चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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और भोजन घट जाये, श्वास रोग, शूल तथा इन्द्रिया निर्बल हो जाये तो असाध्य
समझना चाहिये ऐसे रोगी की चिकित्सा न करे ॥१६-॥
अपां दोषे हरण्यादौ विदध्यादुदकोदरे ॥ ९२ ॥
मूत्रयुक्तानि तीक्ष्णानि विविधक्षारवन्ति च ।
दीपनीयैः कफघ्नैश्च तमाहारैरुपाचरेत् ॥ ९३ ॥
द्रव्येभ्यश्चोदकादिभ्यो नियच्छेदनुपूर्वशः ।
सर्वमेवोदर प्रायो दोषसंघातजं मतम् ॥ ९४ ॥
तस्मात्त्रिदोषशमनी क्रिया स-ेषु कारयेत् ।
( ८ ) उदकोदर की चिकित्सा—उदकोदर मे प्रथम जलीय दोषों को
निकालने क लिये मूत्र और क्षीरयुक्त तीक्ष्ण ओषधिया देनी चाहिये। भोजन मे
अग्नि-दीपक और कफनाशक भाजन देने चाहिये। धीरे-धीरे पानो आदि द्रव
वस्तुओ से रोगी का हटाना चाहिये ।
प्राय सब उदर रोगो मे वातादि तोना दोषो का मिश्रण रहता है। इसलिये
सब उदरो मे तीनों दोषो की सक्षमनो-क्रिया करनी चाहिये ॥६२-६४॥
दोषैः कुक्षौ हि संपूर्गे वह्निर्मन्दत्वमृच्छति ॥ ९५ ॥
तस्माद्भोज्यानि योज्यानि दीपनानि लघूनि च ।
रक्तशालीन्यवान्मुद्गाञ्जाङ्गलांश्च मृगद्विजान् ॥ ९६ ॥
पयोमूत्रासवारिष्टान्मधुशीधूंस्तथा सुराम् ।
यवागूमोदनं वापि यूषैरद्याद्रसैरपि ॥ ९७ ॥
मन्दाम्लस्नेहकटुभिः पञ्च १ मूलोपसाधितैः।
उदर मे दापो के भर जाने से अग्नि मन्द पड़ जाती है। इसलिये दीपनीय
और लघु भोजन रोगी को देने चाहिये। इसके लिये लाल चावल, जौ, मूग,
जागल पशु पक्षियों का मास, दूध, मूत्र, आसव-अरिष्ट, मधु, सीधु (गन्ने के
रस को पका कर बनाया ), सुरा (मद्य ), यवागू, ओदन को अल्प स्नेह तथा
अल्प खटाई वाले, कटु रस तथा पचमूल क्वाथ से साधित मूग आदि के यूष
तथा मास-रस के साथ देना चाहिये ॥६५-६७॥
औदकानूपजं मांसं शाकं पिष्टकृतं तिलान् ॥ ९८ ॥
व्यायामाध्वदिवास्वप्नं यानयानं च वर्जयेत् ।
तथोष्णलवणाम्लानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ ९९ ॥
नाद्यादन्नानि जठरी तोयपानं च वर्जयेत् ।
१. 'यच्च' इति च पाठः ।