चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
४६४ चरकसंहिता [ अ० १०
कम्पते प्रदशेद्दन्तान्१ फेनोद्वामी श्वसित्यपि ।
परुषाणि च कृष्णानि पश्येद्रूपाणि चानिलात् ॥ ६ ॥
(१) वातिक-अपस्मार के लक्षण—वायु के कारण उत्पन्न अपस्मार का
रोगी कापता हे, दाता का काटता है, मुख से झाग उगलता है, जोर जोर से
सास लेता है, कठोर तथा काले रग के रूपो को देखता है। [ इसमे बार बार
प्रबोध ओर बार बार अपस्मार होता है ] ॥ ६ ॥
पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः ।
सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ १० ॥
(२) पैत्तिक अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकला झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे पीली होती है, पोले, लाल रूपों को देखता है,
रोगी को प्यास और गरमी अनुभव होती है, शरीर गरम रहता है, सब जगत्
को आग से व्याप्त अर्थात् चारो ओर आग ही आग देखता है ॥ १० ॥
शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः ।
पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि श्लैष्मिको मुच्यते चिरात् ॥ ११ ॥
(३) कफजन्य अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकली झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे श्वेत होती है, शरीर ठण्डा, रोमाञ्चित और भारी
होता है, रोगी श्वेत रूपो को देखता है, यह रोगी देर मे सञ्ज्ञा ( चेतना )
प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
सर्वैरेतैः समस्तैस्तु लिङ्गैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः ।
अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ १२ ॥
(४) त्रिदोषजन्य अपस्मार मे इन तीनो दोषो के लक्षण मिले रहते हैं।
यह सन्निपातजन्य अपस्मार असाध्य हाता है, इसी प्रकार क्षीण पुरुष मे हुआ
तथा पुराना अपस्मार असाध्य होता है ॥ १२ ॥
पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।
अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथान्तरम् ॥ १३ ॥
मल (अपस्मार के प्रारम्भिक दोष) बारह दिन, पन्द्रह दिन या एक
मास मे अथवा कुछ कम या अधिक समय मे [ जब काल, प्रकृति, दूष्य आदि
से ] बलवान् हो जाते है। तब अपस्मार रोग को उत्पन्न करते है ॥ १३ ॥
तैरावृताना हृत्स्रोतोमनसां संप्रबोधनम् ।
तीक्ष्णैरादौ भिषक् कुर्यात्कर्मभिर्वमनादिभिः ॥ १४ ॥
१. ‘दशते दन्तान्’ इति वा पाठः।
अ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५
अ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५
वातिकं बस्तिभूयिष्ठैः पैत्तं प्रायो विरेचनैः ।
श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् १ ॥ १५ ॥
चिकित्सा—वैद्य को चाहिये कि प्रथम अपस्मार के उत्पन्न होने पर ही
तीक्ष्ण वमन आदि कार्यों द्वारा हृदयवह तथा मनोवह स्रोतों को रोकने वाले
शारीरिक तथा मानसिक दोषो को निकाल कर हृदयवह और मनोवह स्रोतों का
प्रबोधन करे। वातिक अपस्मार मे बस्ति कर्म, पैत्तिक में विरेचन कर्म और
श्लैष्मिक अपस्मार मे वमन कर्म प्रधानत करने चाहियें, और शेष कर्म भी
करने चाहिये ॥ १४-१५ ॥
सर्वतः सुविशुद्धस्य सम्यगाश्वासितस्य च ।
अपस्मारविमोक्षार्थं योगान्संशमनाञ्छृणु ॥ १६ ॥
जिस समय ऊर्ध्व ( ऊपर के ) और अध ( नीचे के ) सब मार्गों का
शोधन हो जाये, और भली प्रकार अन्न-सेवन आदि से शरीर मे बल आ जावे,
तब अपस्मार को शान्त करने के लिये जिन निम्नलिखित योगों को बरतना
चाहिये उनको सुनो ॥ १६ ॥
गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्घृतम् ।
सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् ॥ १७ ॥
इति पञ्चगव्यं घृतम् ।
( १ ) पञ्चगव्य घृत—गाय के गोबर का रस, गाय का दही, गाय का
दूध, गाय का मूत्र इनके बराबर गाय का घृत लेकर घृतपाक-विधि से सिद्ध
करे । यह घृत अपस्मार, कामला आर ज्वर को नष्ट करता है ॥१७॥
द्वे पञ्चमूल्यौ त्रिफला रजन्यौ कुटजत्वचम् ।
सप्तपर्णमपामार्गं नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥१८॥
सम्पाकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम् ।
द्विपलानि जलद्रोणे पक्त्वा पादावशेषिते ॥ १९ ॥
भार्गीं पाठां त्रिकटुका त्रिवृता निचुलानि च ।
श्रेयसीमाढकीं मूर्वा दन्ती भूनिम्बचित्रकौ ॥ २० ॥
द्वे सारिवे रोहिषं च भूतीकं मदयन्तिकाम् ।
क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तैः प्रस्थं सर्पिषः पचेत् ॥ २१ ॥
गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैश्च तत्समैः ।
पञ्चगव्यमिति ख्यातं महत्तदमृतोपमम् ॥ २२ ॥
१ 'समाचरेत्' इति च ।
४६६ चरकसंहिता [ अ० १०
अपस्मारे तथोन्मादे श्वयथावुदरेषु च ।
गुल्मार्शःपाण्डुरोगेषु कामलासु भगन्दरे ।
अलक्ष्मीग्रहरोगघ्नं चातुर्थिकविनाशनम् ॥ २३ ॥
इति महापञ्चगव्यं घृतम् ॥
(२) महापञ्चगव्य घृत—क्षुद्र और लघु दोनो पञ्चमूल (दशमूल),
त्रिफला (हरड़, बहेडा, आंवला), हल्दी, दारुहल्दी, कडे की छाल, सतवन
की छाल, चिरचिटा, नील, कुटकी, अमलतास, काकोडुम्बरिका (छठ गूलर) की
जड, पोहकरमूल, दुरालभा प्रत्येक वस्तु दो पल, पानी एक द्रोण इनका क्वाथ-
विधि से क्वाथ करे। जब चतुर्थांश रह जाये तब छान ले। इसमे भार्गी, पाठा,
त्रिकटु (सोठ, मरिच, पिप्पली), निशोथ, निचुल (जलवेतस या समुद्रफल)
के फल, श्रेयसी (गर्जपिप्पली), आढकी (तुवर), मूवा, दन्तीमूल, चिरायता,
चीता, श्वेत सारिवा और कृष्ण सारिवा, रोहिष तृण, भूतीक (अजवायन),
मदयन्तिका (नवमल्लिका) ये द्रव्य प्रत्येक एक कर्ष ले, इनको बारीक पीस
कर क्वाथ मे डाले। गाय का घी एक प्रस्थ और घी के बराबर गोबर का रस
और गौ के ही दही, दूध और मूत्र लेकर घृत सिद्ध करे। इस घृत का नाम
'महापञ्चगव्य' घृत है। यह घृत अपस्मार, उन्माद ज्वर, कास, शोथ, उदररोग,
गुल्म, अर्श, पाण्डु, कामला और हलीमक रोगो मे अमृत के समान है, यह घृत
अलक्ष्मी (दुभगता), ग्रह रोगों और चातुर्थिक-ज्वर का विनाश करता है १८-२३
ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च ।
पुराणं घृतमुन्मादालक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ॥ २४ ॥
(३) ब्राह्मी घृत—ब्राह्मी का स्वरस, वच, कूठ और शखपुष्पी इन से
पुरातन गो-घृत सिद्ध करे। यह घृत उन्माद, अलक्ष्मी, अपस्मार और पाप को
नष्ट करता है ॥ २४ ॥
घृतं सैन्धवहिङ्गुभ्या वर्षे बास्ते चतुर्गुणे ।
मूत्रे सिद्धमपस्मारहृद्रोगमहामयानाशनम् ॥ २५ ॥
(४) बैल और बकरे का मूत्र चार भाग, सैन्धव और हींग का कल्क
एक भाग, इनसे सिद्ध किया घृत अपस्मार, हृदय रोग, ग्रह रोगो को नष्ट करता
है। [यहा पर गौ और बकरी स्त्री जाति का मूत्र न लेकर नर बैल और बकरे
का ही मूत्र लेना चाहिये' ] ॥ २५ ॥
१ यद्यपि चतुष्पाद मे स्त्रीलिंग ही प्रशस्त है, तथापि यहा पर पुल्लिंग ही
लेना चाहिये। कहा भी है—स्त्रीणा गुरु च तीक्ष्ण च न तु पुंसा तथाविधम् ।
पित्ताशिका. स्त्रियो यस्मात् सौम्यास्तु पुरुषाः स्मृताः ॥
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६७
वचासम्पाककैटर्यवयःस्थाहिङ्गुचोरकैः ।
सिद्धं पलङ्कषायुक्तैर्वातश्लेष्मात्मके घृतम् ॥ २६ ॥
(५) वचा, सम्पाक (अमलतास), कैटर्य (कट्फल), वयःस्था (आवला
या गिलोय), हींग, चोरक (चोरपुष्पी सुगन्धित द्रव्य), पलंकषा (गुग्गुलु),
इनके कल्क से, चार गुणे पानी मे सिद्ध घृत वातिक, श्लैष्मिक अथवा गुल्म
के समान वात, कफ दोनो से उत्पन्न अपस्मार मे हितकारी है ॥२६॥
तैलप्रस्थं घृतप्रस्थं जीवनीयैः पलोन्मितैः ।
क्षीरद्रोणे पचेत्सिद्धमपस्मारविनाशनम् ॥ २७ ॥
(६) तिल का तैल एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, जीवनीय गण की दस
औषधियो मे से प्रत्येक एक-एक पल लेकर इनका कल्क, दूध एक द्रोण, इनमे
घृत सिद्ध करे, यह घृत अपस्मार का नाशक है ॥ २७ ॥
कंसे क्षीरेक्षुरसयोः काश्मर्येऽष्टगुणे रसे ।
कार्षिकैर्जीवनीयैश्च घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २८ ॥
वातपित्तोद्भवं क्षिप्रमपस्मारं नियच्छति ।
(७) दूध एक आढक, गन्ने का रस एक आढक, काश्मरी (गम्भारी)
का क्वाथ घी से आठ गुणा, जीवनीय आदि ओषधिया प्रत्येक एक कर्ष, इनके
कल्क से एक प्रस्थ गो घृत सिद्ध करे । यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य
(अथवा वात-पित्तजन्य) अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ २८-॥
तद्वत्काशविदारीक्षुकुशक्वाथशृतं घृतम् ॥ २९ ॥
(८) इसी प्रकार से कास (सरकण्डा), विदारीकन्द, गन्ना, कुश, इनके
क्वाथ मे सिद्ध घृत वातजन्य, पित्तजन्य अपस्मार को नष्ट करता है ॥२९॥
मधुकद्विपले कल्के द्रोणे चामलकीरसात् ।
तद्वत्सिद्धं घृतप्रस्थं पित्तापस्मारभेषजम् ॥ ३० ॥
(६) आवले का रस एक द्रोण, मुलहठी का कल्क दो पल, घी एक प्रस्थ
इनसे यथाविधि सिद्ध घृत पैत्तिक अपस्मार को नष्ट करता है ॥३०॥
अभ्यङ्गः सार्षपं तैल बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ।
सिद्धं स्याद् गोशकृन्मूत्रे स्नानोत्सादनमेव च ॥३१॥
अभ्यंग-(१) बकरे का मूत्र चार सेर, सरसो का तैल एक सेर, इनसे
सिद्ध किये तैल का अभ्यंग करे । इसी प्रकार गाय के गोबर से उबटन और
गाय के मूत्र से स्नान करे ॥ ३१ ॥
४६८ चरकसंहिता [ अ० १०
कटभीनिम्बकट्वङ्गमधुशिग्रुत्वचा रसे ।
सिद्धं मूत्रसमं तैलमभ्यङ्गार्थे प्रशस्यते ॥ ३२ ॥
( २ ) कटभी ( वापुबा ) नीम की छाल, कट्वङ्ग ( श्योनाक ), मधुशिग्रु
( लाल शोभांजन की छाल ) इनके क्वाथ मे गोमूत्र के समान सरसो का तैल
मिला कर तैल सिद्ध करे, यह तैल अभ्यग के लिये उत्तम है । [ इसमे क्वाथ
चतुर्थांश के स्थान पर तृतीयाश करे तभी स्नेह से चतुर्गुण होगा ] ॥३२॥
पलङ्कषावचापध्यावृश्चिकाल्यर्कसर्षपैः ।
जटिलापूतनाकेशीनाकुलीहिगुचोरकैः ॥ ३३ ॥
लशुनातिरसाचित्राकुष्ठैर्विङ्भिश्च पक्षिणाम् ।
मांसाशिनां यथालाभ बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ॥ ३४ ॥
सिद्धमभ्यञ्जनं तैलमपस्मारविनाशनम् ।
( ३ ) पलकषा ( गुग्गुलु ), वचा, पथ्या ( हरड़ ), वृश्चिकाली ( बिच्छू-
बूटी ), सरसो, जटिला ( जटामासी ), पूतना ( हरड़ ), केशी ( भूत केशी ),
नाकुली ( रास्ना या सर्पगन्धा ), हींग, चोरक ( चोर पुष्पी, सुगन्धित द्रव्य ),
लसुन, अतिरसा ( शतावरी या जलज यष्टि मधु ), चित्रक, कूठ, मासाहारी
पक्षियो ( गीध, चील आदि ) की बीठ इनमे से जो भी मिल सके उनका कल्क
चतुर्थांश, सरसो का तैल एक भाग और बकरे का मूत्र चार भाग लेकर तैल
सिद्ध करना चाहिये, इससे अपस्मार-रोग शान्त होता है ॥३३-३४-॥
एतैश्चैवौषधैः कार्य धूपनं संप्रलेपनम् ॥ ३५ ॥
( ४ ) गुग्गुलु आदि ओषधियोसे ही धूपन और प्रलेप भी करना
चाहिये ॥३५॥
पिप्पली लवणं शिग्रुं हिङ्गु हिगुशिराटिकाम्¹ ।
काकोली सर्षपान्काकनासा कैटर्यचन्दने ॥ ३६ ॥
शुनः स्कन्धास्थिनखराम्पर्शुकाश्चेति पेषयेत् ।
बस्तमूत्रेण पुष्यर्क्षे प्रदेहः स्यात्सधूपनः ॥ ३७ ॥
( ५ ) पिप्पली, सैन्वा नमक, सहजन, हीग, हिगुशिराटिका ( वंशपत्री या
डीकामारी ), काकोली, सरसों, काकनासा ( कौआदूटी ), कैटर्य ( कट्फल ),
चन्दन, कुत्ते के कंधे की हड्डी, नख और पसलियो को बकरे के मूत्र के साथ
पुष्य-नक्षत्र मे पीस कर उनका प्रलेप और धूप देना चाहिये ॥३६-३७॥
१ 'हिङ्गुशिवाटिकाग्' इति वा पाठ ।
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६६
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६६
अपेतराक्षसीकुष्ठपूतनाकेशिचोरकैः ।
उत्सादनं मूत्रपिष्टैर्मूत्रैरेवावसेचनम् ॥ ३८ ॥
( ६ ) अपेतराक्षसी ( कृष्ण तुलसी ), कूठ पूतना ( हरड), भूतकेशी,
चोरक इनको बकरे के मूत्र मे पीस कर उबटन करे और मूत्रों से अवसेचन
( स्नान ) करावे ॥३८॥
जलौकाशकृता तद्वद् दग्धैर्वा बस्तलोमभिः ।
खरास्थिभिर्हस्तिनखैस्तथा गोपुच्छलोमभिः ॥ ३६ ॥
( ७ ) इसी प्रकार जाक की विष्ठा से अथवा बकरे के बालों को जलाकर
उनसे, या गधे की अस्थि से, अथवा हाथी के नखो के चूर्ण से, या गाय की
पूंछ के बालो को जला कर इनको बकरे के मूत्र मे पीसकर उबटन लगावे १ ॥३६॥
कपिलाना गवा मूत्रं नावनं परम हितम् ।
श्वशृगालबिडालाना सिंहादीना च शस्यते ॥ ४० ॥
नस्य—( १ ) पिंगल वर्ण की ( कपिला ) गायो का मूत्र नस्य के लिये
॰अति उत्तम है । इसी प्रकार कुत्ते, गीदड, बिल्ली, सिंह आदि का मूत्र भी
नस्य के लिये उत्तम है ॥ ४० ॥
भार्गी वचा नागदन्ती श्वेतश्वेता२ विषाणिका ।
ज्योतिष्मती नागदन्ती पादोक्ता मूत्रपेषिताः ॥ ४१ ॥
योगास्त्रयोऽतः षड बिन्दून् पञ्च वा नावयेद्भिषक् ।
( २ ) तीन योग—( १ ) भार्गी, वचा और नागदन्ती, ( २ ) श्वेतश्वेता
( श्वेत अपराजिता या दूर्विया वच ) और विषाणिका ( मेढासिंगी ), ( ३ )
ज्योतिष्मती ( मालकगनी ) और नागदन्ती ( बडी दन्ती, पर्व पुष्पिका )
इनको मूत्र के साथ पीस ले । ये तीन योग है। इनके पाच या छ बिन्दुओ से
वैद्य अपस्मार रागी की नाक मे नस्य देवे ॥ ४१ ॥
त्रिफलान्योषपीतद्रुयवक्षारफणिज्जकैः ॥ ४२ ॥
श्यामापामार्गकारञ्जफलैर्मूत्रैश्च बस्तजैः ।
साधित नावनं तैलमपस्मारविनाशनम् ॥ ४३ ॥
( ३ ) त्रिफला, सोठ, मरिच, पिप्पली, पीतद्रु ( हल्दू ), यवक्षार, फणि-
ज्जक ( तुलसी भेद ), श्यामा, ( त्रिवृत् ), अपामार्ग, करजुवा इनका कल्क
१ 'जलौका' के स्थान पर 'जतुका' पाठ हो तो मकडी का ग्रहण करना
उचित है । २ 'शतश्वेता' इति वा ।
४७० चरकसंहिता [ अ० १०
चतुर्थांश, सरसो या तिल का तैल एक भाग, बकरे का मूत्र चार भाग लेकर
तैल सिद्ध करे । इसका नस्य लेने से अपस्मार-रोग नष्ट होता है ॥ ४२-४३ ॥
पिप्पली वृश्चिकाली च कुष्ठं च लवणानि च ।
भार्गी च चूर्णितं नस्तः कार्यं प्रधमनं परम् ॥ ४४ ॥
(४) पिप्पली, वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), कूठ ओर पांचो नमको मे से
जो मिले और भार्गी इन सब का चूर्ण करके नाक मे फूक द्वारा नस्य देना
चाहिये । यह एक उत्तम औषध है ॥ ४४ ॥
कायस्थाञ्छारदान्मुद्गान्मुस्तोशीरयवास्तथा ।
सव्योषान् बस्तमूत्रेण पिष्ट्वा वर्तीः प्रकल्पयेत् ॥ ४५ ॥
अपस्मारे तथोन्मादे सर्पदष्टे गरार्दिते ।
विषपीते जलमृते चैताः स्युरमृतोपमाः ॥ ४६ ॥
अञ्जन—(१) कायस्था (तुलसी या छोटी इलायची), शरद्-ऋतु मे
उत्पन्न मूग (हरे मूग), मोथा, उशीर (खस), जौ, त्रिकटु (सोठ, मरिच,
पिप्पली) इन सब को बकरे के मूत्र मे पीस कर नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे। अपस्मार,
उन्माद, साप का काटा, अर्दित-वात, विषपान, गर (सयोगज विष) से
पीडित और जलमृत अर्थात् जल मे डूबा पुरुष (पेट मे बहुत पानी जाने से
जो मृत के तुल्य हो)१ उसके लिये ये वर्तिया अमृत के समान जीवनप्रद
होती है ॥ ४५-४६ ॥
मुस्तं वयःस्था त्रिफला कायस्था हिङ्गु शाद्वलम् ।
व्योषं माषान् यवान्मूत्रैर्बास्तमेषभभंस्त्रिभिः ॥ ४७ ॥
पिष्ट्वा कृत्वा च ता वर्तिमपस्मारे प्रयोजयेत् ।
किलासे च तथोन्मादे ज्वरेषु विषमेषु च ॥ ४८ ॥
(२) मोथा, वयस्था (गिलोय), त्रिफला, कायस्था (हरड़), हींग,
शाद्वल (दूब, नई घास), सोठ, मरिच पीपल, उड़द और जौ इनको बकरे,
बैल और मेढ़े के मूत्र मे पीसकर (तीनो के मूत्र से) नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे ।
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१ जलमग्न पुरुष के लक्षण--
विष्टब्धपायुमूर्वाक्षमाध्मातोदरमेहनम् ।
विद्याज्जलमृत जन्तु शीतपादकराननम् ॥
गुदा, सिर, आखे अकड जावे, पेट और लिंग फूल जावे, पैर, हाथ और
मुख ठण्डे पड जावे उसे जलमृत पुरुष जाने ।
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७१
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७१
इनका प्रयोग अपस्मार, उन्माद, किलास (श्वेत कुष्ठ) और विषम-ज्वर
मे करे ॥ ४७-४८ ॥
पुष्योद्धृतं शुनः पित्तमपस्मारघ्नमञ्जनम् ।
(३) पुष्य-नक्षत्र मे कुत्ते के पित्त को लेकर उसका अञ्जन करने से
अपस्मार नष्ट होता है।
तदेव सर्पिषा युक्तं धूपनं परमं मतम् ॥ ४६ ॥
धूपन—(१) पुष्य-नक्षत्र मे कुत्ते के पित्त का लेकर पुराने घृत के साथ
मिलाकर धूपन देना भी अपस्मार की उत्तम औषध है ॥ ४६ ॥
नकुलोलूकमार्जारगृध्रकीटाहिकाकजैः ।
तुण्डैः पक्षैः पुरीषैश्च धूपन मारयेद्भिषक् ॥ ५० ॥
आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिर्हृदयं सम्प्रबुध्यते ।
स्रोतांसि चापि शुध्यन्ति स्मृति संज्ञा स विन्दति ॥ ५१ ॥
(२) नेवला, उल्लू, बिल्ली, गीध, कीट (बिच्छू), साप और कौवा
इनके मुख, पख और पुरीषो मे अपस्मार-रोगी को धूपन देवे। इन उपरोक्त
सिद्ध फलदायक कर्मो से अपस्मार-रोगी के हृदय और मनोवह-स्रोत शुद्ध हो
जाते है और रोगी को सज्ञा (चेतना) आ जाती है ॥ ५०-५१ ॥
यस्यातुबन्धस्त्वागन्तुदोषलिङ्गाधिकाकृतिम् ।
पश्येत्तस्य भिषक्कुर्यादागन्तून्मादभेषजम् ॥ ५२ ॥
जिस अपस्मार मे वात आदि दोषो सं अधिक लक्षण दिखाई देते हों,
उसको आगन्तुज समझे। इस आगन्तुज-अपस्मार मे आगन्तुज-उन्माद की
चिकित्सा करे अर्थात् घृतपान और मत्रादि-चिकित्सा करे ॥ ५२ ॥
अतत्त्वाभिनिवेश नामक महारोग का निदान और चिकित्सा —
अनन्तरमुवाचेदमग्निवेशः कृताञ्जलिः ।
भगवान् प्राक् समुद्दिष्टः श्लोकस्थाने महागदः ॥ ५३ ॥
अतत्त्वाभिनिवेशो यस्तद्धेत्वाकृतिभेषजम् ।
तत्र नोक्तं ततः श्रोतुमिच्छामि तदिहोच्यताम् ।
शुश्रूषवे वचः श्रुत्वा शिष्यायाऽऽह पुनर्वसुः ॥ ५४ ॥
अपस्मार¹ का हेतु, लक्षण, चिकित्सा सुनने के अनन्तर हाथ जोड़ कर
अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से निवेदन किया—भगवन् ! आपने सूत्रस्थान
१. अतत्त्वाभिनिवेश-रोग का लक्षण और चिकित्सा का अंश आर्ष नही
है, यह चक्रदत्त और उनके गुरु-जनो, का मत है।
४७२ चरकसंहिता [ अ० १०
में 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक जो महारोग कहा हे, उसकी आकृति, लक्षण, हेतु
वक्ष पर आपने नहीं कहे थे, उनको मैं सुनना चाहता हूँ। उसे आप यहा पर
कहिये। सुनने की इच्छा वाले शिष्य के वचन को सुन कर भगवान् महर्षि
ने कहा—॥ ५३-५४ ॥
महागदं सौम्य शृणु सहेत्वाकृतिभेषजम् ।
मलिनाहारशीलस्य वेगान्प्राप्तान्निगृह्णतः ।
शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैर्हेतुभिश्चातिसेवितैः ॥ ५५ ॥
हृदयं समुपाश्रित्य मनोबुद्धिवहाः सिराः ।
दोषाः संदूष्य तिष्ठन्ति रजोमोहावृतात्मनः ॥ ५६ ॥
हे सौम्य ! महागद के हेतु, लक्षण ओर चिकित्सा को सुनो—जो व्यक्ति
नित्यप्रति मलिन (अपवित्र) और अपथ्य आहार का सेवन करता है, मूत्र,
पुरीष आदि के उपस्थित वेगो को रोकता है, शत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष
आदि कारणो को अति सेवन करता है रजोग्रस्त और मो-(तम) से आवृत
उस पुरुष मे प्रकुपित शारीरिक वात आदि दोष हृदय मे पहुँच कर मनोवह
और बुद्धि-वह (सज्ञावह), सिराओ (स्रोतो) को दूषित कर देते है ॥५५-५६॥
रजस्तमोभ्यां वृद्धाभ्यां बुद्धौ मनसि चाऽऽवृते ।
हृदये व्याकुले दोषैरथ मूढालपचेतसः ॥ ५७ ॥
करोति विषमां बुद्धिं नित्यानित्ये हिताहिते ।
अतत्त्वाभिनिवेशं तमाहुराप्ता महागदम् ॥ ५८ ॥
रज और तम रूपी मानस दोषो के अधिक बढने से सत्त्व-सञ्ज्ञक मन और
बुद्धि घिर जाते है, ढप जाते है। शारीरिक दोषों के बढने से हृदय व्याकुल
हो जाता है। इस अवस्था मे पुरुष को मोह (मूर्च्छा) आ जाती है, चेतना
कम हो जाती है, नित्य, अनित्य और हित, अहित कार्यों मे विपरीत बुद्धि
करने लगता है। आप्त विद्वान् इसको 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक महाराग
कहते हैं ॥ ५७-५८ ॥
स्नेहस्वेदोपपन्नं तं संसाध्य वमनादिभिः ।
कृतसंसर्जनं मेध्यैरन्नपानैरुपाचरेत् ॥ ५६ ॥
चिकित्सा—रोगी को प्रथम स्नेहन और स्वेदन कराके वमन आदि
क्रियाओ से शुद्ध करे। पीछे से अग्नि को बढाने के लिये पेया आदि कर्म तथा
मेधावर्धक, पवित्र अन्नपानो से चिकित्सा करे ॥५६॥
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७३
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७३
ब्राह्मीस्वरसयुक्तं यत् १ पञ्चगव्यमुदाहृतम् ।
तत्सेव्यं शङ्खपुष्पी च यच्च मेध्यं २ रसायनम् ॥ ६० ॥
ब्राह्मी के ( कूठ आदि से मिले ) स्वरस से युक्त जो पंचगव्य घृत प्रथम
कहा है, उसका सेवन करना चाहिये । शंखपुष्पी का स्वरस और जो मेधावर्धक
रसायन प्रथम कहे है, उनका सेवन करना चाहिये ॥६०॥
सुहृदश्चानुकूलास्तं स्वाप्तधर्मार्थवादिनः ।
संयोजयेयुर्विज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ६१ ॥
मन के अनुकूल अच्छे आप्त, धर्म और हित की बात कहने वाले मित्र
लोग उस रोगी को विज्ञान ( शिल्प-शास्त्र ), धैर्य ( चित्त की स्थिरता ), स्मृति
( भूतार्थ-विज्ञान ) और समाधि ( मन के नियमन ) मे लगावे ॥६१॥
प्रयुञ्ज्यात्तैललशुनं पयसा वा शतावरीम् ।
ब्राह्मीरसं कुष्ठरसं वचा वा मधुसंयुताम् ॥ ६२ ॥
( १ ) तिल तैल के साथ मिला लहसुन का रस प्रतिदिन सेवन करे ।
( २ ) शतावरी के रस का दूध के साथ ले, ( ३ ) ब्राह्मी स्वरस, ( ४ ) कूट
के स्वरस, या ( ५ ) वच के चूर्ण को मधु के साथ प्रयोग करे ये पाच
योग है ॥ ६२ ॥
दुश्चिकित्स्यो ह्यपस्मारश्चिरकारी कृतास्पदः ।
तस्माद्रसायनैरेनं प्रायशः समुपाचरेत् ॥ ६३ ॥
अपस्मार रोग मे शारीरिक और मानसिक दोष एक साथ कुपित होते है
और वह महामर्मों मे आश्रित होता है । और यदि यह रोग देह मे एक बार
स्थान पा जावे और चिरस्थायी हो जावे तो वह अति कष्टसाध्य हो जाता है ।
इसलिये इस अपस्मार की प्रायः अनेक रसायनो से चिकित्सा करे ॥६३॥
जलाग्निद्रुमशैलेभ्यो विषमेभ्यश्च तं सदा ।
रक्षेदुन्मादिनं चैव सद्यः प्राणहरा हि ते ॥ ६४ ॥
अपस्मार और उन्माद के रोगियो की जल, अग्नि, वृक्ष, पर्वत और
अन्य विषम स्थानो से सदा रक्षा करे । क्योकि इन का देखने मात्र से उत्पन्न
हुआ वेग प्राणघातक होता है ॥ ६४ ॥
तत्र श्लोकौ—हेतुः कुर्वन्त्यपस्मारं दोषाः प्रकुपिता यथा ।
सामान्यतः पृथक्त्वाच्च लिङ्गं तेषां च भेषजम् ॥६५॥
१. 'स्वरसंयुक्त' इति । २ 'सेव्यं' इति वा ।
४७४ चरकसंहिता [ अ० ११
महागदसमुत्थानं लिङ्गं चोवाच सौषधम् ।
मुनिर्व्याससमासाभ्यामपस्मारचिकित्सिते ॥ ६६ ॥
उपसहार—अपस्मार-राग के कारण, प्रकुपित दोष जिस प्रकार से अप-
स्मार-रोग का उत्पन्न करते है, सामान्य लक्षण तथा पृथक्-पृथक् लक्षण और
चिकित्सा, अतत्त्वाभिनिवेश नामक महागद के कारण, लक्षण और चिकित्सा,
यह सब विषय भगवान् आत्रेय ने प्रजा की हितकामना से 'अपस्मार-चिकित्सित'
अध्याय मे कह दिये ॥ ६५-६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृतेऽपस्मारचिकित्सित नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥
एकादशोऽध्यायः।
अथातः क्षतक्षीणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे क्षतक्षीण-चिकित्सा की व्याख्या करते है, भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
उदारकीर्तिर्ब्रह्मर्षिरात्रेयः परमार्थवित् ।
क्षतक्षीणचिकित्सार्थमिदमाह चिकित्सितम् ॥ ३ ॥
उदार कीर्ति, ब्रह्मर्षि तथा परमार्थ तत्त्व के जानने वाले, भगवान् पुनर्वसु
ने उरःक्षत से क्षीण व्यक्ति की चिकित्सा के लिये निम्नलिखित चिकित्सा-विधि
का उपदेश किया है ॥ ३ ॥
धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् ।
पततो विषमोच्चेभ्यो युध्यमानस्य चाधिकैः ॥ ४ ॥
वृषं हयं वा धावन्तं दम्यं वान्यं निगृह्णतः ।
शिलाकाष्ठाश्मनिर्घातान् क्षिपतो निघ्नतः परान् ॥ ५ ॥
अधीयानस्य वाऽत्युच्चैर्दूरं वा व्रजतो द्रुतम् ।
महानदीं वा तरतो हयैर्वा सह धावतः ॥ ६ ॥
सहसोत्पततो दूरं तूर्णं चातिप्रनृत्यतः ।
तथाऽन्यैः कर्मभिः क्रूरैर्भृशमभ्याहतस्य वा ॥ ७ ॥
विक्षते वक्षसि व्याधिर्बलवान् समुदीर्यते ।
स्त्रीषु चातिप्रसक्तस्य रूक्षाल्पप्रमिताशिनः ॥ ८
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७५
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७५
कारण और सम्प्राप्ति—धनुष को अधिक खींचते हुए, अति अधिक
भारी भार को उठा कर ले जाते हुए, ऊंची-नीची जगह से गिरने पर, अपने
से अधिक बलवान् व्यक्तियो से युद्ध करते हुए, दौड़ते हुए घोडे या बैल को
वा दम्य ( तरुण बैल, घोडे या भैंसे ) को रोकते हुए, शिला, काष्ठ (लकडी ),
पत्थर, निघोत ( मुद्गर ) आदि को दूर फेकते वा दूसरो पर मारते हुए, बहुत
जोर-जोर से ऊंचे स्वर से पढते हुए, दूर तक अति वेग से भागते हुए, बड़ी
भारी नदी को तैरते हुए, घोड़ों के साथ-साथ दौड़ते हुए, एक दम अचानक
कूदते हुए, बहुत तेजी के साथ नाचते हुए, तथा इसी प्रकार के अन्य क्रूर
कार्यो से अथवा दूसरे व्यक्ति से वक्षस्थल पर जोर से चोट लगने पर, स्त्रियों
मे अतिप्रसङ्ग करनेवाले के, रूखा, अल्प ( हीन मात्रा मे ), वा प्रमित अर्थात्
एक रस खानेवाले व्यक्ति के, वक्ष स्थल मे क्षत हो जाता है, इससे क्षतक्षीण
नामक बलवान् रोग उत्पन्न होता है १ ।
[जल्पकल्पतरुकार ने क्षतक्षीण को दो प्रकार का माना है। एक अति स्त्री-
प्रसग, प्रमिताशन आदि से उत्पन्न और दूसरा क्रूरकार्यो से उत्पन्न । परन्तु
परन्तु शुक्र-क्षय से क्षत-क्षय उत्पन्न नही होता, वह तो क्षयजन्य यक्ष्मा है उसको
प्रथम कह दिया है।] ॥ ४-८ ॥
उरो विरुज्यते तस्य भिद्यतेऽथ विदह्यते ।
प्रपीड्यते ततः पार्श्वे शुष्यत्यङ्गं प्रवेपते ॥ ६ ॥
क्रमाद्वीर्यं बलं वर्णो रुचिरग्निश्च हीयते ।
ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदोऽग्निवधस्तथा ॥ १० ॥
दुष्टः श्यावः सदुर्गन्धिः पीतो विग्रथितो बहुः ।
कासमानस्य चाभीक्ष्णं कफः सास्रः प्रवर्तते ॥ ११ ॥
स क्षतः क्षीयतेऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसोः क्षयात् ।
लक्षण—उर स्थल ( छाती ) मे अत्यन्त वेदना या पीडा होती है, छाती
फटती, दो टुकडे होती प्रतीत होती है, जलन सी प्रतीत होती है, पार्श्व दबते
प्रतीत होते हैं, अग शुष्क हो जाते है, अग कापते है । वीर्य ( सामर्थ्य ), बल,
वर्ण ( कान्ति ), रुचि ( भोजन मे इच्छा ) ओर अग्नि धीरे-धीरे घट जाती
है । ज्वर, पीडा, मन की दीनता ( उदासी ), अतिसार, जाठर-अग्नि का नाश
१ राजयक्ष्मा और क्षतक्षीण मे भेद करना चाहिये । क्षतक्षीण की उपेक्षा
से यक्ष्मा अनुबन्ध के रूप मे उत्पन्न हो जाता है । भेद कहा भी है—
शोषप्लीहाढ्यवाताश्च स्वरभेदं क्षत क्षयम् ॥
४७६ चरकसंहिता [ अ० ११
( भोजन का अविपाक या न पचना ), उत्पन्न हो जाता है । बार बार खासी
आती है, खासने मे दूषित, काला या पीला, दुर्गन्धयुक्त, बँधा हुआ ( ग्रथित ),
मात्रा मे बहुत तथा रक्त मिश्रित कफ बाहर आता है । शुक्र और ओज के
क्षीण होने से उर क्षत का रोगी अत्यन्त क्षीण ( दुर्बल ) हो जाता है ॥६-११॥
अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ॥ १२ ॥
छाती मे दर्द आदि पूर्वोक्त लक्षण जब तक अव्यक्त या थोड़े से व्यक्त
होते हैं, वही इस रोग के पूर्वरूप है ॥ १२ ॥
उरोरुक् शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः क्षते ।
क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ॥ १३ ॥
उरःक्षत होने पर—छाती मे दर्द, रक्त का वमन ओर कास विशेष रूप से
होता है । क्षतक्षीण अर्थात् शुक्र के क्षय से रक्तमिश्रित मूत्र तथा पार्श्व, पीठ
और कटि मे जकडाहट, वेदना अथवा स्थिरता आ जाती है ॥ १३ ॥
अल्पलिङ्गस्य दीप्ताग्ने साध्यो बलवतो नवः ।
परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्गं तु वर्जयेत् ॥ १४ ॥
साध्य और असाध्य के रूप—यदि रोगी बलवान् हो, अग्नि भी प्रदीप्त
हो, लक्षण थोडे हों और रोग नया ( एक साल से कम का ) हो तो वह साध्य
होता है । जो रोग एक साल पुराना हो गया हो तो वह याप्य है, जिस रोगी
मे सब लक्षण विद्यमान हों वह असाध्य है । वह चिकित्सा करने योग्य
नहीं है ॥ १४ ॥
चिकित्सा—
उरो मत्वा क्षतं लाक्षां पयसा मधुसंयुताम् ।
सद्य एव पिबेज्जीर्णे पयसाऽद्यात्सशर्करम् ॥ १५ ॥
(१) जब छाती मे क्षत हुआ पता लगे तब लाख को मधु मे मिला
कर दूध के साथ पी लेवे । इसके जीर्ण होने पर दूध और शर्करा के साथ
अन्न खावे १ ॥ १५ ॥
पार्श्वबस्तिरुजश्चाल्पपित्ताग्निस्ता सुरायुताम् ।
भिन्नविट्कः समुस्तातिविषा पाठा सवत्सकाम् ॥ १६ ॥
(२) रोगी को पार्श्वशूल और बस्तिशूल हो तथा अल्पपित्त और अल्पाग्नि
१ अष्टांगसंग्रह मे कहा है—
उरस्यन्त क्षते सद्यो लाक्षा क्षौद्रयुता पिबेत् ।
क्षीरेण शालीन् जीर्णेऽद्यात् क्षीरेणैव सशर्करान् ॥
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७
( मन्दाग्नि ) हो तो लाख का सुरा के साथ पीवे । यदि रोगी को अतीसार
हो तो लाख को मांथा, अतीस, पाठा और इन्द्रजौ के काथ ( काढे )
के साथ पीवे ॥ १६ ॥
लाक्षा सर्पिर्मधूच्छिष्ट जीवनीयगण सिताम् ।
त्वक्क्षीरीसंमितं क्षीरे पक्त्वा दीप्तानलः पिबेत् ॥ १७ ॥
( ३ ) दीप्ताग्नि रोगी लाख, घी, मोम, जीवनीय गण की औषधिया, मिश्री
त्वक्क्षीरी ( वंशलोचन ) और समिता ( गोधूम, गेहूँ का चूर्ण ) को दूध से
पका कर पीये ॥ १७ ॥
इक्ष्वालिकविसग्रन्थिपद्मकेशरचन्दनैः ।
श्रुतं पयो मधुयुतं सन्धानार्थं पिबेत्क्षती ॥ १८ ॥
( ४ ) उरःक्षत रोगी सन्धान के लिये इक्षुवालिका, बिस (मृणाल की जड)
ग्रन्थि ( पिप्पली मूल ), पद्मकेसर ओर चन्दन इनसे पकाये दूध मे मधु मिला
कर पिये ॥ १८ ॥
यवानां चूर्णमादाय क्षीरसिद्धं घृतप्लुतम् ।
ज्वरे दाहे सिताक्षौद्रसक्तून् वा पयसा पिबेत् ॥ १६ ॥
( ५ ) उरःक्षत मे ज्वर और दाह होने पर आम (अग्नि पर न भुने,
कच्चे ) जौ के चूर्ण को चौगुने दूध मे पका कर घी मे मिला कर शर्करा
( शक्कर ) और मधु के साथ खावे । अथवा शक्कर और मधु से मिले जौ के
सत्तूओ को दूध मे मिला कर खावे ॥ १६ ॥
कासी पर्वास्थिशूली च लिह्यात्सघृतमाक्षिकाः ।
मधूकमधुकद्राक्षात्वक्क्षीरीपिप्पलीबलाः ॥ २० ॥
( ६ ) कास, पार्श्वशूल, पोरुओ मे पीडा और अस्थिशूल होने पर महुए के
फूल, मुलहठी, द्राक्षा, वसलोचन, पिप्पली और बला इनके चूर्ण को घी और
शहद मे मिला कर चाटे ॥ २० ॥
एलापत्रत्वचोऽर्धांशाः पिपल्यर्धपलं तथा ।
सितामधुकखर्जूरमृद्वीकाश्च पलोन्मिताः ॥ २१ ॥
संचूर्ण्य मधुना युक्ता गुलिकाः संप्रकल्पयेत् ।
अक्षमात्रा ततश्चैका भक्षयेन्ना दिने दिने ॥ २२ ॥
कासं श्वास ज्वर हिक्का छर्दिमूर्च्छा मदं भ्रमम् ।
रक्तनिष्ठीवनं तृष्णां पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ २३ ॥
शोषप्लीहाढ्यवातांश्च स्वरभेदं क्षतं क्षयम् ।
४७८ चरकसंहिता [ अ० ११
गुलिका तर्पणी वृष्या रक्तपित्तं च नाशयेत् ॥ २४ ॥
इत्येलादिगुटिका ।
(७) एलादि गुटिका—छोटी इलायची, पत्र (तेजपात), त्वच (दाल-
चीनी) ये प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली आधा पल, शर्करा, मुलहठी, खजूर,
द्राक्षा (दाख) प्रत्येक एक-एक पल इन सब का चूर्ण करके मधु के साथ
गोलिया बनावे । रोगी को चाहिये कि प्रतिदिन एक कर्ष परिमित गुटिका खाये।
ये गुटिकाये तर्पणी (वृष्य) है। कास, श्वास, ज्वर, हिचकी, वमन, मूर्च्छा, मद
श्रम, रक्तवमन, प्यास, पार्श्वशूल, अरोचक, शोष, प्लीहा, आढ्यवात, स्वरभेद,
क्षत, क्षय और रक्तपित्त को नष्ट करती है ॥ २१-२४ ॥
रक्तेऽतिवृत्ते दक्षाण्डं यूषेस्तोयेन वा पिबेत् ।
चटकाण्डरसं वाऽपि रक्तं वा छागजाङ्गलम् ॥ २५ ॥
(८) रक्त के अधिक आने पर कुक्कुट के अण्डों को मूग आदि के यूष
(रस) के साथ अथवा जल के साथ पीवे । अथवा चटक (चिडिया) के
अण्डे के रस को यूष के साथ पीवे, बकरी या हरिण आदि जंगली पशुओ के
रक्त को पीवे ॥ २५ ॥
चूर्णं पौनर्नवं रक्तशालितण्डुलशर्करम् ।
रक्तष्ठीवी पिबेत्सिद्धं द्राक्षारसपयोघृतैः ॥ २६ ॥
मधूकमधुकक्षीरसिद्धं वा तण्डुलीयकम् ।
(६) रक्त मिश्रित थूक आने पर—शर्करा, पुनर्नवा और लाल चावलो
का चूर्ण मिला कर खावे । द्राक्षा रस, दूध, घी इनके साथ सिद्ध करके पीवे ।
अथवा महुवे का फूल, गुलहठी, इनका क्वाथ, क्वाथ के समान दूध, इनमे तण्डु-
लीयक (चौलाई) सिद्ध करके पीवे ॥ २६ ॥
मूढवातस्त्वजामेदः सुराभृष्टं ससैन्धवम् ॥ २७ ॥
क्षामः क्षीणः क्षतोरस्कस्त्वनिद्रः सबलेऽनले ।
श्रुतक्षीरसरेणाद्यात्सक्षाौद्रघृतशर्करम् ॥ २८ ॥
(१०) उर क्षत रोगी मे यदि वायु अनुलोम-मार्ग से प्रवृत्त न हो
तो सुरा मे भुनी अजा की वसा (चर्बी) को सैन्धे नमक के साथ सेवन करे ।
यदि उरःक्षत-रोगी क्षाम (क्लान्त) और क्षीण शरीर हो, अग्नि प्रबल हो और
नींद न आती हो तो अजा-मेद (बकरे की चर्बी) को पके हुए दूध के सर
भाग (मलाई) के साथ मिला कर घी, मधु, शर्करा के साथ खावे ॥२७-२८॥
शर्करा च यवक्षौद्रजीवकर्षभकौ मधु ।
अ० ११] चिकित्सितस्थानम् ४७६
शृतक्षीरानुपानं वा लिह्यात्क्षीणः क्षतः कृशः ॥ २९ ॥
क्रव्यादामासनिर्यूहं घृतभृष्टं पिवेच्च सः ।
पिप्पलीक्षौद्रसंयुक्तं मासशोणितवर्धनम् ॥ ३० ॥
(११) कृश और क्षीण उरःक्षत-रोगी जो, गेहूँ, जीवक, ऋषभक इनके
चूर्ण को शर्करा के समान भाग लेकर मधु के साथ चाटे। ऊपर से गरम दूध
पीवे, मांस और रक्त बढ़ाने वाले मांसभक्षी पशु-पक्षियो के मांस के रस को
म भून कर पिप्पली-चूर्ण और मधु के साथ मिला कर खावे ॥२९-३०॥
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षशालप्रियङ्गुभिः ।
तालमस्तकजम्बूत्वक्प्रियालैश्च सपद्मकैः ॥ ३१ ॥
साश्वकर्णैः शृतात्क्षीराद्दध्नाज्जातेन सर्पिषा ।
शाल्योदनं क्षतोरस्कः क्षीणशुक्रश्च मानवः ॥ ३२ ॥
(१२) उरःक्षत और क्षीणशुक्र पुरुष वट, गूलर, पीपल, पिलखन, साल
प्रियङ्गु, ताड का मस्तक, जामुन की छाल, पियाल, पद्माख, अश्वकर्ण (पीतशाल)
इनका समान भाग लेकर उनके कल्क के साथ पके दूध मे से निकले घी के
साथ चावल खाये ॥३१-३२॥
यष्ट्याह्वानागबलयोः क्वाथे क्षीरसमं घृतम् ।
पयस्यापिप्पलीवाशीकल्कसिद्धं क्षते शुभम् ॥ ३३ ॥
(१३) मुलहठी और नागबला का क्वाथ (एक तृतीयांश रहने पर),
दूध, घी के समान, कल्क Callback, पयस्या (क्षीरकाकोली), पिप्पली, वंशलोचन
इनके कल्क से दूध के समान घृत (एक भाग) सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत
में उपयोगी है ॥ ३३ ॥
कोललाक्षारसे तद्वत्क्षीराष्टगुणसाधितम् ।
कल्कैः कट्वङ्गदार्बीत्वग्वत्सकत्वक्फलैर्घृतम् ॥ ३४ ॥
(१४) कोल (सूखे बेर) और लाक्षा रस (अथवा क्वाथ) और घी से
आठ गुणे दूध मे, कट्वङ्ग (श्यानाक), दारुहल्दी की छाल, कूडे की छाल, इन्द्रजौ
इनके कल्क से घृत सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत मे हितकारी है १॥ ३४ ॥
जीवकर्षभकौ वीरां जीवन्तीं नागरं शटीम् ।
चतस्रः पर्णिनीर्मेदे काकोल्यौ द्वे निदिग्धिके ॥ ३५ ॥
पुनर्नवे द्वे मधुकमात्मगुप्ता शतावरीम् ।
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१ अष्टांगसंग्रह मे अष्टगुण दूध का ही विधान है। यथा—
घृतं वाष्टगुणे क्षीरे कोललाक्षारसान्वितम् ॥
४८० चरकसंहिता [ अ० ११
ऋद्धिं परूषकं भार्गी मृद्वीकां बृहतीं तथा ॥ ३६ ॥
शृङ्गाटकं तामलकीं पयस्यां पिप्पलीं बलाम् ।
बदराक्षोटखर्जूरवातामाभिषुकाण्यपि ॥ ३७ ॥
फलानि चैवमादीनि कल्कान् कुर्वीत कार्षिकान् ।
धात्रीरसविदारीक्षुच्छागमांसरसं पयः ॥ ३८ ॥
एषां प्रस्थोन्मितान् भागान् घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
प्रस्थार्धं मधुनः शीते शर्कराऽर्धतुला तथा ॥ ३९ ॥
द्विकार्षिकाणि पत्रैलाहेमत्वङ्मरिचानि च ।
चूर्णितानि विनीयास्माल्लिह्यान्मात्रां सदा नरः ॥ ४० ॥
अमृतप्राशमित्येतन्नराणाममृतं घृतम् ।
सुधामृतरसं प्राश्य क्षीरमांसरसाशिना ॥ ४१ ॥
नष्टशुक्रक्षतक्षीणदुर्बलव्याधिकंपितान् ।
स्त्रीप्रसक्तान्कृशान्वर्णस्वरहीनांश्च बृंहयेत् ॥ ४२ ॥
कासहिक्काज्वरश्वासदाहतृष्णास्रपित्तनुत् ।
पुत्रदं वमिमूर्च्छाहृद्योनिमूत्रामयापहम् ॥ ४३ ॥
इत्यमृतप्राशघृतम् ।
( १५ ) अमृतप्राश-घृत—कल्कार्थ—जीवक, ऋषभक, शतावरी, जीवन्ती,
सोंठ, कचूर, मूगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मेदा, महामेदा, का-
काली, क्षीरकाकाली, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, श्वेत और लाल दोनो पुनर्नवा,
मुलहठी, कौंच, शतावरी, ऋद्धि, फालसा, भार्गी, मुनक्का, बड़ी कटेरी, सिंघाढ़ा,
तामलकी ( भूई आवला ), पयस्या ( विदारी ), पिप्पली, खरैटी, बदर ( बेर ),
अक्षोट ( अखराट ), खजूर, बाताम ( बादाम ), अभिषुक ( पिस्ता ) इसी
प्रकार के अन्य मधुर, स्निग्ध और बृंहण फल प्रत्येक एक-एक कर्ष, आवले
का स्वरस, विदारी का रस, गन्ने का रस, बकरे के मास का रस और गाय का
दूध प्रत्येक एक प्रस्थ लेकर इनके साथ घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे । सिद्ध होकर
शीतल हो जाने पर मधु आधा प्रस्थ ( आठ पल ), शर्करा पचास पल, मरिच,
दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेसर प्रत्येक आधा पल लेकर इनका चूर्ण
इसमे मिला देवे ।
यह घृत क्षतक्षीण व्यक्तियों के लिये अमृत के समान है । सुधा और अमृत
के समान है१, इस घी को खाकर पीछे से दूध और मास रस के साथ अन्न खावे ।
१ सुधा और अमृत दोनो पर्याय है तथापि इतना विवेक है कि नागों ने-
अ० ११] ३१ चिकित्सितस्थानम् ४८१
अ० ११] ३१ चिकित्सितस्थानम् ४८१
यह अमृतप्राश घृत नष्टशुक्र, क्षतक्षीण, दुर्बल, रोगों से कृश हुए, अति-
मैथुनशील, हीनमांस, वर्ण, स्वर से हीन व्यक्तियों को पुष्ट करता है। यह घृत
कास, हिक्का, ज्वर, श्वास, दाह, प्यास, रक्तपित्त, वमि, मूर्च्छा, हृदय
रोग, योनिरोग और मूत्ररोग को नष्ट करता है, यह घृत पुत्रदायक अर्थात्
वीर्यवर्धक है ॥३५-४३ ॥
श्वदंष्ट्रोशीरमञ्जिष्ठाबलाकाश्मर्यकत्तृणम् ।
दर्भमूलं पृथक्पर्णीं पलाशर्षभकौ स्थिराम् ॥ ४४ ॥
पलिकान् साधयेत्तेषां रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
कल्कैः स्वगुप्ताजीवन्तीमेदर्षभकजीवकैः ॥ ४५ ॥
शतावर्या द्विमृद्वीकाशर्कराश्रावणीबिसैः ।
प्रस्थः सिद्धो घृताद्वातपित्तहृद्द्रव'शूलनुत् ॥ ४६ ॥
मूत्रकृच्छ्रप्रमेहार्शः कास'शोपक्षयापहः ।
धनुःस्त्रीमद्यभाराध्वखिन्नानां बलमांसदः ॥ ४७ ॥
इति श्वदंष्ट्रादिघृतम् ।
(१६( श्वदंष्ट्रादि घृत-गोखरू, खस, मजीठ, खरेंटी, गम्भारी, रोहिषतृण,
दर्भमूल, पृश्निपर्णी, ढाक, ऋषभक, शालपर्णी प्रत्येक एक एक पल लेकर आठ
गुणे जल में पकावे । चतुर्थांश रहने पर इसमे घी से चौगुना दूध मिलावे ।
कल्कार्थ—कोंच, जीवन्ती, मेदा, ऋषभक, जीवक, शतावरी, ऋद्धि, द्राक्षा,
शर्करा, श्रावणी (गोरखमुण्डी), बिस (मृणाल) इनका घी से एक चतुर्थांश
कल्क लेकर उसके द्वारा घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे ।
यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य हृदयशूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, अर्श, कास,
शोष और क्षय का नष्ट करता है, धनुष, भार, स्त्री, मद्य, यात्रा से क्षीण
व्यक्तियों का बल और मांस देता है ॥ ४४-४७ ॥
मधुकाष्टपलं द्राक्षाप्रस्थक्वाथे घृतं पचेत् ।
पिप्पल्यष्टपले कल्के प्रस्थं सिद्धे च शीतले ॥ ४८ ॥
पृथगष्टपलं क्षौद्रशर्कराभ्यां विमिश्रयेत् ।
समं शक्तु क्षतक्षीणे रक्तगुल्मे च तद्धितम् ॥ ४६ ॥
इति शक्तुप्रयोगः ।
जिसको खाया था वह सुधा और देवों ने जिसका पान किया था वह अमृत
कहाया था । नाग और देव दोनो उनको सेवन कर दीर्घजीवी और अमर हुए
ऐसी प्रसिद्धि है। इन दोनों के ही तुल्य यह अमृतप्राश घृत समझना चाहिये। चक्र०
१ 'हृद्द्रव' इति । २ 'काम' इति च पाठ.।
४८२ चरकसंहिता [ अ० ११
( १७ ) सक्तु प्रयोग—मुलहठी आठ पल, सूखी दाख एक प्रस्थ इनके
क्वाथ मे पिप्पली का कल्क आठ पल मिला कर घी का एक प्रस्थ ( १६ पल )
सिद्ध करे । सिद्ध होने पर जब ठण्डा हो जाये तब मधु आठ पल, शर्करा
( खाण्ड ) आठ पल मिलावे । इस घी को सत्तू के समान भाग मे मिला कर
खांवे । यह घृत क्षतक्षीण और रक्तगुल्म रोगो मे हितकारी है ॥ ४८-४६ ॥
धात्रीफलविदारीक्षुजीवनीयरसाद् घृतात् ।
अजागोपयसोश्चैव सप्त प्रस्थान्पचेद्भिषग् ॥ ५० ॥
सिद्धशीते सिताक्षौद्र द्विप्रस्थं विनयेत्ततः ।
यक्ष्मापस्मारपित्तासृक्कासमेहक्षयापहम् ॥ ५१ ॥
वयःस्थापनमायुष्यं मांसशुक्रबलप्रदम् ।
( १८ ) आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का
रस एक प्रस्थ, जीवनीय गण का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध एक प्रस्थ,
गाय का दूध एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, इन सात वस्तुओ को पकावे । इस घृत
के शीतल होने पर शर्करा एक प्रस्थ ( १६ पल ) और मधु एक प्रस्थ मिलावे ।
यह घृत यक्ष्मा, अपस्मार, रक्तपित्त, कास, प्रमेह और क्षय को नष्ट करता है,
यौवन को बनाये रखन और बुढापे को दूर करने वाला, आयुर्वर्धक और मास
शुक्र तथा बल को बढाता है ॥ ५०-५१-॥
घृतं तु पित्तेऽभ्यधिके लिह्याद्वातेऽधिके पिबेत् ॥ ५२ ॥
लीढं निर्वापयेत्पित्तमल्पत्वाद्वन्ति नानलम् ।
आक्रामत्यनिलं पीतमूष्माणं निरुणद्धि च ॥ ५३ ॥
( १६ ) पित्त के प्रबल होने पर घी चाटे, वायु के अधिक होने पर घृतका
पान करे । पित्त के अधिक होने पर चाटा हुआ घृत पित्त को तो शान्त करता
है और मात्रा में थोड़ा होने से जाठर-अग्नि का नाश नही करता । वायु के
अधिकता मे पिया हुआ घृत स्निग्ध और गुरु होने से वायु को शमन करता है
वायु रूक्ष और लघु होता है । बलवान् वायु पक्वाशय से जिस उष्णिमा को ले
जा रहा हो, उसको शान्त करता है ॥ ५२-५३ ॥
क्षामक्षीणकृशाङ्गानामेतान्येव घृतानि च ।
त्वक्क्षीरीशर्करालाजचूर्णैः स्यानानि१ योजयेत् ॥ ५४ ॥
क्षाम (क्रान्त शरीर), क्षीण और कृश अगो-वाले व्यक्तियों मे उपरोक्त घृत
१ 'पानानि' च पाठः ।
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८३
वशलोचन, पिप्पला, लाजा इनके चूर्णो से गाढा ( घन ) पान बना कर
सेवन करावे ॥ ५४ ॥
सर्पिर्गुडान् समध्वक्षाञ्जग्ध्वा चानु पयः पिवेत् ।
रेतो वीर्य बलं पुष्टिं तैराशुतरमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥
( २० ) सर्पिर्गुड— ( १ ) वशलोचन, पिप्पली और लाजा चूर्ण से बने
बनाये घृतो को मधु के साथ सेवन करे पीछे से दूध पीवे । इस प्रकार करने से
शुक्र, सामर्थ्य, बल और पुष्टि शीघ्र प्राप्त होती है ॥ ५५ ॥
बला विदारी ह्रस्वा च पञ्चमूली पुनर्नवा ।
पञ्चानां क्षीरिवृक्षाणा शुङ्गा मुष्ट्यशका अपि ॥ ५६ ॥
एषा कषाये द्विक्षीरे विदार्याजरसांशिके ।
जीवनीयैः पचेत्कल्केैरक्षमात्रैर्घृताढकम् ॥ ५७ ॥
सितापलानि पूतेऽस्मिन् शीते द्वात्रिंशदावपेत् ।
गोधूमपिप्पलीवाशीचूर्ण शृङ्गाटकस्य च ॥ ५८ ॥
सक्षौद्रं कुडवाशेन तत्सं खजमूर्च्छितम् ।
स्त्यानं सर्पिर्गुडान् कृत्वा भूर्जपत्रेण वेष्टयेत् ॥ ५९ ॥
ताञ्जग्ध्वा पलिकान् क्षीरं मद्य चानुपिवेत्कफे ।
शोषे कासे क्षते क्षीणे श्रमस्त्रीभारकर्पिते ॥ ६० ॥
रक्तनिष्ठीवने तापे पीनसे चोरसि स्थिते ।
शस्ताः पार्श्वशिरःशूले विभेदे स्वरवर्णयोः ॥ ६१ ॥
इति द्वितीयसर्पिर्गुडाः ।
( २१ ) सर्पिर्गुड़ ( २ )—क्वाथ के लिये खरैटी, विदारीकन्द, लघुपञ्च
मूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू ) पाचो क्षीरी
वृक्षो ( बड़, पीपल, पिलखन, गूलर, अश्वत्थ ) के नवीन कोमल पत्ते प्रत्येक
एक मुष्टि ( पल ) लेकर आठ गुणे जल मे क्वाथ करे । चतुर्थाश रहने पर उतार
ले । कषाय से दुगुना दूध, विदारी का स्वरस तथा बकरे का मास रस प्रत्येक
कषाय के समान, अथवा एक एक आढक, कल्कअर्थ-जीवक, ऋषभक आदि
जीवनीय गण की दस ओषधिया प्रत्येक एक एक कर्ष, घृत एक आढक ( चार
प्रस्थ ) लेकर यथाविधि घृतपाक करे । सिद्ध होने पर छान कर इस घृत मे
मिश्री बत्तीस पल, गेहूँ, पिप्पली, वशलोचन, सिंघाड़ा इनमे से प्रत्येक का चूर्ण
और शहद प्रत्येक एक एक कुडव ( चार पल ) मिला कर खौचे से भली
प्रकार चलावे, जिससे गाढा हो जाये । फिर इनकी एक एक पल की गुटिकाये