चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८१
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८१
क्वाथ-योग श्लोक के चतुर्थांशो में कहे गये है । इनको शहद के साथ मिलाकर
प्रयोग करे । ये पित्तनाशक है ॥ ३०-३२ ॥
सर्वेषु मेहेषु मतौ तु पूर्वौ कषाययोगौ विहितास्तु सर्वे ।
मन्थस्य पाने यवभावनाया स्युर्भोजने पानविधौ पृथक्च ॥ ३३ ॥
सिद्धानि तैलानि घृतानि चैव देयानि मेहेष्वनिलात्मकेषु ।
मेदः कफश्चैव कषाययोगैः स्नेहेश्च वायुः शममेति तेषाम् ॥ ३४ ॥
( १) सब से पूर्व (दार्बी और सुराह्वा) कहे दो योगो को सब प्रकार के
प्रमेहो मे देवे । इन बाईस प्रयोगो को मन्थ के पान मे, जौ की भावना देने
मे, भक्ष्य और पेय पदार्थों के सस्कार मे विवेचनापूर्वक देवे ।
( २ ) वात प्रमेह में इन्हीं कषायो से सिद्ध घी और तैल का प्रयोग करे ।
इन कषाया से मेद और कफ शान्त होते हे और स्नेहन से वायु शान्त
होता है ॥ ३३-३४ ॥
[ वातज और कफपित्तज मे यापन के लिये कषाय पीये वसामेह में
अग्निमन्थ का, मज्जामेह मे गिलोय और चीते का, उसमे कूठ, कुड़ा, पाठा
और कटुरोहिणी मिला ले । हस्तिमेह मे हाथी, शूकर, गधा, ऊट इनकी अस्थि
के सार का उपयोग करे । मधुमेह मे कदर और खदिर का, कफानुगतादि मेहो
मे तदनुसार उपदेश किये कषायो से साधित तैलो का उपयोग करे ओर पित्तानु-
गत म घृत और यमको का प्रयोग करे—अष्टाग-स० ] ।
कम्पिल्लसप्तच्छदशालजानि बैभीतरौहीतककौटजानि ।
कपित्थपुष्पाणि च चूर्णितानि क्षौद्रेण लिह्यात्कफपित्तमेही ॥ ३५ ॥
पिबेद्रसेनामलकस्य वापि कल्कीकृतान्यक्षसमानि काले ।
जीर्णे च भुञ्जीत पुराणमन्नं मेही रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ॥ ३६ ॥
( ३ ) कफ प्रमेह और पित्त-प्रमेह मे—कमीला, सतवन की छाल, शाल
की लकडी इनका चूर्ण या बहेडा, रोहेडा की छाल, कुटज की छाल इनका
चूर्ण अथवा कैथ के फूलो के चूर्ण को मधु के साथ चाटे । अथवा इन्ही तीनो
योगो मे से एक का चूर्ण ( एक कर्ष ) करके आवले के रस के साथ पीवे ।
औषध के जीर्ण होने पर पुराने शालि आदि के भात को जगल पशु-पक्षियो के
स्वादु मास-रसो के साथ खावे ॥ ३५-३६ ॥
दृष्ट्वाऽनुबन्धं पवनात्मकस्य पित्तस्य वा स्नेहविधिर्विकल्प्यः ।
तैलं कफे स्यात्त्वकषायसिद्धं पित्ते घृतं पित्तहरैः कषायैः ॥ ३७ ॥
वायु के साथ पित्त या कफ का अनुबन्ध देखकर स्नेह विधि मे भेद
करना चाहिये । अर्थात् कफ मे कफघ्न औषधियो के कषाय मे सिद्ध तैल बरते ।
पित्त का अनुबन्ध होने पर पित्तघ्न ओषधियो के कषाय मे सिद्ध घृत बरते ॥३७॥
३८२ चरकसंहिता [ अ० ६
त्रिकण्टकाश्मन्तकसोमवल्कैर्भल्लातकैः सातिविषैः सलोध्रैः ।
वचापटोलार्जुननिम्बमुस्तैर्हरिद्रया पद्मकदीप्यकैश्च ॥ ३८ ॥
मञ्जिष्ठया वाऽगुरुचन्दनैश्च सर्वैः समुस्तैः कफवातजेषु ।
मेहेषु तैलं, विपचेद् घृतं तु पैत्तेषु, मिश्रं त्रिषु लक्षणेषु ॥ ३६ ॥
( ५ ) त्रिकण्टकाद्य तैल, घृत और यमक—( १ ) गोखरू, अश्मन्तक,
सोमवल्क ( श्वेत खदिर ) । ( २ ) भिलावा अतीस, लोध । ( ३ ) वच, पर-
वल, अर्जुन, नीम की छाल, नागरमोथा । ( ४ ) हल्दी, पद्माख, अजवायन ।
( ५ ) मजीठ, अगर और लाल चन्दन इन पाच योगो को मोथे के साथ मिला
कर कफ-वातजन्य प्रमेहो ( कफमेह मे वायु का योग हो ) मे, तैल का पाक
करे । तैल से चतुर्थाश कल्क और चौगुने जल मे धीरे २ तैल पकावे । पित्त-
जन्य प्रमेह मे वायु का अनुबन्ध हा तो इनके कल्क से घृत पाक करे । तीनो
दोषो के लक्षण हो तो इन्ही द्रव्यो के कल्क से घी और तैल के यमक को यथा-
विधि सिद्ध करके प्रयोग करे१ । ॥३८-३६॥
फलत्रिकं दारुनिशा विशालां मुस्ता च निःक्वाथ्य निशा सकल्काः ।
पिवेत्कषाय मधुसंप्रयुक्तं सर्वप्रमेहेषु समुद्धृतेषु ॥ ४० ॥
( ६ ) फल त्रिकादि क्वाथ—त्रिफला, दारुहल्दी, विशाला ( इन्द्रायण ),
मोथा इनका क्वाथ करके हल्दी के कल्क का प्रक्षेप मिला कर मधु के साथ
प्रवृद्ध प्रमेहो मे पीवे ॥४०॥
लोध्रं शटी पुष्करमूलमेलां मूर्वा विडङ्गं त्रिफलां यवानीम् ।
चव्यं प्रियंगुं क्रमुक विशाला किराततिक्तं कटुरोहिणीं च ॥ ४१ ॥
भाङ्गीनतं चित्रकपिप्पलीना मूलं सकुष्ठातिविष सपाठम् ।
कलिङ्गकान्केशरमिन्द्रसाह्वा नख सपत्रं मरिचं सर्वं च ॥ ४२ ॥
द्रोणेऽम्भसः कर्षसमानि पक्त्वा पूते चतुर्थागजलावशेषे ।
रसेऽर्धभागं मधुनः प्रदाय पक्षं निधेयो घृतभाजनस्थः ॥ ४३ ॥
लोध्रासवोऽय कफपित्तमेहान् क्षिप्रं निहन्याद् द्विपलप्रयोगात् ।
पाण्ड्वामयार्शांस्यरुचि ग्रहण्या दोष किलासं विविधं च कुष्ठम् ॥४४॥
इति लोध्रासवः२ ।
१ यहा पर पाच योग है । सब के साथ मोथा मिलाना चाहिये । कई
आचार्य ‘समुस्तैः’ के स्थान पर ‘समस्तै ’ पढते है । उनके लिये एक ही योग
है । अष्टाग-सग्रह मे इसको एक ही योग पढा है । वहा पर चतुर्जातक का
प्रयोग करने के लिये लिखा है । २ ‘मध्वासव’ इति च पाठः ।