चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५५८ चरकसंहिता [अ० १४
तुम्बुरूणि विडङ्गानि देवदार्वक्षता घृतम् ।
बृहती चाश्वगन्धा च पिप्पल्यः सुरसा घृतम् ॥ ५१ ॥
वराहवृषद्विट् चैव धूपनं शक्तवो घृतम् ।
कुञ्जरस्य पुरीषं च घृतं सर्जरसो रसः ॥ ५२ ॥
(४) धूपन—काला साप, सुअर, ऊट, जोंक, वृषदंश (बिल्ली) इनकी
वसा से अर्शों को स्निग्ध करके धूपन देना चाहिये¹ ।
(१) धूपन के लिये पुरुषो के बाल, साप की केचुली, बिल्ली की त्वचा,
आक की जड़, शमी (खेजडा) वृक्ष के पत्ते हितकारी है। इन वस्तुओ को घी
के साथ बरतना चाहिये² । (२) तुम्बरू, बायविडग, देवदारु, अक्षत और
घी इनका धूपन देना चाहिये । (३) बड़ी कटेरी का फल, असगन्ध, पिप्पली,
तुलसी और घी इनका धूपन देना चाहिये । (४) सुअर की विष्ठा, बिल्ली की
विष्ठा, सत्तू और घी इनका धूप देना चाहिये । (५) हाथी की विष्ठा, घी और
राल इनका धूप देना चाहिये । धूपन के लिये पाच याग है ॥४६-५२॥
हरिद्राचूर्णसंयुक्तं सुधाक्षीरं प्रलेपनम् ।
गोपित्तपिष्टाः पिप्पल्यः सहरिद्राः प्रलेपनम् ॥ ५३ ॥
शिरीषबीजं कुष्ठं च पिप्पल्यः सैन्धवं गुडः ।
अर्कक्षीरं सुधाक्षीरं त्रिफला च प्रलेपनम् ॥ ५४ ॥
पिप्पल्यश्चित्रकः श्यामा किण्वं मदनतण्डुलाः ।
प्रलेपः कुक्कुटशकृद्धरिद्रागुडसंयुतः ॥ ५५ ॥
निकुम्भः सामृतासङ्गः पारावतशकृद्गुडः ।
प्रलेपः स्याद् गजास्थीनि निम्बो भल्लातकानि च ॥ ५६ ॥
प्रलेपः स्यादलर्केण वासन्तकवसायुतः ।
शूलश्वयथुहृद्युक्तश्शुलुकीवसायाऽथवा ॥ ५७ ॥
आर्कं पयः सुधाकाण्ड कटुकालाबुपल्लवाः ।
करञ्जो बस्तमूत्रं च लेपनं श्रेष्ठमर्शसाम् ॥ ५८॥
(५) आठ प्रलेप—(१) हल्दी के चूर्ण को थोर के दूध मे मिला कर
१ कहीं २ पर 'जलौका' के स्थान पर 'जतुका' पाठ है जिससे मकड़ी
लेना । वाग्भट मे 'जलौका' पाठ है । यथा—'कृष्णाहिबिडालोष्ट्रजलौकाशूकर-
वसाभिर्वा अभ्यज्य।'
२ वाग्भट मे यह योग इस प्रकार से पढ़ा है—'धूपयेच्च सघृतशमीपत्रार्क-
मूलमानुषकेशाहिनिर्मोकबिडालचर्मभिः इससे घी लेना चाहिये ।