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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 616 में से

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पृष्ठ 214

हृद्रोगं सशिरोरोगमतीसारमरोचकम् ।
कासं प्रमेहमानाहं प्लीहानमुदरं नवम् ॥ ३१ ॥
कफप्रसेकं वैस्वर्यं वैवर्ण्यं कामलां कृमीन् ।
श्वयथुं तमकं छर्दिं क्लैव्यमङ्गावसादनम् ॥ ३२ ॥
स्रोतोविवन्धांन्विविधान् प्रलेपं हृदयोरसोः ।
स्मृतिबुद्धिप्रमोहं च जयेच्छीघ्रं हरीतकी ॥ ३३ ॥
कुष्ठ, गुल्म, उदावर्त्त, शोष, पाण्डुरोग, मद, अर्श, ग्रहणी, पुराने विषम
ज्वर, हृदयरोग, शिरोरोग, अतिसार, अरुचि, कास, प्रमेह, आनाह ( अफरा ),
प्लीहा ( बढ़ी तिल्ली ), नवीन उदररोग, कफ-प्रसेक ( मुख से लार बहना, कफ
का जाना ), स्वरभेद, विवर्णता, कामला, क्रिमिरोग, श्वयथु ( शोथ ), तमक,
छर्दि ( कै ), क्लीबता, अंगों का अवसाद ( शिथिलता ), रसवह आदि स्रोतों
के अवरोध, हृदय और छाती की कफ आदि से उत्पन्न लिप्तता, स्मृति और
बुद्धिनाश ( अज्ञान ) इन विकारों को हरड शीघ्र ही जीत लेती है ॥ ३०-३३ ॥
अजीर्णिनो रूक्षभुजः स्त्रीमद्यविषकर्षिताः ।
सेवेरन्नभयामेते क्षुत्तृष्णोष्णार्दिताश्च ये ॥ ३४ ॥
हरीतकी सेवन के योग्य व्यक्ति—अजीर्ण के रोगी, रूक्ष आहार करनेवाले,
स्त्री-सम्भोग या विष के कारण दुर्बल व्यक्ति भूख, प्यास और गरमी से पीड़ित
पुरुष हरड का सेवन करें ॥ ३४ ॥
तान् गुणांस्तानि कर्माणि विद्यादामलकेष्वपि ।
यान्युक्तानि हरीतक्या वीर्यस्य तु विपर्ययः ॥ ३५ ॥
अतश्चामृतकल्पानि विद्यात्कर्मभिरीदृश ।
हरीतकीनां शस्यानि भिषगामलकस्य च ॥ ३६ ॥
ओषधीनां परा भूमिर्हिमवान् शैलसत्तमः ।
तस्मात्फलानि तज्जानि ग्राहयेत्कालजानि तु ॥ ३७ ॥
आपूर्णरसवीर्याणि काले काले यथाविधि ।
आदित्य-सलिल-च्छाया-पवन प्रीणितानि च ॥ ३८ ॥
यान्यदग्धान्यपूतीनि निर्व्रणान्यगदानि च ।
तेषां प्रयोगं वक्ष्यामि फलानां कर्म चोत्तमम् ॥ ३६ ॥
आंवले के गुण-कर्म—हरड़ के समान ही आवले में गुण और कर्म जाने ।
परन्तु आवले का वीर्य हरड़ से विपरीत अर्थात् शीत है । इसलिये उपरोक्त गुणों
के कारण अस्थिरहित बीजरहित आवले और हरड़ को अमृत के समान समझना