चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
१८६ चरकसंहिता [ अ० १२
अवस्था का श्रवण करना अथवा रोगी का वर्णन करते समय भूतकाल की
क्रियाओं को सुनना अशुभ लक्षण हैं । ऐसा सुन कर रोगी की मृत्यु समझनी
चाहिये । इस प्रकार से मरणोन्मुख रोगियों के दूतों का वर्णन सम्पूर्ण रूप में
कह दिया ॥ २४ ॥
पध्याातुरकुलानां च वक्ष्याम्यौत्पातिकं पुनः ॥ २५ ॥
अवश्रुतमधोत्कृष्टं स्खलनं पतनं तथा।
आक्रोशः संप्रहारो वा प्रतिषेधो विगर्हणम् ॥ २६ ॥
वस्त्रोष्णीषोत्तरीयध्वजच्छत्रोपानद्युगाश्रयम् ।
व्यसनं दर्शनं चापि मृतव्यसनिनां तथा ॥ २७ ॥
चैत्यध्वजपताकानां पूर्णानां पतनानि च ।
हतानिष्टप्रवादाश्च दर्शनं भस्मपांसुभिः ॥ २८ ॥
पथच्छेदो विडालेन शना सर्पेण वा पुनः ।
मृगद्विजानां क्रूराणां गिरो दीप्तां दिशं प्रति ॥ २९ ॥
शयनासनयानानामुत्तानानां प्रदर्शनम् ।
इत्येतान्यप्रशस्तानि सर्वाण्याहुर्मनीषिणः ॥ ३० ॥
एतानि पथि वैद्येन पश्यताऽऽतुरवेश्मनि ।
शृण्वता च न गन्तव्यं तदागारं विपश्चिता ॥ ३१ ॥
इत्यौत्पातिकमाख्यातं पथि वैद्यविगर्हितम् ।
( ५ ) मार्ग के लक्षण—
रोगी के घर जाते समय रास्ते में जो अरिष्ट सूचक लक्षण ( अशुभ चिह्न )
होते हैं उनको कहते हैं—छींक का आना, डर कर रोना, फिसलना, गिरना,
चिल्लाना, चोट लगना, प्रतिषेध ( मत जाओ ऐसी रुकावट होना ), निन्दा,
वस्त्र, पगड़ी, चादर ( दुपट्टा ), छत्री, जूता इन पदार्थों का फट जाना, मार्ग
में दुःखी अथवा मृत या कान, नाक अथवा अंग से हीन व्यक्ति का दर्शन
होना, चैत्य (मन्दिर), ध्वजा, पताका अथवा पानी से भरे घड़ों का गिरना; मरना
या कोई अनिष्ट बात, या वस्तु का नाश सुनाई देना; राख या रेत-मिट्टी इन सहित
दीखना; बिल्ली, सांप या कुत्ता इनका रास्ता काट कर जाना; जिस दिशामें सूर्य हो
उधर ही शृगाल, गोहड़, गीध आदि क्रूर पशु पक्षी चिल्ला रहे हों; बिछौना, आसन,
गाड़ी आदि वस्तुएं उत्तान रूप से रास्ते में पड़ी हों तो बुद्धिमान् इनको अशुभ लक्षण
समझें । ۞ रोगी के घर में जाते समय ये लक्षण हों तो रोगी के घर नहीं जाना
चाहिये । वैद्य के लिए निन्दित इन 'औत्पातिक' लक्षणों को कह दिया ॥२५-३१॥
۞ दीप्ता दिक्—'दक्षिण दिशा' भी अर्थ है ।
अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८७
अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८७
इमामपि च बुध्येत गृहावस्थां मुमूर्षताम् ॥ ३२ ॥
प्रवेशे पूर्णकुम्भाग्निमृद्वीजफलसर्पिषाम् ।
वृषब्राह्मणरत्नान्नदेवतानां विनिर्गतिम् ॥ ३३ ॥
अग्निपूर्णानि पात्राणि भिन्नानि विशिखानि च ।
भिषग् मुमूर्षतां वेश्म प्रविशन्नेव पश्यति ॥ ३४ ॥
छिन्नभिन्नविदग्धानि भग्नानि मृदितानि च ।
दुर्बलानि च सेवन्ते मुमूर्षोर्वैश्मिका जनाः ॥ ३५ ॥
( शयनं वसनं यानं गमनं भोजनं रुतम् ।
श्रूयतेऽमङ्गलं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ ३६ ॥ )
शयनं वसनं यानमन्यदपि परिच्छदम् ।
प्रेतवद्यस्य कुर्व्वन्ति सुहृदः प्रेत एव सः ॥ ३७ ॥
अन्नं व्यापद्यतेऽत्यर्थं ज्योतिश्चैवोवशाम्यति ।
निवाते सेन्धनं यस्य तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ ३८ ॥
आतुरस्य गृहे यस्य भिद्यन्ते वा पतन्ति वा ।
अतिमात्रममत्राणि दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ३९ ॥
निम्नलिखित लक्षणों से भी मरने वाले रोगी के घर की अवस्था का ज्ञान
कर लेना चाहिये । ( १ ) घर में घुसने के समय पानी से भरे पात्र, आग,
मिट्टी, बीज, फल, घी, बैल ( गाय ), ब्राह्मण, रत्न, अन्न या देवताओं की
प्रतिमा आदि को यदि घर से बाहर कोई ले जा रहा हो, अग्नि से भरे पात्र
अथवा टूटे और खाली पात्रों को वैद्य रोगी के घर में घुसते देखे तो अशुभ है ।
( २ ) इसी प्रकार मिट्टी के टूटे-फूटे, जले बर्त्तन दिखाई दें, घर के आदमी
निर्बल, तेजहीन दिखाई दें, तो रोगी नहीं बचता । ( ३ ) जिस रोगी का
बिस्तर ( उत्तर को सिर, दक्षिण दिशा में पांव ) वस्त्र, यान अथवा अन्य सामान
मृतक के समान किया जा रहा हो, तो उसे भी मृतक का भाई गिनना चाहिये ।
( ४ ) जिस रोगी का आहार अत्यन्त बिगड़ा हुआ हो, और वायु के झोंके से
रहित स्थान में इंधन के होने पर भी आग बुझती हो, वह रोगी चिकित्सा के
अयोग्य है । ( ५ ) जिस रोगी के घर में थाली, कटोरे आदि पात्र बहुत करके
टूटते या गिरते हों, उस रोगी का जीवन कठिन है ॥ ३२-३६ ॥
भवन्ति चात्र-यद् द्वादशभिरध्यायैर्व्यासतः परिकीर्तितम् ।
मुमूर्षतां मनुष्याणां लक्षणं जीवितान्तकृत् ॥ ४० ॥
तत्समासेन वक्ष्यामः पर्यायान्तरमाश्रितम् ।
पर्यायवचनं ह्यर्थविज्ञानायोपपद्यते ॥ ४१ ॥
१८८ चरकसंहिता [ अ० १२
इत्यर्थं पुनरेवेयं विवक्षा नो विधीयते ।
तस्मिन्नेवाधिकरणे यत्पूर्वमभिदर्शितम् ॥ ४२ ॥
इन बारह अध्यायों में मरणोन्मुख रोगी के लक्षणों को विस्तार से कह दिया
है। अब संक्षेप में इनके पर्याय कहते हैं। पर्याय द्वारा अर्थ का ज्ञान भली
प्रकार से हो जाता है। इसलिये इसी विस्तार को अब सक्षेप में कहते हैं—इसमे
पुनरुक्ति दोष नहीं मानना ॥ ४०-४२ ॥
वसतां चरमे काले शरीरेषु शरीरिणाम् ।
अध्युग्राणां विनाशाय देहेभ्यः प्रविवत्सताम् ॥ ४३ ॥
इच्छास्तितिक्षता प्राणान् कान्तं वासं जिहासताम् ।
तन्त्रयन्त्रेषु भिन्नेषु तमोऽन्त्य प्रविविक्षताम् ॥ ४४ ॥
विनाशायेह रूपाणि यान्यवस्थान्तराणि च ।
भवन्ति तानि वक्ष्यामि यथाद्देशं यथागमम् ॥ ४५ ॥
प्राणाः समुपतप्यन्ते विज्ञानमुपरुध्यते ।
वमन्ति बलमङ्गानि चेष्टा व्युपरमन्ति च ॥ ४६ ॥
इन्द्रियाणि विनश्यन्ति खिलीभवति चेतना ।
औत्सुक्यं भजते सत्त्व चेतो भीराविशत्यपि ॥ ४७ ॥
स्मृतिस्त्यजति मेधा च ह्रीश्रियो चापसर्पतः ।
उपसर्पन्ते पाप्मान ओजस्तेजश्च नश्यति ॥ ४८ ॥
शीलं व्यावर्ततेऽत्यर्थं भक्तिश्च परिवर्तते ।
विक्रियन्ते प्रतिच्छायाश्छायाश्च विकृतिं प्रति ॥ ४९ ॥
शुक्र प्रच्यवते स्थानादुन्मार्गं भजतेऽनिलः ।
क्षयं मांसानि गच्छन्ति गच्छन्त्यसृगुपक्षयम् ॥ ५० ॥
ऊष्माणः प्रलयं यान्ति विश्लेष यान्ति संधयः ।
गन्धा विकृततां यान्ति भेद वर्णस्वरौ तथा ॥ ५१ ॥
वैवर्ण्यं भजते कायः कायच्छिद्रं विशुष्यति ।
धूमः संजायते मूर्ध्नि दारुणाख्यश्च चूर्णकः ॥ ५२ ॥
सततस्पन्दना देशाः शरीरे येऽभिलक्षिताः ।
ते स्तम्भानुगताः सर्वे न चलन्ति कथंचन ॥ ५३ ॥
गुणाः शरीरदेशानां शीतोष्णमृदुदारुणाः ।
विपर्यासेन वर्तन्ते स्थानेष्वन्येषु तद्विधाः ॥ ५४ ॥
नखेषु जायते पुष्प पङ्को दन्तेषु जायते ।
जटाः पक्ष्मसु जायन्ते सीमन्ताश्चापि मूर्धनि ॥ ५५ ॥
अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८६
अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८६
भेषजानि न संवृत्तिं प्राप्नुवन्ति यथारुचिम् ।
यानि चाप्युपपद्यन्ते तेषां वीर्यं न सिध्यति ॥ ५६ ॥
नानाप्रकृतयः क्रूरा विकारा विविधौषधाः ।
क्षिप्रं समभिवर्तन्ते प्रतिहत्य बलौजसी ॥ ५७ ॥
शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धश्चेष्टा विचिन्तितम् ।
उत्पद्यन्तेऽशुभान्येव प्रतिकर्मप्रवृत्तिषु ॥ ५८ ॥
दृश्यन्ते दारुणाः स्वप्ना दौरात्म्यमुपजायते ।
प्रेष्याः प्रतीपता यान्ति प्रेताकृतिरुदीर्यते ॥ ५९ ॥
प्रकृतिर्हीयतेऽत्यर्थं विकृतिश्चाभिवर्धते ।
कृत्स्नमौत्पातिकं घोरमरिष्टमुपलक्ष्यते ॥ ६० ॥
इत्येतानि मनुष्याणां भवन्ति विनाशिष्यताम् ।
लक्षणानि यथोद्देशं यान्युक्तानि यथागमम् ॥ ६१ ॥
अन्तकाल अर्थात् मृत्यु के समय में प्रिय प्राणो के निकलते समय, शरीर
के सिरा, स्नायु आदि में जो परिवर्त्तन होते हैं, शरीर के नाश होने के समय जो
व्याकुल दशा होती है, इनके कारण शरीर के अवयवों की जो दशा होती है,
उसका शास्त्रानुसार वर्णन करते हैं:—
प्राण पीड़ित होते हैं, ज्ञान की गति बन्द हो जाती है, अंगों का बल नष्ट
हो जाता है, क्रियायें बन्द ( नष्ट ) हो जाती है, चेतना बिखरती जाती है,
मन में आकाङ्क्षा, उत्सुकता रहती है, चित्त में भय समा जाता , स्मरण शक्ति
लुप्त हो जाती है, बुद्धि, लज्जा और कान्ति भी नष्ट हो जाती है, पाप से उत्पन्न
होने वाले रोग पैदा होने लगते हैं, ओज और तेज (शुक्र) कान्ति नष्ट हो
जाती है, शील-स्वभाव बहुत बदल जाता है, भक्ति नष्ट हो जाती है, कान्ति
और प्रभा विकृत हो जाती है, शुक्र स्थान से भ्रष्ट हो जाता है, वायु ऊपर को
चढ़ने लगता है, मास का क्षय हो जाता है, रक्त भी कम हो जाता है, शरीर
की गरमी नष्ट हो जाती है, सन्धिया शिथिल हो जाती हैं, गन्ध, वर्ण, स्वर,
विकृत हो जाते हैं, शरीर का रंग बदल जाता है, शरीर के रोमकूप बन्द हो जाते
हैं, शिर पर धूम हो जाता है, गोमय के समान भयानक चूर्ण उत्पन्न हो जाता
है (स्नेह नहीं रहता ), शरीर के जिन स्थानो पर निरन्तर स्पन्दन (कम्पन)
रहता है, उन स्थानों पर जड़ता आ जाती है, वे किसी भी प्रकार में गति नहीं
करते, शरीर के स्थानों में शीत, मृदु, दारुण आदि गुण भी बदल जाते हैं,
(शीत के स्थान पर उष्णमा, मृदु के स्थान पर कठोरता, कठोरता के स्थान पर
मृदुता, उष्णमा के स्थान पर शीत हो जाता है), नखों में पुष्प (फूल, श्वेत
चिह्न), उत्पन्न हो जाता है, दातों मे मलिनता आ जाती है, पलकों में गुझिया
१६० चरकसंहिता [अ० १२
(जटा) पड़ जाती हैं, बालों में माग निकल आती है, रोगी के लिये जरूरी
औषध नहीं मिलती, तथा जो मिलती है वह फलप्रद नही होती, रुचि के अनुसार
दी हुई औषध से भी सफलता नहीं होती, बल और ओज को कम करके नाना
प्रकार के भयानक तथा अनेक ओषधियो से अच्छे होने वाले रोग शीघ्र उत्पन्न
हो जाते हैं, शब्द, रूप, रस, गन्ध और अनेक प्रकार की अशुभ चेष्टा और
विचार उत्पन्न होते हैं, चिकित्सा करने पर भी अशुभ फल दीखता है, नाना
प्रकार के भयानक स्वप्न दिखाई देते हैं, स्वभाव दुष्ट बन जाता है, सेवक,
परिचारक विरूद्ध एव निराश हो जाते हैं, रोगी की आकृति मृतक के समान
बन जाती है, प्रकृति विशेष रूप में कम हो जाती है और विकृति विशेष रूप मे
बढ़ जाती है। ये सब उत्पात घोर अनिष्टसूचक हैं। ये सब लक्षण मरणासन्न
मनुष्य में होते हैं। शास्त्र-प्रमाण के अनुसार मरने वाले मनुष्य के ये
लक्षण कहे हैं॥ ४३-६१॥
मरणायेह रूपाणि पश्यताऽपि भिषग्विदा।
अपृष्टेन न वक्तव्यं मरणं प्रत्युपस्थितम् ॥ ६२ ॥
पृष्टेनापि न वक्तव्यं तत्र यत्रोपघातकम् ।
आतुरस्य भवेद् दुःखमथवाऽन्यस्य कस्यचित् ॥ ६३ ॥
अनुवन् मरणं तस्य नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ।
वैद्य के कर्त्तव्य—इन लक्षणों को वैद्य देख कर भी बिना पूछे किसी को
नहीं कहे और जहा पर रोगी को अथवा किसी अन्य आदमी को दुःख या मृत्यु
हो तो वहा पर पूछने पर भी रोगी की मृत्यु न कहे । उनसे कह दे कि मैं इस
रोगी की चिकित्सा नहीं करना चाहता ॥ ६२-६३॥
यस्य पश्येद्विना शाय लिङ्गानि कुशलो भिषक् ॥ ६४ ॥
लिङ्गेभ्यो मरणाख्येभ्यो विपरीतानि पश्यता।
लिङ्गान्यारोग्यमागन्तुं वक्तव्यं भिषजा ध्रुवम् ॥ ६५ ॥
दूतैरुत्पातिकैर्भावैः पथ्यातुरकुलाश्रयैः ।
आतुराचार-शीलेष्ट-द्रव्य-संपत्ति-लक्षणैः ॥ ६६ ॥
रोगी के अच्छे लक्षण—जिस मरणासन्न रोगी मे वैद्य अच्छे लक्षण देखे,
जैसे—मरणसूचक लक्षणों से विपरीत लक्षण हों, वैद्य को बुलानेवाले दूत
सद्भाव युक्त हों, वैद्य के मार्ग मे उत्पात न हों, रोगी के घर में अमंगल लक्षण
दृष्टिगोचर न हों, इत्यादि लक्षणों को देखकर रोगी का आरोग्य सम्बन्धियों तथा
रोगी को अवश्य कह देना चाहिये ॥ ६४-६६ ॥
अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १६१
अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १६१
स्वाचारं हृष्टमव्यङ्गं यशस्यं शुक्लवाससम् ।
अमुण्डमजटं दूतं जातिवेशक्रियासमम् ॥ ६७ ॥
अनुष्ट्रखरयानस्थमसन्ध्याम्वग्रहेषु च ।
अदारुणेषु नक्षत्रेष्वनुग्रेषु ध्रुवेषु च ॥ ६८ ॥
शुभ लक्षण—रोगी का आचार, शील, इष्ट पदार्थ बिगड़े न हों, तो
समझना चाहिये कि रोगी अच्छा हो जायेगा। इसी प्रकार दूत आचारवान्,
प्रसन्नचित्त, शरीर का कोई अवयव विकृत न हो, यशस्वी, सफेद वस्त्र पहिने,
शिखा समेत मुण्डन न कराये, उचित जाति के समान वस्त्र पहिने तथा उचित
क्रियावान् हो, वह दूत उत्तम है । ऊट, गधा इन पर सवारी न किये हों,
सन्ध्याकाल मे, अप्रशस्त ग्रहों में, क्रूर नक्षत्र मे, ध्रुव नक्षत्र के उदय काल मे
वैद्य को बुलाने के लिये नहीं जाना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥
विना चतुर्थी नवमीं विना रिक्तां चतुर्दशीम् ।
मध्याह्नं चार्धरात्रं च भूकम्पं राहुदर्शनम् ॥ ६९ ॥
विना देशमशस्तं च शस्तौत्पातिकलक्षणम् ।
दूतं प्रशस्तमव्यग्रं निर्दिशेदागतं भिषक् ॥ ७० ॥
दध्यक्षताङ्घ्रिजातीनां वृषभाणां नृपस्य च ।
रत्नानां पूर्णकुम्भानां सितस्य तुरगस्य च ॥ ७१ ॥
सुरध्वजपताकानां फलानां पावकस्य च ।
कन्यापुंवर्धमानानां बद्धस्यैकपशोस्तथा ॥ ७२ ॥
पृथिव्या उद्धतायाश्च वह्नेः प्रोज्ज्वलितस्य च ।
मोदकानां सुमनसां शुक्लानां चन्दनस्य च ।' ७३ ॥
मनोन्नास्थानपानस्य पूर्णस्य शकटस्य च ।
नृभिर्धेन्वाः सवत्साया वडवायाः स्त्रियास्तथा ॥ ७४ ॥
जीवञ्जीवकसिद्धार्थसारसप्रियवादिनाम् ।
हंसानां शतपत्राणां चाषाणां शिखिनां तथा ॥ ७५ ॥
मत्स्याजद्विजराज्ञानां प्रियङ्गूनां घृतस्य च ।
रोहिष्र्काङ्क्षसिद्धानां रोचनायाश्च दर्शनम् ॥ ७६ ॥
चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी या रिक्त तिथि मे मध्याह्न, आधी रात में,
भूकम्प, अथवा ग्रहण काल मे, जिस समय वैद्य अप्रशस्त स्थान में स्थित हो,
अथवा जब औत्पातिक लक्षण दीखते हो, उस समय मे घबराहट के साथ वैद्य
को बुलाने के लिये दूत न जावे। इन उपरोक्त लक्षणों से बचा, प्रशस्त लक्षणों
वाला दूत उत्तम है। वैद्य जब रोगी को देखने जावे, और मार्ग में अथवा रोगी
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के घर में घुसते समय निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे तो शुभ लक्षण समझने
चाहिये । जैसे—दही, अक्षत (खिलें चावल ), ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, गाय,
राजा, रत्न, पानी से भरे घड़े, सफेद घोड़ा, शक्र ध्वजा, फल, यावक ( यावक-
अन्न ), गाद में चढ़ा कन्या या पुत्र, बधा हुआ श्रेष्ठ पशु, खोदी हुई मिट्टी
वाली भूमि, जलती हुई आग, लड्डू, सफेद फूल, चन्दन, मनोनुकूल खान-पान,
मनुष्यों से भरी गाड़ी, बछड़े समेत गाय, बछेरी समेत घोड़ा, लड़के समेत स्त्री,
जीवजीवक ( चकोर ), सिद्धार्थक, सारस, प्रियवादी ( चातक ), हंस, कटफोड़ा,
चाष ( भास पक्षी ), मोर, मछली, बकरा, ब्राह्मण, शंख, प्रियंगु, घृत, गोरोचना,
शीशा (दर्पण), सफेद सरसों, रोचना इन सब पदार्थों का दर्शन शुभ है ॥ ६६-७६ ॥
गन्धः सुगन्धो वर्णश्च सुशुक्लो मधुरो रसः ।
मृगपक्षिमुष्याणा प्रशस्ताश्च गिरः शुभाः ॥ ७७ ॥
छत्रध्वजपताकानामुत्क्षेपणमभिष्टुतिः ।
भेरीमृदङ्गशङ्खाना शब्दाः पुण्याहनिस्वनाः ॥ ७८ ॥
वेदाध्ययनशब्दाश्च सुखो वायुः प्रदक्षिणः ।
पथि वेश्मप्रवेशे तु विद्यादारोग्यलक्षणम् ॥ ७६ ॥
सुगन्ध, श्वेत वर्ण, मधुर रस, मनुष्य, पशु, पक्षियों की शुभ वाणी प्रशस्त
समझनी चाहिये । छत्र, ध्वजा, पताकाओं का ऊपर चढ़ा रहना, अथवा इधर
उधर आकाश में उड़ते रहना, भेरी, मृदंग, शंख आदि बाजों के पवित्र शब्द,
वेद के पढ़ने का शब्द, सुखकारक दक्षिण दिशा की वायु का बहना—ये सब
शुभ चिह्न हैं। इन लक्षणो को रास्ते मे देख कर रोगी की आरोग्यता को
समझ लेना चाहिये ॥ ७७-७६ ॥
मङ्गलाचारसपन्नः सातुरो वैश्मिको जनः ।
श्रद्दधानोऽनुकूलश्च प्रभूतद्रव्यसंग्रहः ॥ ८० ॥
धनैश्वर्यसुखावाप्तिरिष्टलाभः सुखेन च ।
द्रव्याणा तत्र याग्याना योजना सिद्धिरेव च ॥ ८१ ॥
रोगी और उसके घर के मनुष्य यदि मंगल आचार वाले, श्रद्धावाले, अनु-
कूल, बहुत अधिक सामान ( धन आदि ) वाले, धन-ऐश्वर्य-सुख से परिपूर्ण
हों, इष्ट वस्तु सुगमता से मिल सके, उचित तथा अभीष्ट वस्तु की योजना सुग-
मता से की जा सके, ऐसी अवस्था में सफलता शीघ्र मिलती है ॥ ८०-८१ ॥
गृहप्रासादशैलाना नागानां वृषभस्य च ।
हयानां पुरुषाणां च स्वप्ने समधिरोहणम ॥ ८२ ॥
अ० १२ ] १३ इन्द्रियस्थानम् १६३
अ० १२ ] १३ इन्द्रियस्थानम् १६३
अर्णवानां प्रतरणं वृद्धिः सर्वाधनिःस्रुतिः ।
स्वप्ने देवः सपितृभिः प्रसन्नैश्चाभिभाषणम् ॥ ८३ ॥
सोमार्कवह्निद्विजातीनां गवां नॄणां यशस्विनाम् ।
दर्शनं शुक्लवस्त्राणां ह्रदस्य विमलस्य च ॥ ८४ ॥
मास-मत्स्य-विषामेध्यच्छत्रादर्शपरिग्रहः ।
स्वप्ने सुमनसां चैव शुक्लानां दर्शनं शुभम् ॥ ८५ ॥
अश्वगोरथयानं च यानं पूर्वोत्तरेण च ।
रोदनं पतितात्थानं द्विषतां चावमर्दनम् ॥ ८६ ॥
रोगी का स्वप्न में घर, महल, पर्वत, हाथी बैल घोड़े आदि पर चढ़ना,
समुद्रों को तैरना, समुद्र का बढ़ना, दुःखों से पार होना, प्रसन्न हुए देवताओं
और पितरों से बातचात करना, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,
गाय और कीर्तिशाली पुरुषों का दर्शन करना, सफेद वस्त्रों का दर्शन, निर्मल
सरोवर का दर्शन होना, मास, मछली, विष, अपवित्र वस्तु, छत्र, दर्पण इन
वस्तुओं को ग्रहण करना, सफेद फूलों का दर्शन या धारण करना, घोड़ा, बैल
या रथ पर बैठ कर सवारी करना, पूर्व उत्तर में जाना, रोना वा गिरे हुओं का
उठना, शत्रुओं का अवमर्दन करना, ये लक्षण हों तो जाने कि रोगी
स्वस्थ हो जायगा ॥ ८२-८६ ॥
सत्त्वलक्षणसंयोगो भक्तिर्वैद्यद्विजातिषु ।
साध्यत्वं न च निर्वेदस्तदारोग्यस्य लक्षणम् ॥ ८७ ॥
आरोग्याद् बलमायुश्च सुखं च लभते महत् ।
इष्टांश्चाप्यपरान् भावान् पुरुषः शुभलक्षणः ॥ ८८ ॥
जिस रोगी की वृत्ति सत्त्व गुण के लक्षणों से युक्त हों, जो रोगी वैद्य और
ब्राह्मणों में भक्ति रखता हो, रोगी में आत्मग्लानि भाव न हो तो रोगी को साध्य
समझे । उपरोक्त शुभ लक्षणो से मनुष्य को आरोग्य दीर्घायु, महान् सुख एव
अन्य वाञ्छित फल प्राप्त होते हैं ॥ ८७ ८८ ॥
तत्र श्लोकः-उक्तं गोमयचूर्णीये मरणारोग्यलक्षणम् ।
दूतस्वप्नान्तरोत्पातयुक्तिसिद्धिद्व्यपाश्रयम् ॥ ८६ ॥
'इस गोमयचूर्णीय' नामक अध्याय मे मरण व आरोग्य के लक्षण दूत
के लक्षण, स्वप्न के लक्षण, मार्ग मे जाते समय शुभ अशुभ उत्पात, रोगी के
घर मे होने वाले लक्षण, युक्ति और सिद्धि में वर्णन कर दी है ॥८६॥
भवति चात्र-इतीदमुक्तं प्रकृतं यथा तथा
तदन्ववेक्ष्य सतत भिषग्विदा ।
तथा हि सिद्धि च यशश्च शाश्वतं
१६४ चरकसंहिता [ अ० १२
तथा हि सिद्धि च यशश्च शाश्वतं
स सिद्धकर्मा लभते धनानि च ॥ ६० ॥
इस इन्द्रिय स्थान में जिन जिन बातों का वर्णन किया है, वे बातें वैद्य को
अवश्य भली प्रकार जाननी चाहियें । इनको जाननेवाला वैद्य ‘सिद्धकर्मा’
होता है और उसकी चिकित्सा सदा सफल होती है । इससे उसको निरन्तर यश
और धन मिलता है ॥ ६० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने गोमयचूर्णी-
यमिन्द्रिय नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इतीन्द्रियस्थानं सम्पूर्णम् ।
चिकित्सितस्थानम्
चिकित्सितस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
( प्रथमः पादः )
[ चिकित्सा शास्त्र के हेतु लिंग और औषध ज्ञान ये तीन ही अंग हैं। ये
तीनों अग स्वस्थ और रोगी दोनों पुरुषो के लिये उपयोगी हैं। इनमें से हेतु
और लिंग इन दो बातों का विवेचन पीछे कर चुके हैं। अब औषधज्ञान की
व्याख्या के लिये इस स्थान का अवतरण करते हैं। औषध ज्ञान रूप चिकित्सा
धर्म, अर्थ और यश को देती है। इस चिकित्सा मे भी रसायन और वाजीकरण-
चिकित्सा अधिक फलदायक है। क्योंकि इनसे बुढ़ापा आदि स्वाभाविक रोग
दूर होते हैं, पुत्रैषणा पूर्ण होती है और रसायन द्वारा अपरिमित आयु प्राप्त
होती है, इसलिये रसायनचिकित्सा अधिक महत्त्व की है । ]
अथातोऽभयामलकीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम "अभयामलकीय नामक रसायन पाद" की व्याख्या करते हैं,
भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया था ॥ १-२ ॥
चिकित्सितं व्याधिहरं पथ्यं साधनमौषधम् ।
प्रायश्चित्तं प्रशमनं प्रकृतिस्थापनं हितम् ॥ ३ ॥
विद्याद्भेषजनामानि-
भेषज के पर्याय—चिकित्सा, व्याधिहर, पथ्य, साधन, औषध, प्रायश्चित्त,
प्रशमन, प्रकृतिस्थापन और हित ये सब भेषज के पर्याय हैं ॥ ३ ॥
भेषजं द्विविधं च तत् ।
स्वस्थस्यौजस्करं किञ्चित्किञ्चिदार्तस्य रोगनुत् ॥ ४ ॥
भेषज के दो भेद—यह भेषज दो प्रकार का है। एक स्वस्थ पुरुष के ओज,
शक्ति या जीवन को बढ़ानेवाला, दूसरा रोगी पुरुष के रोग को नष्ट करनेवाला ।
अभेषजं च द्विविधं बाधन सानुबाधनम् ।
अभेषज-अभेषज भी दो प्रकार का है। जैसे एक बाधन और दूसरा सानु-
बाधन । इनसे बाधन अभेषज उसी समय के लिये पीड़ा देता है (जैसे—चीता या राई
१६६ चरकसंहिता [ अ० १
अथवा भिलावे का लेप)। और सानुबाधन औषध-दीर्घकाल तक रहनेवाले कुष्ठ
आदि विकारों को उत्पन्न करता है (जैसे-मत्स्य को दूध के साथ खाना) ॥ ४॥
स्वस्थस्यौजस्करं यत्तु तद् वृष्यं तद् रसायनम् ॥ ५ ॥
प्रायः, प्रायेण रोगाणां द्वितीयं प्रशमे मतम् ।
प्रायःशब्दो विशेषार्थो ह्युभयं ह्युभयार्थकृत् ॥ ६ ॥
रसायन—जो औषध स्वस्थ पुरुष के बल वीर्य को बढ़ाता है वह औषध
प्राय. वृष्य और रसायन होता है। दूसरी प्रकार का औषध प्रायः रोगों का
शमन करता है । यहाँ पर प्रयुक्त हुआ 'प्रायः' शब्द विशेषार्थवाची है । साधा-
रणतः दोनों प्रकार के कार्य करते हैं । [जैसे-क्षतक्षीण अध्याय में कहा सर्पि-
र्गुड़ रसायन और वृष्य दोनों हैं । ] ॥ ५-६ ॥
दीर्घमायुः स्मृतिं मेधामारोग्यं तरुणं वयः ।
प्रभावर्णस्वरौदार्यं देहेन्द्रियबलं परम् ॥ ७ ॥
वाक्सिद्धि प्रणतिं कान्तिं लभते ना रसायनात् ।
लाभोपाया हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥ ८ ॥
रसायन के कार्य—रसायन के सेवन से पुरुष दीर्घ आयु, स्मृति (पूर्व
अनुभूत का स्मरण करने का सामर्थ्य ), मेधा ( धारणात्मिका बुद्धि ), आरोग्य,
तरुण वय (जवानी), प्रभा, वर्ण, स्वर की उदारता (प्रशस्तता), उत्कृष्ट
देह-बल, इन्द्रिय-बल, वाक्-सिद्धि (जो कहा जाय वह अवश्य होकर रहे),
प्रणति (लोकों की पूजनीयता) और कान्ति प्राप्त करता है ।
इन गुणों की प्राप्ति में कारण—प्रशस्त रस (आहार, वार्य, विपाक) आदि
के लाभ के उपाय ही रसायन हैं। (उत्तम रस से धातु भी उत्तम होते हैं) ॥७-८॥
अपत्यसन्तानकरं यत्सद्यः संप्रहर्षणम् ।
वाजीवातिबलो येन यात्यप्रतिहतः स्त्रियः ॥ ६ ॥
भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां येन येनोपचीयते ।
जीर्यतोऽप्यक्षयं शुक्रं फलवद्येन दृश्यते ॥ १० ॥
प्रभूतशाखः शाखीव येन चैत्यो यथा महान् ।
भवत्यर्च्यो बहुमतः प्रजानां सुबहुप्रजः ॥ ११ ॥
सन्तानमूलं येनेह प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ।
यशः श्रियं बलं पुष्टिं वाजीकरणमेव तत् ॥ १२ ॥
वाजीकरण औषध—जो औषध सन्तान-परम्परा (सन्तान-तन्तु) पुत्र
पौत्रादि की शृङ्खला को बनाती है, जिसके सेवन से प्रहर्ष (लिंग में कामोत्ते-
जना, हर्ष) होता है, जिसके सेवन से पुरुष घोड़े के समान अति बलशाली
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६७
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६७
होकर स्त्रियों से अप्रतिहत रूप में ( बिना शक्ति नष्ट हुए, बिना झिझक के )
सम्भोग कर सकता है, जिसके सेवन से पुरुष स्त्रियों का अतिप्रिय बन जाता है,
जिसके सेवन से पुष्टि, बल मिलता है, जिसके सेवन से वृद्धावस्था में जीर्ण
होता हुआ भी पुरुष अक्षय शुक्र के भण्डार को प्राप्त करके पुत्रवान् हो सकता है,
जिसके सेवन से मनुष्य वृक्ष के समान अनेक शाखाँवाला ( पुत्र, पौत्र, सगे
सम्बन्धियोंवाला ) बन जाता है, जिसके सेवन से पुरुष चैत्य ( ग्राम तरु या
देवमन्दिर ) के समान बहुत प्रजावाला, बहुत मानवाला, सर्वप्रिय, पूजनीय
होता है, जिसके सेवन से पुरुष मर कर भी सन्तान के कारण होनेवाली अन-
न्तता, यश, रत्न, बल, पुष्टि को प्राप्त करता है। उस औषध को 'वाजीकरण'
कहते हैं ॥ ९-१२ ॥
स्वस्थस्यौजस्करं त्वेतद् द्विविधं प्रोक्तमौषधम् ।
यद् व्याधिनिर्घातकरं वक्ष्यते तच्चिकित्सिते ॥ १३ ॥
स्वस्थ पुरुष के लिये जो दो प्रकार के औषध ऊर्ज को उत्पन्न करते हैं
वह कह दिये हैं और जो औषध रोग का नाश करता है, उसको चिकित्सा-
धिकार में कहेंगे ॥ १३ ॥
चिकित्सितार्थ एतावान्विकाराणां यदौषधम् ।
रसायनविधिश्चाग्रे वाजीकरणमेव च ॥ १४ ॥
ज्वर आदि रोगों को शमन करनेवाले औषध का उपदेश ही चिकित्सा-
अधिकार का प्रयोजन है। वैसे रसायन और वाजीकरण भी चिकित्सा में ही
सम्मिलित हैं। ज्वर आदि रोगों की चिकित्सा से पूर्व रसायन और वाजीकरण
को कहा है ॥ १४ ॥
अभेषजमिति ज्ञेयं विपरीतं यदोषधात् ।
तदसेव्यं, निषेव्यं, तु प्रवक्ष्यामि यदौषधम् ॥ १५ ॥
अभेषज का लक्षण— जो औषध से विपरीत हो, उसका नाम अभेषज है,
यह सेवन के अयोग्य है। जो औषध सेवन करने योग्य है, उसका अब
उपदेश करते हैं ॥ १५ ॥
रसायनानां द्विविधं प्रयोगमृषयो विदुः ।
कुटीप्रावेशिकं चैव वातातापकमेव च ॥ १६ ॥
ऋषियों ने रसायनों के प्रयोग की दो प्रकार की विधि कही है। ( १ )
वातातापक और ( २ ) कुटी-प्रावेशिक । इनमें कुटी-प्रावेशिक विधि अधिक
प्रभावशाली है ॥ १६ ॥
१६८
चरकसंहिता
[ अ० १
कुटीप्रावेशिकस्याऽऽदौ विधिः समुपदेक्ष्यते ।
नृपवैद्यद्विजातीनां साधूनां पुण्यकर्मणाम् ॥ १७ ॥
निवासे निर्भये शस्ते प्राप्योपकरणे पुरे ।
दिशि पूर्वोत्तरायां तु सुभूमौ कारयेत्कुटीम् ॥ १८ ॥
विस्तारोत्सेधसंपन्नां त्रिगर्भां सूक्ष्मलोचनाम् ।
घनभित्तिमृतुसुखां सुस्पष्टां मनसः प्रियाम् ॥ १९ ॥
शब्दादीनामशस्तानागम्यां स्त्रीविवर्जिताम् ।
इष्टोपकरणोपेतां सज्जवैद्यौषधद्विजाम् ॥ २० ॥
अब कुटी प्रावेशिक विधि का उपदेश करेंगे—
कुटी प्रावेशिक विधि—जिस स्थान पर राजा, वैद्य, ब्राह्मण और पुण्य
कर्म करनेवाले साधु सन्त रहते हों, जो स्थान निर्भय, प्रशस्त हो, जहा पर सब
प्रकार के साधन मिल सके, ऐसे नगर मे अच्छी भूमि पर पूर्व या उत्तर दिशा
में कुटी बनवावे । वह कुटी पर्याप्त लम्बी, चौड़ी, ऊंची होनी चाहिये । इसमें
तीन गर्भ ऐसे हों कि एक के अन्दर दूसरा और दूसरे में तीसरा घर हो । इसमें
छोटे २ रोशनदान ( झरोखे ) हों । इस कुटी की दीवारे मोटी, ऋतु के
अनुकूल सुखदायक, खूब प्रकाशयुक्त, मन को लुभानेवाली, अशुभ शब्द
आदि की पहुंच से बाहर, स्त्री रहित, आकांक्षित साधनों से सज्जित और वैद्य,
औषध और ब्राह्मण जहा पर सदा रह सके, ऐसी कुटी बनानी चाहिये ॥१७-२०॥
अथोदगयने शुक्ले तिथिनक्षत्रपूजिते ।
मुहूर्त्तकरणोपेते प्रशस्ते कृतवापनः ॥ २१ ॥
धृतिस्मृतिबलं कृत्वा श्रद्धाधानः समाहितः ।
विधूय मानसान्दोषान्मैत्रीं भूतेषु चिन्तयन् ॥ २२ ॥
देवताः पूजयित्वाऽग्रे द्विजातींश्च प्रदक्षिणम् ।
देवगोब्राह्मणान्कृत्वा ततस्तां प्रविशेत्कुटीम् ॥ २३ ॥
जिस दिन सूर्यभगवान् उत्तरायण मे हो, शुक्ल पक्ष हो, प्रशस्त तिथि,
नक्षत्र, मुहूर्त, करण में मुण्डन करा के श्रद्धा और एकाग्र मन से धृति ( धैर्य ),
स्मृति के बल से, रज, तम, आदि मानसिक दोषों को जीत कर सब प्राणियों मे
मैत्री का चिन्तन करते हुए, प्रथम देव, ब्राह्मण की पूजा करके, देवता, गौ
और ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा करके कुटी में प्रवेश करे ॥ २१-२३ ॥
तस्यां संशोधनैः शुद्धः सुखी जातबलः पुनः ।
रसायनं प्रयुञ्जीत तत्प्रवक्ष्यामि शोधनम् ॥ २४ ॥
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६६
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६६
कुटी मे प्रविष्ट होकर संशोधन ओषधियों से शुद्ध होकर पुनः बलवान् होने
पर रसायन का प्रयोग करे । इसलिये प्रथम संशोधनों को कहते हैं ॥ २४ ॥
हरीतकीनां चूर्णानि सैन्धवामलके गुडम् ।
वचां विडङ्गं रजनीं पिप्पलीं विश्वभेषजम् ।
पिवेदुष्णाम्बुना जन्तुः स्नेहस्वेदोपपादितः ॥ २५ ॥
तेन शुद्धशरीराय कृतसंसर्जनाय च ।
त्रिरात्रं यावकं दद्यात्पञ्चाहं वाऽपि सर्पिषा ।
सप्ताहं वा पुराणस्य यावच्छुद्धेस्तु वर्चसः ॥ २६ ॥
शुद्धकोष्ठं तु तं ज्ञात्वा रसायनमुपाचरेत् ।
वयःप्रकृतिसात्म्यज्ञो योगिकं यस्य यद्भवेत् ॥ २७ ॥
संशोधन—हरड़ का चूर्ण, सेन्धा नमक, आवला, गुड़, वच, बायविडंग,
हल्दी, पीपल और सोंठ इनके चूर्ण को गरम पानी के साथ पीना चाहिये ।
संशोधन देने से पूर्व रोगी को स्नेहन और स्वेदन दे देना चाहिये । इस प्रकार
से शरीर के शुद्ध होने पर पेया आदि पथ्य के क्रम का अनुष्ठान कर चुकने पर
हीन, मध्यम और उत्तम शुद्धि की दृष्टि से तीन दिन, पाच दिन और सात
दिन जब तक पुराना मल बाहर न हो जाये तब तक यवान्न (जौ का बना
भोजन वा कुल्माष, मोटा धान्य ) घी के साथ देना चाहिये । जिस समय कोष्ठ
शुद्ध हो जाये उस समय रसायन का उपयोग करे । वय, प्रकृति और सात्म्य
को समझनेवाले वैद्य को चाहिये कि जो रसायन उपयोगी हो उसी का
प्रयोग करे ॥ २५-२७ ॥
हरीतकीं पञ्चरसामुष्णामलवणा शिवाम् ।
दोषानुलोमिनीं लघ्वीं विद्याद्दीपनपाचनीम् ॥ २८ ॥
आयुष्या पौष्टिकी धन्या वयसः स्थापनी पराम् ।
सर्वरोगप्रशमनीं बुद्धीन्द्रियबलप्रदाम् ॥ २९ ॥
हरड़ के गुण—यद्यपि आयुःस्थापक द्रव्यों में आवला ही श्रेष्ठ है,
परन्तु विरेचक गुण क होने से रोगनिवारक वस्तुओं में हरड़ ही श्रेष्ठ है । हरड़
मे लवण रस को छोड़ कर शेष पाचो रस हैं, उसे उष्ण वीर्य, कल्याणकारिणी,
दोषों का अनुलोमन करनेवाली, लघु, अग्निदीपक, पाचक, आयु को बढ़ानेवाली,
पौष्टिक, धन्य, उत्कृष्ट आयु.स्थापक, सब रोगों का नाश करने वाली, बुद्धि
इन्द्रिय बल को देने वाली जाने ॥ २८-२९ ॥
कुष्ठ गुल्ममुदावर्तं शोषं पाण्ड्वामय मदम् ।
अर्शांसि ग्रहणीदोषं पुराण विषमज्वरम् ॥ ३० ॥
हृद्रोगं सशिरोरोगमतीसारमरोचकम् ।
कासं प्रमेहमानाहं प्लीहानमुदरं नवम् ॥ ३१ ॥
कफप्रसेकं वैस्वर्यं वैवर्ण्यं कामलां कृमीन् ।
श्वयथुं तमकं छर्दिं क्लैव्यमङ्गावसादनम् ॥ ३२ ॥
स्रोतोविवन्धांन्विविधान् प्रलेपं हृदयोरसोः ।
स्मृतिबुद्धिप्रमोहं च जयेच्छीघ्रं हरीतकी ॥ ३३ ॥
कुष्ठ, गुल्म, उदावर्त्त, शोष, पाण्डुरोग, मद, अर्श, ग्रहणी, पुराने विषम
ज्वर, हृदयरोग, शिरोरोग, अतिसार, अरुचि, कास, प्रमेह, आनाह ( अफरा ),
प्लीहा ( बढ़ी तिल्ली ), नवीन उदररोग, कफ-प्रसेक ( मुख से लार बहना, कफ
का जाना ), स्वरभेद, विवर्णता, कामला, क्रिमिरोग, श्वयथु ( शोथ ), तमक,
छर्दि ( कै ), क्लीबता, अंगों का अवसाद ( शिथिलता ), रसवह आदि स्रोतों
के अवरोध, हृदय और छाती की कफ आदि से उत्पन्न लिप्तता, स्मृति और
बुद्धिनाश ( अज्ञान ) इन विकारों को हरड शीघ्र ही जीत लेती है ॥ ३०-३३ ॥
अजीर्णिनो रूक्षभुजः स्त्रीमद्यविषकर्षिताः ।
सेवेरन्नभयामेते क्षुत्तृष्णोष्णार्दिताश्च ये ॥ ३४ ॥
हरीतकी सेवन के योग्य व्यक्ति—अजीर्ण के रोगी, रूक्ष आहार करनेवाले,
स्त्री-सम्भोग या विष के कारण दुर्बल व्यक्ति भूख, प्यास और गरमी से पीड़ित
पुरुष हरड का सेवन करें ॥ ३४ ॥
तान् गुणांस्तानि कर्माणि विद्यादामलकेष्वपि ।
यान्युक्तानि हरीतक्या वीर्यस्य तु विपर्ययः ॥ ३५ ॥
अतश्चामृतकल्पानि विद्यात्कर्मभिरीदृश ।
हरीतकीनां शस्यानि भिषगामलकस्य च ॥ ३६ ॥
ओषधीनां परा भूमिर्हिमवान् शैलसत्तमः ।
तस्मात्फलानि तज्जानि ग्राहयेत्कालजानि तु ॥ ३७ ॥
आपूर्णरसवीर्याणि काले काले यथाविधि ।
आदित्य-सलिल-च्छाया-पवन प्रीणितानि च ॥ ३८ ॥
यान्यदग्धान्यपूतीनि निर्व्रणान्यगदानि च ।
तेषां प्रयोगं वक्ष्यामि फलानां कर्म चोत्तमम् ॥ ३६ ॥
आंवले के गुण-कर्म—हरड़ के समान ही आवले में गुण और कर्म जाने ।
परन्तु आवले का वीर्य हरड़ से विपरीत अर्थात् शीत है । इसलिये उपरोक्त गुणों
के कारण अस्थिरहित बीजरहित आवले और हरड़ को अमृत के समान समझना
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०१
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०१
चाहिये। गुठलीरहित हरड़ आवले का प्रयोग और परिमाण जानना चाहिये।
श्रेष्ठ हिमालय पर्वत ही औषधियों के लिये उत्कृष्ट भूमि है। इसलिये अपनी
ऋतु में उत्पन्न मौसमी फलो को हिमालय पर्वत से समय समय पर लेना चाहिये।
ये फल रस और वीर्य से परिपुष्ट होने चाहियें। ये फल सूर्य, वायु, छाया, पानी
से तृप्त व हरे-भरे होने चाहिये। जो फल कृमि आदि से न खाये हों सड़े न
हों, जिन पर चोट न लगी हो, रंग रहित हों, उन फलों का प्रयोग और उत्तम
कर्मों का अब उपदेश करूंगा ॥ ३५-३६ ॥
पञ्चानां पञ्चमूलानां भागानेकदशपलोन्मितान् ।
हरितकीसहस्रं च त्रिगुणामलकं नवम् ॥ ४० ॥
विदारिगन्धा बृहतीं पृश्निपर्णीं निदिग्धिकाम् ।
विद्याद्विदारिगन्धाद्यं श्वदंष्ट्रापञ्चमं गणम् ॥ ४१ ॥
बिल्वाग्निमन्थस्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलाम् ।
पुनर्नवां शूर्पपर्ण्यौ बलामैरण्डमेव च ॥ ४२ ॥
जीवकर्षभकौ मेदा जीवन्तीं सशतावरीम् ।
शरेक्षुदर्भकाशानां शालीनां मूलमेव च ॥ ४३ ॥
इत्येषा पञ्चमूलानां पञ्चानामुपकल्पयेत् ।
भागान्यथोक्तांस्तत्सर्वं साध्यं दशगुणेऽम्भसि ॥ ४४ ॥
दशभागावशेषं तु पूतं तं ग्राहयेद्रसम् ।
हरीतकीश्च ताः सर्वाः सर्वाण्यामलकानि च ॥ ४५ ॥
तानि सर्वाण्यनस्थीनि फलान्यापोथ्य कूर्चनैः ।
विनीय तस्मिन्निर्यूहे चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ ४६ ॥
मण्डूकपर्ण्याः पिप्पल्याः शङ्खपुष्प्याः प्लवस्य च ।
मुस्तानां सविडङ्गानां चन्दनागुरुणोस्तथा ॥ ४७ ॥
मधुकस्य हरिद्राया वचायाः कनकस्य च ।
भागांश्चतुष्पलान् कृत्वा सूक्ष्मेलायास्त्वचस्तथा ॥ ४८ ॥
सितोपलासहरुं च चूर्णितं तुल्याऽधिकम् ।
तैलस्य द्वयाढकं तत्र दद्यात् त्रीणि च सर्पिषः ॥ ४९ ॥
साध्यमौदुम्बरे पात्रे तत्सर्वं मृदुनाऽग्निना ।
ज्ञात्वा लेहमदग्धं च शीतं क्षौद्रेण ससृजेत् ॥ ५० ॥
क्षौद्रप्रमाणं स्नेहार्धं तत्सर्वं घृतभाजने ।
तिष्ठेत्सम्मूछितं तस्य मात्रा काले प्रयोजयेत् ॥ ५१ ॥
२०२ चरकसंहिता [ अ० १
या नोपरुन्ध्यादाहारमेतं मात्रां जरां प्रति ।
षष्टिकः पयसा चात्र जीर्णे भोजनमिष्यते ॥ ५२ ॥
ब्राह्म रसायन—पाचों पंच मूलो के पृथक् पृथक् दस पल ( एक पल = ८
तोले के ) लेने चाहिये । हरड़ एक हजार, नया आवला तीन हजार लेने
चाहियें । पाच पचमूल पहला ( १ ) पचमूल विदारिगन्धा ( शालपर्णी ),
( २ ) वृहती ( बड़ी कटेरी ), ( ३ ) पृश्निपर्णी, ( ४ ) निर्दिग्धका ( छोटी
कटेरी ) और ( ५ ) गोखरू ये पाच विदारोगन्वादि पचमूल है । इसको क्षुद्र
पचमूल भी कहते हैं ।
( २ ) दूसरा पचमूल—बिल्व ( बेल ), अग्निमन्य ( अरणी ), स्योनाक
( सोनापाठा ), काश्मरा ( गम्भारी ) और पाटला इसे महा-पञ्चमूल कहते हैं ।
( ३ ) तीसरा पचमूल—पुनर्नवा, शूर्पपर्णी, ( मुद्गपर्णी और माषपर्णी ),
बळा और एरण्ड ।
( ४ ) चौथा पचमूल ऋषभक, जीवक, मेदा, जीवन्ती और शतावरी ।
( ५ ) पाचवा पचमूल—शर, इक्षु, दर्भ, काश तथा शाली की जड़ ।
उपरोक्त औषधियों को दस गुणे जल में डाल कर क्वाथ करना चाहिये
और जल का दसवा भाग शेष रहने पर निर्मल वस्त्र से छान लेवे । हरड़ और
आवलों को निकाल कर इनकी गुठलियों को बाहर कर देना चाहिये । फिर
कुचल कर कूर्चनों से इनके रेशे बाहर कर लेने चाहियें । ✤ रेशे निकल जाने
पर हरड़ और आंवले की पिठ्ठी को क्वाथ में डाल देना चाहिये । साथ में
निम्न वस्तुओं का चूर्ण भी क्वाथ में मिला देना चाहिये । यथा—मण्डूकपर्णी,
पिप्पली, शखपुष्पी, प्लव ( केवटी मोथा ), मोथा, बायविडग, लालचन्दन,
अगरु, मुलहठी, हल्दी, वच, कनक ( नाग केसर ), छोटी इलायची और
दालचीनी, प्रत्येक चार पल, मिश्री १००० पल, तैल २ आढक, घी ३
✤ ( १ ) आवल और हरड़ के रेशे निकालने के लिये कूर्चनों का उपयोग
करते हैं । एक लकड़ी में तीन चार सूइया लगी रहती हैं। उन को इन पर
फेरने से रेशे इन में फस जाते हैं। हरड़ और आवले मे सूत होते हैं, इसलिये
लकड़ी के कूर्चनो का उपयोग करना चाहिये ' अथवा हरड़ और आंवले को
कपड़े में मथ कर निकालना चाहिये । इससे रेशे ऊपर रह जाते हैं ।
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०३
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०३
आढ़क * इन सब को औदुम्बर ( ताम्र ) के कलई किये बर्त्तन मे कोमलाग्नि
पर पाक करना चाहिये । जब लेह भली प्रकार बन जाये और जले नहीं, तब
उतार लेना चाहिये । ठण्डा होनेपर इसमें शहद मिलाना चाहिये । शहद की
मात्रा घी और तेल की मात्रा से आधी होनी चाहिये । इन सब को घी से
भावित पात्र मे रखना चाहिये । मात्रा ओर समय को देख कर इतना इस
अवलेह का खाये जो पच जाये और भूख को नष्ट न करे । [ साधारण मात्रा
एक तोला ] । सेवन करनेवाला व्यक्ति पूर्ववत् आहार राशि का उपयोग करे ।
इस अवलेह के जीर्ण होने पर दूध के साथ साठी चावलों का भात खाना
चाहिये ॥ ४०-५२ ॥
वैखानसा बालखिल्यास्तथा चान्ये तपोधनाः ।
रसायनमिदं प्राप्य बभूवुरमितायुषः ॥ ५३ ॥
मुक्त्वा जीर्णं वपुश्चाग्र्यमवापुस्तरुणं वयः ।
वीत तन्द्रा-क्लम-श्वासा निरातङ्काः समाहिताः ॥ ५४ ॥
मेधा-स्मृति-बलोपेताश्चिररात्रं तपोधनाः ।
ब्राह्मं तपो ब्रह्मचर्यं चेरुश्चात्यन्तनिष्ठया ॥ ५५ ॥
रसायनमिदं ब्राह्ममायुष्कामः प्रयोजयेत् ।
दीर्घमायुर्वयश्चाग्र्यं कामांश्चेष्टान् समश्नुते ॥ ५६ ॥
इति ब्राह्मरसायनम् ।
वैखानस, बालखिल्य और अन्य तपस्वी लोगों ने इस रसायन के सेवन से
अपरिमित आयु प्राप्त की । जीर्ण, शीर्ण, वृद्ध शरीर त्याग कर नया सुन्दर
जवान शरीर और आयु पाई । इसके सेवन से तपस्वी लोग तन्द्रा, क्लम (थकान)
श्वास (श्रमजन्य) से रहित, नीरोग, मेधा, स्मृति, बल से युक्त होकर बहुत
- परिभाषा-नियम से, घी और तैल द्विगुण करना चाहिये । अष्टांग-संग्रह
में यह योग आया है । वहा पर दुगने का विधान दिया है ।
यहा पर सब घी, तैल, क्वाथ, चूर्ण, मिश्री को एक साथ पाक करने की
विधि बतलाई है । यदि इनको पृथक् पृथक् भी पकाये तो भी कार्य हो जायेगा ।
हरड़ और आवले तो घी और तैल में भून कर रख ले । इस पिट्ठी को क्वाथ
और मिश्री में मिला कर पाक करें । आसन्न पाक होने पर मण्डूकपर्णी आदि
का चूर्ण मिला कर उतार लें और शीतल होने पर शहद मिला देवें ।
हरड़ और आवले को भूनते समय लोहे की कड़ाही या कोंचे का उपयोग
न करके कलई वाले पात्र तथा लकड़ी का प्रयोग करना उत्तम है ।
२०४ चरकसंहिता [ अ० १
दिनों तक ब्रह्म, तप, एवं ब्रह्मचर्य का अत्यन्त एकाग्रता (निष्ठा) के साथ
पालन कर सके । दीर्घायु को चाहनेवाले व्यक्ति को चाहिये कि इस रसायन
का उपयोग करे । इसके सेवन से दीर्घायु, श्रेष्ठ वय, मनचाही कामनायें प्राप्त
होती हैं ॥ ५३-५६ ॥
यथोक्तगुणानामामलकाना सहस्रं पिष्ट-स्वेदन-विधिना पयस ऊष्मणा
सुस्विन्नमनातपशुष्कमनस्थि चूर्णयेत्, तदामलकसहस्रं स्वरसपरिपोतँ
स्थिरा-पुनर्नवा-जीवन्ती- नागबला ब्रह्मसुवर्चला-मण्डूकपर्णी-शतावरी-
शङ्खपुष्पी-पिप्पली-वचा-विडङ्ग स्वयंगुप्तामृता-चन्दनागुरु-मधुक-मधूक-
पुष्पोत्पल-पद्म-मालती-युवती यूथिका-चूर्णाष्टभाग-संयुक्तं, पुनर्नार्गबला-
सहस्रपल-स्वरस-परिपोतमनातपशुष्कं द्विगुणितमषिषा क्षौद्रसर्पिषा वा
क्षुद्रगुडाकृति कृत्वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे भस्मराशेरधः स्थापयेदन्त-
र्भूमेः पक्षं कृतरक्षाविधानमथर्ववेदविदा, पक्षात्यये चोद्धृत्य कनक रजत-
ताम्र-प्रवाल-कालायस-चूर्णाष्टभाग-सयुक्तमर्धकर्षवृद्ध्या यथोक्तेन
विधिना प्रातः प्रातः प्रयुञ्जानोऽग्निबलमभिसमीक्ष्य जीर्णे च षष्टिकं
पयसा ससर्पिष्कमुपसेवमानो यथोक्तान् गुणान् समश्नुत इति ॥ ५७ ॥
ब्राह्म रसायन—ऊपर कहे हुए गुणों से युक्त एक हजार आवलों को पिष्ट-
स्वेदन विधि द्वारा दूध की गरमी से स्विन्न करना चाहिये* । जब
भली प्रकार से स्विन्न हो जायें तब इनकी गुठली निकाल कर इनको छाया में
शुष्ककर लेना चाहिये । शुष्क होने पर इनके चूर्ण को एक एक हजार आवलों
- पिष्ट-स्वेदन विधि कई प्रकार की है । जेमे—
(१) एक मलमल में आवले बाधकर हाड़ी के मुख मे लटका देना
चाहिये। हाडी मे दूध भर देना चाहिये । दूध आवलों को छुए नहीं । इसको
कोमल आग पर गरम करना चाहिये । जब आवले नरम हो जाये तब बाहर
कर ले । (२) हाडी मे दूध भर कर हाडी के मुख पर जाली या मलमल
बाधकर उस पर आवले रख दें। ऊपर से दूसरी हाडी ढाप दे। फिर गरम
करें। (३) हाडी में दूध भर कर ऊपर मुख पर घास आदि रखकर उस पर
आंवले रख कर गरम करें ।
(२) क्षुद्र गुड़ाकृति का अर्थ चक्रपाणि ने फाणित, राब किया है। राब
के समान होने पर—
(३) अष्टाग सग्रह में—'द्विगुण-सर्पिषा क्षौद्रेण' यह पाठ है। अर्थात्
शहद से घी दुगुना लेना चाहिये। यह ठीक भी है।
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०५
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०५
का स्वरस पिला देना चाहिये । आवंलों के ताजे रस में इस चूर्ण को रख देना
चाहिये । रस के शुष्क होने पर शालिपर्णी, पुनर्नवा, नागबला, ब्रह्म-सुवर्चला
( ब्राह्मी ), मण्डूकपर्णी, शतावरी, शंखपुष्पी ( शंखाहूलो ), पिप्पली, वच,
वायविडंग, कौंच, गिलोय, लाल चन्दन, अगरु, मुलहठी, महुवे के फूल, नीला
कमल, श्वेत कमल, मालती, युवती ( नवमालिका, मागरा ), यूथिका ( जूही,
श्वेतपुष्पा ), इनका चूर्ण मिलाना चाहिये । इन सब का चूर्ण स्वरस से भावित
आवले के चूर्ण से अष्टमाश होना चाहिये । फिर इस सम्पूर्ण चूर्ण में एक
हज़ार पल नागबला का स्वरस डालकर छाया मे शुष्क करना चाहिये । शुष्क
होने पर दुगना घी अथवा एक साथ मिले घी और शहद मिलाकर गुड़ के
समान बन जाने पर छोटा छोटी डलिया बाघकर घी से भावित पवित्र दृढ़ पात्र
मे रखकर उपलों की राख मे भूमि क अन्दर गाड़ देना चाहिये । अथर्ववेद
के ज्ञाता विद्वानों से रक्षाविधान कराके गत्तं में गाड़ना चाहिये । पन्द्रह दिन
तक औषध को भूमि मे गड़े रहने देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे निकाल
कर स्वर्ण, चादी, ताम्र, प्रवाल, कालायस ( फौलाद ) की भस्मों को औषध
मे अष्टमाश मिलाना चाहिये । इस रसायन को कुटी-प्रावेशिक विधि के अनुसार
आधा कर्ष ( १ तोला ) से प्रारम्भ करके धीरे धीरे आधा आधा कर्ष बढ़ाते
हुए प्रातः सेवन करना चाहिये । इसका प्रयोग करते समय अग्नि के बल का
ध्यान रखना चाहिये । जब यह औषध जीर्ण हा जाये तब घी से मिश्रित साठा
के भात को दूध के साथ खाना चाहिये । इस रसायन से उपरोक्त कहे गुण
प्राप्त होते हैं ॥ ५७ ॥
भवन्ति चात्र — इदं रसायन ब्राह्मं महर्षिगणसेवितम् ।
भवत्यरोगो दीर्घायुः प्रयुञ्जानो महाबलः ॥ ५८ ॥
कान्तः प्रजाना सिद्धार्थश्चन्द्रादित्यसमद्युतिः ।
श्रुतं धारयते सत्त्वमार्षं चास्य प्रवर्तते ॥ ५६ ॥
धरणीधरसारश्च वायुना समविक्रमः ।
स भवत्यविष चास्य गात्रे संपद्यते विषम् ॥ ६० ॥
इति ब्राह्मरसायनद्वितीययोगः ।
इस ब्राह्म रसायन को महर्षियों ने सेवन किया था । इसके सेवन से पुरुष
नीरोग, दीर्घायु, महाबलशाली जनता मे प्रिय, सुन्दर ( जिसे जनता चाहती
है ), उसकी सब इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं । वह चन्द्रमा और सूर्य के समान
कान्तियुक्त होता है, वह सुनते ही याद कर लेता है, उसका मन आर्षप्रकृति का