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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 616 में से

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पृष्ठ 539

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५५
पाक ये अर्श रोगी को मार देते हैं, इन लक्षणों वाला रोगी असाध्य है । जो
अर्श सहज (गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न हुए), सन्निपातजन्य तथा भीतर की
वलि मे आश्रित होते है, वे सब असाध्य होते है ॥ २७-२६ ॥
शेषत्वादायुषस्तानि चतुष्पादसमन्विते ।
याप्यन्ते दीप्तकायाग्नेः प्रत्याख्येयान्यतोऽन्यथा ॥ ३० ॥
द्वन्द्वजानि द्वितीयायां वलो यान्याश्रितानि च ।
कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सराणि च ॥ ३१ ॥
असाध्य दो प्रकार के हैं, याप्य और प्रत्याख्येय । यदि रोगी की आयु शेष
हो, भिषक्, औषध, रोगी ओर उपचारक ये चारो पाद मिल जाये, रोगी की
अग्नि प्रदीप्त हो तो सहज आदि अर्श याप्य है और यदि आयु शेष न हो,
चारो पाद न मिले तथा अग्नि मन्द हो तो, 'प्रत्याख्येय' असाध्य हैं ॥३०-३१॥
बाह्याया तु वलौ जातान्येकदोषोल्बणानि च।
अर्शांसि सुखसाध्यानि न विरोत्पतितानि च ॥ ३२ ॥
साध्य भी दो प्रकार के है। सुखसाध्य और कष्टसाध्य । जो अर्श द्वन्द्वज
तथा दूसरी वलि मे आश्रित हो ओर एक साल पुराने हो जाते है, वे कष्टसाध्य
हैं। जो अर्श बाह्य-वलि मे उत्पन्न हो, जिनमे एक दोष की प्रबलता हा और
नूतन ही उत्पन्न हुए हो तो वे सुखसाध्य होते है ॥ ३२ ॥
तेषां प्रशमने यत्नमाशु कुर्याद्विचक्षणः ।
तान्याशु हि गुदं बद्ध्वा कुर्युर्बद्धगुदोदरम् ॥ ३३ ॥
इन अर्शो की शान्ति के लिये वैद्य को शीघ्र ही यत्न करना चाहिये ।
क्योकि ये अर्श गुदा को रोक कर शीघ्र ही बद्धगुदोदर-रोग को उत्पन्न
कर देते है ॥ ३३ ॥
तत्राऽऽहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम् ।
दाहं क्षारेण चाप्येके'दाहमेके तथाऽग्निना ॥ ३४ ॥
अस्त्येतद् भूरितन्त्रेण धीमता दृष्टकर्मणा ।
क्रियते त्रिविधं कर्म भ्रंशस्तस्य सुदारुणः ॥ ३५ ॥
पुंस्त्वोपघातः श्वयथुर्गुदे वेगविनिग्रहः ।
आध्मानं दारुणं शूलं व्यथा रक्तातिवर्तनम् ॥ ३६ ॥
पुनर्विरोहो रूढानां छेदो भ्रंशो गुदस्य च ।
करणं वा भवेच्छिद्रं शस्त्रक्षाराग्निविभ्रमात् ॥ ३७ ॥
चिकित्सा—अर्श की शान्ति के लिये एक वैद्य का कथन है कि शस्त्र से