सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 562, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 562

५७८ चरकसंहिता [ अ० १४
( ४३ ) कूड़े की छाल के क्वाथ के साथ थोडा सा सोठ चूर्ण मिला कर
लेने से स्निग्ध रक्त (कफ मिश्रित रक्त का) अवरोध होता है । इसी प्रकार
से अनार की छाल और चन्दन के क्वाथ को सोंठ के चूर्ण के साथ देने से
स्निग्ध रक्त का अवरोध होता है ॥ १८६ ॥
चन्दनकिराततिक्तकधन्वयवासाः सनागराः कथिताः ।
रक्तार्शासां प्रशमना दार्बीत्वगुशीरनिम्बाश्च ॥ १८७ ॥
(४४) चन्दन, चिरायता, धमासा, बासा और सोंठ, दारुहल्दी की छाल,
खस तथा नीम की छाल इनका क्वाथ रक्तजन्य अर्श मे शान्ति करता है ।
दारुहल्दी की छाल, खस और नीम की छाल इनको पृथक् भी प्रयोग करने से
रक्त रुकता है ॥ १८७ ॥
सातिविषा कुटजत्वक् फलं च सरसाञ्जनं मधुयुतानि ।
रक्तापहानि दद्यात्पिपासवे तण्डुलजलेन ॥ १८८ ॥
(४५) अतीस, कूड़े की छाल, इन्द्रजौ, रसौत इनके चूर्ण को मधु मे
मिला कर प्यास लगने पर तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये । यह योग
रक्तनाशक है ॥ १८८ ॥
कुटजत्वचो विपाच्यं पलशतमाद्रं महेन्द्रसलिलेन १ ।
यावत्स्याद् गतरसं तद्द्रव्यं पूतो रसस्ततो ग्राह्यः ॥ १८९ ॥
मोचरसः समङ्गा फलिनी च पलांशिकै २ स्त्रिभिस्तैश्च ।
वत्सकबीजं तुल्यं चूर्णीकृतमत्र प्रदातव्यम् ॥ १९० ॥
पूतोत्कथितः सान्द्रः स रसोऽदार्वाप्रलेपनो ग्राह्यः ।
मात्राकालोपहिता रसक्रियैषा जयत्यसृक्स्रावम् ३ ॥ १९१ ॥
छागलिपयसा युक्ता ४ पेया मण्डेन वा यथाग्निबलम् ।
जीर्णौषधश्च शालीन् पयसा छागेन भुञ्जीत ॥ १९२ ॥
रक्तार्शांस्यतिसारं रक्तं सासृग्रुजो निहन्त्याशु ।
बलवच्च रक्तपित्तं रसक्रियैषा जयत्युभयभागम् ॥ १९३ ॥
इति कुटजादिरसक्रिया ।
(४६) कुटजादि-रस-क्रिया—कूडे की गीली छाल १०० पल लेकर बरसात
का पानी एक द्रोण लेकर इसमे क्वाथ करना चाहिये । जब सब रस निकल जाये
और अष्टमाश रह जाये तब छान लेना चाहिये । इसमें मोचरस (सीम्बल का
१ 'तु मेघसलिलेन' इति, २ 'समांशिकै' इति,
३ 'जयति रक्तम्' इति, ४ 'पीता' इति च पाठान्तराणि ।