चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४६८ चरकसंहिता [ अ० १०
कटभीनिम्बकट्वङ्गमधुशिग्रुत्वचा रसे ।
सिद्धं मूत्रसमं तैलमभ्यङ्गार्थे प्रशस्यते ॥ ३२ ॥
( २ ) कटभी ( वापुबा ) नीम की छाल, कट्वङ्ग ( श्योनाक ), मधुशिग्रु
( लाल शोभांजन की छाल ) इनके क्वाथ मे गोमूत्र के समान सरसो का तैल
मिला कर तैल सिद्ध करे, यह तैल अभ्यग के लिये उत्तम है । [ इसमे क्वाथ
चतुर्थांश के स्थान पर तृतीयाश करे तभी स्नेह से चतुर्गुण होगा ] ॥३२॥
पलङ्कषावचापध्यावृश्चिकाल्यर्कसर्षपैः ।
जटिलापूतनाकेशीनाकुलीहिगुचोरकैः ॥ ३३ ॥
लशुनातिरसाचित्राकुष्ठैर्विङ्भिश्च पक्षिणाम् ।
मांसाशिनां यथालाभ बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ॥ ३४ ॥
सिद्धमभ्यञ्जनं तैलमपस्मारविनाशनम् ।
( ३ ) पलकषा ( गुग्गुलु ), वचा, पथ्या ( हरड़ ), वृश्चिकाली ( बिच्छू-
बूटी ), सरसो, जटिला ( जटामासी ), पूतना ( हरड़ ), केशी ( भूत केशी ),
नाकुली ( रास्ना या सर्पगन्धा ), हींग, चोरक ( चोर पुष्पी, सुगन्धित द्रव्य ),
लसुन, अतिरसा ( शतावरी या जलज यष्टि मधु ), चित्रक, कूठ, मासाहारी
पक्षियो ( गीध, चील आदि ) की बीठ इनमे से जो भी मिल सके उनका कल्क
चतुर्थांश, सरसो का तैल एक भाग और बकरे का मूत्र चार भाग लेकर तैल
सिद्ध करना चाहिये, इससे अपस्मार-रोग शान्त होता है ॥३३-३४-॥
एतैश्चैवौषधैः कार्य धूपनं संप्रलेपनम् ॥ ३५ ॥
( ४ ) गुग्गुलु आदि ओषधियोसे ही धूपन और प्रलेप भी करना
चाहिये ॥३५॥
पिप्पली लवणं शिग्रुं हिङ्गु हिगुशिराटिकाम्¹ ।
काकोली सर्षपान्काकनासा कैटर्यचन्दने ॥ ३६ ॥
शुनः स्कन्धास्थिनखराम्पर्शुकाश्चेति पेषयेत् ।
बस्तमूत्रेण पुष्यर्क्षे प्रदेहः स्यात्सधूपनः ॥ ३७ ॥
( ५ ) पिप्पली, सैन्वा नमक, सहजन, हीग, हिगुशिराटिका ( वंशपत्री या
डीकामारी ), काकोली, सरसों, काकनासा ( कौआदूटी ), कैटर्य ( कट्फल ),
चन्दन, कुत्ते के कंधे की हड्डी, नख और पसलियो को बकरे के मूत्र के साथ
पुष्य-नक्षत्र मे पीस कर उनका प्रलेप और धूप देना चाहिये ॥३६-३७॥
१ 'हिङ्गुशिवाटिकाग्' इति वा पाठ ।