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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 616 में से

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पृष्ठ 600

६१६ चरकसंहिता [ अ० १५
श्योनाकोदीच्यकट्वङ्गवत्सकत्वग्दुरालभाः ॥ १३५ ॥
दार्वी पर्पटकं मूर्वा१ यवानी मधुशिग्रुकम् ।
पटोलपत्रं सिद्धार्थान् यूथिकां जातिपल्लवान् ॥ १३६ ॥
जम्ब्वाम्रबिल्वमध्यानि निम्बशाकफलानि च ।
त२द्रोगशममन्विच्छन् भूनिम्बाद्येन योजयेत् ॥ १३७ ॥
( २८ ) वच, अतीस, पाठा, सतवन रसाञ्जन ( रसौत ), श्योनाक ( सोना-
पाठा ), उदीच्य, ( नेत्रवाला ), कट्त्वग ( श्योनाक ) [ दो बार पढ़ने से दो
बार लेना चाहिये ], वत्सकत्वग् ( कूडे की छाल ), दुरालभा ( धमासा ),
दार्वी ( दारूहल्दी ), पित्तपापडा, मूर्वा, अजवायन, मधु, शिग्रु ( मीठा सुहा-
जना ), पटोलपत्र, सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), यूथिका ( जूई ) और चमेली के
पत्ते, जामुन, बेलगिरी, आम की गुठली और नीम तथा शाक-वृक्ष के फल
इनको कूट कर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको गुड़ के शर्बत के साथ पीना
चाहिये अथवा भूनिम्बादि गण की वस्तुओ से मिलाकर खाना चाहिये । इससे
उपरोक्त रोग शान्त होते है३ ॥१३५-१३७॥
किराततिक्तं षड्ग्रन्था त्रायमाणा कटुत्रिकम् ।
चन्दनं पद्मकोशीरं दार्वी त्वक् कटुरोहिणी ॥ १३८ ॥
कुटजत्वक्फलं मुस्तं यवानी देवदारु च ।
पटोलनिम्बपत्रैलासौराष्ट्रातिविषात्वचः ॥ १३९ ॥
मधुशिग्रोश्च बीजानि मूर्वापर्पटकं तथा ।
तच्चूर्णं मधुना लेह्यं पेयं मद्येर्जलेन वा ॥ १४० ॥
हृत्पाण्डुग्रहणीरोगगुल्मशूलारुचिज्वरान् ।
कामला सन्निपातं४ च मुखरोगांश्च नाशयेत् ॥ १४१ ॥
इति किराताद्यं चूर्णम् ।
( २६ ) किराताद्य चूर्ण—चिरायता, षड्ग्रन्था ( वच ), त्रायमाणा, सोठ
मरिच, पिप्पली, चन्दन, पद्माख, उशीर, ( खस ), दारूहल्दी, दालचीनी,
कुटकी, पटोल, नीम के पत्ते, इलायची, सौराष्ट्र ( सुराष्ट्री ), अतीस, त्वच ( दाल-
चीनी), मीठे सुहाजने के बीज, मूर्वा, पित्तपापड़ा इनको समान भाग लेकर
इसका चूर्ण करना चाहिये । इस चूर्ण को मधु के साथ चाटना चाहिये । अथवा
१. पाठा इति पाठान्तरम् । २ हृद्रोग इति पाठान्तरम् । ३. शाक वृक्ष के
लिये डल्हण ने लिखा है कि—'कर्कशमसृणपृष्ठोदरपत्रो वृक्षः, महाखरपत्र' ।
यह सागोन का भेद प्रतीत होता है । ४. 'पाण्डुरोग च' इति वा पाठः ।