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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 616 में से

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पृष्ठ 437

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५३

शस्तं स्त्रीणां च वन्ध्यानां धन्यमायुर्बलप्रदम् ।
अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहविनाशनम् ॥ ४८ ॥
कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च ।
इति कल्याणकं घृतम् ।
( २ ) कल्याणक घृत—विशाला ( गवाक्षी ), त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा,
आँवला ), कौन्ती ( रेणुका और 'कान्ता' पाठ मे—मोटी इलायची ), देवदारु,
एलवालुक ( एलुआ ), स्थिरा ( शालपर्णी ), नत ( तगर ), हल्दी, दारु-हल्दी,
अनन्तमूल, कृष्णसारिवा, फूल प्रियगु, नीला कमल, छोटी इलायची, मजीठ,
दन्तीमूल, अनार, नागकेसर, तालीशपत्र, बड़ी कटेरी, मालती ( चमेली के नये
फूल ), वायबिडङ्ग, पृश्निपर्णी, कूठ, लाल चन्दन, पद्माख इन अट्ठाईस ओषधियो
मे प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनके कल्क द्वारा, घी एक प्रस्थ, पानी चार प्रस्थ
लेकर घृत पाक करे¹। यह कल्याणक नाम का घृत अपस्मार, ज्वर, कास,
शोष, मन्दाग्नि, क्षय, वातरक्त, प्रतिश्याय, तृतीयक, चतुर्थक ज्वर, छर्दि, अर्श,
मूत्रकृच्छ्र, वीसर्प, कण्डू, पाण्डु-रोग, उन्माद, विष और प्रमेह रोगो मे
हितकारी है, भूतो से आक्रान्त चित्त वाले अव्यक्त वाणी वाले, अल्प शुक्र
पुरुषो और वन्ध्या स्त्रियो के लिये प्रशस्त है। यह कल्याणक घृत धन के लिये
हितकारी, कल्याणकारी, आयुप्रद, बलप्रद तथा सब प्रकार के ग्रहो से उत्पन्न रोगो
का नाशक है ॥४२-४८॥
एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम् ॥ ४९ ॥
रसे तस्मिन्पचेत्सर्पिर्गूढक्षीरे चतुर्गुणे ।
वीरा-द्विमाष-काकोली-स्वयंगुप्तर्षभकद्धिभिः ॥ ५० ॥
मेदया च समैः कल्कैस्तत्स्यात्कल्याणकं महत् ।
बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम् ॥ ५१ ॥
इति महाकल्याणकं घृतम् ।
( ३ ) महाकल्याणक घृत—इन विशाला आदि अट्ठाईस वस्तुओ आर
स्थिरा आदि इक्कीस द्रव्यो से क्वाथ विधि से क्वाथ करे। इसमे पहिली बार
ब्याई ( खारके की ) गाय का दूध, घी से चतुर्गुण मिलावे। फिर वीरा ( पृश्नि-
पर्णी या शतावरी ), द्विमाष ( मूगपर्णी और माषपर्णी ), काकोली, कौंच,

१. चरकोपस्कार मे—'कान्ता' पाठ है। अष्टाङ्ग सङ्ग्रह मे भी—बड़ी
इलायची का ग्रहण है जैसे—'वरा विशाला भद्रैला देवदार्वेलवालुकैरि'ति ।
'कौन्ती' पाठ निर्णयसागर की प्रति मे है।