बल हीयते, व्याधय आप्यायन्ते, यस्माद्धीन प्राणाञ्ज-
हाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहक च मन इत्यभिधीयते, तत् त्रिविध-
माख्यायते—शुद्ध राजसं तामसं चेति। येनास्य खलु प्रयतो भूयिष्ठ,
तेन द्वितीयाया वाजातौ संप्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन संयुज्यते
तदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति, स्मार्तं हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैव
मनसोऽनुबन्धादनुवर्त्तते, यस्यानुवृत्ति पुरस्कृत्य पुरुषो जातिस्मर
इत्युच्यते इति सत्त्वमुक्तम्। यानि खल्वस्य गर्भस्य सत्त्वजानि, यानि
चास्य सत्त्वतः संभवतः संभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—
भक्तिः शीलं शौचं द्वेष स्मृतिर्मोहस्त्यागो मात्सर्यं शौर्यं भयं क्रोधस्त-
न्द्रोत्साहस्तैक्ष्ण्यं मार्दवं गाम्भीर्यमनवस्थितत्वमित्येवमादयश्चान्ये, ते
सत्त्वजा विकाराः, तानुत्तरकालं सत्त्वभेदमधिकृत्य उपदेक्ष्याम इति
सत्त्वजानि। नानाविधानि खलु सत्त्वानि तानि सर्वाण्येकपुरुषे भवन्ति,
न च भवन्त्येककालम्। एकं तु प्रायोवृत्त्याऽऽह ॥ २० ॥
सत्त्व भी गर्भ की उत्पत्ति का एक घटक है। शुक्र-शोणित से बने गर्भ-
शरीर में सब से प्रथम जीव का स्पर्श होता है। वहा सत्त्व (मन) ही स्पृक्-
शरीर के साथ आत्मा को जोडता है। आत्मा तो निष्क्रिय है, वह 'सत्त्व'
(मन) द्वारा ही देह में प्रवेश करता है। जिस के दूसरे देह में जाने के समय
मरणासन्न रागी के स्वभाव में परिवर्तन आ जाता है, इच्छा बदल जाती है,
सब इन्द्रिया पीड़ित होती हैं, बल क्षीण हो जाता है, रोग बढते है, जिनसे हीन
होने पर पुरुष प्राणों को छोड़ देता है, जो इन्द्रियो को अपने अपने विषयो में
प्रेरित करता है, उसीको 'मन' अर्थात् सत्त्व कहते हैं।
[ जो शरीर आत्मा को नित्य स्पर्श किये रहता है वह शरीर 'स्पृक्' शरीर
कहाता है। जिस सूक्ष्म देह में आत्मा एक देह से निकल कर दूसरे देह में
प्रवेश करता है वह देह आत्मा का निरन्तर स्पर्श किये रहने से 'स्पृक्शरीर'
कहाता है। उसका दूसरा नाम आतिवाहिक शरीर या कारण शरीर है। उस
कारण शरीर द्वारा ही मन भोगायतन शरीर से आत्मा को बाधता अथवा स्पृक्
शरीर स्पर्शवान् त्वचा से मढा यह स्थूल शरीर ही माना जाये। उसमें मन ही
आत्मा से उस शरीर का सम्बन्ध बनाता है। यदि मन का इस आत्मा के
शरीर से सम्बन्ध करने में कारण न माना जाये, तो आत्मा के व्यापक होने से
सर्वत्र ही ज्ञान की उपलब्धि होनी चाहिये। परन्तु नहीं होती तो स्पर्शवाले
शरीर में भी जिस जगह मन जुड़ता है वहा सुख दुःखादि की उपलब्धि होती
४८ चरकसंहिता [ अ० ३
है, अन्यत्र नहीं। 'स्पृक्' इस विशेषण से मूत्र, नख, केश आदि मे मन को
गति नहीं होने से आत्मा को ज्ञान नहीं होता ] ।
यह सत्त्व तीन प्रकार का बतलाया जाता है । शुद्ध, राजस और तामस ।
इस जन्म से देहान्तर में जाते समय मन के साथ से जो गुण अधिक मात्रा में
होगा, दूसरे जन्म में भी वही गुण अधिक मात्रा मे रहेगा । जिस समय मन में
शुद्ध सत्त्व की प्रधानता रहती है उस समय जीव अतीत जाति का भी स्मरण
करता है । ॐ आत्मा का यह स्मृति के योग्य ज्ञान शुद्ध सात्त्विक मन के योग से
होता है। जिस ज्ञान को मान कर पुरुष 'जातिस्मर' अर्थात् पूर्वजन्म को स्मरण
करने वाला कहा जाता है । इस प्रकार मन का विवेचन किया । गर्भ के जा
अश सत्त्व ( मन ) से उत्पन्न होते हैं या जो सत्त्व ( मन ) के होने पर ही होना
सम्भव हैं, उनका वर्णन करते हैं । जैसे—भक्ति, शील, पवित्रता, द्वेष, स्मृति,
मोह, त्याग, मत्सरता, शूरता, भय, क्रोध, तन्द्रा, उत्साह, तीक्ष्णता, मृदुता,
गम्भीरता, मन की अस्थिरता, आदि तथा अन्य अनेक सत्त्व से उत्पन्न होने वाले
विकार हैं जिनका सत्त्व का भेद वर्णन करने वाले प्रकरण में करेगे । यह सत्त्व
से उत्पन्न होने वाले अशो का विषय समाप्त हुआ ।
ये सत्त्व नाना प्रकार के हैं । ये सब एक पुरुष में रहते हैं, परन्तु वे सब
समय में नहीं रहते । प्राय सत्त्व एक ही रहता है इसलिये मन एक ही प्रकार
का कहा जाता है । इनमे जिस एक को प्रधानता रहती है, उसी गुण से वह कहा
जाता है । सत्त्व की अधिकता से सात्त्विक, रज की अधिकता से राजस, तम की
अधिकता से तामस कहा जाता है ॥ २० ॥
एवमय नानाविधानामेषां गर्भकराणां भावानां समुदायादभिनिर्वर्तते
गर्भः, यथा कूटागार नानाद्रव्यसमुदायात्, यथा वा रथो नानारथाङ्ग-
समुदायात्, तस्मादेतदवोचाम-मातृजश्चार्यं गर्भः पितृजश्चाऽऽत्मजश्च
सात्म्यजश्च रसजश्च । अस्ति च सत्त्वमुपपादुकमिति होवाच
भगवानात्रेयः ॥ २१ ॥
इस प्रकार से इन नाना प्रकार के गर्भ के उत्पादक पदार्थों ( भावो ) के
मिलने से गर्भ बनता है । जिस प्रकार जेन्ताक स्वेद में कहे नाना द्रव्यों के
समूह से कूटागार बनता है, जिस प्रकार रथ के नाना अगों के समुदाय से रथ
बनता है, उसी प्रकार माता आदि सब छ पदार्थों के मिलने से गर्भ बनता है ।
इसीलिये हम कहते हैं गर्भ माता से उत्पन्न होता है, पिता से उत्पन्न होता है,
ॐ देखिये सुश्रुत, शारीर स्थान, अध्याय २ ।
अ० ३ ] ४ शारीरस्थानम् ४९
अ० ३ ] ४ शारीरस्थानम् ४९
आत्मा से उत्पन्न होता है, सात्म्य से उत्पन्न होता है, रस से उत्पन्न होता है
और सत्त्व भी गर्भ की उत्पत्ति मे एक घटक है ॥ २१ ॥
भरद्वाज उवाच—यद्ययमेषां नानाविधाना गर्भकराणां भावानां
समुदायादभिनिर्वर्तते गर्भः, कथमयं सधीयते, यदि चापि संधीयते
कस्मात् समुदायप्रभवः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण जायते, मनुष्यश्च
मनुष्यप्रभव उच्यते। तत्र चेदिष्टमेतद्यस्मान्मनुष्यो मनुष्यप्रभवस्तस्मा-
देव मनुष्यविग्रहेण जायते, यथा—गोर्गोप्रभवः, यथा-चाश्वादश्वप्रभवः
इत्येवं सति यदुक्तमग्रे समुदायात्मक इति तदयुक्त, यदि च मनुष्यो
मनुष्यप्रभव , कस्माज्जडान्ध-कुब्ज-मूक-वामन-मिन्मिन-व्यङ्गोन्मत्त-कुष्ठ-
किलासिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा न भवन्ति । अथाऽत्रापि बुद्धिरेवं
स्यात्—स्वेनैवायमात्मा चक्षुषा रूपाणि वेत्ति, श्रोत्रेण शब्दान्, घ्राणेन
गन्धान् ,रसनेन रसान्, स्पर्शनेन स्पर्शान्, बुद्ध्या बोद्धव्यमित्यनेन हेतुना
न जडादिभ्यो जाताःपितृसदृशा भवन्ति।अत्रापि प्रतिज्ञाहानिदोषः स्यात्,
एवमुक्ते ह्यात्मा सत्त्विन्द्रियेषु ज्ञः स्यादसत्त्वज्ञः। यत्र चैतदुभयं सभ-
वति ज्ञत्वमज्ञत्व च, सविकारश्चात्मा। यदि च दर्शनादिभिरात्मा
विषयान्वेत्ति, निरिन्द्रियो दर्शनादिविरहादज्ञः स्यात्, अज्ञत्वादकारणं,
अकारणत्वाच्च नात्मेति वाग्वस्तुमात्रमेतद्वचनमनर्थक स्यादिति होवाच
भरद्वाजः ॥ २२ ॥
इस पर भरद्वाज मुनि फिर शका करते है—यदि इन गर्भकारक भिन्न २
अनेक प्रकार के पदार्थो के समुदाय से गर्भ बनता है, तो यह गर्भ (शुक्र-
शोणित ) जीव रूप से किस प्रकार से सम्बन्धित होता है। यह भी मान ले कि
सम्बन्धित हो जाता है, तो समुदाय के कारण उत्पन्न होने वाला गर्भ किस
प्रकार से मनुष्य रूप में हो जाता है ? यदि यह भी मान लिया जाय कि मनुष्य
मनुष्य से उत्पन्न हुआ है इसलिये वह मनुष्य रूप से उत्पन्न होता कहा जाता
है ? जिस प्रकार गाय मे गाय उत्पन्न होता है और घोड़े से घोड़ा उत्पन्न होता
है, तो पहिले जो यह कहा है कि माता आदि क समुदाय से गर्भ उत्पन्न होता
है, यह ठीक नही । ओर यदि मनुष्य से मनुष्य की उत्पत्ति मानोगे तो जड़बुद्धि
अन्धे, कुबड़े, गूंगे, नाटे, मिन्मिने, श्याममण्डल, पागल, कोढ़ी, किलास आदि के
रोगी मनुष्यों से उत्पन्न सन्तान पिता के समान क्यों नही होतो ? अन्धे से अन्धा
जड़ से जड़बुद्धि होना चाहिये । परन्तु ऐसा सर्वत्र नहीं होता। इस पर भी यदि
इस प्रकार से मानें कि आत्मा अपने आप चक्षु से रूपो को जानता है, अपने
५० चरकसंहिता [ अ० ३
कानों से ही शब्दों को सुनता है, अपनी नासिका से गन्धों को पहिचानता है,
अपनी ही रसना से रसों को पहिचानता है, अपनी ही त्वचा से स्पर्श करता है,
अपनी बुद्धि से जानने योग्य बातों को जानता है, इस कारण से जड़ आदि
माता पिता से उत्पन्न सन्तान पूर्ण रूप से पिता के समान नहीं होती तो प्रतिज्ञा-
हानि दोष आता है । क्योंकि ऐसा मानने से आत्मा इन्द्रियो के रहते ज्ञानी और
न रहते अज्ञानी हो जाता है । इस प्रकार आत्मा में ज्ञानी और अज्ञानी ये
दोनों गुण होने सम्भव हों वह आत्मा विकार-प्रकृतिवाला हो जायेगा, परन्तु
आत्मा ‘निर्विकार’ कहा जाता है । यदि चक्षु आदि इन्द्रियों से युक्त होने पर
आत्मा विषयों को जानता है, तो वह निरिन्द्रिय अवस्था में ( चक्षु आदि के
अभाव में ) अज्ञानी बनेगा । अज्ञ होने से अपने उत्पत्ति का कारण भी नहीं हो
सकेगा । कारण न होने से आत्मा की सत्ता भी नहीं रही । इसलिये ‘आत्मा’
यह वचन कहना अर्थरहित शब्दमात्र ही रह जाता है ॥ २२ ॥
आत्रेय उवाच—पुरस्तादेतत्प्रतिज्ञातं—सत्त्वं जीवस्पृक् शरीरेणा-
भिसंबध्नातीति, तस्मात्तु समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण
जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते । तद्वक्ष्यामः-॥ २३ ॥
भगवान् आत्रेय ने कहा—प्रथम यह कहा है कि सत्त्वसंज्ञक मन जीव
आत्मा को स्पृक्शरीर के साथ का सम्बन्ध कराता है, क्योंकि समुदाय द्वारा
उत्पन्न गर्भ मनुष्य रूप से बनता है, मनुष्य से मनुष्य ही उत्पन्न होता कहा
जाता है, उसकी व्याख्या करते हैं ॥ २३ ॥
भूताना चतुर्विधा योनिर्भवति—जरायुवाण्डस्वेदोद्भिदः । तासा
खलु चतसृणामपि योनीनामेकैका योनिरपरिसंख्येयभेदा भवति, भूता-
नामाकृतिविशेषापरिसंख्येयत्वात् । तत्र जरायुजानामण्डजाना च प्राणि-
नामेते गर्भकरा भावा यां या योनिमापद्यन्ते तस्यां तस्यां योनौ तथा-
तथारूपा भवन्ति, तद्यथा कनक-रजत-ताम्र-त्रपु-सीसकान्यासिच्यमा-
नानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टविग्रहेषु। ते यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा
मनुष्यविग्रहेण जायन्ते, तस्मात्समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्र-
हेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते, तयोनित्वात् ॥ २४ ॥
प्राणियों की योनि चार प्रकार की है । जरायु, अण्ड, स्वेद और उद्भिद्
इन चारों प्रकार की योनियों में एक एक योनि के असख्य भेद हैं, क्योंकि प्राणी
की आकृतियों के भेद असख्य हैं ।
इन में जरायुज तथा अण्डज प्राणियों के गर्भोत्पादक शुक्र, शोणित आदि
पदार्थ जिस जिस योनि में पहुचते हैं, उसी उसी योनि में उसी उसी रूप के हो
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ५१
अ० ३ ] शारीरस्थानम् ५१
जाते हैं । जिस प्रकार पिघल हुए सोना, चादी, ताम्बा, सीसा आदि मोम से
लिप्त मिट्टी के साचे में डालने पर उसी मोम के आकार के पदार्थ बन जाते
हैं, उसी प्रकार मनुष्य के साचे में ढल कर वह मनुष्य रूप के होजाते हैं । इस
कारण से समुदाय से उत्पन्न होने वाला गर्भ मनुष्य रूप में उत्पन्न होता है ।
मनुष्य योनि से उत्पन्न होने से मनुष्य को मनुष्यसे उत्पन्न हुआ कहते हैं ॥२४॥
यच्चोक्तं —यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः कस्मान्न जडादिभ्यो
जाताः पितृसदृशरूपा भवन्तीति, तत्रोच्यते-यस्य यस्य ह्यङ्गावयवस्य
बीजे बीजभाग उपतप्तो भवति तस्य तस्याङ्गावयवस्य विकृतिरुपजायते,
नोपजायते चानुपतापात्, तस्मादुभयोपपत्तिरप्यत्र, सर्वस्य चात्मजानी-
न्द्रियाणि, तेषां भावाभावहेतुर्दैव, तस्मान्नैकान्तता जडादिभ्यो जाताः
पितृसदृशरूपा भवन्ति ॥ २५ ॥
और जो यह कहा है कि यदि मनुष्य मनुष्य से उत्पन्न होता है, तो जड़
बुद्धि माता पिता की सन्तान इनके समान जड़बुद्धि क्यों नहीं होती, इसका
उत्तर यह है—शुक्र-शोणित रूप बीज में जिस जिस अवयव का बीज भाग
दूषित रहता है, उसी उसी अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाती है । बीज भाग
के दूषित न होने से नहीं होती । इसलिये जड़त्व और अजड़त्व अन्धत्व और
अनन्धत्व दोनों ही बातों का होना सम्भव है। सब प्राणियों की इन्द्रिया आत्म-
कर्म से बनती हैं। इन इन्द्रियों के होने से भाव और न होने से अभाव में दैव
कारण होता है । इस कारण से जड़बुद्धि आदि माता पिता से उत्पन्न सन्तान
अवश्य ही पिता के समान हो, यह आवश्यक नहीं। वे कभी सदृश होते और
कभी नहीं होते हैं ॥ २५ ॥
न चात्मा सत्त्विन्द्रियेष्वसत्सु वा भवत्यज्ञः, न ह्यसत्त्वः कदाचि-
दात्मा; सत्त्वविशेषाच्चोपलभ्यते ज्ञानविशेष इति ॥ २६ ॥
इन्द्रियों के होने पर आत्मा ज्ञानी होता है, यह भी ठीक नहीं है अथवा
इन्द्रियों के न होने पर अज्ञानी रहता है, यह भी नही । क्योंकि आत्मा कभी
भी सत्त्वरहित नहीं रहता । सत्त्व ( मन ) की विशेषता से ज्ञान विशेष प्राप्त
होता है। इसलिये आत्मा का मन के साथ सदा सम्बन्ध रहने पर बाह्य इन्द्रियों
के अभाव में भी नित्य ज्ञान होता रहता है । यही आत्म-ज्ञान है ॥ २६ ॥
भवन्ति चात्र ।
न कर्तुरिन्द्रियाभावात्कार्यज्ञानं प्रवर्तते ।
यैः क्रिया वर्तते या तु सा बिना तैर्न वर्तते ॥ २७ ॥
५२ चरकसंहिता [ अ० ३
जानन्नपि मृदोऽभावात्कुम्भकृन्न प्रवर्तते।
श्रूयतां चेदमध्यात्ममात्मज्ञानबलं महत् ॥ २८ ॥
कर्त्ता को इन्द्रियों के अभाव से बाह्य विषयों का ज्ञान नहीं होता। जो
क्रिया जिन भावों के द्वारा उत्पन्न होती है, उन भावों के बिना वह क्रिया भी
नहीं होती। जिस प्रकार घड़े को बनाने की विधि जानने वाला कुम्हार भी,
मिट्टी न हो तो घड़ा नहीं बना सकता, इसी प्रकार बाह्य विषय का ज्ञान भी,
इन्द्रियों न हों तो नहीं होता। इसलिये इन्द्रियों के न होने से आत्मा का ज्ञानी
होने का गुण नष्ट नहीं होता। इस महान् आत्मज्ञान के महान् बल रूप
अध्यात्म ज्ञान को सुनो ॥ २७-२८ ॥
इन्द्रियाणि च सङ्क्षिप्य मनः संगृह्य चञ्चलम् ।
प्रविश्याध्यात्ममात्मज्ञः स्वे ज्ञाने पर्यवस्थितः ॥ २९ ॥
सर्वत्रावहितज्ञानः सर्वभावान् परीक्षते।
गृह्णीष्व चेदमपरं भरद्वाज विनिर्णयम् ॥ ३० ॥
निवृत्तेन्द्रियवाक्चेष्टः सुप्तः स्वप्नगतान् यदा।
विषयान् सुखदुःखे च वेत्ति नाज्ञोऽप्यत. स्मृत ॥ ३१ ॥
इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटा कर, चंचल स्वभाव वाले मन को आत्मा
से अतिरिक्त विषयों से खींच कर आत्मा में प्रविष्ट करने पर आत्मा आत्मज्ञान
में स्थित होता है। इस अवस्था में वह सब प्रकार के ज्ञान में बे-रोकटोक जा
सकता है, इसी से विना इन्द्रियों के भी सब विषयों को देख लेता है। हे भरद्वाज !
इसलिये इस तत्त्व को भी निश्चय रूप से ग्रहण करो। जिस समय इन्द्रिया, वाणी,
चेष्टायें आदि सब शान्त होती हैं, और सोया हुआ पुरुष स्वप्नावस्था में बाह्य
सुख दुःखों को जानता है, तो भी आत्मा को अज्ञ नहीं कहते। तब भी वह
ज्ञानवान् ही रहता है ॥ २९-३१ ॥
आत्मज्ञानादृते चैकं ज्ञानं किंचिन्न वर्तते।
नह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ॥ ३२ ॥
तस्माज्ज्ञः प्रकृतिश्चात्मा द्रष्टा कारणमेव च।
सर्वमेतद्भरद्वाज ! निर्णीतं जहि संशयम् ॥ ३३ ॥ इति ॥
आत्म-ज्ञान- आत्मा को छोड़ कर मनोजन्य या इन्द्रियजन्य ज्ञान अकेला
उत्पन्न नहीं हो सकता। सब अवस्थाओं मे ज्ञान का कारण आत्मा ही है,
क्योंकि असहाय वस्तु अकेली नहीं रह सकती और न बिना कारण के उत्पन्न
हो सकती है। समाधि और स्वप्नावस्था दोनों मे आत्मा ही ज्ञान का कारण
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५३
है। इसलिये आत्मा ज्ञानी है, आत्मा ही प्रकृति ( विकार नहीं ) है, वही सब
कार्यों का देखनेवाला और कारण है। हे भरद्वाज ! आत्मा का ज्ञानी होना
आदि सब बातों का निर्णय कर दिया। अब संशय को छोड़ दो ॥ ३२-३३ ॥
तत्र श्लोकौ— हेतुर्गर्भस्य निर्वृत्तौ वृद्धौ जन्मनि चैव यः ।
पुनर्वसुमतिर्या च भरद्वाजमतिश्च या ॥ ३४ ॥
प्रतिज्ञाप्रतिषेधश्च विशदश्चाऽऽत्मनिर्णयः ।
गर्भावक्रान्तिमुद्दिश्य खुड्डीकां तत् प्रकाशितम् ॥ ३५ ॥
गर्भ के जन्म, निवृत्ति और वृद्धि में जो कारण हैं, उस सम्बन्ध में भगवान्
आत्रेय का जो मत है और जो भरद्वाज मुनि का मत है, भरद्वाज की प्रतिज्ञा
का दोष आदि पुनर्वसु कृत स्थित आत्म-निर्णय, ये सब बातें इस खुड्डीका
गर्भावक्रान्ति नामक अध्याय में भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं ॥ ३४-३५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने खुड्डीकागर्भावक्रान्ति-
शारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातो महती गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'महती गर्भावक्रान्ति' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
यतश्च गर्भः संभवति, यस्मिंश्च गर्भसंज्ञा, यद्विकारश्च गर्भो, यया
चानुपूर्व्याभिनिर्वर्त्तते कुक्षौ, यश्चास्य वृद्धिहेतुः, यतश्चास्याऽजन्म भवति,
यतश्च जायमानः कुक्षौ विनाशं प्राप्नोति, यतश्च कार्त्स्न्येनाविनश्यन्वि-
कृतिमापद्यते, तदनुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
जिन कारणों से गर्भ होता है, जिनसे कि इसकी गर्भ संज्ञा होती है, जिन
विकारों का परिणाम गर्भ है, जिस अनुक्रम से गर्भाशय या माता के कोख में
गर्भ बनता है, जो इस गर्भ की वृद्धि के कारण हैं, जिन कारणों से इसका जन्म
नहीं होता, जिन कारणों से कोख में उत्पन्न होकर भी नष्ट हो जाता है और
जिन कारणों से गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है,
अब उनका वर्णन करेंगे ॥ ३ ॥
५४ चरकसंहिता [अ० ४
मातृजः पितृज आत्मजः सात्म्यजो रसजः सत्त्वज इत्येतेभ्यो भावेभ्यः
समुदितेभ्यो गर्भः संभवति। तस्य येऽवयवा यतो यतः संभवतः
संभवन्ति तान्विभज्य मातृजादीनवयवान् पृथक्पृथगुक्तमग्रे ॥ ४ ॥
माता, पिता, आत्मा, सात्म्य, रस, सत्त्व इन छ भावों के समुदाय से गर्भ
बनता है। इस गर्भ के जो जो अवयव जिस जिस पदार्थ से उत्पन्न होते हैं,
उन सब माता आदि पदार्थों को पृथक् पृथक् रूप मे विभाग करके प्रथम कह
चुके हैं ॥ ४ ॥
शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति ॥ ५ ॥
जिस समय गर्भाशय में शुक्र, शोणित और जीव (आत्मा) का संयोग
होता है, उस समय इनकी 'गर्भ' संज्ञा होती है ॥ ५ ॥
गर्भस्तु खल्वन्तरिक्ष-वाय्वग्नि-तोय-भूमि-विकारश्चेतनाधिष्ठान
भूतः। एवमनयैव युक्त्या पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मका गर्भश्चेत-
नाधात्वधिष्ठानभूतः, स ह्यस्य षष्ठो धातुरुक्तः ॥ ६ ॥
गर्भ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी इन पंच महाभूतों के विकार
तथा चेतना इन छः धातुओं का अधिष्ठान अर्थात् आश्रय है। इस प्रकार से
यह ५च महाभूतो के विकार से बना गर्भ चेतना (आत्मा) धातु का आश्रय
होता है। यही चेतना (आत्मा) इस गर्भ का छठा धातु कहाता है। [धारण
करने से 'धातु' कहाता है। आत्मा गर्भ को धारण करता है, इसलिये इसे भी
'धातु' शब्द से कहा है।] ॥ ६ ॥
यथा चाऽऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ तदनुव्याख्यास्यामः-गते पुराणे
रजसि नवे चावस्थिते,पुनः शुद्धस्नानां स्त्रियमव्यापन्न-योनि-शोणित-गर्भा-
शयामृतुमतीमाचक्ष्महे, तया सह तथाभूतया यदा पुमानव्यापन्नबीजो
मिश्रीभाव गच्छति तस्य हर्षोदीरितः पर शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतोऽ-
ङ्गादङ्गात्सभवति, स तथा हर्षभूतेनात्मनोदीरितश्चाधिष्ठितश्च बीजरूपो
धातुः पुरुषशरीरादभिनिष्पत्योचितेन पथा गर्भाशयमनुप्रविश्याऽऽर्तवे-
नाभिसंसर्गमेति ॥ ७ ॥
गर्भाशय में जिस क्रम से गर्भ का विकास होता है उसका वर्णन करते हैं-
पुराने ऋतुकाल के क्रम से संचित रज के निवृत्त होने और नये रज के उप-
स्थित होने पर स्नान क्रिया द्वारा शुद्ध हुई, रोग रहित योनि, आर्तव और गर्भा-
शयवाली स्त्री को हम 'ऋतुमती' कहते हैं। इस ऋतुमती स्त्री के साथ रोग-
रहित बीजवाला पुरुष जिस समय संयोग करता है, उस समय हर्ष के कारण
अ० ४] शारीरस्थानम् ५५
अ० ४] शारीरस्थानम् ५५
शरीर का श्रेष्ठ धातुस्वरूप शुक्र शरीर के प्रत्येक अंग से उत्पन्न होता है। वह
हर्ष के कारण उत्पन्न तथा हर्ष के ही द्वारा प्रेरित होकर आत्मा का आश्रय भूत
यह बीज रूप धातु पुरुष के शरीर से बाहर आकर उचित मार्ग से गर्भाशय में
प्रवेश करके आर्तव के साथ मिलता है ॥ ७ ॥
तत्र पूर्वं चेतनाधातुः सत्वकरणो गुणग्रहणाय प्रवर्तते । स हि
हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता मन्ता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा
विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽव्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्रधान-
मव्यक्तं जीवो ज्ञः पुद्गलश्चेतनावान्विभुर्भूतात्मा चेन्द्रियात्मा
चान्तरात्मा चेति ॥ ८ ॥
सबसे प्रथम मन के साधनवाला चेतना-धातु गुण को ग्रहण करने के लिये
प्रवृत्त होता है। उसी चेतना धातु को हेतु, कारण, निमित्त, अक्षर, कर्त्ता,
मन्ता, वेदिता, बोद्धा, द्रष्टा, धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप, पुरुष, प्रभव,
अव्यय, नित्य, गुणी (गुणवान्), ग्रहण (मूर्त्ता को ग्रहण करने वाला), प्रधान,
अव्यक्त, जीव, ज्ञ, पुद्गल, चेतनावान्, विभु, भूतात्मा, इन्द्रियात्मा और अन्त-
रात्मा इन पर्यायों से कहते हैं ॥ ८ ॥
स गुणोपादानकालेऽन्तरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्ते;
यथा प्रलयात्यये सिसृक्षुर्भूतान्यक्षरभूतः सत्त्वापादानः पूर्वतरमाकाशं
सृजति, ततः क्रमेण व्यक्ततरगुणान्धातृन्वाय्वादींश्चतुरः, तथा देह-
ग्रहणेऽपि प्रवर्तमानः पूर्वतरमाकाशमेवोपादत्ते, ततः क्रमेण व्यक्ततर-
गुणान्धातूनवाय्वादींश्चतुरः, सर्वमपि तु खल्वेतद् गुणोपादानमणुना
कालेन भवति ॥ ९ ॥
वह चेतना धातु गुणों के उत्पत्ति काल में अन्य वायु आदि गुणों से पूर्व,
सब से प्रथम अन्तरिक्ष का ग्रहण करता है। क्योकि प्रलय के अनन्तर सृष्टि
के प्रारम्भ में सृष्टि को बनाने की इच्छा वाला प्रधान, अक्षर, पुरुष, सत्त्व को
लेकर सब से प्रथम आकाश को बनाता है। इसके बाद क्रम से अधिक
व्यक्त गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं को उत्पन्न करता है। उसी
प्रकार देह के ग्रहण करने के अवसर में भी प्रवृत्त हुआ आत्मा सबसे पूर्व
आकाश को ही ग्रहण करता है, फिर क्रम से उससे अधिक स्पष्ट गुणों
वाले वायु आदि चार धातुओं को लेता है। इनके गुणों का पूर्ण रीति से
ग्रहण करना बहुत थोड़े समय मे ही हो जाता है। [इस प्रकार आकाश
में एक गुण, वायु में दो गुण (शब्द, स्पर्श), अग्नि में तीन गुण
५६ चरकसंहिता [ अ० ४
(शब्द, स्पर्श, रूप), जल में चार गुण (शब्द, स्पर्श, रूप और रस) और
पृथ्वी में पाच गुण (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) उत्पन्न करता है।]
इसी प्रकार शरीर में गुण उत्पन्न करने में प्रवृत्त होने पर भी सब से प्रथम
आकाश के गुण को ही उत्पन्न करता है, इसके पीछे क्रम से स्पष्ट गुणवाले
वायु आदि भूतों को उत्पन्न करता है। भूतों के गुणों का ग्रहण बहुत ही थोड़े
समय मे हो जाता है। [जिस प्रकार सूर्य कान्तमणि में सूर्य की किरणें आती हुई
नहीं दीखतीं, परन्तु रूई तिनके के जलने से किरणो का आना प्रतीत होता है,
उसी प्रकार शरीर के अन्दर भूतों के कार्य से इनके गुणों का तथा चेतना धातु
का अनुमान होता है] ॥ ६ ॥
स तु सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि समूर्च्छितः सर्वधा-
तुकलनीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः ॥१०॥
द्वितीये मासि घनः संपद्यते- पिण्ड पेश्यर्बुदं वा, तत्र घनः
[पिण्डः] पुरुषः, स्त्री पेशी, अर्बुदं नपुंसकम् ॥ ११ ॥
तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च योगपद्येनाभिनिर्व-
र्त्तन्ते ॥ १२ ॥
गर्भ का प्रथम रूप खेट-सव गुणों वाला यह चेतना धातु गर्भ रूप में
होकर प्रथम मास में मूर्च्छित, निश्चेष्ट, गतिरहित अव्यक्त, सम्पूर्ण धातुओं वाला,
श्लेष्मा के पिण्ड के समान होता है, उस समय उसका शरीर अस्पष्ट रूप अंगों
वाला होता है, उस समय उसके अंग पृथक् २ नहीं बने होते। उस समय
उसका नाम 'खेट' होता है।
घन-दूसरे मास में यह गर्भ रूप धातु कठिन, पिण्ड गोल माठ के आकार
का वा पेशी-लम्बो मास पेशी के समान वा अर्बुद-गोल और ऊची गांठ
के समान बन जाता है। इन में से घन (पिण्ड) रूप हो तो पुरुष, पेशी हो तो
स्त्री, अर्बुद हो तो नपुंसक होता है। तीसरे मास में सम्पूर्ण इन्द्रिया और शिर
आदि सब अंग तथा आमाशय आदि अवयव एक साथ बनने लगते हैं ॥१२॥
तत्रास्य केचिदङ्गावयवा मातृजादीनवयवान् विभज्य पूर्वमुक्ता
यथावत्, महाभूतविकारप्रविभागेन त्विदानीमस्य तांश्चैवाङ्गावयवान्
कांश्चित्पर्यायान्तरेणापरांश्चानुव्याख्यास्यामः - मातृजादयोऽप्यस्य महा-
भूतविकारा एव। तत्रास्याऽऽकाशात्मकं - शब्दः श्रोत्रं लाघवं सौक्ष्म्यं
विवेकश्च । वाय्वात्मकं-स्पर्शः स्पर्शनं रौक्ष्यं प्रेरणं धातुव्यूहनं चेष्टाश्च
शारीर्यः । अग्न्यात्मकं- रूप दर्शनं प्रकाशः पक्तिरौष्ण्यं च । अबात्मकं
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५७
रसो रसन शत्य मार्दवः स्नेहः क्लेदश्च । पृथिव्यात्मक गन्धो घ्राण
गौरवं स्थैर्यं मूर्तिश्च ॥ १३ ॥
गर्भ के अंग और अवयवों में से कुछ अवयव जो कि माता आदि से उत्पन्न
होते हैं, प्रथम कह चुके हैं । उन प्रथम कहे हुए अवयवों को भी अब दूसरे
प्रकार से महाभूतों का प्रविभाग करते हुए क्रम से प्राप्त तथा अन्य न कहे हुए
अंगों ( अवयवों ) का भी वर्णन करेंगे ।
माता आदि से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयव भी पांचों महाभूतों के
विकार ही हैं । इनमें इस गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, अति सूक्ष्मता और
विवेक ये अश आकाश से उत्पन्न होते हैं। वायु से स्पर्श, त्वचा, रूक्षता,
प्रेरण, धातु रचना और शारीरिक चेष्टायें उत्पन्न होती हैं । अग्नि से रूप, चक्षु,
प्रकाश, पाचन और उष्णिमा ये अंश उत्पन्न होते हैं । जल से रस, रसना,
शीतलता, कोमलता, स्नेह और क्लेद ये अंश उत्पन्न होते है । पृथिवी से गन्ध,
नासिका, भारीपन, स्थिरता ओर कठिनता ये अंश उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥
एवमयं लोकसमितः पुरुषः । यावन्तो हि लोके भावविशेषास्ता-
वन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे, तावन्तो लोके, इति बुधास्त्वेवं द्रष्टु-
मिच्छन्ति ॥ १४ ॥
पुरुष की लोकतुल्यता—इस प्रकार पाच महाभूतों के विकारो से बना होने
के कारण यह पुरुष लोक समित अर्थात् लोक के तुल्य है । लोक में जितने भी
आध्यात्मिक अथवा अहंकार आदि भौतिक पदार्थ विशेष हैं, उतने ही सब
पदार्थ इस पुरुष मे भी हैं और जितने भाव ( पदार्थ ) पुरुष में हैं, उतने ही
इस लोक में हैं । इस प्रकार से लोक और पुरुष की समानता ज्ञानी पुरुष
देखना चाहते है ॥ १४ ॥
एवमस्येन्द्रियाण्यङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते, अन्यत्र तेभ्यो
भावेभ्यो येऽस्य जातस्योत्तरकालं जायन्ते, तद्यथा—दन्ता व्यञ्जनानि
व्यक्तीभावः, तथायुक्तानि चापराणि, एषा प्रकृतिः, विकृति पुनरतोऽ-
न्यथा । सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिच्च नित्या भावाः, सन्ति चानित्याः
केचित् । तस्य य एवाङ्गावयवाः सन्तिष्ठन्ते, त एव स्त्रीलिङ्गं पुंल्लिङ्गं
नपुंसकलिङ्गं वा बिभ्रति । ततः स्त्रीपुरुषयोर्ये वैशेषिका भावाः प्रधान-
संश्रया गुणसंश्रयाश्च, तेषां यतो भूयस्त्वं ततोऽन्यतरभावः । तद्यथा—
क्लैव्यं भीरुत्वमवैशारद्यमनवस्थानमधोगुरुत्वमसहनन शैथिल्यं मार्दवं
५८ चरकसंहिता [ अ० ४
तथायुक्तानि चापराणि स्त्रीकराणि, अतो विपरीतानि पुरुषकराणि, उभ-
यभागावयवा नपुंसककराणि ॥ १५ ॥
इस प्रकार से इस गर्भ की इन्द्रिया, अंग और अवयव एक साथ बनने
प्रारम्भ हो जाते है। परन्तु जो पदार्थ इस गर्भ की उत्पत्ति के पीछे बनते
हैं, वे गर्भ में बनने आरम्भ नहीं होते । जैसे-दात, व्यञ्जन, (मूँछ, दाढ़ी
आदि) शुक्र और रज की उत्पत्ति तथा स्थूल मास आदि ये देर में उत्पत्ति के
पीछे बनने प्रारम्भ होते हैं। यह तो मनुष्य की प्रकृति अर्थात् स्वभाव है और
इसके विपरीत जब कभी दात आदि गर्भ में ही बन जाते हैं, तब यह विकृति
कहाती है। इस गर्भ में कुछ पदार्थ नित्य होते हैं। जो जब तक शरीर रहता
है तब तक रहते हैं जमे-हाथ, पाँव आदि और कुछ भाव अनित्य हैं जो
शरीर के साथ सदा नहीं रहते जैसे-दान आदि । इस गर्भ मे शरीर के
साथ जो अग या अवयव रहते हैं वे ही अवयव स्त्रीलिंग पुरुपलिंग या नपुंसक-
लिंग के लक्षणों को धारण करते हैं। इनमें स्त्री और पुरुष के लक्षणों में ज-
विशेष लक्षण भेदक होते हैं, वे प्रधान या मुख्य होते हैं, जिन गुणों की प्रथा-
नता वा अधिकता रहती है, वही विशेष लिंग या चिह्न बनते हैं। अधिकता न
रहने पर वे विपरीत होते हैं। जैसे-क्लीवता, भीरुत्व, मोह, चंचलता, कटि से
निचले भाग का भारी होना, शरीर का संगठित न होना, शिथिलता, कोमलता
तथा स्तन आदि, अन्य जन्म के उपरान्त होने वाले लक्षणों का होना, स्त्रीलिंग
की उत्पत्ति में कारण है। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना पुरुष की
उत्पत्ति मे कारण है। दोनों प्रकार के अवयव वा लक्षण नपुंसक की उत्पत्ति
में कारण हैं॥ १५ ॥
तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना
निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च, तद्द्वै-
हृद्य्यमाचक्षते वृद्धा । मातृजं चास्य हृदय मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं
भवति रसवाहिनीभि संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः संप-
द्यते। तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृद्य्यस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति
कर्तु, विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि
माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु । तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणो-
पचरन्ति कुशलाः ॥ १६ ॥
गर्भ की इन्द्रिया जिस समय बनती है, उसी समय चित्त में सुख दुःख के
ज्ञान का सम्बन्ध भी हो जाता है। इसलिये तब से लेकर गर्भ स्पन्दन (गति)