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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

४४८ चरकसंहिता [अ० ६

एकान्त मे बातचीत करे, ऐसे प्रकृति वाले पुरुष को यक्षग्रह से उन्मत्त हुआ
जाने ॥ २४ ॥
नष्टनिद्रमन्न-पान-द्वेषिणमनाहारमप्रतिबलिनं शस्त्र-शोणित-मांस-रक्त-
माल्याभिलाषिणं सन्तर्जकं च राक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥ २५ ॥
(६) राक्षसोन्माद—रात को नींद न आये, रोगी रात को विचरे, खान-
पान से द्वेप रखे, बिना आहार के भी अति बलवान् हो, शस्त्र, रक्त, मास, लाल
माला की चाह करे ओर दूसरे को डाट का भय दिखावे, ऐसे व्यक्ति को राक्षस-
ग्रह से उन्मत्त जाने ॥ २५ ॥
प्रहास-नृत्य-प्रधानं १ देव-विप्र-वैद्य-द्वेपावज्ञाभिः स्तुति- २ वेद-मन्त्र-शा-
स्त्रोदाहरणैः काष्ठादिभिरात्मपीडनेन च ब्रह्मराक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥२६॥
(७) ब्रह्मराक्षस—हास्य करे और नृत्य करे, देव, ब्राह्मण और वैद्यो मे
द्वेष, अनाहार तथा देवता आदि की स्तुति करे, वेद, मत्र, धर्मशास्त्र इनके
अनेक उदाहरण दे, लकडी, डेले आदि से अपने शरीर को आघात पहुचावे,
ऐसे व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस से उन्मत्त समझे ॥२६॥
अस्वस्थचित्तं स्थानमलभमानं नृत्य-गीत-हासिनं बद्धाबद्धप्रलापिनं ३
संकर-कूट-मलिन-रथ्याचैल-तृणाश्म-काष्ठाधिरोहणरतिं ४ संभिन्न-रूक्ष-
वर्ण-स्वरं नग्नं विधावन्तं नैकत्र तिष्ठन्तं दुःखान्यावेदयन्तं नष्टस्मृतिं च
पिशाचोन्मत्तं विद्यात् ॥ २७ ॥
(८) पिशाचोन्माद—अस्वस्थ मन हो, नाचे, गावे, हसे, सम्बद्ध और
असम्बद्ध बातचीत करे, संकर (झाडू से एकत्र किये धूल तिनके आदि), कूट
(मिट्टी का ढेर), मैले रास्ते, मलिन वस्त्र, तिनके, पत्थर, लकडी इन पर चढने
की प्रवृत्ति हो, जिसके वर्ण मिलेजुले हो, स्वर रूखा ओर एक समान न रहता
हो (बदलता रहे), नगा रहे, इधर-उधर भागे, एक स्थान पर न बैठे, दूसरे
के सामने अपने दुःख की कथा कहे तथा स्मृति नष्ट हो गई हो, ऐसे व्यक्ति को
पिशाचग्रह से उन्मत्त समझे ॥ २७ ॥
तत्र शौचाचारं तपःस्वाध्यायकोविदं नर प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयो-
दश्या च देवाः, ज्ञान-शुचि-विविक्त-सेविनं धर्म-शास्त्र-श्रुति-काव्य-कुशलं
प्रायः षष्टिनवम्योर्ऋषयः, मातृ-पितृगुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो
दशम्याममावास्यायां च पितरः, गन्धर्वास्तु स्तुति-गीत-वादित्र-रति पर-
१ 'प्रहासनृत्यवादिन' इति । २ 'वज्ञाभिस्तुति-' इति । ३. 'बद्धप्रभाषिण'
इति च । ४. 'तृणेषु आरोहण-' इति च पाठः ।

अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६

अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६
दार-गन्ध-माल्य-प्रियं शोचाचारं द्वादश्या चतुर्थ्यां च, सत्त्व-बल-रूप-
गर्व-शौर्य-युक्तं माल्यानुलेपनं हास्यप्रियमतिवाक्करणं प्रायः शुक्लैकादश्यां
सप्तम्यां च यक्षाः, स्वाध्याय-तपो-नियमोपवास-व्रतचर्या-देव-यति-गुरु-पू-
जारति नष्टशौचं ब्रह्मवादिनं शूरमानिनं देवतागार-सलिल-क्रीडनरति प्रायः
शुक्लपञ्चम्यां पूर्णचन्द्रदर्शने च ब्रह्मराक्षसाः, रक्षःपिशाचास्तु हीन-सत्त्व-
पिशुन-क्रौण-लुब्धं प्रायो द्वितीयातृतीयाष्टमीषु पुरुषं छिद्रमवेक्ष्याभिधर्ष-
यन्ति१ । इत्यपरिसंख्येयानां ग्रहाणामाविष्कृततमा ह्यष्टावेते व्या-
ख्याताः ॥ २८ ॥
आगमन काल—इनमे शौच ( शुचि, पवित्र ) आचार वाले, तप और
वेदाध्ययन मे पण्डित पुरुष के छिद्र ( त्रुटि अवकाश ) को ढूंढकर प्रायः शुक्ल-
पक्ष की प्रतिपदा या त्रयोदशी के दिन उसको देवग्रह आक्रान्त करते हैं। ऋषि-
ग्रह—स्नान, पवित्र द्रव्य, एकान्तस्थान सेवी, धर्मशास्त्र, वेद मे कुशल व्यक्ति
को प्राय करके छठी या नवी तिथि के-दिन आक्रान्त करते है। पितृग्रह-प्रायः
माता, पिता, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य की सेवा करने वाले में
त्रुटि देखकर दशमी या अमावस्या-तिथि मे आक्रमण करते है। गन्धर्वग्रह—
स्तुति, गाने-बजाने मे रत, परस्त्री, गन्ध और माला के प्रिय, पवित्र आचार
वाले व्यक्ति मे छिद्र देखकर प्राय बारहवी या चौदहवी तिथि मे आक्रमण
करते है। यक्षग्रह—सत्त्व, बल, रूप, अहकार, शौर्य से युक्त माला, अगराग
और हास्य के प्रिय, अतिवाक्पटु व्यक्ति मे छिद्र पाकर प्रायः करके शुक्लपक्ष की
एकादशी या सतमी मे आक्रमण करते है। ब्रह्मराक्षस-स्वाध्याय, तप, नियम
उपवास, ब्रह्मचर्य, देवता, सन्यासी और गुरुओ की पूजा न करने वाले, भ्रष्टा-
चार, अपवित्र, अपने को ब्राह्मण और अब्राह्मण कहने वाले अर्थात् अब्राह्मण
होने पर ब्राह्मण और ब्राह्मण होने पर अब्राह्मण कहने वाले, अपने को शूर
गिनने वाले, मन्दिर और पानी मे क्रीडा करने वाले मे छिद्र देखकर पञ्चमी या
पौर्णमासी के दिन आक्रमण करते है। राक्षस और पिशाच—प्रायः दुर्बल,
छली स्वभाववाले, चोर, लोभी, धूर्त्त पुरुष मे छिद्र पाकर द्वितीया, तृतीया
और अष्टमी के दिन आक्रमण करते है।
[ सुश्रुत मे कहा है—देवग्रह पौर्णमासी मे, असुर सन्ध्याकालो मे, गन्धर्व
प्राय अष्टमी मे यक्ष प्रतिपदा मे, पितृ-जन कृष्णपक्ष मे, सर्प पञ्चमी मे, राक्षस
रात्रि मे और पिशाच चतुर्दशी मे आक्रमण करते हैं। ]
१ प्रतिवाक्य ‘धर्षयन्ति’ इति क्रियापद च पठ्यते क्वचित् ।

४५० चरकसंहिता [ अ० ६
ग्रह असंख्य हैं, उनमें ये ही आठ ग्रह अधिक दीखने से मुख्य हैं, इसलिये
इन्हीं आठ ग्रहो की व्याख्या की है ॥ २८ ॥
सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु यो हस्तावुद्यम्य रोषसंरम्भात्रिःसङ्गमन्वेष्वा-
त्मनि वा पातयेत् स ह्यसाध्यो ज्ञेयः, तथा यः साश्रुनेत्रो मेढ्रप्रवृत्तरक्तः
क्षतजिह्वः प्रस्रुतनासिकश्छिद्यमानमर्मा प्रतिहन्यमानपाणिः सततं विक्कू-
जन् दुर्वर्णस्तृषार्तः पूतिगन्धिश्च हिंसार्थमुन्मत्तो ज्ञेयस्तं परिवर्जयेत् ॥२६॥
इन सब भूतोन्मादों मे जो पुरुष क्रोध के वेग के कारण हाथों को ऊंचा
उठा कर बिना किसी शंका या संकोच के, बिना ज्ञान के अपने या पराये पर
मारने के लिये पटके तो उसे असाध्य समझना चाहिये । इसी प्रकार से जिस
रोगी की आंखो से आंसू बहे, लिंग-इन्द्रिय से रक्त आता हो, जीभ कट जाये,
नासिका से पानी बहता हो, त्वचा फट जाये, मारने के लिये दोनो हाथ उठा
रक्खे हों, निरन्तर कराहता ( अव्यक्त शब्द करता ) रहता हो, देखने मे भद्दा
कुरूप, प्यासा, शरीर से दुर्गन्ध आती हो, उसे हिंसार्थी उन्माद रोगी ( पागल )
समझे, वह रोगी असाध्य है ।
[ चरकोषस्कार मे साध्य-असाध्य के विषय मे लिखा है कि—इन सब
भूतोन्मादो मे उन्माद का प्रयोजन हिंसा, रति और पूजा है । इनमे से हिंसार्थी
उन्माद असाध्य है और रति और पूजा के निमित्त हुए उन्माद साध्य है।]॥२६॥
रत्यर्चनकामोन्मादिनौ तु भिषगभिचाराभिशापाभ्यां बुद्ध्वा तद-
ज्ञोपहारबलिमिश्रेण मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत् ॥ ३० ॥
रति और पूजन के लिए उत्पन्न उन्माद मे वैद्य को चाहिये कि अभिचार
और अभिशाप को समझ कर इनके अग भूत जो उपहार ( बलि आदि ) हो,
उसके साथ मन्त्र विधि और भैषज्य विधि (घृतपान आदि) द्वारा चिकित्सा करे॥३०॥
तत्र द्वयोरपि निजागन्तुनिमित्तयोरुन्मादयोः समासविस्तराभ्यां
भेषजविधि व्याख्यास्यामः ॥ ३१ ॥
इसके आगे निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो का सक्षेप और
व स्तार से चिकित्सा का उपदेश करेगे ॥ ३१ ॥
उन्मादे वातजे पूर्वं स्नेहपानं विशेषवित् ।
कुर्यादावृतमार्गे तु सस्नेहं मृदु शोधनम् ॥ ३२ ॥
कफपित्तभवेऽप्यादौ वमनं सविरेचनम् ।
स्निग्धस्विन्नस्य कर्तव्यं शुद्धे संसर्जनक्रमः ॥ ३३ ॥
वात आदि दोषों के भेदों को जाननेवाले वैद्य वातजन्य उन्माद की

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१
उत्पन्नावस्था मे घृत का पान करावे । क्योकि कफ पित्त द्वारा मार्ग के अवरुद्ध
होने से प्रथम वमन, विरेचन रूपी शोधन करना उचित है। शोधन स्नेहयुक्त
और मृदु हो इससे वायु का प्रकोप नही होता ।
कफ और पित्त से उत्पन्न उन्मादो मे भी रोगी का स्नेहन और स्वेदन
करके वमन और विरेचन देना उचित है। रोगी के शुद्ध होने पर पेया विलेपी
रूप से अन्न सेवन का क्रम चालू करे ॥ ३२-३३ ॥
निरूहान् स्नेहबस्तींश्च १ शिरसश्च विरेचनम् ।
ततः कुर्याद्यथादोषं तेषां भूयस्त्वमाचरेत् ॥ ३४ ॥
हृदिन्द्रियशिरःकोष्ठे संशुद्धे वमनादिभिः ।
मनःप्रसादमाप्नोति स्मृतिं संज्ञां च विन्दति ॥ ३५ ॥
पीछे से निरूह ( आस्थापन ), स्नेह बस्ति ( अनुवासन ), शिरोविरेचन
करावे । दोष के अधिक होने पर दोषानुसार बार बार वमन, विरेचन करावे ।
वमन आदि कार्यों से हृदय ( छाती ), चक्षु आदि इन्द्रियो के, शिर, कोष्ठ
( आमाशय-पक्वाशय ) के शुद्ध होने पर रोगी का मन प्रसन्न हो जाता है, वह
स्मृति और संज्ञा ( ज्ञान ) को प्राप्त करता है ॥ ३४-३५ ॥
शुद्धस्याऽऽचारविभ्रंशे तीक्ष्णं नावनमञ्जनम् ।
ताडनं च मनोबुद्धिदेहसंतर्जनं हितम् ॥ ३६ ॥
शोधन करने पर भी यदि रोगी मे आचार की अपवित्रता हो तो तीक्ष्ण
नस्य, तीक्ष्ण अञ्जन, दण्ड आदि से पीटना, मन, बुद्धि और शरीर को उद्विग्न
करने वाले कार्य करने हितकारी हैं ॥ ३६ ॥
यः शक्तो विनयेत्पट्टैः संयम्य सुदृढैः सुखैः ।
अपेतलोष्ठकाष्ठाद्यैः संरोध्यश्च तमोगृहे ॥ ३७ ॥
तर्जनं त्रासनं दानं सान्त्वनं हर्षणं भयम् ।
विस्मयो विस्मृतेर्हेतोर्नयन्ति प्रकृतिं मनः ॥ ३८ ॥
जो उन्माद-रोगी नम्रता से वश मे आ सके उसको सुदृढ और सुखकारक
जिनसे उसे देह मे पीड़ा या व्रण न हो ऐसे वस्त्रों से बाध कर अन्धकारयुक्त
घर मे बन्द कर दे । घर मे से ढेले, लकड़ी आदि सब हटा देवे जिससे ये न
चुभे न किसी प्रकार की चोट लगे । तर्जन ( डाट डपट ), करना, दान,
हर्षोत्पादन, आश्वासन, भयदिखाना, विस्मय ( चकित करना ), आदि क्रियाओं
से विस्मृत हुआ मन ( विमूढ चित्त ) पुनः प्रकृति में आ जाता है ॥३७-३८॥
१. 'निरूहणस्नेहबस्ती' इति वा ।

४५२ चरकसंहिता [ अ० ९
प्रदेहोत्साद्नाभ्यङ्गधूमाः पानं च सर्पिषः ।
प्रयोक्तव्यं मनोबुद्धिस्मृतिसंज्ञाप्रबोधनम् ॥ ३६ ॥
प्रदेह, उत्सादन ( उबटन ), अभ्यग ( तैल मर्दन ), धूम और घृतपान
ये सब वस्तुए मन, बुद्धि, स्मृति और सज्ञा को प्रबुद्ध करती है, इनका प्रयोग
करना उचित है ॥ ३६ ॥
सर्पिःपानादिरागन्तौर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः ।
आगन्तुज उन्माद मे रति तथा अर्चना की कामना से उत्पन्न उन्मादो मे
घृतपान आदि भेषजविधि तथा ओषधि, मणि, मगल, बलि आदि मत्र विधि
का प्रयोग करे ।
अतः सिद्धतमान्योगाञ्छृणून्मादविनाशनान् ॥ ४० ॥
हिङ्गुसौवर्चलव्योषैर्द्विपलांशैर्धृताढकम् ।
चतुर्गुणे गवां मूत्रे सिद्धमुन्मादनाशनम् ॥ ४१ ॥
अब विस्तार से अति सिद्ध ( परीक्षित ) फलप्रद उन्मादनाशक योगों
को सुनो—
( १ ) हींग, सौवर्चल ( सचल ), व्योष ( सोंठ, मरिच, पिप्पली ), इनमे
प्रत्यक दो पल परिमित लेकर इनके कल्क से, घी एक आढक और गाय का मूत्र
चार आढक लेकर घृतपाक करे, यह घृत उन्माद का नाशक है ॥ ४०-४१ ॥
विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेल्ववालुकम् ।
स्थिराऽनन्ता रजन्यौ द्वे शारिवे द्वे प्रियङ्गु कम् ॥ ४२ ॥
नीलोत्पललमाञ्जिष्ठादन्तीदाडिमकेशरम् ।
तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ॥ ४३ ॥
विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठं चन्दनपद्मकौ ।
कल्कैः कर्षसमैरेतैर्विंशत्यष्टाभिरेव च ॥ ४४ ॥
चतुर्गुणे जले सम्यक् १ घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
अपस्मारे ज्वरे कासे श्वासे मन्देऽनले क्षये २ ॥ ४५ ॥
वातरक्ते ३ प्रतिश्याये तृतीयकचतुर्थके ।
छर्द्यशौमूत्रकृच्छ्रेषु विसर्पोपहतेषु च ॥ ४६ ॥
कण्डू-पाण्ड्वामयोन्माद-विष-मेह-गदेषु च ।
भूतोपहतचित्तानां गद्गदानामरेतसाम् ४ ॥ ४७ ॥
१. 'पक्त्वा' इति । २ 'मन्देऽनलक्षये' इति ।
३ 'वातरोगे' इति । ४ 'मचेतसाम्' इति च पाठः ।

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५३

शस्तं स्त्रीणां च वन्ध्यानां धन्यमायुर्बलप्रदम् ।
अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहविनाशनम् ॥ ४८ ॥
कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च ।
इति कल्याणकं घृतम् ।
( २ ) कल्याणक घृत—विशाला ( गवाक्षी ), त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा,
आँवला ), कौन्ती ( रेणुका और 'कान्ता' पाठ मे—मोटी इलायची ), देवदारु,
एलवालुक ( एलुआ ), स्थिरा ( शालपर्णी ), नत ( तगर ), हल्दी, दारु-हल्दी,
अनन्तमूल, कृष्णसारिवा, फूल प्रियगु, नीला कमल, छोटी इलायची, मजीठ,
दन्तीमूल, अनार, नागकेसर, तालीशपत्र, बड़ी कटेरी, मालती ( चमेली के नये
फूल ), वायबिडङ्ग, पृश्निपर्णी, कूठ, लाल चन्दन, पद्माख इन अट्ठाईस ओषधियो
मे प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनके कल्क द्वारा, घी एक प्रस्थ, पानी चार प्रस्थ
लेकर घृत पाक करे¹। यह कल्याणक नाम का घृत अपस्मार, ज्वर, कास,
शोष, मन्दाग्नि, क्षय, वातरक्त, प्रतिश्याय, तृतीयक, चतुर्थक ज्वर, छर्दि, अर्श,
मूत्रकृच्छ्र, वीसर्प, कण्डू, पाण्डु-रोग, उन्माद, विष और प्रमेह रोगो मे
हितकारी है, भूतो से आक्रान्त चित्त वाले अव्यक्त वाणी वाले, अल्प शुक्र
पुरुषो और वन्ध्या स्त्रियो के लिये प्रशस्त है। यह कल्याणक घृत धन के लिये
हितकारी, कल्याणकारी, आयुप्रद, बलप्रद तथा सब प्रकार के ग्रहो से उत्पन्न रोगो
का नाशक है ॥४२-४८॥
एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम् ॥ ४९ ॥
रसे तस्मिन्पचेत्सर्पिर्गूढक्षीरे चतुर्गुणे ।
वीरा-द्विमाष-काकोली-स्वयंगुप्तर्षभकद्धिभिः ॥ ५० ॥
मेदया च समैः कल्कैस्तत्स्यात्कल्याणकं महत् ।
बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम् ॥ ५१ ॥
इति महाकल्याणकं घृतम् ।
( ३ ) महाकल्याणक घृत—इन विशाला आदि अट्ठाईस वस्तुओ आर
स्थिरा आदि इक्कीस द्रव्यो से क्वाथ विधि से क्वाथ करे। इसमे पहिली बार
ब्याई ( खारके की ) गाय का दूध, घी से चतुर्गुण मिलावे। फिर वीरा ( पृश्नि-
पर्णी या शतावरी ), द्विमाष ( मूगपर्णी और माषपर्णी ), काकोली, कौंच,

१. चरकोपस्कार मे—'कान्ता' पाठ है। अष्टाङ्ग सङ्ग्रह मे भी—बड़ी
इलायची का ग्रहण है जैसे—'वरा विशाला भद्रैला देवदार्वेलवालुकैरि'ति ।
'कौन्ती' पाठ निर्णयसागर की प्रति मे है।

४५४ चरकसंहिता [अ० ६
ऋषभ और ऋद्धि तथा मेदा इनको परस्पर सम भाग लेकर इनके कल्क से
घृतपाक करे, यह महाकल्याणक घृत है ॥ ४६-५१ ॥
जटिला पूतना केशी चारटी मर्कटी वचाम् ।
त्रायमाणां जया वीरा चोरकं कटुरोहिणीम् ॥ ५२ ॥
कायस्था शूकरी छत्रामतिच्छत्रा पलङ्कषाम् ।
महापुरुषदान्ता च वयःस्था नाकुलीद्वयम् ॥ ५३ ॥
कटम्भरा वृश्चिकाली स्थिरा चाऽऽहृत्य तैर्घृतम् ।
सिद्धं चातुर्थकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ५४ ॥
महापैशचिक नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् ।
बुद्धिस्मृतिकरं चैव बालाना चाङ्गवर्धनम् ॥ ५५ ॥
इति महापैशचिकं घृतम् ।
(४) महापैशचिक घृत—जटिला (जटामासी), पूतना (हरड), केशी
(भूतकेशी), चारटी (पद्मचारिणी अथवा ब्रह्मयष्टि), कर्कटी (कौच), वच,
त्रायमाणा, जया (अरण्डि), वीरा (पृश्निपर्णी या काकोली), चोरक (सुगन्धित
द्रव्य, इसे भूटानी लोग बेचते है) कुटकी, कायस्था (सुरसा वा क्षीरकाकोली),
शूकरा (वाराही कन्द वा विधारा), छत्रा (धनिया), अतिच्छत्रा (सौंफ),
पलङ्कषा (लाख या गुग्गुल), महापुरुषदान्ता (शतावरी), वयस्था (आवला),
नाकुली द्वय (दोनो रास्ना अथवा सपाक्षी और सर्पगन्धा), कटम्भरा (कटभी),
वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), स्थिरा (शालपर्णी), इन को लाकर इनके क्वाथ
और कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत चतुर्थक ज्वर उन्माद, ग्रह, अपस्मार
को नष्ट करता है। यह महापैशार्चिक नामक घृत अमृत के समान बुद्धि, स्मृति-
कारक, तथा नालको के अगो को बढाने वाला है ॥ ५२-५५ ॥
लशुनाना शतं त्रिशदभया त्र्यूषणात्पलम् ।
गवा चर्ममसीप्रस्थमाढकं क्षीरमूत्रयोः ॥ ५६ ॥
पुराणसर्पिषः प्रस्थमेभिः सिद्धं प्रयोजयेत् ।
हिङ्गुचूर्णपलं शीते दत्त्वा च मधुमाणिकाम् ॥ ५७ ॥
तद्दोषगन्तुसम्भूतालुन्मादान्विषमज्वरान् ।
अपस्मारांश्च हन्त्याशु पानाभ्यञ्जननावनैः ॥ ५८ ॥
इति लशुनाद्यं घृतम् ।
(५) लशुनाद्य घृत—लहसुन एक सौ, हरड़ तीस, मिलित सोठ, मरिच,
पिप्पली एक पल, गाय का चमड़ा जलाकर तैयार की राख एक प्रस्थ, गाय

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५५

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५५
का दूध एक आढक, गाय का मूत्र एक आढक, पुरातन (दस साल पुराना) घृत
एक प्रस्थ, इन सब से यथाविधि घृत पाक करे । सिद्ध होने पर छान कर ठण्डा
होने पर इसमे हींग का चूर्ण एक पल और शहद दो कुडव मिला देवे । यह
घृत पान, अभ्यङ्ग, नस्य मे प्रयोग करने से दोषजन्य, आगन्तुज उन्माद रोग,
विषमज्वर और अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ ५६-५८ ॥
लशुनस्याविनष्टस्य तुलाधे निस्तुषीकृतम् ।
तदर्धं दशमूलस्य द्वयाढकेऽपां विपाचयेत् ॥ ५९ ॥
पादशेषे घृतप्रस्थं लशुनस्य रसं तथा ।
कोलमूलकवृक्षाम्लमातुलुङ्गाद्रकै रसैः ॥ ६० ॥
दाडिमाम्लसुरामस्तुकाञ्जिकाम्लैस्तदर्धिकैः ।
साधयेत् त्रिफलादारुलवणव्योषदीप्यकैः ॥ ६१ ॥
यवानीचव्यहिङ्ग्वम्लवेतसैश्च पलार्धिकैः ।
सिद्धमेतत्पिबेच्छूलगुल्माशोजठरापहम् ॥ ६२ ॥
ब्रध्नपाण्ड्वामयप्लीहयोनिदोषज्वरकृमीन् ।
वातश्लेष्मामयान्त्सर्वानुन्मादं चापकर्षति ॥ ६३ ॥
इति द्वितीयं लशुनाद्यं घृतम् ।
(६) लशुनाद्य घृत (२)—रस, गन्ध आदि से युक्त लहसुन को छिलके
रहित करके उसकी गिरी ५० पल, मिलित दशमूल २५ पल, इनको दो आढक
जल मे पकावे । जब चौथाई रह जाये तो वस्त्र से छान ले । फिर पुरातन घृत
एक प्रस्थ, लशुन का रस १ प्रस्थ, बेर मूली, वृक्षाम्ल (समाक दान), बिजौरा,
अदरक, अनार का रस, सुरा, मस्तु, काजी ये प्रत्येक आधा प्रस्थ, त्रिफला,
देवदारु, सैन्धानमक, त्रिकटु, अजमोदा, दीप्यक (जीरा), चव्य, हींग, अम्ल-
वेत प्रत्येक आधा पल, लेकर घृत सिद्ध करे । यह सिद्ध हुआ घृत शूल, गुल्म,
अर्श, उदर रोग, ब्रध्न, पाण्डु-रोग, प्लीहा, योनि दोष, ज्वर, कृमि और वात-कफ
रोगो और उन्माद को नष्ट करता है ॥ ५६-६३ ॥
हिङ्गुना हिङ्गुपर्ण्या च सकायस्थावयस्थया ।
सिद्धं सर्पिर्हितं तद्वद्वयःस्थाहिङ्गुचौरकैः ॥ ६४ ॥
केवलं सिद्धमेभिर्वा पुराणं पाययेद् घृतम् ।
पाययित्वोत्तमा यात्रा श्वभ्रे रुन्ध्याद् गृहेऽपि वा ॥ ६५ ॥
विशेषतः पुराणं च घृतं त पाययेद्भिषक् ।
हींग, हिंगुपर्णी (वेणुपत्री या डीकामारी), कायस्था (हरड़), वयस्था
(आवला), इनके कल्क से सिद्ध घृत अथवा वयस्था (आवला), हींग, चोरक

४५६ चरकसंहिता [ अ० ६
( सुगन्धित द्रव्य ) इनसे सिद्ध घृत उन्माद रोग मे हितकारी है, ये दो योग
हैं । अथवा हीग, सौवर्चल, त्रिकटु द्वारा पुरातन घृत को सिद्ध करके पिलावे
उन्माद रोगी को घी की उत्तम मात्रा ( जो कि २४ घण्टे अर्थात् दिन-रात मे
जीर्ण हो ) पिला कर पानी रहित गढे या घर मे बन्द कर देवे१ ॥६४-६५॥
उग्रगन्धं पुराणं स्याद्दशवर्षस्थितं घृतम् ॥ ६६ ॥
लाक्षारसनिभं शीतं तद्धि सर्वग्रहापहम् ।
मेध्यं विरेचनेऽपथ्यं प्रपुराणमतः परम् ॥ ६७ ॥
त्रिदोषघ्नं पवित्रत्वाद्विशेषाद् ग्रहमोक्षणम् ।
गुणकर्माधिकं स्थानादास्वादात्कटुतिक्तकम् ॥ ६८ ॥
नासाध्यं नाम तस्यास्ति यत्स्याद्वर्षशतस्थितम्२ ।
दृष्टं स्पृष्टमथाघ्रातं तद्धि सर्वग्रहापहम् ।
अपस्मारग्रहोन्मादवतां शस्तं विशेषतः ॥ ६६ ॥
( ७ ) पुरातन घृत—जो घी दस साल पुराना हो जाये, जिसमे कि तीव्र
गन्ध आने लगे, जिसका रग लाख के समान लाल हो जाये, वह शीतवीर्य होता
है, उसका नाम पुराना घृत है । दस वर्ष के पीछे घृत अति पुरातन हो जाता
है इसको 'प्र-पुराण' कहते हैं । वह त्रिदोषनाशक पवित्र होने से खासकर ग्रह
रोगो को नष्ट करता है, पीने से अधिक गुणशाली है, स्वाद मे कटु-तिक्त रस है,
कान, आख के रोगो को नष्ट करता, विषनाशक और पवित्र करने वाला है ।
और बारह साल पुराने घृत से कोई भी रोग असाध्य नही है । इसके देखने,
छूने ओर सूघने से वीसर्प और ग्रह-रोग नष्ट होते है । वह अपस्मार, विष,
उन्माद और वायु रोगों मे अमृत के समान प्रशस्त है ॥६६-६६॥
एतैरौषधवर्गैर्वा विधेयत्वं न गच्छति ।
अञ्जनोत्सादनालेपान्नावनादींश्च योजयेत् ॥ ७० ॥
शिरीषो मधुकं हिङ्गु लशुनं तगरं वचा ।
कुष्ठं च बस्तमूत्रेण पिष्टं स्यान्नावनाञ्जनम् ॥ ७१ ॥
इति नस्याञ्जनम् ।
१उत्तम मात्रा का लक्षण—दिन रात्रि भर मे बिना दोष उत्पन्न किये जो
जीर्ण हो सके वह मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद ग्रह, अपस्मार को नाश करती
है । एक दिन रात मे जीर्ण होने वाली स्नेह की उत्तमा मात्रा, पूरे दिन मे
जीर्ण होने वाली मध्यमा और आधे दिन मे जीर्ण होनेवाली ह्रस्वमात्रा कहाती है ।
२. 'यत्स्याद् द्वादशवार्षिकम्' इति च पाठः ।

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४५७

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४५७
तद्वद् व्योषं हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठाहिङ्गुसर्षपाः ।
शिरीषबीजं चोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ७२ ॥
इति नस्यमञ्जनम् ।
(८) यदि उन्माद रोगी उपरोक्त ओषधि समूहों से वश मे न आवे, वह
कहा न माने, तब (१) हिंगु, कल्याणक आदि घृतो मे वर्णित ओषधियों से
अञ्जन, उत्सादन (उबटन), आलेप और नस्य करे । (२) शिरीष के बीज,
मुलहठी, हींग, लहसुन, तगर, वच, कूठ, इन सब को बकरी के मूत्र मे पीस कर
इसका नस्य और अञ्जन दे। (३) इसी प्रकार से व्योष (त्रिकटु, सोंठ,
मरिच, पिप्पली), हल्दी, दारु-हल्दी, मजीठ, हींग, सरसो, सिरस के बीज
इनको बकरी के मूत्र मे पीस कर नस्य और अञ्जन करे यह उन्माद, ग्रह और
अपस्मार रोगो को नष्ट करता है ॥७०-७२॥
पिष्ट्वा तुल्यमपामार्गहिङ्गनी१ हिङ्गुपत्रिकाम् ।
वत्तिः स्यान्मरिचार्धांशा पित्ताभ्या गोशृगालयोः ॥ ७३ ॥
तयाऽञ्जयेदपस्मारभूतोन्मादज्वरार्दितान् ।
भूतातानमरातांश्च नरार्ताँश्च गोमये ॥ ७४ ॥
मरिचं चाऽऽतपे मास सपित्त स्थितमञ्जनम् ।
वैकृतं पश्यतः कार्य दोषभूतहतस्मृतेः ॥ ७५ ॥
इत्यञ्जनम् ।
(४) अपामार्ग (चिरचिटा) के बीज, हींग और हींगुपत्रि प्रत्येक एक
एक भाग, काली मिर्च आधा भाग, इनको गाय और गीदड के पित्त के साथ
पीस कर वर्ती बनावे । इस वर्त्ती को अपस्मार, उन्माद तथा ज्वर रोगी, भूत
और देवताओ से पीडित व्यक्तियो मे तथा नेत्र रोगो मे प्रयोग करे। (५) वात
आदि दोष के कारण से अथवा भूतो के कारण से यदि दृष्टि विकृत हो गई हो
तो काली मिरच को गाय और शृगाल के पित्त मे एक मास तक व्याप्त करके
धूप मे रखे, फिर इसका अञ्जन करे ॥७३-७५॥
सिद्धार्थको वचा हिङ्गुकरञ्जे देवदारु च ।
मञ्जिष्ठा त्रिफला श्वेता कटभीत्वक् कटुत्रिकम् ॥ ७६ ॥
समांशानि प्रियंगुश्च शिरीषो रजनीद्वयम् ।
बस्तमूत्रेण पिष्टोऽयमगदः पानमञ्जनम् ॥ ७७ ॥
नस्यमालेपनं चैव स्नानमुद्वर्तनं तथा ।
१. 'अपामार्ग हिङ्गुल' इति वा पाठः ।

अपस्मार-विषोन्माद-कृत्यालक्ष्मीज्वरापहः ॥ ७८ ॥
भूतेभ्यश्च भयं हन्ति राजद्वारे च शस्यते ।
( ६ ) सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), वच, हींग, करञ्ज, देवदारु, मजीठ,
त्रिफला, श्वेता ( श्वेत अपराजिता ), कटभी ( वापुभा ), त्वक् ( दालचीनी ),
त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), प्रियङ्गु, शिरीष के बीज, हल्दी, दारुहल्दी
इन सबका समान भाग लेकर बकरी के मूत्र मे पीस ले। यह अगद पान, नस्य,
आलेपन, अञ्जन, उद्वर्त्तन ओर स्नान मे प्रयोग करने पर अपस्मार, विष,
उन्माद, कृत्या ( मारण क्रिया ), अलक्ष्मी ओर ज्वर को नष्ट करता है।
इस अगद के पानादि से भूतो से भय नहीं रहता। राजसभा मे सफलता
मिलता है ॥ ७६-७८ ॥
सर्पिरेतेन सिद्ध वा सगोमूत्रं तदर्थकृत् ॥ ७९ ॥
प्रसेके पीनसे गन्धैर्धूमवर्ति कृता पिबेत् ।
वैरेचनिकधूमोक्तेः श्वेताद्यैर्वा सहिङ्गुभिः ॥ ८० ॥
( १० ) सिद्धार्थक आदि वस्तुओ द्वारा गोमूत्र मे सिद्ध किया घृत भी यही
फल देता है, मुख से पानी बहने पर, पीनस मे, उन्माद मे गन्ध-वस्तुओ ( दाह
ज्वर चिकित्सा मे कथित अगरु आदि वस्तुओ ) से बनी धूमवर्त्ति तथा सूत्र-
स्थान मे कथित श्वेता, ज्योतिष्मती आदि वैरेचनिक वस्तुओ को हींग के साथ
धूमवर्त्ती करके प्रायोगिक धूम विधि से पीवे १ ॥ ७६-८० ॥
शल्लकालूकमार्जारजम्बूकवृकबस्तजैः ।
मूत्र-पित्तःशकृल्लोम-नखैश्चर्मभिरेव च ॥ ८१ ॥
सेकाञ्जनं प्रधमनं नस्यं धूमं च कारयेत् ।
वातश्लेष्मात्मके प्रायः—
( ११ ) शल्लक ( शजार ), उल्लू, बिल्ली, गीदड, भेडिया, बकरा इन
पशुओ के मूत्र, पित्त, शकृत् ( मल ), लोम, नख, चमडे से परिषेक, अञ्जन,
प्रधमन ( विरेचन चूर्ण रूप नस्य ), नस्य, धूम, वातजन्य और कफजन्य उन्माद
मे प्रायः करके करना चाहिये ॥८१-॥
पैत्तिके च प्रशस्यते ॥ ८२ ॥
तिक्तकं जीवनीय च सर्पिः स्नेहश्च मिश्रकः ।
शीतानि चान्नपानानि मधुराणि मृदूनि च ॥ ८३ ॥
१ वैरेचनिक धूम—'श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालमन शिला।
गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमो मूर्धविरेचने' ॥

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९
(१२) पित्तजन्य उन्माद मे तिक्त वस्तुओ से तथा जीवनीय-गण
की ओषधियो से सिद्ध घृत का पान, तथा मिश्रक स्नेह (यमक) का प्रयोग
करे । इसी प्रकार से शीतल, मधुर, लघु खान-पान देने चाहिये ॥८२-८३॥
शङ्खे केशान्तसन्धौ वा मोक्षयेऽज्ञो भिषक् सिराम् ।
उन्मादे विषमे चैव ज्वरेऽपस्मार एव च ॥ ८४ ॥
(१३) शस्त्र कर्म को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि उन्माद, अपस्मार
आर विषम-ज्वर म, शख प्रदेश, कान, ललाट क मध्य मे ओर केशो के अन्तिम
भाग के सन्धि स्थान मे स्थित सिरा का वेधन करे १ ॥ ८४ ॥
घृतमासविदृप्तं वा निवाते स्थापयेत्सुखम् ।
त्यक्त्वा मतिस्मृतिभ्रंशं संज्ञां लब्ध्वा प्रमुच्यते ॥ ८५ ॥
(१४) अथवा रोगी को कल्याणक घृत आदि ओर मास से तृप्त कराके
सामने की वायु से रहित घर म आराम के साथ रखे । इस प्रकार करने से
बुद्धि और स्मृति के भ्रश को छोड़ कर रोगी सज्ञा (चेतना) को प्राप्त कर
लेता है और उन्माद रोग से मुक्त हा जाता है ॥ ८५ ॥
आश्वासयेत्सुहृद्द्वा तं वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ।
ब्रूयादिष्टविनाशं वा दर्शयेदद्भुतानि वा ॥ ८६ ॥
(१५) मित्र लोग धर्म, अर्थयुक्त वचनो से आश्वासन देवे, इष्ट वस्तु के
नाश को कहे, आश्चर्यकारक वस्तुओ को दिखावे ॥ ८६ ॥
बद्धं सर्षपतैलाक्तं न्यसेद्रोत्तानमातपे ।
कपिकच्छ्वाऽथवा तप्तलोहतैलजलैः स्पृशेत् ॥ ॥ ८७ ॥
कशाभिस्ताडयित्वा वा सुबद्धं विजने गृहे ।
रुन्ध्याच्चेतो हि विभ्रान्तं व्रजत्यस्य यथा शमम् ॥ ८८ ॥
(१६) शरीर पर सरसो का तैल लगाकर, हाथ, पाव बाध कर पीठ के
भार धूप मे लेटावे । कौच या गरम लोहे, गरम तैल या गरम जल से स्पर्श
करे । कशा (कोडो) से पीटे, बाधे, एकान्त घर मे बन्द रखे । इस प्रकार
करने से रोगी का विक्षिप्त चित्त शान्त हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥
सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिंहैर्गजैश्च तम् ।
त्रासयेच्छस्त्रहस्तैर्वा तस्करैः शत्रुभिस्तथा ॥ ८९ ॥
अथवा राजपुरुषा बहिर्नीत्वा सुसंयतम् ।
त्रासयेयुर्वधेनैनं तर्जयन्तो नृपाज्ञया ॥ ९० ॥
१ सुश्रुते—शखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपागललाटेषु चोन्मादे ।

४६० चरकसंहिता [ अ० ९
देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं महत्।
तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः॥ ९१॥
(१७) विष का दाढ निकाले हुए सर्प से, दान्त (पले हुए, नम्र) सिंह
और हाथी अथवा हाथ मे शस्त्र लिये हुए चोरो या शत्रुओ से उसको डरावे।
अथवा राजकर्मचारी इसको बाहर लेजा कर, इसके हाथ पाव बाध कर मारने
का भय दिखाये और कहे राजा ने तुम्हारे वध की आज्ञा दी है। क्योकि
कषादि के ताडन रूपी शरीर-क्लेश से प्राणो का भय कही अधिक होता है, इस
कारण से विक्षिप्त मन शान्त हो जाता है॥ ८६-९१॥
इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते।
तस्य तत्सदृशप्राप्तिशान्त्याश्वासः शम नयेत् ॥ ९२ ॥
काम-शोक-भय-क्रोध-हर्षेर्ष्या-लोभ-सम्भवान्।
परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत्॥ ९३॥
इष्ट वस्तु के नाश होने से जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो, उस रोगी को उस
वस्तु के समान वस्तु की प्राप्ति से, सान्त्वना तथा आश्वासन द्वारा शान्त करे।
काम, शोक, मद, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ के कारण त जिसका मन विक्षिप्त
हुआ हो तो परस्पर विरुद्ध द्वन्द्वो से वह शान्त हो जाता है। कामजन्य उन्माद
क्रोध से, क्रोधजन्य काम से, भयजन्य और शोकजन्य क्रोध ओर काम से,
शान्त हो जाते है ॥ ९२ ६३॥
बुद्ध्वा देशं वयःसात्म्य दोषं कालं बलाबले।
चिकित्सितमिदं कुर्यादुन्मादं भूतदोषजे ॥ ९४॥
देवर्षिपितृगन्धर्व्वैरुन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्।
वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकर्म च॥ ९५॥
सर्पिष्पानादि तस्येह मृदुभैषज्यमाचरेत्।
पूजा बल्युपहाराश्च मन्त्राञ्जनविधींस्तथा ॥ ९६॥
शान्तिकर्मेष्टिहोमाश्च जपस्वस्त्ययनानि च।
वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाऽऽचरेत् ॥ ९७॥
दोषजन्य (निज) और आगन्तुज उन्माद मे देश, वय, सात्म्य, दोष,
काल, बल और अबल की परीक्षा करके उपरोक्त चिकित्सा करे। बुद्धिमान् वैद्य
को चाहिये कि देवग्रह, ऋषिग्रह, पितृग्रह, गन्धर्वग्रह इनसे आक्रान्त उन्माद
रोगी मे तीक्ष्ण अञ्जन आदि तथा क्रूर कर्मों का प्रयोग न करे। इनकेलिये
घृत आदि कोमल ओषधि का प्रयोग करे १।
१ सुश्रुत मे भी कहा है—न च रूक्ष प्रयुञ्जीत प्रयोग देवताग्रहे।
ऋ ते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूल न चाचरेत् ॥

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१
दैवव्यपाश्रय चिकित्सा—पूजा, बलि कर्म, उपहार कर्म, मन्त्र, अजनविधि,
शान्ति कर्म, यज्ञ, होम, जप, मगलकर्म, वेदोक्त नियम, प्रायश्चित्त आदि
सेवन करे ॥ ९४-९७ ॥
भूतानामधिपं देवमीश्वरं जगतः प्रभुम् ।
पूजयन् प्रयतो नित्य जयत्युन्मादजं भयम् ॥ ९८ ॥
रुद्रस्य प्रमथा नाम गणा लोके चरन्ति ये ।
तेषा पूजा च कुर्वाण उन्मादेभ्यो विमुच्यते ॥ ९९ ॥
बलिभिर्मङ्गलैर्होमैरौषध्यगदधारणैः ।
सत्याचारतपोज्ञानप्रदाननियमव्रतैः ॥ १०० ॥
देवगुह्यकविप्राणां गुरूणां पूजनेन च ।
आगन्तुः प्रशमं याति सिद्धैर्मन्त्रौषधैस्तथा ॥ १०१ ॥
नित्य प्रति भूतों ( प्राणियो ) के अधिपति, जगत् के ईश्वर-महेश्वर का पूजन
करने से उन्माद का भय नही रहता । रुद्र के 'प्रमथ' नामक जो गण लोक मे
विचरते हैं, उनकी प्रतिदिन पूजा करने से आगन्तुज उन्माद से मनुष्य मुक्त
हो जाता है । बलि कर्म से, मागलिक कार्यों से, होम से, ओषधियां और अगदो
के धारण करने से, सत्य आचार से, तप से, ज्ञान से, दान से, नियम, व्रत के
पालन से, देवता, गाय, ('गुह्यक', पाठ हो तो यक्ष), ब्राह्मण, गुरु-जनों के
पूजन से, सिद्ध फलदायक मन्त्र तथा ओषधियां से आगन्तुज-उन्माद शान्त
होता है ॥ ९८-१०१ ॥
यच्चोपदेक्ष्यते किंचिदपस्मारचिकित्सिते ।
उन्मादे तच्च कर्तव्यं सामान्याद्धेतुदूष्ययोः ॥ १०२ ॥
निवृत्तामिषमद्यो यो हिताशी प्रयतः शुचिः ।
निजागन्तुभिरुन्मादैः सत्त्ववान् न स युज्यते ॥१०३॥
उन्माद और अपस्मार रोग मे हेतु और दूष्य की समानता है । इसलिये
अपस्मार चिकित्सा मे जो कुछ विशेष कहेगे वह सब इस उन्माद मे भी वर-
तना चाहिये । मांस और मद्य के सेवन से पृथक्, पथ्यभोजी, अन्दर और
बाहर से पवित्र तथा सत्त्वगुण से युक्त और जो जितेन्द्रिय व्यक्ति होता है,
वह निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादों से मुक्त रहता है॥१०२-१०३॥
प्रसादश्चेन्द्रियार्थानां बुद्ध्यात्ममनसां तथा ।
धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम् ॥ १०४ ॥
उन्माद से छूटने के लक्षण—इन्द्रियों तथा इनके विषयो मे निर्मलता,
बुद्धि, आत्मा और मन की प्रसन्नता, वात आदि धातुओ का अपनी स्वाभाविक

उपसहार—निज और आगन्तुज उन्मादो के कारण, लक्षण, चिकित्सा

४६२ चरकसंहिता [ अ० १०
स्थिति मे आ जाना, ये उन्माद से मुक्त (प्रायः सब रोगो से मुक्त) व्यक्ति के
लक्षण हैं ॥ १०४ ॥
तत्र श्लोकः—उन्मादानां समुत्थानां लक्षणं सचिकित्सितम् ।
निजागन्तुनिमित्तानामुक्तवान् भिषगुत्तमः ॥ १०५ ॥
उपसहार—निज और आगन्तुज उन्मादो के कारण, लक्षण, चिकित्सा
को वैद्यो मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने इस अध्याय मे कह दिया ॥ १०५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
उन्मादचिकित्सितं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः ।
अथातोऽपस्मारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे अपस्मार-रोग की चिकित्सा की व्याख्या करते है, भगवान्
आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
स्मृतेरपगमं प्राहुरपस्मारं भिषग्विदः ।
तमःप्रवेशं बीभत्सचेष्टं धीसत्त्वसंप्लवात् ॥ ३ ॥
वैद्यो मे ज्ञानी अथवा भेषज को जानने वाले विद्वान् स्मृति के नष्ट होने को
ही अपस्मार कहते है¹ । इसमे बुद्धि और सत्त्व (मन) के विभ्रंश होने से
अन्धकार मे घुसने के समान प्रतीति अर्थात् ज्ञान का अभाव या मोह और
शरीर की चेष्टाये बीभत्स हो जाती हैं ॥ ३ ॥
विभ्रान्तबहुदोषाणामहिताशुचिभोजिनाम् ।
रजस्तमोभ्यां विहते सत्त्वे दोषावृते हृदि ॥ ४ ॥
चिन्ताकामभयक्रोधशोकोद्वेगादिभिस्तथा ।
मनस्यभिहते नृणामपस्मारः प्रवर्त्तते ॥ ५ ॥
१ सुश्रुत मे अपस्मार-सज्ञा की व्याख्या इस प्रकार की है ।
स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपस्तत्परिवर्जने ।
अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽय व्याधिरन्तकृत् ॥ सुश्रुते ॥
अपगतः स्मारः स्मरणं अनुभूतार्थविज्ञानं यस्मिन् रोगे सोऽपस्मार ।
जिस रोग मे स्मृति अर्थात् अनुभूत पदार्थ का ज्ञान नष्ट हों जाता है वह
'अपस्मार' कहलाता है । यह रोग रोगी का मृत्युकारक होता है ।

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६३

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६३

निदानपूर्वक सम्प्राप्ति—अपथ्यसेवी और अपवित्र भोजन करने वालो मे
तथा जिन पुरुषो मे शरीर दोष अस्थिर तथा बहुत होते है, उनमे सत्त्वगुण
वाले मन मे रज और तम के बढने से तथा चिन्ता, काम, भय, क्रोध, शोक,
उद्वेग आदि मानसिक विकारो से मन पर आघात होने पर (इन मानसिक
कारणो से रज और तम बढते है ) और चेतना स्थान हृदय के शारीरिक
वातादि दोषो से व्याप्त हो जाने पर अपस्मार रोग उत्पन्न होता है ॥ ४-५ ॥
धमनीभिः श्रिता' दोषाहृदय पीडयन्ति हि ।
सपीज्यमानो व्यथते मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥ ६ ॥
जिस समय आश्रित (वात आदि शारीरिक) दोष वेग को उत्पन्न करके
हृदयमूल वाली धमनियो द्वारा हृदय मे पहुच जाते है, उस समय चेतना-स्थान
हृदय के पीडित होने से पुरुष भ्रान्तचित्त और मोह को प्राप्त होकर
दुःखी होता है ॥ ६ ॥
पश्यत्यसन्ति रूपाणि पतति प्रस्फुरत्यपि ।
जिह्माक्षिभ्रूः स्रवल्लालो हस्तौ पादौ च विक्षिपन् ॥ ७॥
दोषवेगे च विगते सुप्तवत्प्रतिबुद्ध्यते ।
सामान्य लक्षण—अपस्मार रोगी असत् (अविद्यमान) रूपो को भी देखता
है, भूमि पर गिरता है, कापता है। आख और भौहे टेढी (कुटिल) हो जाती
हैं, मुख से लार बहती है, हाथ और पाव को इधर-उधर फेकता है, इस प्रकार
से बीभत्स चेष्टाए करता है। दोष के वेग के शान्त होने पर रोगी सो कर
उठने के समान जागता है ॥ ७-॥
पृथग्दोषैः समस्तैश्च वक्ष्यते स चतुर्विधः ॥ ८ ॥
दोषो के पृथक् पृथक् तथा समस्त होने से अपस्मार चार प्रकार का
है। (१) वातिक, (२) पैत्तिक, (३) श्लैष्मिक और (४) सन्निपातजन्य,
चारों के लक्षण कहते है ॥ ८ ॥
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१ 'धमनीभिश्चिता' इति वा पाठः ।
२ सुश्रुत मे भी कहा है—
सञ्ज्ञावहेषु स्रोतस्सु दोषव्याप्तेषु मानवः ।
रजस्तम परीतेषु मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥
विक्षिपन् हस्तपादौ च विजिह्मभ्रूविलोचनः ।
दन्तान् खादन् वमन्फेन विवृताक्षः पतेत् क्षितौ ॥

४६४ चरकसंहिता [ अ० १०

कम्पते प्रदशेद्दन्तान्१ फेनोद्वामी श्वसित्यपि ।
परुषाणि च कृष्णानि पश्येद्रूपाणि चानिलात् ॥ ६ ॥
(१) वातिक-अपस्मार के लक्षण—वायु के कारण उत्पन्न अपस्मार का
रोगी कापता हे, दाता का काटता है, मुख से झाग उगलता है, जोर जोर से
सास लेता है, कठोर तथा काले रग के रूपो को देखता है। [ इसमे बार बार
प्रबोध ओर बार बार अपस्मार होता है ] ॥ ६ ॥
पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः ।
सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ १० ॥
(२) पैत्तिक अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकला झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे पीली होती है, पोले, लाल रूपों को देखता है,
रोगी को प्यास और गरमी अनुभव होती है, शरीर गरम रहता है, सब जगत्
को आग से व्याप्त अर्थात् चारो ओर आग ही आग देखता है ॥ १० ॥
शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः ।
पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि श्लैष्मिको मुच्यते चिरात् ॥ ११ ॥
(३) कफजन्य अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकली झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे श्वेत होती है, शरीर ठण्डा, रोमाञ्चित और भारी
होता है, रोगी श्वेत रूपो को देखता है, यह रोगी देर मे सञ्ज्ञा ( चेतना )
प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
सर्वैरेतैः समस्तैस्तु लिङ्गैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः ।
अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ १२ ॥
(४) त्रिदोषजन्य अपस्मार मे इन तीनो दोषो के लक्षण मिले रहते हैं।
यह सन्निपातजन्य अपस्मार असाध्य हाता है, इसी प्रकार क्षीण पुरुष मे हुआ
तथा पुराना अपस्मार असाध्य होता है ॥ १२ ॥
पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।
अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथान्तरम् ॥ १३ ॥
मल (अपस्मार के प्रारम्भिक दोष) बारह दिन, पन्द्रह दिन या एक
मास मे अथवा कुछ कम या अधिक समय मे [ जब काल, प्रकृति, दूष्य आदि
से ] बलवान् हो जाते है। तब अपस्मार रोग को उत्पन्न करते है ॥ १३ ॥
तैरावृताना हृत्स्रोतोमनसां संप्रबोधनम् ।
तीक्ष्णैरादौ भिषक् कुर्यात्कर्मभिर्वमनादिभिः ॥ १४ ॥
१. ‘दशते दन्तान्’ इति वा पाठः।

अ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५

अ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५
वातिकं बस्तिभूयिष्ठैः पैत्तं प्रायो विरेचनैः ।
श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् १ ॥ १५ ॥
चिकित्सा—वैद्य को चाहिये कि प्रथम अपस्मार के उत्पन्न होने पर ही
तीक्ष्ण वमन आदि कार्यों द्वारा हृदयवह तथा मनोवह स्रोतों को रोकने वाले
शारीरिक तथा मानसिक दोषो को निकाल कर हृदयवह और मनोवह स्रोतों का
प्रबोधन करे। वातिक अपस्मार मे बस्ति कर्म, पैत्तिक में विरेचन कर्म और
श्लैष्मिक अपस्मार मे वमन कर्म प्रधानत करने चाहियें, और शेष कर्म भी
करने चाहिये ॥ १४-१५ ॥
सर्वतः सुविशुद्धस्य सम्यगाश्वासितस्य च ।
अपस्मारविमोक्षार्थं योगान्संशमनाञ्छृणु ॥ १६ ॥
जिस समय ऊर्ध्व ( ऊपर के ) और अध ( नीचे के ) सब मार्गों का
शोधन हो जाये, और भली प्रकार अन्न-सेवन आदि से शरीर मे बल आ जावे,
तब अपस्मार को शान्त करने के लिये जिन निम्नलिखित योगों को बरतना
चाहिये उनको सुनो ॥ १६ ॥
गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्घृतम् ।
सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् ॥ १७ ॥
इति पञ्चगव्यं घृतम् ।
( १ ) पञ्चगव्य घृत—गाय के गोबर का रस, गाय का दही, गाय का
दूध, गाय का मूत्र इनके बराबर गाय का घृत लेकर घृतपाक-विधि से सिद्ध
करे । यह घृत अपस्मार, कामला आर ज्वर को नष्ट करता है ॥१७॥
द्वे पञ्चमूल्यौ त्रिफला रजन्यौ कुटजत्वचम् ।
सप्तपर्णमपामार्गं नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥१८॥
सम्पाकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम् ।
द्विपलानि जलद्रोणे पक्त्वा पादावशेषिते ॥ १९ ॥
भार्गीं पाठां त्रिकटुका त्रिवृता निचुलानि च ।
श्रेयसीमाढकीं मूर्वा दन्ती भूनिम्बचित्रकौ ॥ २० ॥
द्वे सारिवे रोहिषं च भूतीकं मदयन्तिकाम् ।
क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तैः प्रस्थं सर्पिषः पचेत् ॥ २१ ॥
गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैश्च तत्समैः ।
पञ्चगव्यमिति ख्यातं महत्तदमृतोपमम् ॥ २२ ॥
१ 'समाचरेत्' इति च ।

४६६ चरकसंहिता [ अ० १०
अपस्मारे तथोन्मादे श्वयथावुदरेषु च ।
गुल्मार्शःपाण्डुरोगेषु कामलासु भगन्दरे ।
अलक्ष्मीग्रहरोगघ्नं चातुर्थिकविनाशनम् ॥ २३ ॥
इति महापञ्चगव्यं घृतम् ॥
(२) महापञ्चगव्य घृत—क्षुद्र और लघु दोनो पञ्चमूल (दशमूल),
त्रिफला (हरड़, बहेडा, आंवला), हल्दी, दारुहल्दी, कडे की छाल, सतवन
की छाल, चिरचिटा, नील, कुटकी, अमलतास, काकोडुम्बरिका (छठ गूलर) की
जड, पोहकरमूल, दुरालभा प्रत्येक वस्तु दो पल, पानी एक द्रोण इनका क्वाथ-
विधि से क्वाथ करे। जब चतुर्थांश रह जाये तब छान ले। इसमे भार्गी, पाठा,
त्रिकटु (सोठ, मरिच, पिप्पली), निशोथ, निचुल (जलवेतस या समुद्रफल)
के फल, श्रेयसी (गर्जपिप्पली), आढकी (तुवर), मूवा, दन्तीमूल, चिरायता,
चीता, श्वेत सारिवा और कृष्ण सारिवा, रोहिष तृण, भूतीक (अजवायन),
मदयन्तिका (नवमल्लिका) ये द्रव्य प्रत्येक एक कर्ष ले, इनको बारीक पीस
कर क्वाथ मे डाले। गाय का घी एक प्रस्थ और घी के बराबर गोबर का रस
और गौ के ही दही, दूध और मूत्र लेकर घृत सिद्ध करे। इस घृत का नाम
'महापञ्चगव्य' घृत है। यह घृत अपस्मार, उन्माद ज्वर, कास, शोथ, उदररोग,
गुल्म, अर्श, पाण्डु, कामला और हलीमक रोगो मे अमृत के समान है, यह घृत
अलक्ष्मी (दुभगता), ग्रह रोगों और चातुर्थिक-ज्वर का विनाश करता है १८-२३
ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च ।
पुराणं घृतमुन्मादालक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ॥ २४ ॥
(३) ब्राह्मी घृत—ब्राह्मी का स्वरस, वच, कूठ और शखपुष्पी इन से
पुरातन गो-घृत सिद्ध करे। यह घृत उन्माद, अलक्ष्मी, अपस्मार और पाप को
नष्ट करता है ॥ २४ ॥
घृतं सैन्धवहिङ्गुभ्या वर्षे बास्ते चतुर्गुणे ।
मूत्रे सिद्धमपस्मारहृद्रोगमहामयानाशनम् ॥ २५ ॥
(४) बैल और बकरे का मूत्र चार भाग, सैन्धव और हींग का कल्क
एक भाग, इनसे सिद्ध किया घृत अपस्मार, हृदय रोग, ग्रह रोगो को नष्ट करता
है। [यहा पर गौ और बकरी स्त्री जाति का मूत्र न लेकर नर बैल और बकरे
का ही मूत्र लेना चाहिये' ] ॥ २५ ॥
१ यद्यपि चतुष्पाद मे स्त्रीलिंग ही प्रशस्त है, तथापि यहा पर पुल्लिंग ही
लेना चाहिये। कहा भी है—स्त्रीणा गुरु च तीक्ष्ण च न तु पुंसा तथाविधम् ।
पित्ताशिका. स्त्रियो यस्मात् सौम्यास्तु पुरुषाः स्मृताः ॥

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६७
वचासम्पाककैटर्यवयःस्थाहिङ्गुचोरकैः ।
सिद्धं पलङ्कषायुक्तैर्वातश्लेष्मात्मके घृतम् ॥ २६ ॥
(५) वचा, सम्पाक (अमलतास), कैटर्य (कट्फल), वयःस्था (आवला
या गिलोय), हींग, चोरक (चोरपुष्पी सुगन्धित द्रव्य), पलंकषा (गुग्गुलु),
इनके कल्क से, चार गुणे पानी मे सिद्ध घृत वातिक, श्लैष्मिक अथवा गुल्म
के समान वात, कफ दोनो से उत्पन्न अपस्मार मे हितकारी है ॥२६॥
तैलप्रस्थं घृतप्रस्थं जीवनीयैः पलोन्मितैः ।
क्षीरद्रोणे पचेत्सिद्धमपस्मारविनाशनम् ॥ २७ ॥
(६) तिल का तैल एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, जीवनीय गण की दस
औषधियो मे से प्रत्येक एक-एक पल लेकर इनका कल्क, दूध एक द्रोण, इनमे
घृत सिद्ध करे, यह घृत अपस्मार का नाशक है ॥ २७ ॥
कंसे क्षीरेक्षुरसयोः काश्मर्येऽष्टगुणे रसे ।
कार्षिकैर्जीवनीयैश्च घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २८ ॥
वातपित्तोद्भवं क्षिप्रमपस्मारं नियच्छति ।
(७) दूध एक आढक, गन्ने का रस एक आढक, काश्मरी (गम्भारी)
का क्वाथ घी से आठ गुणा, जीवनीय आदि ओषधिया प्रत्येक एक कर्ष, इनके
कल्क से एक प्रस्थ गो घृत सिद्ध करे । यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य
(अथवा वात-पित्तजन्य) अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ २८-॥
तद्वत्काशविदारीक्षुकुशक्वाथशृतं घृतम् ॥ २९ ॥
(८) इसी प्रकार से कास (सरकण्डा), विदारीकन्द, गन्ना, कुश, इनके
क्वाथ मे सिद्ध घृत वातजन्य, पित्तजन्य अपस्मार को नष्ट करता है ॥२९॥
मधुकद्विपले कल्के द्रोणे चामलकीरसात् ।
तद्वत्सिद्धं घृतप्रस्थं पित्तापस्मारभेषजम् ॥ ३० ॥
(६) आवले का रस एक द्रोण, मुलहठी का कल्क दो पल, घी एक प्रस्थ
इनसे यथाविधि सिद्ध घृत पैत्तिक अपस्मार को नष्ट करता है ॥३०॥
अभ्यङ्गः सार्षपं तैल बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ।
सिद्धं स्याद् गोशकृन्मूत्रे स्नानोत्सादनमेव च ॥३१॥
अभ्यंग-(१) बकरे का मूत्र चार सेर, सरसो का तैल एक सेर, इनसे
सिद्ध किये तैल का अभ्यंग करे । इसी प्रकार गाय के गोबर से उबटन और
गाय के मूत्र से स्नान करे ॥ ३१ ॥